श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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आनन्दसे वास करते हैं। उस कमलके विस्तृत दलसमूह ही श्रीकृष्णप्रेयसी श्रीराधा आदि ब्रजाङ्गनाओंके उपवन-स्वरूप धामविशेष हैं। चित्-शक्तिसे प्रकाशित श्रीकृष्णलोक विविध आनन्दमय वैचित्र्य-विकाससे विभिन्न तरु, लता, पत्र, पुष्प, वन, सरोवर, नदी, पर्वत, पशु, पक्षी और पतङ्गादि शोभा-सम्पत्तिसे सुसज्जित होकर श्रीकृष्णका सुखसाधन करता है। परन्तु हमारे इन्द्रिय-ज्ञानके द्वारा गोचर मायिक जगत्की अनित्य शोभा-सौन्दर्यके समान वह सब चित्-वैचित्र्य परिणामी (नश्वर) नहीं है, अपितु अपरिणामी और नित्य नव-सुखप्रद है। वहाँ सभी वस्तुएँ ही चिन्मय, चिद्धर्म-समन्वित हैं और वे सभी सब प्रकारसे अपने नाथ श्रीकृष्णके सेवा-सुखमें रत हैं। श्रीकृष्णके एकात्म-रूप स्वयंप्रकाश श्रीबलदेव ही निजांशसे उस श्रीधाम-स्वरूपमें उनकी सेवा करते हैं। वहाँ कालका प्रवेश नहीं है। अनादि-अनन्त आनन्द-मुहूर्त चिरस्थिर-भावसे श्रीकृष्णसेवामें तन्मय है। वहाँ कभी भी भूत-वर्तमान-भविष्यरूपमें काल विभक्त नहीं है। किन्तु श्रीभगवान्की अचिन्त्य शक्तिसे भूत-वर्तमान-भविष्यकी जो आनन्दके लिये उपयोगिता है, वह श्रीकृष्ण-सुख-साधनकी सहायिका सेविकारूपमें सदा वर्तमान है। वहाँ कुसुम हैं, कुसुममें कीट नहीं हैं। वहाँ चन्द्र-सूर्यादि प्रकाश वितरण नहीं करते, वह चिदानन्दमय स्वप्रकाशित धाम है। ब्रह्मसंहिता (५/५६)— “श्रियः कान्ताः कान्तः परमपुरुषः कल्पतरवो द्रुमा भूमिचिन्तामणिगणमयी तोयममृतम्। कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रियसखी चिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च॥ स यत्र क्षीराब्धिः स्रवति सुरभीभ्यश्च सुमहान् निमेषार्द्धाख्यो वा व्रजति न हि यत्रापि समयः। भजे श्वेतद्वीपं तमहमिह गोलोकमिति यं विदन्तस्ते सन्तः क्षितिविरलचाराः कतिपये॥” अर्थात् “जहाँ अप्राकृत लक्ष्मीगण कान्ताएँ हैं, परमपुरुष श्रीकृष्ण ही एकमात्र कान्त हैं, वृक्षमात्र ही चिन्मय-कल्पतरु हैं, भूमिमात्र ही चिन्तामणि अर्थात् चिन्मय मणियाँ हैं, जलमात्र ही अमृत है, कथामात्र ही संगीत है, गमनमात्र अर्थात् चलना-फिरना ही नृत्य है, वंशी-प्रियसखी है, ज्योति-चिदानन्दमय है, परम-चित्पदार्थमात्र ही आस्वादनीय या भोग्य है, जहाँ करोड़ों-करोड़ों सुरभी-गायोंसे चिन्मय महाक्षीरसमुद्र निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, वहाँ भूत और भविष्यत् रूप कालका खण्डत्व नहीं है—अखण्ड नित्यकाल वर्तमान है। इसलिये वहाँ निमेषार्द्ध काल (पलक झपकनेका आधा काल) भी अतीत नहीं होता। उसी श्वेतद्वीपरूप परमपीठका मैं भजन करता हूँ। उसी धामको इस जगत्में कोई-कोई विरले अल्पसंख्यक साधुजन ही गोलोक नामसे जानते हैं।” उस षट्कोण गोकुलके बाहर अवस्थित चारों ओर श्वेतद्वीप नामका अद्भुत चतुष्कोण युक्त स्थान है। श्वेतद्वीप—चार खण्डोंमें चारों ओरसे विभक्त है। उसके एक-एक भागमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका धाम है। उन चारों धामोंमें—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप चार पुरुषार्थ हैं और उन पुरुषार्थोंके हेतुस्वरूप मन्त्रमय ऋक्, यजु, साम और अथर्व—ये चारों
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वेद सुशोभित हैं। आठ दिशाएँ एवं उर्द्ध और अधः क्रमसे दस दिशाओंमें दस शूल निबद्ध हैं तथा आठों दिशाओंमें महापद्म, पद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द और नील—ये आठ रत्न हैं। मन्तर्रूपी दश दिक्पाल दस दिशाओंमें वर्तमान हैं। श्यामवर्ण, गौरवर्ण, रक्तवर्ण और शुक्लवर्णके पार्षदसमूह तथा विमला आदि अद्भुत शक्तियोंके समुदायसमूह समस्त दिशाओंमें शोभित हो रहे हैं।
गोकुल और श्वेतद्वीपकी विभिन्न सीमा निर्दिष्ट होनेपर भी गोकुल अर्थात् व्रजलोक धामको गोलोक अर्थात् स्वकीयभावयुक्त श्रीकृष्णधाम, श्वेतद्वीप और वृन्दावन भी कहते हैं। (लघुभागवतामृतम्—पूर्व खण्ड ४९८)—“यत्तु गोलोकनाम स्यात् तच्च गोकुल-वैभवम्।” अर्थात् गोलोककी अपेक्षा गोकुलकी महिमा अधिक है, इसलिये गोलोकको गोकुलका वैभव कहा गया है॥ १७॥
गोलोक-वृन्दावन सम्पूर्ण रूपसे श्रीकृष्णभिन्न धाम :— सर्वग, अनन्त, विभु, कृष्णतनुसमा। उपर्युधो व्यापियाछे, नाहिक सीमा॥ १८॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी दिव्य देहके समान ही यह धाम सर्वव्यापी, अनन्त और विभु है। ऊपर-नीचे इसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है॥ १८॥ अनुभाष्य—श्रीजीव गोस्वामी कृत श्रीकृष्णसन्दर्भ (१०६ संख्या)में— “अथ कतमत्तत् पदं यत्रासौ विहरति? तत्रोच्यते—‘या यथा भुवि वर्त्तन्ते पुर्यो भगवतः प्रियाः। तास्तथा सन्ति वैकुण्ठे तत्तल्लीलार्थमादृताः॥’ इति स्कान्दवचनानुसारेण वैकुण्ठे यत्स्थानं वर्त्तते, तत्तदेवेति मन्तव्यम्। तच्चाखिलवैकुण्ठोपरिभाग एव। ××× स्वायम्भुवागमे च स्वतन्त्रतयैव सर्वोपरि तत्स्थानमुक्तम्; यथा ईश्वरदेवीसंवादे चतुर्दशाक्षरध्यानप्रसङ्गे पञ्चाशीतितमे पटले—‘नानाकल्पलताकीर्णं वैकुण्ठं व्यापकं स्मरेत्। अधः साम्यं गुणानाञ्च प्रकृतिः सर्वकारणम्॥” ×× तस्माद् ‘या यथा भुवि वर्त्तन्ते’ इति न्यायाच्च स्वतन्त्र एव द्वारकामथुरागोकुलात्मकः श्रीकृष्णलोकः स्वयंभगवतो विहारास्पदत्वेन भवति सर्वोपरीति सिद्धम्। अतएव वृन्दावनं गोकुलमेव सर्वोपरि विराजमानं गोलोकत्वेन प्रसिद्धम्। ब्रह्मसंहितायां—‘सहस्रपत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत् पदम्। ×× चतुरस्रं तत्परितः श्वेतद्वीपाख्यमद्भुतम्॥” ×× तस्य श्रीकृष्णस्य धाम नन्दयशोदाभिः सह वासयोग्यं महान्तःपुरमर्, तस्य स्वरूपमाह—अनन्तस्य श्रीबलदेवस्यांशात् सम्भवो नित्याविर्भावो यस्य तत्। तथा तन्त्रेण तदपि बोध्यते—अनन्तोऽंशो यस्य तस्य श्रीबलदेवस्यापि सम्भवो निवासो यत्र तदिति। ×× अथ गोकुलावरण्यान्याह—तद्वहिश्चतुरस्रं तस्य गोकुलस्य बहिः सर्वतश्चतुरस्रं चतुष्कोणात्मकं स्थलं श्वेतद्वीपाख्यम्, इति तदंशे गोकुलमिति नाम-विशेषाभावात्। किन्तु चतुरस्राभ्यन्तर-मण्डलं वृन्दावनाख्यं, बहिर्मण्डलं केवलं श्वेतद्वीपाख्यंः ज्ञेयं; गोलोक इति यत्पर्यायः। ×× ब्रह्मलोकः वैकुण्ठाख्यः। ×× नारद-पञ्चरात्रे विजयाख्याने—‘तत्सर्वोपरि गोलोके श्रीगोविन्दः सदा स्वयम्। विहरेत् परमानन्दी गोपीगोकुलनायकः॥’ इति। तदेवं सर्वोपरि श्रीकृष्णलोकोऽस्तीति सिद्धम्। स च लोकस्तत्तल्लीलापरिकरभेदेनांशभेदात् द्वारकामथुरागोकुलाख्यस्थान-त्रयात्मक इति निर्णीतम्। अन्यत्र तु भुवि प्रसिद्धान्येव तत्तदाख्यानि स्थानानि तद्रूपत्वेन श्रूयन्ते, तेषामपि वैकुण्ठान्तरवत् प्रपञ्चातीतत्व- नित्यत्वालौकिकरूपत्व-भगवत्प्रियास्पदत्वकथनात्।” भगवान् कैसे धाममें विचरण करते हैं, इसका यहाँ विवेचन किया जा रहा है—‘इस प्रपञ्चमें जिस प्रकार भगवान्की प्रिय पुरियों (द्वारका-मथुरा-गोकुल) की अवस्थिति है, उसी प्रकार उनकी प्रिय तीन पुरियाँ उनकी उन-उन लीलाओंके उद्देश्यसे वैकुण्ठमें भी विराजमान
पाँचवाँ अध्याय | २५७
[ ५/१४-२० हैं' - स्कन्दपुराणके इस वाक्यके अनुसार वैकुण्ठमें जो सब स्थान विद्यमान हैं, वे-वे स्थान प्रपञ्चमें भी हैं- इस प्रकार जानना होगा। प्राकृत सृष्टिके ऊपरी भागमें सभी वैकुण्ठ लोकोंका स्थान है। स्वायम्भुवतन्त्रमें भी - स्वतन्तरूपसे सबके ऊपर वैकुण्ठका स्थान है- यह कहा गया है। इस ग्रन्थमें देवी-महेश्वर संवादमें चतुर्दश-अक्षरध्यानके प्रसङ्गमें कहा गया है- 'मन्त्रका जप करते हुए साधक नाना कल्पवृक्ष-लताओंसे व्याप्त, व्यापक, अखण्ड वैकुण्ठका स्मरण करेंगे। उस वैकुण्ठके नीचे जड़-जगत्की कारणस्वरूप सत्त्व-रज-तमगुणोंकी साम्यावस्थावाली प्रकृति अवस्थित है।' इसलिये 'जिस प्रकारसे पृथ्वीपर हरिधामसमूह वर्तमान हैं, वहाँपर भी उसी प्रकारसे हैं' - इस न्यायके अनुसार भी द्वारका, मथुरा और गोकुल धामवाले श्रीकृष्णलोककी स्वतन्त्रताकी ही उपलब्धि होती है, स्वयं भगवान्का विहारक्षेत्र होनेके कारण ये धाम सबसे ऊपर हैं, यह सिद्ध होता है। इसलिये वृन्दावन-गोकुल ही सर्वोपरि विराजमान हैं और ये गोलोक नामसे प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मसंहितामें भी कहा गया है- 'गोकुल नामक श्रीकृष्णलोक हजार पत्रोंसे युक्त कमलके सदृश है। उसके बाहर चारों ओर चतुर्भुजाकार 'श्वेतद्वीप' नामक अद्भुत धाम है।' उस श्रीकृष्णके धाममें नन्द-यशोदादिके साथ वासयोग्य श्रीकृष्णका महा-अन्तःपुर है। गोकुलका स्वरूप इस प्रकार है- श्रीबलदेव प्रभुके अंश अनन्तसे गोकुलका आविर्भाव हुआ है और यह नित्य धाम है। तन्त्रशास्त्रसे भी ऐसा ही समझा जाता है। अनन्तदेव जिनके अंश हैं, उन श्रीबलदेव प्रभुका जहाँ जन्म और निवासस्थान है, वही भगवद्धाम है। गोकुलके आवरणोंका वर्णन इस प्रकार है-उस गोकुलके बाहर चारों दिशाओंमें स्थित एक चतुर्भुजाकार स्थल है जिसे 'श्वेतद्वीप' कहते हैं, इस अंश श्वेतद्वीपको गोकुल नहीं कहा जाता है। किन्तु चतुष्कोणात्मक स्थलका भीतरी मण्डल 'वृन्दावन' नामसे विख्यात है और केवल बाहरी मण्डल 'श्वेतद्वीप' नामसे जाना जाता है तथा इसका दूसरा नाम 'गोलोक' है। 'ब्रह्मलोक' शब्दसे 'वैकुण्ठ' को समझना चाहिये। नारद-पञ्चरात्रमें विजयाख्यान-प्रसङ्गमें कहा गया है- 'वैकुण्ठमें सबसे ऊपरी भागमें गोलोकमें सदा स्वयं श्रीगोपीनाथ गोकुलाधिपति श्रीगोविन्ददेव परमानन्दसे विहार करते हैं। इसलिये सभी लोकोंके ऊपर श्रीकृष्णलोककी स्थिति सिद्ध होती है। उस श्रीकृष्णलोकमें ही उन-उन लीला और परिकरभेदसे और अंशभेदसे 'द्वारका', 'मथुरा' और 'गोकुल' नामक तीन विशिष्ट स्थान हैं, यही निर्णीत हुआ है। अन्यत्र यह कहा गया है-प्रपञ्चमें पृथ्वीमें उन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध स्थान उन्हींके समान हैं, ऐसा सुना जाता है, क्योंकि वे भी वैकुण्ठके समान प्रपञ्चसे अतीत, नित्य, अलौकिक रूपविशिष्ट और भगवान्के नित्य प्रिय कहे जानेके कारण इन्हें वैकुण्ठमें स्थित श्रीकृष्णलोकसे अभिन्न जानना चाहिये ॥ १४-१८ ॥ वह स्वप्रकाशित, श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुआ है :- ब्रह्माण्डे प्रकाश ताँर कृष्णेर इच्छाय। एकइ स्वरूप ताँर, नाहि दुइ काय ॥ १९॥ भोगनेत्रोंसे प्रपञ्चके समान दिखनेपर भी भक्तिनेत्रोंसे श्रीकृष्णविलासक्षेत्र चिन्मयी चिन्तामणि-भूमि :- चिन्तामणि-भूमि, कल्पवृक्षमय वन। चर्मचक्षे देखे ताँरे प्रपञ्चेर सम ॥ २० ॥ २५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/१९-२२ ] प्रेमनेत्रे देखे ताँर स्वरूप प्रकाश। गोप-गोपीसङ्गे याँहा कृष्णेर विलास ॥ २१ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - श्रीकृष्णकी इच्छासे वह चिन्मय व्रजधाम जड़ ब्रह्माण्डमें प्रकाशित होकर भी एक ही स्वरूपसे विराजमान होता है। कोई-कोई व्यक्ति यह विचार रखते हैं कि परव्योममें स्थित गोलोकादि धाम प्रपञ्चमें प्रकटित व्रजधामसे भिन्न है, किन्तु यह सत्य नहीं है। वे एक ही स्वरूप हैं, एक ही समयमें परव्योम और प्रपञ्चमें प्रकाशित होकर विराजमान हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित व्रजमें भी भूमि चिन्तामणि है, वनोंके वृक्ष कल्प-वृक्ष हैं, उसका स्वरूप-प्रकाश प्रेम-नेत्रोंके द्वारा ही दिखलायी देता है, चर्म-चक्षुओंके द्वारा वह प्रपञ्चके समान ही प्रतीत होता है। गोप-गोपीके साथ श्रीकृष्ण यहाँ सदा विलास करते हैं॥ १९-२१॥ अमृतानुकणिका - प्रश्न हो सकता है- भौतिक ब्रह्माण्ड तो सीमाबद्ध और क्षुद्र है तथा उसके भी एक क्षुद्र अंशमें व्रजलोक प्रकटित हुआ है, तब व्रजलोक भी क्षुद्र और सीमाबद्ध होगा, परन्तु यह सत्य नहीं है। श्रीकृष्ण बाल्यलीलामें एक छोटे बालकके रूपमें दिखते हैं, परन्तु स्वरूपतः वे जैसे विभु- सर्वव्यापक हैं (यथा माँ यशोदाका स्तनपान करते हुए अपने मुखमें समस्त लोक दिखलाये थे), वैसे ही व्रजलोक धाम ब्रह्माण्डके एक क्षुद्र अंशमें प्रकट होनेपर सीमाबद्ध दिखनेपर भी विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, यह श्रीगोकुलकी अचिन्त्य शक्तिका प्रभावसे ही सम्भव हुआ है॥१९॥ गोलोकमें गोविन्द :- ब्रह्मसंहिता (५/२५)- चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष- लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्। लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २२ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - लाखों-लाखों कल्पवृक्षोंसे परिवेष्टित, चिन्तामणिसमूहसे निर्मित स्थानमें, कामधेनु गायोंका पालन करनेवाले तथा लाखों लक्ष्मियोंके द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥ अनुभाष्य - कल्पवृक्षलक्षावृतेषु (कल्पवृक्षाणां प्रार्थनोचिताभीष्टफलप्रदवृक्षाणां लक्षैः असंख्यैः आवृतेषु मण्डितेषु) चिन्तामणिप्रकरसद्मसु (चिन्तामणीनाम् अभीष्टफलदानसमर्थरत्नानां प्रकरेण समूहेन रचितानि सद्मानि हर्म्याणि तेषु) सुरभीः (कामधेनुः) अभिपालयन्तम् (अभि सर्वतोभावेन गोपोचित-गो-परिचर्याप्रकारेण पालयन्तं) लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं (लक्ष्मयः गोपरामाः तासां सहस्राणां शतैः सम्भ्रमेण सेव्यमानं) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-प्रार्थनाके अनुरूप असंख्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षोंसे मण्डित, चिन्तामणि अर्थात् अभीष्ट फलदान करनेमें समर्थ रत्नोंसे निर्मित भवनोंसे युक्त स्थानमें पाँचवाँ अध्याय | २५९
[ ५/२२-२५ कामधेनुओंका पालन करनेवाले अर्थात् गोपोचित परिचर्या करनेवाले और लाखों लक्ष्मियों (गोपियों) के द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥ आदि चतुर्व्यूह :- मथुरा-द्वारकाय निजरूप प्रकाशिया। नानारूपे विलसये चतुर्व्यूह हैञा॥२३॥ सभी चतुर्व्यूहोंके अंशी :- वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध। सर्वचतुर्व्यूह-अंशी, तुरीय, विशुद्ध॥२४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३-२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उस कृष्णधामके मथुरा और द्वारका प्रकोष्ठमें श्रीकृष्ण, वासुदेव-सङ्कर्षण- प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-इस आदि-चतुर्व्यूहको प्रकाशितकर अनेक प्रकारसे विलास करते हैं। द्वारकामें जो चतुर्व्यूह है, वह अन्य सभी चतुर्व्यूहोंका अंशी है और विशुद्ध-चिन्मय है॥२३-२४॥ अमृतानुकणिका-'वासुदेव'-देवकी-वसुदेवके पुत्र; ये द्वारका-चतुर्व्यूहके प्रथमव्यूह और व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके प्रकाशरूप हैं। व्रजेन्द्रनन्दन द्विभुज हैं और उनका गोपवेश एवं गोप-अभिमान है। वासुदेव कभी द्विभुज और कभी चतुर्भुज होते हैं; उनका क्षत्रिय वेश एवं क्षत्रिय अभिमान है। 'सङ्कर्षण'-श्रीबलराम जिस स्वरूपमें द्वारका-मथुरामें लीला करते हैं, उसे सङ्कर्षण कहते हैं; देवकीके गर्भसे आकर्षणकर रोहिणीके गर्भमें स्थापित होनेके कारण उनको सङ्कर्षण कहते हैं। ये द्वारका-चतुर्व्यूहके द्वितीय व्यूह हैं। जो श्रीबलराम स्वयंरूपमें स्वयंरूप श्रीकृष्णकी लीलामें सहायता करते हैं, वही श्रीबलराम ही सङ्कर्षण रूपमें द्वारका-मथुरामें वासुदेवकी लीलामें सहायक हैं। वासुदेवको श्रीकृष्ण भी कहा जाता है, उसी प्रकार सङ्कर्षणको बलराम भी कहा जाता है। वर्ण और अङ्ग-सन्निवेशमें व्रजविलासी बलराम और द्वारका-मथुरा-विलासी सङ्कर्षणमें कोई पार्थक्य नहीं है-दोनों ही द्विभुज और श्वेत वर्ण हैं, किन्तु उनके भावोंका पार्थक्य है-व्रजमें उनका गोपभाव और द्वारका-मथुरामें क्षत्रियभाव है। अप्रकटलीलामें गोकुल, मथुरा और द्वारका, इन तीन धामोंमें श्रीकृष्ण और श्रीबलरामके पृथक् पृथक् विग्रह नित्य विराजमान होते हैं, किन्तु प्रकटलीलामें, एक धाममें जब वे लीला करते हैं, तब अन्य धामोंमें कोई भी प्रकटरूप नहीं होता है। 'प्रद्युम्न'-श्रीरुक्मिणी देवीके गर्भजात श्रीकृष्णके पुत्र हैं। श्रीकृष्ण ही आश्रयरूपमें वात्सल्यरस आस्वादनके निमित्त प्रद्युम्न नामसे निज-पुत्र-अभिमानसे नित्य द्वारका लीला करते हैं। इसलिये श्रीप्रद्युम्न श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, ये द्वारका-चतुर्व्यूहके तृतीय व्यूह हैं। 'अनिरुद्ध'-ये श्रीकृष्णके पौत्र हैं, रुक्मीकी कन्या रुक्मवतीके गर्भसे प्रद्युम्नके पुत्र हैं। प्रद्युम्नके समान ये भी श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं; ये द्वारका-चतुर्व्यूहके चतुर्थ व्यूह हैं॥२३-२४॥ गोकुल, मथुरा और द्वारकामें द्विभुजरूपमें लीला :- एइ तिन लोके कृष्ण केवल लीलामय। निजगण लञा खेले अनन्त समय॥२५॥ २६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/२५-२८ ] अनुवाद-इन्हीं तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण अपने नित्य परिकरोंके साथ अनादि कालसे अनन्त कालतक केवल लीलाओंमें ही रत हैं अर्थात् वे सृष्टि-पालन-संहारादि कोई भी कार्य नहीं करते हैं॥ २५॥ अनुभाष्य-‘तिन लोके’—गोकुल, मथुरा और द्वारकामें॥ २५॥ परव्योम-वैकुण्ठमें चतुर्भुज-नारायणरूपमें आधिपत्य :- परव्योम-मध्ये करि' स्वरूप-प्रकाश। नारायणरूपे करेन विविध विलास॥ २६॥ अनुवाद-परव्योममें श्रीकृष्ण नारायण रूपमें अपना प्रकाश करते हैं और नाना प्रकारके विलास करते हैं॥ २६॥ स्वयंरूप श्रीकृष्ण-द्विभुज, ऐश्वर्यविलास नारायण-चतुर्भुज :- स्वरूपविग्रह कृष्णेर केवल द्विभुज। नारायणरूपे सेइ तनु चतुर्भुज॥ २७॥ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म, महैश्वर्यमय। श्री-भू-नीला-शक्ति याँर चरण सेवय॥ २८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७-२८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णका स्वरूपविग्रह सदा द्विभुज है। परव्योममें उनका स्वरूप-प्रकाश नारायणरूपमें चतुर्भुज है और श्री, भू एवं नीला, ये तीन शक्तियाँ सदा उनकी सेवा करती हैं। (श्रीसम्प्रदायके वैष्णवोंके ग्रन्थोंमें इन तीन प्रकारकी शक्तियोंका विशेष वर्णन है)॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-‘श्री-भू-नीला’—नीलाको बङ्गालमें कोई-कोई 'लीलाशक्ति' कहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ वैकुण्ठमें नारायणकी सेवामें विराजमान रहती हैं। जब तीन आल्वार् (सिद्ध महापुरुष)—भूतयोगी, सरयोगी और भ्रान्तयोगीने गेहलीग्राममें रात्रिके समय एक ब्राह्मणके घरमें आश्रय ग्रहण किया था, तब नारायणने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये थे। 'प्रपन्नामृत'–७७/६१-६२ श्लोकोंमें उन्होंने नारायणका वर्णन इस प्रकार किया है— “ताक्ष्र्याधिरूढं तड़िदम्बुदाभं लक्ष्मीधरं वक्षसि पङ्कजाक्षम्। हस्तद्वये शोभितशङ्खचक्रं विष्णुं ददृशुर्भगवन्तमाद्यम्॥ आजानुबाहुं कमनीयगात्रं पार्श्वद्वये शोभितभूमिनीलम्। पीताम्बरं भूषणभूषिताङ्गं चतुर्भुजं चन्दनरुषिताङ्गम्॥” अर्थात् “गरुड़की पीठपर बैठे हुए चतुर्भुज आदिपुरुष भगवान् विष्णुका विद्युत-समन्वित मेघवर्णका कमनीय शरीर है। उनके कमलके समान नेत्र हैं, घुटनोंतक लम्बी भुजायें हैं और उनके दो हाथोंमें शङ्ख एवं चक्र शोभायमान हो रहे हैं। उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके चन्दनलेपित श्रीअङ्ग विभिन्न अलङ्कारोंसे विभूषित हैं और वक्षःस्थलपर 'लक्ष्मी' (श्री) तथा दोनों ओर 'भू' और 'नीला' अवस्थित हैं।” सीतोपनिषदि— “महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपाचेतनाऽचेतनात्मिका। सा देवी त्रिविधा भवति—शक्त्यात्मना इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति। इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति—श्री-भू-नीलात्मिका।” पाँचवाँ अध्याय | २६१
अर्थात् “परमेश्वरकी भिन्न-अभिन्नरूपा, चेतन-अचेतनात्मिका महालक्ष्मी अपनी शक्तिके द्वारा इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और साक्षात्शक्ति रूपोंमें तीन प्रकारकी हैं। इच्छाशक्ति पुनः श्री, भू और नीला भेदसे तीन प्रकारकी हैं।” श्रीमध्वाचार्य स्वकृत गीता-टीका (श्लोक ४/६)में— “महदादेस्तु माता या श्री-भू-नीलेति कल्पिता। विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुर्जॊऽपि हि। जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढ़-चेतसाम्॥” अर्थात् “महत्तत्त्वादिकी माता जो श्री-भू-नीलारूपमें निरूपित हैं और उन्हें विमोहनकारिणी ‘दुर्गा’ भी कहा जाता है। उनके साथ अजन्मा श्रीविष्णु भी अपने चित्-बलके प्रभावसे मूढ़ व्यक्तियोंको जन्म ग्रहण करनेवाले प्रतीत होते हैं।” व्यासयोग ७/१४ में— “श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी। तच्छक्त्यनन्तांशहीनाथापि तस्याश्रयात् प्रभोः॥ अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलापि हि। तेषां दुरत्ययाप्येषा बिना-विष्णुप्रसादतः॥” अर्थात् “श्री-भू-दुर्गा—इन तीन रूपोंमें भिन्ना जो वैष्णवी (विष्णुकी अंशरूपा) महामाया हैं, वे अनन्तांश-हीन होनेपर भी विष्णुके आश्रयमें होनेके कारण उनकी कलाभाग अर्थात् अंशकी अंश शक्ति भी अनन्त ब्रह्मा-रुद्रादिके पास नहीं है। विष्णुके अनुग्रहके बिना ब्रह्मा-रुद्रके लिये भी उस मायाका अतिक्रम करना दुष्कर है।” गीता १४/३ मध्वभाष्य— “महद्ब्रह्म प्रकृतिः। सा च श्री-भू-दुर्गेति भिन्ना। उमा-सरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः॥” अर्थात् “महद्-ब्रह्मको प्रकृति भी कहते हैं। वही प्रकृति पुनः श्री, भू और दुर्गा, इन तीन भिन्न रूपोंसे जानी जाती हैं। सरस्वती, उमादि भी उस शक्तिके अंशसे युक्त अन्य जीवमात्र हैं।” तथा च कार्ष्यायण-श्रुतिः— “श्रीभूर्दुर्गा महती तु माया, सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिका च। उमा वागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः॥” इति। अर्थात् “श्री, भू और दुर्गा, इन रूपोंमें महामाया ब्रह्माण्डोंको प्रसव करनेवाली और जगत्में बाँधनेवाली हैं। उमा, वाक् (सरस्वती) आदि अन्य जीव उनके अंश हैं और महामायाके प्रभावसे ही उनकी कीर्त्ति शास्त्रोंमें गायी गयी है।” श्रीजीव गोस्वामीकृत भगवत्सन्दर्भ (८० संख्यामें)— “यथा पाद्मे-‘नित्यं तद्रूपमीशस्य परं धाम्नि स्थितं शुभम्। नित्यं सम्भोग्यमीश्वर्या श्रिया भूम्या च संवृतम्॥’ नामस्वरूपयोर्निरूपणेन महासंहितायामपि विविक्तं; तत्त्रिशक्तिः-श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना जीवमाया महात्मनः। आत्ममाया तदिच्छा स्यात् गुणमया जड़ात्मिका॥” और (२२ संख्यामें)— ‘श्रीरत्र जगत्पालनशक्तिः, भूस्तत्सृष्टिशक्तिः, दुर्गा तत्प्रलयशक्तिः। तत्तद्रूपेण या भेदं प्राप्ता, सा जीवविषया तच्छक्तिर्जीवमायेत्युच्यते। पाद्मे श्रीकृष्णसत्यभामा-संवादे-‘अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः’ इत्येतद्वाक्यानन्तरं
५/२८-३३ ] 'ततः सर्वेऽपि ते देवाः श्रुत्वा तद्वाक्य-चोदिताः। गौरीं लक्ष्मीं धराञ्चैव प्रणेमुर्भक्तितत्पराः॥' इति।" अर्थात् “परमधाममें रहनेवाले ईश्वरका वह रूप नित्य, शुभ और श्री-भू-नीलाशक्तिसे संवृत होकर नित्य सम्भोग्य है। महासंहितामें नाम और स्वरूपके निरूपणके द्वारा तीन शक्तियोंका विवेचन हुआ है; जैसे, - महात्मा श्रीभगवान्की (१) जीवमाया, वह 'श्री', 'भू' और 'दुर्गा', इन तीन स्वरूपोंसे भिन्न है। उनकी (२) आत्ममाया उनकी इच्छा है और (३) गुणमाया जड़ात्मिका है।" 'श्री' जगत्पालन शक्ति है, 'भू' उनकी सृष्टि शक्ति है और 'दुर्गा' उनकी प्रलय शक्ति है। इन तीन रूपोंमें जो भेदको प्राप्त हो रही है, उस जीव विषयक शक्तिको 'जीवमाया' कहा जाता है। पद्मपुराणमें श्रीकृष्ण-सत्यभामा संवादमें- 'मैं ही तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त, तीन प्रकारके गुणोंके सहित वर्तमान रहती हूँ।' इस वाक्यके बादमें कहा गया है- 'तब सब देवताओंने यह सुनकर उनके वाक्यके द्वारा प्रेरित होकर गौरी (दुर्गा), लक्ष्मी (श्री) और पृथ्वी (भू) को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।'॥२८॥ श्रीकृष्ण केवल लीलामय होनेपर भी जीवोंके प्रति अहैतुक-कृपामय :- यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ामात्र धर्म। तथापि जीवेर कृपाय करे एक कर्म॥२९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केवल क्रीड़ामात्र ही उनका एकमात्र धर्म होनेपर भी श्रीकृष्ण जीवोंके प्रति कृपावशतः जीवनिस्ताररूप एक लीला करते हैं॥२९॥ चतुर्विध मुक्तिके द्वारा जीवोंका उद्धार-साधन अथवा वैकुण्ठमें लाना :- सालोक्य-सामीप्य-सार्ष्टि-सारूप्य-प्रकार। चारि मुक्ति दिया करे जीवेर निस्तार॥३०॥ अनुवाद-सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सारूप्य, ये चार प्रकारकी मुक्ति देकर श्रीकृष्ण जीवोंका निस्तार करते हैं॥३०॥ निर्विशेष ब्रह्मज्ञानीकी वैकुण्ठके बाहर स्थिति :- ब्रह्मसायुज्य-मुक्तेर ताँहा नाहि गति। वैकुण्ठ-बाहिरे हय तांसबार स्थिति॥३१॥ अनुवाद-ब्रह्म-सायुज्य मुक्ति पानेवालोंकी वहाँ गति नहीं है। उन सबकी स्थिति वैकुण्ठसे बाहर ही है॥३१॥ परव्योमके बाहरमें चिन्मय ब्रह्मलोक :- वैकुण्ठ-बाहिरे एक ज्योतिर्मय मण्डल। कृष्णेर अङ्गेर प्रभा, परम उज्ज्वल॥३२॥ मायातीत होनेपर भी वह चिद्विलासहीन, केवल चिन्मात्र :- 'सिद्धलोक' नाम तार प्रकृतिर पार। चित्स्वरूप, ताँहा नाहि चिच्छक्ति-विकार॥३३॥ पाँचवाँ अध्याय | २६३
[ ५/३२-३५ ब्रह्मधामका दृष्टान्त :- सूर्य्यमण्डल येन बाहिरे निर्विशेष। भितरे सूर्य्येर रथ-आदि सविशेष ॥ ३४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३२-३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-['वैकुण्ठ'-शब्दसे 'कृष्णधाम' और 'परव्योम'को समझना चाहिये]। उस परव्योमके बाहर श्रीकृष्णकी अङ्गप्रभाका विस्तार एक ज्योतिर्मय मण्डल बनाता है। उसे 'सिद्धलोक', 'ब्रह्मलोक' आदि कहते हैं। ब्रह्मसायुज्यमुक्तिका वह एकमात्र स्थान है। वह धाम चित्स्वरूप तो है, परन्तु वहाँ चित्-शक्तिगत विकार अर्थात् विचित्रता नहीं है। सूर्य्यमण्डल जैसे बाहरसे निर्विशेष अर्थात् विचित्रतारहित ज्योतिर्मय मात्र है, किन्तु मण्डलके भीतर सूर्य्यके रथादि सविशेष अर्थात् अनेक विचित्रताएँ दिखायी देती हैं, उसी प्रकार ब्रह्मज्योतिके भीतर वैकुण्ठ सविशेष और विचित्रायुक्त है। सूर्य्यमण्डलके बाहरका अंश ब्रह्मधामके सदृश है॥ ३२-३४॥ श्रीमद्भागवत (७/१/२९) कामाद्द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः॥ ३५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“बहुत लोगोंने ही भक्तिके समान काम, द्वेष, भय और स्नेहसे अपने मनको आविष्ट करके पापोंका त्याग करते हुए उस गतिको प्राप्त किया है।” अन्य किसी-किसी संस्करणमें यह अतिरिक्त श्लोक (भाः ७/१/३०) भी मिलता है- “कामाद्गोप्या भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः। सम्बन्धाद्वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो॥” अर्थात् [नारदजीने युधिष्ठिर महाराजसे कहा]-“गोपियोंने काम (प्रेम) से, कंसादिने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्रादि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने स्नेहयुक्त पारिवारिक सम्बन्धसे, तुम लोगोंने स्नेहसे और हम लोगोंने भक्तिसे अपने मनको भगवान्में लगाया है।”॥ ३५॥ अनुभाष्य-शिशुपाल श्रीकृष्णविद्वेषी होनेपर भी क्यों सायुज्य-मुक्तिके योग्य बना? धर्मराज युधिष्ठिरके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीनारदने कहा, - यथा [विहितया] भक्त्या (सेवनेन) ईश्वरे मनः आवेश्य [तद्गतिं गच्छन्ति], तथा कामाद् [यथा गोप्यः], द्वेषात् [यथा दन्तवक्र-शिशुपालादयः], भयात् [यथा कंसाद्याः], स्नेहात् [यथा पाण्डवाः] [एतादृशः] बहवः तदघं (कामादिनिमित्तं पापं) हित्वा तद्गतिं (मोक्षप्रकारभेदं) गताः (प्राप्ताः)। श्लोक-भावानुवाद-बहुत लोगोंने भक्तिके समान काम (जैसे गोपियोंने), द्वेष (जैसे दन्तवक्र, शिशुपालादिने), भय (जैसे कंसादिने) और स्नेहसे अपने मनको आविष्ट करके (जैसे आप पाण्डवोंने) पापोंका त्याग करते हुए उस (मुक्तिके भेदसे भिन्न-भिन्न) गतिको प्राप्त किया है। श्रीमद्भागवत सातवें-स्कन्धमें युधिष्ठिर महाराजके प्रश्न और श्रीनारदके उत्तरके प्रसङ्गमें ७/१/२२-४६ और ७/३/३०, ३२, ३४ श्लोकोंकी गौड़ीयभाष्यके तथ्यमें विभिन्न टीकाएँ द्रष्टव्य हैं॥ ३५॥ २६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/३६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२७८)– यदरीणां प्रियाणान्च प्राप्यमेकमिवोदितम्। तद्ब्रह्मकृष्णयोरैक्यात् किरणाकर्कोपमा-जुषोः ॥ ३६ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ३६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रमें जहाँ-जहाँ भगवान्के शत्रु और प्रिय व्यक्तियोंकी एक जैसी गति प्राप्त होनेका उल्लेख है, वह सब किरण-स्थानीय ब्रह्म और सूर्य-स्थानीय श्रीकृष्णको एक मानकर कहा गया है। [भावार्थ यह है कि भगवत्-प्रिय व्यक्ति वैकुण्ठ-वैचित्र्यको और भगवत्-शत्रु विलासशून्य 'सिद्धलोक' को प्राप्त करते हैं] ॥ ३६ ॥ अनुभाष्य—यत् (यस्मिन् शास्त्रे) अरीणां (भगवद्विद्वेषिणां) प्रियनाञ्च (भगवद्भक्तानां) एकं प्राप्यम् उदितं (कथितं), तत् (तु) किरणाकर्कोपमाजुषोः ब्रह्मकृष्णयोः ऐक्यात् (अर्थात् किरणस्थानीय-निर्विरोधब्रह्मणः, अर्क स्थानीय-कृष्णस्य च तत्त्वतोऽभेदात्) [बोद्धव्यं इत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। श्रीमद्भागवत (१०/२/३२)– येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्त्वय्यस्त-भावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्र “हे कमलनयन ! आपके भक्तोंके अतिरिक्त अन्य जो अपनेको विमुक्त कहकर अभिमान करते हैं और आपके प्रति भक्तिभावसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे शम, दम आदि कठिन साधनाके फलसे स्वयंको जीवन्मुक्त बोध करते हैं, परन्तु आश्रयस्वरूप आपके पादपद्मोंका अनादर करनेके कारण अधःपतित हो पड़ते हैं अर्थात् पुनः हीन अवस्थाको प्राप्त होते हैं।” श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें श्रीकृष्ण-महिमा वर्णन प्रसङ्ग (२५-३७) में— “तत्र मैत्रेयप्रश्नः, चतुर्थांशे (विष्णुपुराण ४/१५/१-१०)–“हिरण्यकशिपुत्वे च रावणत्वे च विष्णुना। अवाप निहतो भोगान् अप्राप्यान् अमरैरपि ॥ नालभत् तत्र चैवेह सायुज्यं स कथं पुनः। सम्प्राप्तः शिशुपालत्वे सायुज्यं शाश्वते हरौ ॥” श्रीपराशरोत्तरं–“दैत्येश्वरस्य वधायाखिललोकोत्पत्तिस्थितिविनाशकारिणा अपूर्वतनूग्रहणं कुर्वता नृसिंहरूपमाविष्कृतम्। तत्र हिरण्यकशिपोर्विष्णुरयमित्येतत् न मनस्यभूत्। निरतिशयपुण्यजात-समुद्भूतमेतत् सत्त्वमिति रजउद्रेक-प्रेरितैकाग्रमतिस्तद्भावनावियोगात् ततोऽवाप्तवधहैतुकीं निरतिशयामेवाखिलत्रैलोक्याधिक्यधारिणीं दशाननत्वे भोगसम्पदमवाप॥ नास्तस्मिन्ननादिनिधने परब्रह्मभूते भगवत्यनालम्बनीकृते मनसस्तल्लयम्। दशाननत्वेऽप्यनङ्गपराधीनतया जानकीसमासक्तचेतसो दाशरथिरूपधारिणस्तद्रूपदर्शनमेवासीत्। नायमच्युत इत्यासक्तिर्विपद्यतोऽन्तःकरणे मानुषबुद्धिरेव केवलमस्याभूत्। पुनरप्यच्युतविनिपातनमात्रफलमखिलभूमण्डल-श्लाघ्यं चेदिराजकुले जन्म अव्याहतञ्चैश्वर्यं शिशुपालत्वे चावाप॥ तत्र त्वखिलानामेव भगवन्नाम्नां कारणान्यभवन्। ततश्च तत्कारणकृतानां तेषामशेषाणामेवाच्युत-नाम्नामनवरतानेक- जन्म-सम्बन्धि-तद्विद्वेषानु-बन्धचित्तो विनिन्दन-सन्त-र्जनादिषूच्चारणमकरोत्। तच्च रूपमति-प्ररूढ़वैरानुभावादटन- भोजन-स्नानासन-शयनादिष्वशेषावस्थान्तरेषु नैवापययावस्यात्मचेतः॥ ततस्तमेवाक्रोशोषूच्चारयन् तमेव हृदयेनावधारयन्नात्मविनाशाय भगवदस्तचक्रांशुमालोज्ज्वलमकषतेजःस्वरूपं परमब्रह्मभूतमपगतद्वेषादिदोषो भगवन्तमद्राक्षीत्। तावच्च भगवच्चक्रेणाशुव्यापादि-तस्तत्स्मरणदग्धाखिलाघसंश्रयो भगवता तेनान्तमुपनीतस्तस्मिन्नेव लयममुपययौ॥ एतच्च तवाखिलं मयाभिहितम्। अयं हि भगवान् कीर्त्तितः संस्मृतश्च द्वेषानुबन्धेनाप्यखिलसुरासुरादिदुर्लभं फलं प्रयच्छति, किमुत सम्यग्भक्तिमताम्॥” इति। नोक्तं पराशरेणात्र स्थितौ तौ पार्षदविति। किन्तुभयोस्तयोरासीज्जन्मत्रयमितीरितम्॥ अतः सर्वेषु कल्पेषु न तौ पार्षदजौ मतौ। अन्यथा न तयोः पातः पाँचवाँ अध्याय | २६५
[ ५/३६ प्रतिकल्पं समञ्जसः॥ नृसिंहरूपं हरिणा यदाविष्कृतमद्भुतम्। हिरण्यकशिपोरस्मिन् विष्णुबुद्धिर्न निश्चिता॥ किन्त्वेष पुण्यसम्पन्नः कोऽपीति कृतनिश्चयः। रज-उद्रिक्तता नुन्नमतिस्तद्भावयोगतः॥ ततोऽवाप्तविनाशहेतु- कामखिलोत्त्तमाम्। अवाप भोगसम्पत्तिं रावणत्वे सुदुर्लभाम्॥ विष्णुत्वानिश्चयान्नातिद्वेषान्नावेशसन्ततिः। तां बिना च भवेद् द्वेषो नरकायैव वेणवत्॥ किन्त्वस्य सम्पत्सम्प्राप्तिस्तत्करेण मृतेः परम्। एवमाहैव-शब्देन तत्सादृगुण्यमनुस्मरन्॥ आवेशाभावतो दोषानाशाच्छुद्धमपश्यतः। प्रकटेऽपि परब्रह्म-रूपे तत्रास्य नो लयः॥ रावणत्वे महाकाम-पराधीनीकृतात्मनः। तद्धन्मनुष्यधीरस्य श्रीरामेऽभून्मृतावपि॥ अतोऽसौ चेदिराजत्वे पुनरापोत्तमां श्रियम्॥ तत्र कृष्णे समस्तानामेव नाम्नां रमापतेः। कारणानि प्रवृत्तेस्तु निमित्तान्यभवंस्तदा॥ तेन निश्चित्य तं विष्णुं स्वस्य द्विर्मरणं यतः। अतिद्वेषान्महावेशात् तानि नामानि सर्वशः। प्रजल्प सततं शश्वन्निन्दा-सन्तर्जनादिषु॥ रूपञ्च तादृशं दृष्ट्वा विष्णुरेवेति निश्चयात्। नामवत् तच्च सर्वत्र सर्वदा चैव संस्मरन्॥ दग्धतद्द्वेषजाघौघः क्षिप्ते चक्रे च तद्रुचा। अपेतदैत्यभावोऽन्ते तथा संस्कृतदृष्टिकः। तदा तूज्ज्वलमद्राक्षीत् परं ब्रह्म नराकृति॥ तदैव चक्रघातेन दैत्यदेहे विनाशिते। तदेव ब्रह्म परमनुलीनत्वमाययौ॥ इत्युक्तवाप्यत्र बक्यादेर्मोक्षमप्यर्भलीलया। अमोक्षं कालनेम्यादेरन्यत्रापीशचेष्टया। मुनिः स्मृत्वा पुनः प्राख्यत् ‘अयं हि भगवान्’ इति॥ ‘हि’ प्रसिद्धं अयं कृष्णो भगवान् स्वयमेव यत्। प्रीणतां द्विषतां चातश्चेतांस्याकर्षति द्रुतम्। तस्मात् कीर्त्तित इत्यादि माहात्म्यं चित्रमत्र न॥” मर्मानुवाद-“(विष्णुपुराणके चौथे अंशमें) मैत्रेयने पराशर मुनिसे प्रश्न किया-‘हिरण्यकशिपु और रावणका शरीर धारणकर जिस दैत्यने देवताओंको भी दुष्प्राप्य भोग प्राप्त किये थे, किन्तु मुक्ति प्राप्त नहीं की, पुनः उसी दैत्यने शिशुपालका शरीर धारण करके किस प्रकार श्रीकृष्णसे सायुज्य प्राप्त किया?’ पराशरने कहा-‘श्रीनृसिंहदेवके आविर्भूत होनेपर हिरण्यकशिपु उनमें ‘ये विष्णु हैं’ ऐसी बुद्धि ना करके उनको कोई अति पुण्यवान् तेजस्वी प्राणी समझने लगा। रजोगुणके उद्रेकके कारण मृत्युके समय वह उनके रूपकी चिन्ता नहीं कर सका। इस कारणसे भगवान्को आलम्बन अर्थात् सेव्य विषयविग्रह ना माननेके कारण उसका मन भगवान्में विलीन नहीं हुआ। किन्तु उनके हाथों मारे जानेके फलस्वरूप दूसरे जन्ममें उसने रावणके शरीरमें तीनों लोकोंपर अधिकार करके अतिशय भोग-सम्पत्तिको प्राप्त किया। उस रावणके शरीरमें कामके वशीभूत होकर जानकीमें आसक्तचित्तसे उसने भगवान् श्रीरामचन्द्रके केवल रूपका दर्शन किया था। किन्तु मृत्युके समय श्रीराममें विष्णुबुद्धि ना होकर, उसके अन्तःकरणमें केवल उनके प्रति मनुष्य बुद्धि हुई थी। पुनः श्रीरामके हाथों मरनेके फलस्वरूप उसने शिशुपाल शरीरमें प्रसिद्ध चेदिराज वंशमें जन्म और प्रचुर ऐश्वर्य प्राप्त किया। श्रीकृष्णको वासुदेव मानकर उसकी उनमें विष्णु-बुद्धि थी। बहुत जन्मोंतक विद्वेषके फलसे उसके चित्तमें वही विद्वेष दृढ़रूपमें रहनेके कारण वह श्रीकृष्णकी निन्दा और उनपर क्रोध करते हुए उनके नामका उच्चारण करता था। और घोर विद्वेषके प्रभावसे चलते-फिरते, भोजन करते, स्नान करते, बैठते-उठते और सोते हुए सभी अवस्थाओंमें किसी भी प्रकारसे भी भगवान्का वह सुन्दर रूप शिशुपालके श्रीकृष्णाविष्ट चित्तसे दूर नहीं हुआ। आक्रोशादिमें श्रीकृष्णके नामका उच्चारण और हृदयमें उनके रूपको धारण करते-करते अन्तिम समयमें उसके द्वेषादि अपराध दूर हो गये और उसने अपने विनाशके लिये आये सुदर्शन-चक्रकी किरणछटामें परमब्रह्म भगवत्स्वरूपके दर्शन किये। (प्रतिकूल होनेपर भी) भगवत्-स्मरणके प्रभावसे उसके अनर्थ ध्वंस हो गये और शिशुपाल भगवान्के चक्रके द्वारा मारे जानेपर भगवान्के समीप जाकर उनमें लयको प्राप्त हुआ। हे २६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/३६ ] मैत्रेय ! यही तुम्हारे प्रश्नका उत्तर है। प्रतिकूल अनुशीलनके फलसे श्रीकृष्णके द्वेषी जब वैरानूबन्धके द्वारा भी सद्गति प्राप्त कर सकते हैं, तब अनुकूल अनुशीलनके फलसे शुद्धभक्त सर्वोत्तम गति, श्रीकृष्णके चरणकमल या श्रीकृष्णप्रेम प्राप्त करेंगे, इसमें क्या सन्देह है? पराशर मुनिने यह नहीं कहा कि वे दोनों दैत्य पहले भगवत्-पार्षद जय-विजय थे। उन्होंने केवल इतना ही कहा कि उन्होंने तीन जन्म ग्रहण किये थे। इसलिये ये दोनों भगवत्पार्षद प्रत्येक कल्पमें असुररूपमें जन्मग्रहण करते हैं, यह पराशर मुनिका अभिप्राय नहीं है। यह अभिप्राय नहीं होनेपर प्रतिकल्पमें ही भगवत्पार्षदोंका पतन होता है, यह बात अत्यन्त ही असङ्गत है। (अर्थात् भगवान् विष्णुमें सृष्टि करनेकी इच्छा-शक्तिकी भाँति युद्ध करनेकी इच्छा-शक्ति भी नित्य वर्तमान है। जैसे क्रीड़ा-प्रिय महाराजा अपने प्रतिकूल वृत्तिवाले खिलाड़ियोंके साथ सदा क्रीड़ा करते रहते हैं, उन खिलाड़ियोंकी अनुपस्थितिमें अपने पार्षदों या अनुचरोंको प्रतिद्वन्द्वी बनाकर उनके साथ क्रीड़ाका आनन्द लेते हैं और वे अनुचरगण भी प्रतिकूल-भावके साथ क्रीड़ा करके अपने स्वामीका सन्तोष विधान करते हैं, वैसे ही भगवान् विष्णु भी किसी प्रतिकूल भाववाले अनादि-बहिर्मुख जीवके साथ अथवा अपने किसी पार्षदको प्रतिकूल-भावयुक्त करके और स्वयं भी उसके प्रति प्रतिकूल-भाव धारणकर परस्परकी युद्धक्रीड़ा-वृत्ति चरितार्थ करते हैं, इसलिये प्रतिकल्पमें भगवत्पार्षदोंके पतनकी बात असङ्गत है।) भगवान् जो अलौकिक नृसिंहरूपमें आविर्भूत हुए थे, उसमें हिरण्यकशिपुकी विष्णु-बुद्धि नहीं हुई थी, किन्तु उसने उन्हें कोई अति पुण्यके फलस्वरूप उत्पन्न प्राणीमात्र ही समझा। रजोगुणके उद्रेकके कारण उसकी बुद्धि भ्रमित हो गयी और उसने भगवान् नृसिंहमें 'यह एक तेजस्वी प्राणी है', ऐसी भावना की; वह अन्तकालमें उनके रूपकी भावना नहीं कर पाया। इसलिये केवल भगवान् नृसिंहके हाथों मारे जानेपर उसने रावण-देहमें सुदुर्लभ भोग-सम्पत्ति प्राप्त की। विष्णु होनेकी निश्चित रूपसे धारणाके अभावमें और अतिद्वेषके अभावमें भगवान्में आवेशकी वृद्धि नहीं होती। वेन राजाकी भाँति आवेशवृद्धिके बिना भगवत्-द्वेष केवल नरकका कारण है। अत्यन्त आवेश ना होनेपर निन्दादि-जनित अपराधोंका विनाश नहीं हो सकता। अपराध नाश ना हो पानेके कारण हिरण्यकशिपु भगवान्के शुद्धस्वरूपका दर्शन नहीं कर पाया, इसलिये परब्रह्म नृसिंहदेवके प्रकट रहनेपर भी वह उनमें लीन नहीं हो पाया। रावण शरीरमें भी उसका चित्त प्रबल कामके अधीन था, इसलिये हिरण्यकशिपुकी भाँति उसकी भी श्रीराममें मनुष्य बुद्धि थी। इस कारण उस दैत्यने शिशुपालके रूपमें पुनः पहलेकी भाँति उत्तम भोग-सम्पत्ति प्राप्त की। श्रीकृष्णमें वासुदेवत्व रहनेके कारण उसी नामयोगके हेतु वह उस समय उनको पूर्व दो जन्मोंमें अपनी मृत्युका कारण मानकर अत्यन्त द्वेष और परम आवेशसे सदा निन्दा-तर्जनादिमें भी उन सब नामोंका कीर्तन करता और उनमें चतुर्भुजादिरूप दर्शन करके विष्णु बुद्धि रखकर नामकीर्तनकी भाँति उस रूपकी भी अनुक्षण चिन्ता करता रहता था। इसलिये द्वेषजनित पापराशि दग्ध होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्रकी दीप्तिसे उसका दैत्यभाव दूर हुआ और शुद्ध-संस्कृत दिव्यचक्षु प्राप्तकर उसने भगवान्की परब्रह्म पाँचवाँ अध्याय | २६७
[ ५/३६-३९ नराकृतिका दर्शन किया। उसी समय सुदर्शन-चक्रके आघातसे उसका दैत्यशरीर विनष्ट हो गया और वह परब्रह्ममें लीन हो गया। श्रीकृष्णसे द्वेषजनित अतिशय आवेशके कारण शिशुपालने उनमें सायुज्य-लय प्राप्त किया—यह बात कहकर श्रीकृष्णकी बाल्यलीलामें पूतनादिको मोक्ष, किन्तु अन्य अवतारोंमें एवं ईश्वरचेष्टासे मारे गये कालनेमी आदिकी मोक्ष-अभावकी आलोचना करनेके लिये यह गद्य कहा गया है। ‘हि’—प्रसिद्धि अर्थमें है। अन्यान्य अवतारोंकी अपेक्षा अवतारीका विद्वेष अर्थात् प्रतिकूलभावसे कीर्तन और स्मरण करनेसे असुरकी भी सद्गति होती है।” श्रीपाद बलदेव विद्याभूषणकृत भाष्य भी द्रष्टव्य है। श्रीसनातन गोस्वामीकृत बृहद्भागवतामृत (गोलोक महात्म्य-नामक २/२/२००-२०१) में— ‘अहो श्लाघ्यः कथं मोक्षो दैत्यानामपि दृश्यते। तैरेव शास्त्रैर्निन्द्यन्ते ये गो-विप्रादि-घातिनः॥ सर्वथा प्रतियोगित्वं यत् साधुत्वासुरत्वयोः। तत्साधनेषु साध्ये च वैपरीत्यं किलोचितम्॥’ इस श्लोकका श्रीसज्जनतोषणीके दसवें खण्डमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरकृत अनुवाद—“जिन सभी दैत्योंकी शास्त्रोंमें गो-ब्राह्मणादिके घातकके रूपमें निन्दा की गयी है, उन कंसादि दैत्योंने जो सायुज्य मुक्ति प्राप्त की, उस मुक्तिको किस प्रकार प्रशंसनीय कहा जा सकता है? भगवद्भक्त ही साधु हैं और भगवत्-विद्वेषी ही असुर हैं। साधुओं और असुरोंके लक्षणोंमें जिस प्रकार सर्वदा विपरीत-धर्म होता है, उनके साधन और साध्यके विषयमें भी उसी प्रकार विपरीत-भाव रहना आवश्यक है। असुरोंका साधुओंसे विद्वेष और गो-ब्राह्मणोंकी हत्या ही साधन है तथा मोक्ष ही साध्य है। भक्तोंका भक्ति ही साधन है और प्रेम ही साध्य है। इसलिये जो लोग उस सायुज्य मुक्तिके लिये प्रयास करते हैं, वे लोग असुरोंकी भाँति केवल ज्ञान-चेष्टारूप असाधु-साधनका ही आश्रय करते हैं॥” ३६॥ ब्रह्मलोकके ऊपर चित्-विलासमय परव्योम :— तैछे परव्योमे नाना चिच्छक्तिविलास। निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब बाहिरे प्रकाश॥ ३७॥ अनुवाद—परव्योममें चित्-शक्तिके द्वारा नाना प्रकारके विलास होते हैं अर्थात् वहाँ अनेक प्रकारकी विशेषताएँ हैं तथा निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब उस परव्योमका बाहरी प्रकाशमात्र है॥ ३७॥ निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानकारीको चिन्मात्र-ब्रह्मलोक ही प्राप्य :— निर्विशेष-ब्रह्म सेइ केवल ज्योतिर्मय। सायुज्येर अधिकारी ताँहा पाय लय॥ ३८॥ अनुवाद—निर्विशेष ब्रह्म केवल भगवान्की ज्योतिमात्र है और जो सायुज्य मुक्तिके अधिकारी होते हैं, वे उस ज्योतिमें लीन हो जाते हैं॥ ३८॥ ज्ञानी, योगी और हरिद्वेषीकी गति :— भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२८०)में ब्रह्माण्डपुराणका वचन— सिद्धलोकस्तु तमसः पारे यत्र वसन्ति हि। सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः॥ ३९॥ २६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तमः अर्थात् मायिकजगत्के परे ब्रह्मधामरूप 'सिद्धलोक' है। वहाँ ब्रह्मसुखमें मग्न मायावादी लोग और भगवान्के द्वारा मारे गये कंसादि असुर वास करते हैं; पातञ्जल-योगी भी कैवल्य प्राप्तकर उस लोकको प्राप्त होते हैं॥३९॥ अनुभाष्य—तमसः पारे (त्रिगुणातीते प्रदेशे) तु सिद्धलोकः [वर्त्तते], यत्र सिद्धाः (निर्भेदब्रह्मज्ञानसिद्धाः, कैवल्ययोगसिद्धाश्च) हरिणाः (कृष्णेन) हताः दैत्याः च, ब्रह्मसुखे (निर्विशेषब्रह्मेश्वर-सायुज्ये) मग्नाः [सन्तः] वसन्ति हि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। पहले उल्लेख किया गया ३५-३६ संख्याका अनुभाष्य भी द्रष्टव्य है॥३९॥ परव्योममें स्थित द्वितीय चतुर्व्यूह द्वारकाके आदि-चतुर्व्यूहका प्रकाश :- सेइ परव्योमे नारायणेर चारि पाशे। द्वारकार चतुर्व्यूह द्वितीय प्रकाशे॥४०॥ अनुवाद—उस परव्योममें परव्योमाधिपति नारायणके चारों ओर द्वारकाके चतुर्व्यूहका दूसरा प्रकाश विराजमान है॥४०॥ अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें (चतुर्व्यूहवर्णन प्रसङ्गमें ८३-८४ संख्या)— “पादे तु परमव्योम्नः पूर्वाद्यो दिक्षचतुष्टये। वासुदेवादयो व्यूहाश्चत्वारः कथिताः क्रमात्॥ तथा पादविभूतौ च निवसन्ति क्रमादिमे। जलावृत्तिस्थ-वैकुण्ठस्थितवेदवतीपुरे॥ सत्योर्द्धे वैष्णवे लोके नित्याख्ये द्वारकापुरे। शुद्धोदादुत्तरे श्वेतद्वीपे चैरावतीपुरे। क्षीराम्बुधिस्थितानन्तक्रोड़े-पर्यङ्क-धामनि॥” अर्थात् पद्मपुराणमें कहा गया है कि परव्योमके पूर्वादि चार दिशाओंमें वासुदेवादि चतुर्व्यूह क्रमानुसार अवस्थान करते हैं। और एकपादविभूतिमें अर्थात् प्रपञ्चमें क्रमसे चार स्थानोंमें ये वासुदेवादि चार मूर्तियाँ वास करती हैं। जलसे आवृत्त वैकुण्ठमें वेदवतीपुरमें वासुदेव, सत्यलोकके ऊपर विष्णूलोकमें सङ्कर्षण, नित्य द्वारकापुरमें प्रद्युम्न और शुद्धजलके समुद्रके उत्तर तट-स्थित क्षीरसमुद्रके मध्य श्वेतद्वीपमें ऐरावतीपुरमें अनन्तशय्यापर अनिरुद्ध वास करते हैं॥४०॥ ये सब तुरीय-विराट्, गर्भ और कारणके अतीत :- वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध। 'द्वितीय चतुर्व्यूह' एइ—तुरीय, विशुद्ध॥४१॥ अनुवाद—द्वितीय चतुर्व्यूहके वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, - ये चिन्मय और विशुद्ध हैं॥४१॥ अनुभाष्य—सङ्कर्षणका दूसरा नाम 'महासङ्कर्षण' भी है। (परवर्त्ती ४२-४८ संख्यामें इसका वर्णन हुआ है)॥४१॥ द्वितीय-चतुर्व्यूहगत महासङ्कर्षण ही चित्-शक्तिके मूल-आश्रय :- ताँहा ये रामेर रूप-महासङ्कर्षण। चिच्छक्ति-आश्रय तिहाँ, कारणेर कारण॥४२॥
[ ५/४१-४८
चित्-शक्ति-सन्धिनी-परिणत तद्रूपवैभव :- चिच्छक्ति-विलास एक—'शुद्धसत्त्व' नाम। शुद्धसत्त्वमय यत वैकुण्ठादि-धाम ॥ ४३ ॥ षडैश्वर्यादि समस्त महासङ्कर्षणका चित्-वैभव :- षड्विधैश्वर्य ताँहा सकल चिन्मय। सङ्कर्षणे विभूति सब, जानिह निश्चय ॥ ४४ ॥ अनुवाद—इनमें श्रीबलराम महासङ्कर्षणके रूपमें हैं जो चित्-शक्तिके आश्रय हैं। वे सभी कारणोंके कारण हैं। चित्-शक्तिके एक विलासका नाम शुद्ध-सत्त्व है। वैकुण्ठमें सभी लोक शुद्धसत्त्वमय हैं। वहाँ जितना षड्विध ऐश्वर्य है, वह सब पूर्ण चिन्मय है और यह सब महासङ्कर्षणकी विभूति हैं, ऐसा निश्चित रूपसे जानना चाहिये॥ ४२-४४॥ महासङ्कर्षण ही जीवशक्तिके आश्रय :- 'जीव'-नाम तटस्थाख्य एक शक्ति हय। महासङ्कर्षण—सब जीवेर आश्रय ॥ ४५ ॥ अनुवाद—जीव नामकी एक तटस्था शक्ति है और उसके अंश सभी जीवोंके भी महासङ्कर्षण आश्रय हैं॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वारकामें जो श्रीकृष्ण-बलदेवादि चतुर्व्यूह हैं, उनका ही द्वितीय प्रकाश परव्योममें है। इस चतुर्व्यूहका नाम 'द्वितीय चतुर्व्यूह' है और यह भी चिन्मय एवं विशुद्ध है। वहाँ श्रीबलरामका स्वरूप महासङ्कर्षण है। उस परव्योममें 'शुद्धसत्त्व' नामक चित्-शक्तिका सन्धिनी-विलास है, जिसके द्वारा वैकुण्ठादि शुद्धसत्त्वमय धाम और षडैश्वर्य—ये सभी महासङ्कर्षणकी विभूतियाँ हैं। महासङ्कर्षण ही समस्त जीवोंके आश्रय हैं, इसलिये वे तटस्था नामक जीव-शक्तिके आश्रय हैं। चित्कण-जीव जीवशक्तिसे उत्पन्न होकर भी मायाशक्तिके द्वारा वश्य-रूपमें निर्मित होनेसे 'माया' और 'चित्', इन दोनों तटस्थ-धर्मजनित होनेके कारण इसका नाम 'तटस्थ' है॥ ४०-४५॥ सङ्कर्षणके ही अंश—कारणोदशायी विष्णु :- याँहा हैते विश्वोत्पत्ति, याँहाते प्रलय। सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण समाश्रय ॥ ४६ ॥ सर्वाश्रय, सर्वाद्भुत, ऐश्वर्य अपार। 'अनन्त' कहिते नारे महिमा याँहार ॥ ४७ ॥ तुरीय, विशुद्धसत्त्व, 'सङ्कर्षण' नाम। तिँहो याँर अंश, सेइ नित्यानन्द-राम ॥ ४८ ॥ अनुवाद—जिनसे जगत्की सृष्टि और प्रलय होती है, उन पुरुष (कारणोदशायी विष्णु) के मूल आश्रय श्रीसङ्कर्षण हैं। वे सङ्कर्षण सबके आश्रय हैं, वे सभी प्रकारसे अद्भुत हैं और उनका ऐश्वर्य असीम है। 'अनन्त' भी उनकी महिमाका बखान नहीं कर सकते हैं। सङ्कर्षण जो मायातीत विशुद्धसत्त्व हैं, वे श्रीनित्यानन्द-बलरामके अंश हैं॥ ४६-४८॥
२७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४१-४८ ]
अमृतप्रवाह भाष्य-महासङ्कर्षण चिन्मय विशुद्धसत्त्व हैं। वे श्रीनित्यानन्द-रामके अङ्ग अर्थात् प्रकाश हैं॥४८॥ अनुभाष्य-मूल पयारमें 'अंश' और अमृतप्रवाह भाष्यमें 'अङ्ग' प्रयोग हुआ है, इन दोनोंका एक ही अर्थ है। श्रीपाद शङ्कराचार्यने अपने भाष्यमें ब्रह्मसूत्रके द्वितीय पादमें द्वितीय अध्यायके 'उत्पत्त्यसम्भवाधिकरणे' में चतुर्व्यूहके विषयमें जो भ्रमपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं, उसकी मीमांसा-स्वरूपमें ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास कविराज) ने 'पयार ४१-४७' के द्वारा उनको परास्त करके दिखाया है। अद्वयज्ञान विष्णुवस्तुको दृश्यजगत्की कोई एक वस्तु माननेकी श्रीपाद शङ्कराचार्यकी जो भ्रान्ति है, उसे पञ्चरात्रमें श्रीनारायणने स्वयं उनको बतलाया है, परन्तु श्रीनारायणकी आज्ञानुसार शिवजीके अवतार श्रीशङ्कराचार्यने बद्ध और आसुरिक स्वभाववाले जीवोंको मोहित करनेके लिये उसके विप्रलिप्साका (छलका) अवलम्बन करके जिस भ्रान्त धारणाका प्रचार किया, उसके फलस्वरूप उनकी परम्परामें दीक्षितादि अद्वैतपन्थी भ्रान्तिकी चरम सीमातक पहुँचे हैं। बद्धजीवोंमें चतुर्व्यूहके ज्ञानकी योग्यता सम्भवपर नहीं है। उनकी निर्बुद्धिताको बढ़ानेके लिये ही श्रीशङ्कराचार्यकी इस प्रकार दुरुक्ति है। चतुर्व्यूह शुद्धसत्त्वमय, चित्शक्तिविलासी और षडैश्वर्यसम्पन्न हैं। उनको दरिद्र और निःशक्तिक कहना या समझना मूढ़ जीवोंका धर्म है। ऐसे ही जीव मायाके द्वारा मोहित होनेके योग्य हैं। वैकुण्ठ और मायिक जगत्के भेदको समझ नहीं पानेसे इस प्रकारकी भ्रान्तिकी सम्भावना होती है। श्रीशङ्कराचार्यने ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्यायमें द्वितीयपादके ४२-४५ सूत्रोंके अपने भाष्यमें 'चतुर्व्यूहवाद' के अस्तित्वको नकारनेका वृथा प्रयास किया है। उनके भाष्यसे 'चतुर्व्यूह'के सम्बन्धमें उनके विकृत धारणामूलक वाक्य नीचे उद्धृत किये गये हैं। “उत्पत्त्यसम्भवात्” (सूत्र ४२, शङ्करभाष्य)-××× “तत्र भागवता मन्यन्ते, भगवानेवैको वासुदेवो निरञ्जनो ज्ञानस्वरूपः परमार्थ-तत्त्वम्। स चतुर्द्धात्मानं प्रविभज्य प्रतिष्ठितो वासुदेवव्यूहरूपेण सङ्कर्षणव्यूहरूपेण प्रद्युम्नव्यूहरूपेणाऽनिरुद्ध-व्यूहरूपेण च। वासुदेवो नाम परमात्मोच्यते, सङ्कर्षणो नाम जीवः, प्रद्युम्नो नाम मनः, अनिरुद्धो नामाहङ्कारः। तेषां वासुदेवः परा प्रकृतिः, इतरे सङ्कर्षणादयः कार्यम्। तत्र यत्तावदुच्यते, योऽसौ नारायणः परः परमात्मा सर्वात्मा, स आत्मानात्मनमनेकधा व्यूह्यावस्थित इति, तन्न निराक्रियते। यत् पुनरिदमुच्यते,-वासुदेवात् सङ्कर्षण उत्पद्यते, सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नः, प्रद्यम्नाच्चानिरुद्ध इति, अत्र ब्रूमः-न वासुदेवसंज्ञकात् परमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञस्य जीवस्योत्पत्तिः सम्भवति, अनित्यत्वादिदोषप्रसङ्गात्। उत्पत्तिमत्त्वे हि जीवस्यानित्यत्वादयो दोषाः प्रसज्येरन्, ततश्च नैवास्य भगवत्प्राप्तिर्मोक्षः स्यात्, कारणाप्राप्तौ कार्यस्य प्रविलयप्रसङ्गात्। प्रतिषेधिष्यते चाचार्यों जीवस्योत्पत्तिं 'नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः' इति। तस्मादसङ्गतैषां कल्पना।” भाष्यका अर्थ-“भागवत-लोग (वैष्णव) सोचते हैं कि, भगवान् वासुदेव एक हैं, वे निरञ्जन हैं, ज्ञानमय उनका शरीर है और वे ही परमार्थतत्त्व हैं। वे स्वयं अपनेको चार भागोंमें विभक्त करके विराजमान हैं। वह चार प्रकारका व्यूह इस प्रकार है-पहला वासुदेव-व्यूह, दूसरा सङ्कर्षण-व्यूह, तीसरा प्रद्युम्न-व्यूह और चौथा अनिरुद्ध-व्यूह, यह चार प्रकारका व्यूह ही उनका शरीर है। वासुदेवका दूसरा नाम 'परमात्मा' है, सङ्कर्षणका अन्य नाम 'जीव' है, प्रद्युम्नका नामान्तर 'मन' है और अनिरुद्धका एक और नाम 'अहङ्कार' है। इन चतुर्व्यूहोंमें वासुदेव-व्यूह
पाँचवाँ अध्याय | २७१
[ ५/४१-४८ ही परा प्रकृति अर्थात् मूल कारण है। सङ्कर्षणादि वासुदेव-व्यूहसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये परा प्रकृतिका कार्य हैं। जीव बहुत समय तक भगवत्-गृह (मठ-मन्दिर) में जाकर उपादान, पूजा, स्वाध्याय और योगसाधनमें रत रहकर पापसे मुक्त होता है। तब वह पुण्यशरीरी होकर परा प्रकृति भगवान्को प्राप्त करता है। भागवत-लोग यह कहते हैं कि नारायण प्रकृतिसे परे और परमात्माके नामसे प्रसिद्ध तथा सर्वात्मा हैं, यह बात श्रुतिके विरुद्ध नहीं है और वे स्वयं अपने अनेक प्रकारके व्यूहरूपोंमें अवस्थित या विराजमान हैं, इस बातको भी हमलोग स्वीकार करते हैं। इसलिये भागवत-मतका यह अंश इस सूत्रके द्वारा निराकरणीय नहीं है। परन्तु भागवत-लोग जो यह कहते हैं कि वासुदेवसे सङ्कर्षण, सङ्कर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धकी उत्पत्ति हुई है, इस अंशका निषेध करनेके लिये ही आचार्य वेदव्यासने इस सूत्रकी रचना की है। अनित्यत्वादि दोषकी आशङ्काके कारण वासुदेव नामक परमात्मासे सङ्कर्षण नामक जीवकी उत्पत्ति सम्पूर्ण रूपसे असम्भव है। जीव यदि उत्पत्तिमान हो, तो उसमें अनित्य होनेका दोष अवश्य ही होगा। तब जीवका नश्वर स्वभाव होनेके कारण उसका भगवत् प्राप्तिरूप मोक्ष हो ही नहीं सकता है, क्योंकि कारण-विनाशमें कार्य-विनाश अवश्यम्भावी है। आचार्य वेदव्यासने जीवकी उत्पत्तिका निषेध दूसरे अध्यायके तीसरे पाद “नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः” सूत्रके द्वारा की है और उत्पत्तिनिषेधके द्वारा नित्यता प्रमाणित करेंगे, इसलिये यह कल्पना असङ्गत है।” “न च कर्त्तुः करणम्” (सूत्र ४३, शङ्करभाष्य)—‘इतश्चासमञ्जसैषां कल्पना, यस्मान्न हि लोके कर्त्तुर्देवदत्तादेः करणं परश्वाद्युत्पद्यमानं दृश्यते। वर्णयन्ति च भागवताः—कर्तुर्जीवात् सङ्कर्षणासंज्ञकात् करणं मनः प्रद्युम्नसंज्ञकमत्पद्यते, कर्त्तृजाच्च तस्मादनिरुद्ध-संज्ञकोऽहङ्कार उत्पद्यते इति। न चैतद्द्दष्टान्तमन्तरेणाध्यवसितुं शक्नुमः। न चैवम्भूतां श्रुतिमुपलभामहे।” भाष्यका अर्थ— “इस प्रकारकी कल्पनाको जो असङ्गत कहा है, इसका कारण है। उदाहरण स्वरूप जैसे देवदत्तादि (अनिश्चित रूपसे कोई एक व्यक्ति) कर्त्तासे कुल्हाड़ी आदि करणकी उत्पत्ति दृष्टिगोचर नहीं होती है, तो भी भागवत-लोग कहते हैं- सङ्कर्षण नामक कर्त्ता-जीवसे प्रद्युम्न नामक करण-मनने जन्म लिया है। पुनः उन्हीं कर्त्तासे जन्म ग्रहण किये प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध अर्थात् अहङ्कारकी उत्पत्ति होती है। भागवत-लोग इस बातको दृष्टान्तके द्वारा समझानेमें अक्षम हैं, तो उसे किस प्रकार ग्रहण किया जा सकता है? इस तत्त्वका बोध करानेवाला कोई श्रुति-वाक्य भी नहीं सुना जाता है।” “विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः” (सूत्र ४४, शङ्करभाष्य)—“तथापि स्यात्र चेते सङ्कर्षणादयो जीवादिभावेनाभिप्रायन्ते, किं तर्हि, ईश्वरा एवैते सर्वे ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिरैश्वर्यधर्मैरन्विता अभ्युपगम्यन्ते, वासुदेवा एवैते सर्वे निर्दोषा निरधिष्ठाना निरवद्याश्चेति, तस्मान्नायं यथावर्णित उत्पत्त्यसम्भवो दोषः प्राप्नोतीति, अत्रोच्यते—एवमपि तदप्रतिषेध उत्पत्त्यसम्भवस्याप्रतिषेध प्राप्नोत्येव। अयमुत्पत्त्यसम्भवो दोषः प्रकारान्तरेणेत्यभिप्रायः। कथम्? यदि तावदयमभिप्रायः —परस्परभिन्ना एवैते वासुदेवादयश्चत्वार ईश्वरास्तुल्यधर्माणो नैषामेकात्मकत्वमस्तीति, ततोऽनेकेश्वर- कल्पनाऽनर्थक्यं, एकेनैवेश्वरेणेश्वरकार्यसिद्धेः; सिद्धान्तहानिश्च—भगवानेको वासुदेवः परमार्थतत्त्वमित्यभ्युपगमात्। अथायमभिप्राय— एकस्यैव भगवत एते चत्वारो व्यूहास्तुल्यधर्माण इति, तथापि तदवस्थ एवोत्पत्त्यसम्भवः। न हि वासुदेवात् सङ्कर्षणस्योत्पत्तिः सम्भवति, सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नस्य, प्रद्युम्नाच्चानिरुद्धस्य, अतिशयाभावात्। भवितव्यं हि कार्यकारणयोरतिशयेन २७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४१-४८ ] यथा मृद्घटयोः। न ह्यसत्यतिशये कार्यं कारणमित्यवकल्पते। न च पञ्चरात्रसिद्धान्तिष्वेकैकस्मिन् सर्वेषु वा ज्ञानैश्वर्यादितारतम्यकृतः कश्चिद्भेदोऽभ्युपगम्यते। वासुदेवा एव हि सर्वे व्यूहा निर्विशेषा इष्यन्ते। न चैते भगवद्व्यूहाश्चतुःसंख्यायामेवावतिष्ठेरन्, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य समस्तस्यैव जगतो भगवद्व्यूहत्वावगमात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंका इस प्रकार अभिप्राय भी हो सकता है कि उक्त सङ्कर्षणादि जीव-कोटि नहीं हैं; वे लोग सभी ईश्वर, सभी ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्तियुक्त, बल, वीर्य और तेजःसम्पन्न, सभी वासुदेव, सभी निर्दोष, निराधिष्ठित, निरवद्य हैं। इसलिये उनके सम्बन्धमें उत्पत्त्यसम्भव-दोष नहीं है। इस अभिप्रायके ऊपर यह कह सकते हैं—इस प्रकारका अभिप्राय रहनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषका निवारण नहीं होता है, क्योंकि यह दोष दूसरे प्रकारसे रह जाता है। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं; किन्तु सभी समधर्मी और ईश्वर हैं। यह अर्थ अभिप्रेत होनेपर अनेक ईश्वरोंको स्वीकार करना होगा। अनेक ईश्वर स्वीकार करनेका कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि एक ईश्वरके द्वारा ही ईश्वर-कार्य सिद्ध (सम्पादन) हो जाता है। और भी भगवान् वासुदेव एक अर्थात् अद्वितीय और परमार्थ-तत्त्व हैं, इस प्रकार प्रतिज्ञा रहनेसे सिद्धान्तहानिका दोष भी जुड़ जाता है। अभिप्राय यह है—यह चतुर्व्यूह एकमात्र भगवान्का ही है और वे सभी समधर्मी हैं। ऐसा होनेपर भी उत्पत्त्यसम्भव-दोषसे बचा नहीं जा सकता, क्योंकि वे किसी प्रकार एक-दूसरेसे कम या अधिक नहीं होनेपर वासुदेवसे सङ्कर्षणका, सङ्कर्षणसे प्रद्युम्नका और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका जन्म नहीं हो सकता है। कार्य-कारणमें कोई वैशिष्ट्य होता है, यह स्वीकार करना होगा। जिस प्रकार मिट्टी (कारण) से घड़ा (कार्य) बनता है। दोनोंमें तारतम्य ना रहनेसे कौन कार्य है, कौन कारण है, यह निर्देश नहीं किया जा सकता। और भी देखें, पञ्चरात्र-सिद्धान्ती लोग वासुदेवादिके ज्ञानादि तारतम्यकृत किसी भेदको नहीं मानते, अपितु चतुर्व्यूहको एकमात्र वासुदेव ही मानते हैं। तो भगवान्के व्यूह क्या चार ही पर्याप्त हैं? अवश्य ही ऐसा नहीं है। ब्रह्मादिसे लेकर घासके तिनके तक समुदाय जगत् सभी भगवत्-व्यूह हैं—यह श्रुति और स्मृति, दोनोंके द्वारा प्रमाणित हुआ है।” विप्रतिषेधाच्च’ (सूत्र ४५, शङ्करभाष्य)—“विप्रतिषेधश्चास्मिन् शास्त्रे बहुविध उपलभ्यते गुणगुणित्व-कल्पणादिलक्षणः। ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजांसि गुणाः, आत्मान एवैते भगवन्तो वासुदेवा इत्यादिदर्शनात्।” भाष्यका अर्थ—“भागवत-लोगोंकी पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें गुण और गुणी आदिमें अनेक प्रकारसे विरोधी कल्पना दिखायी देती है। स्वयं ही गुण और स्वयं ही गुणी, यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। वे कहते हैं कि ज्ञानशक्ति, ऐश्वर्यशक्ति, बल, वीर्य और तेज, ये सब गुण हैं, प्रद्युम्नादि भिन्न होनेपर भी ये आत्मा और भगवान् वासुदेव हैं।” श्रीपाद शङ्कराचार्यके मतवादके उत्तरमें श्रीरूप गोस्वामीकृत लघुभागवतामृतमें (चतुर्व्यूह-वर्णन- प्रसङ्गमें ८०-८३ श्लोकमें)— “महावस्थाख्यया ख्यातं यद्व्यूहानां चतुष्टयम्। तस्याद्योहयं तथोपास्यश्चित्ते तदधिदैवतम्। तथा विशुद्धसत्त्वस्य यश्चाधिष्ठानमुच्यते॥ निजांशो यस्य भगवान् श्रीसङ्कर्षण इष्यते। यस्तु सङ्कर्षणो व्यूहो द्वितीय इति सम्मतः। जीवश्च स्यात् सर्वजीवप्रादुर्भावास्पदत्वतः॥ पूर्णशारद-शुभ्रांशुपरार्द्धमधुरद्युतिः। उपास्योऽयमहाङ्कारे शेषन्यस्तनिजांशकः॥ स्मराारातैरधर्मस्य सर्वान्तकसुरद्विषाम्। अन्तर्यामित्वमास्थाय जगत्संहारकारकः॥ व्यूहस्तृतीयः प्रद्युम्नो विलासे यस्य पाँचवाँ अध्याय | २७३
[ ५/४१-४८
विश्रुतः। यः प्रद्युम्नो बुद्धितत्त्वे बुद्धिमद्भिरुपास्यते ॥ स्तवत्या च श्रिया देव्या निषेव्यत इलावृते। शुद्धजाम्बूनदप्रख्यः क्वचिन्नोलघनच्छविः॥ निदानं विश्वसर्गस्य कामन्यस्तनिजांशकः। विधेः प्रजापतीनाञ्च रागिणाञ्च स्मरस्य च। अन्तर्यामित्वमापन्नः सर्गं सम्यक् करोत्यसौ॥ व्यूहस्तर्योऽनिरुद्धाख्यो विलासो यस्य शस्यते। योऽनिरुद्धो मनस्तत्त्वे मनीषिभिरुपास्यते॥ नीलजीमूतसङ्काशो विश्वरक्षणतत्परः। धर्मस्यायं मनूनाञ्च देवानां भूभुजां तथा। अन्तर्यामित्वमास्थाय कुरुते जगतः स्थितिम्॥ मोक्षधर्मे तु मनसः स्यात् प्रद्युम्नोऽधिदैवतम्। अनिरुद्धस्त्वहङ्कारस्येति तत्रैव कीर्त्तितम्॥ सर्वेषां पञ्चरात्राणामप्येषा प्रक्रिया मता। पाद्मे तु परमव्योम्नः पूर्वाद्ये दिक्चतुष्टये। वासुदेवादयो व्यूहश्चत्वारः कथिता क्रमात्॥" “परव्योम-महावैकुण्ठनाथ नारायणके ‘महावस्थ’ नामक विख्यात चतुर्व्यूहमें ये वासुदेव ‘आदिव्यूह’ हैं और चित्तके उपास्य हैं। इसलिये ये चित्तके अधिष्ठातृ देवता हैं और विशुद्ध-सत्त्वमें अधिष्ठित हैं। (भाः ४/३/२३) श्रीसङ्कर्षण इनके स्वांश अर्थात् विलास हैं। सङ्कर्षणको ‘द्वितीयव्यूह’ और सभी जीवोंके प्रादुर्भावका स्रोत होनेके कारण उन्हें ‘जीव’ भी कहा जाता है। असंख्य शारदीय पूर्ण-चन्द्रमाओंकी उज्ज्वल किरणोंसे भी सुमधुर उनकी कान्ति है। वे अहङ्कारतत्त्वके उपास्य हैं; उन्होंने अनन्तदेवमें अपनी आधारशक्ति स्थापित की है और वे कामदेवको भस्म करनेवाले रुद्र और अधर्म, अहि (सर्प), अन्तक (मृत्यु) एवं असुरोंके अन्तर्यामी रूपमें रहकर जगत्के संहार कार्यका सम्पादन करते हैं। उन्हीं सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति प्रद्युम्न तीसरा व्यूह हैं। बुद्धिमान लोग बुद्धितत्त्वसे प्रद्युम्नकी उपासना करते हैं। लक्ष्मीदेवी इलावृतवर्षमें उनका गुणगान करते-करते सेवा करती हैं। कहीं पिघले स्वर्णकी भाँति, तो कहीं नवीन-नील मेघकी भाँति उनकी अङ्गकान्ति है। वे विश्वसृष्टिका मूल कारण हैं और उन्होंने अपनी सृष्टि करनेकी शक्ति कामदेवमें निहित की है। वे विधाता हैं और सभी प्रजापतियों, विषयोंमें अनुरक्त देव-मानवादि प्राणियों एवं कन्दर्पके अन्तर्यामी रूपमें सृष्टि कार्यका सम्पादन करते हैं। चौथे व्यूह अनिरुद्ध सङ्कर्षणकी विलासमूर्ति हैं। मनीषीगण मनःतत्त्वमें इन अनिरुद्धकी उपासना करते हैं। उनकी अङ्गकान्ति नीलमेघके सदृश है। वे विश्वके पालनमें सदा तत्पर हैं। वे धर्म, मनु, देवता और राजाओंके अन्तर्यामी रूपमें जगत्का पालन करते है। मोक्षधर्ममें प्रद्युम्नको मनका अधिदेवता और अनिरुद्धको अहङ्कारका अधिदेवता कहा गया है, परन्तु चतुर्व्यूहके विषयमें पूर्वोक्त वाक्य (अर्थात् प्रद्युम्न बुद्धिके और अनिरुद्ध मनके अधिदेवता, यह) पूर्ण रूपसे पञ्चरात्र-सम्मत है।” भगवान्का विलास और अचिन्त्यशक्तिके सम्बन्धमें लघुभागवतामृतमें (४४-४६ संख्या) — “नन्विदं श्रूयते शास्त्रे महावाराह-वाक्यतः। 'सर्वे नित्याः शाश्वताश्च देहास्तस्य परात्मनः। हानोपादानरहिता नैव प्रकृतिजाः क्वचित्॥ परमानन्दसन्दोहा ज्ञानमात्राश्च सर्वतः। सर्वे सर्वगुणैः पूर्णा सर्वदोषविवर्जिताः ॥ इति। किञ्च श्रीनारद-पञ्चरात्रे- 'मणैर्यथा विभागेन नील-पीतादिभिर्युतः। रूपभेदमवाप्नोति ध्यानभेदात् तथाच्युतः ॥' इति। तस्मात् कथं तारतम्यं तेषां व्याख्यायते त्वया॥ अत्रोच्यते—'एकत्वञ्च पृथकत्वञ्च तथांशत्वमृतांशता। तस्मिन्नेकत्र नायुक्तमचिन्त्यानन्तशक्तितः ॥' तत्रैकत्वेऽपि पृथक्प्रकाशता, यथा- (भाः १०/६९/२) 'चित्रं वतैनदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥' इति। पृथक्त्वेऽप्योकरूपतापत्तिः, यथा पाद्मे- 'स देवो बहुधा भूत्वा निर्गुणः पुरुषोत्तमः। एकीभूय पुनः शेते निर्दोषा हरिरादिकृत् ॥' इति। एकस्यैव अंशांशित्वं विरुद्धशक्तित्वञ्च, यथा (भाः १०/४०/७) - 'यजन्ति त्वन्मायास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम्॥' इति। कौर्मे च—'अस्थूलश्चाणुरूंश्चैव स्थूलोऽणुश्चैव सर्वतः। अवर्णः सर्वतः प्रोक्तः श्यामो रक्तान्तलोचनः। ऐश्वर्योगाद् भगवान्
२७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
विरुद्धार्थोऽभिधीयते॥ तथापि दोषा परेमे नैवाहार्याः कथञ्चन। गुणा विरुद्धा अप्येते समाहार्याः समन्ततः॥' इति। श्रीषष्ठस्कन्धे मिथो विरुद्धाचिन्त्यशक्तित्वं यथा गद्येषु (भाः ६/९/३४-३७)- 'दुरवबोध इवायं तव विहारयोगो यदशरणोऽशरीर इदमनवेक्षितास्मत्समवाय आत्मनैवाविक्रियमाणेन सगुणमगुणः सृजसि हरसि पासि। अथ तत्रभवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गपतितः पारतन्त्र्येण स्वकृतकुशलाकुशलं फलमुपाददाति? आहोस्व्यादात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्ते? इति ह वाव न विदामः॥ न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगणे ईश्वरे अनवगाह्यमाहात्म्येऽर्वाचीन-विकल्प-वितर्क-विचार-प्रमाणाभासकुतर्क-शास्त्रकलिलान्तः- करणाशय-दुरवग्रहवादिनां विवादानवसरे॥ उपरतसमस्तमायामये केवल एवात्ममायामन्तर्द्धाय को न्वर्थो दुर्घट इव भवति, स्वरूपद्वयाभावात् सम-विषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम्' ॥ इति। अत्र कारिकाः- 'विना शरीरचेष्टत्वं विना भूम्यादिसंश्रयम्। विना सहायांस्ते कर्माविक्रियस्य सुदुर्गमम्॥ उक्तो गुणविसर्गेण देवासुररणादिकः॥ तस्मिन् पतित आसक्त पारतन्त्र्यन्तु तद्भवैत्। यदाश्रितेषु देवेषु पारवश्यं कृपाकृतम्॥ तेन स्वकृतमात्मीयकृतं शुभशुभेतरत्। सुखदुःखादिरूपं किं फलं स्वीकुरुते भवान्। आत्मारामतया किंवा तत्रोदास्तेतरामिति। ना विद्मः किन्तु नैवेदं विरुद्धमुभयं त्वयि॥ तत्र हेतुर्भगवतीत्यादि प्रोक्तं पदद्वयम्। तथैवेश्वर-इत्यादिपदानां पञ्चकं मतम्॥ भगवत्त्वेन सार्वज्ञ्यं सद्गुणत्वं तथान्यतः। ब्रह्मत्वं केवलत्वेन लभ्यते तत्र च स्फुटम्॥ यद्यपि ब्रह्मतहेतोः सर्वत्र स्यात् तटस्थता। तथाप्यादिगुणद्वया भवेद्भक्तानुकूलता॥ नन्वेकस्य स्वरूपस्य द्वैरूप्यं कथमेकदा। तत्राह अर्वाचीनेति तद्दृशानां हि वादिनाम्। विवादस्यानवसरस्ते सस्य तावद्गोचरे॥ अतोऽचिन्त्यत्मशक्तिं तां मध्येकृत्यात्र दुर्घटः। को न्वर्थ स्याद् विरुद्धोऽपि तथैवास्या ह्यचिन्त्यता। सा च नानावरुद्धानां कार्याणामाश्रयान्मता॥ 'श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्' इति च ब्रह्मसूत्रकृत्। 'अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्।' इति स्कान्दवचस्तच्च मण्यादिष्वपि दृश्यते॥ तादृशीञ्च विना शक्तिं न सिद्धेत् परमेशता। यतश्चानवगाह्यत्वेनास्य माहात्म्यमुच्यते॥ अज्ञानमिन्द्रजालं वा वीक्ष्यते यत्रकुत्रचित्। अतो न पारमैश्वर्यं तेन तस्य प्रसिद्ध्यति॥ तच्च न हीत्याह स्फुटञ्चोपरतेत्यदः॥ तथा भगवतीत्यादिपदानां षट्तयस्य च। भवेत् प्रयोगतात्पर्यमत्र निष्फलमेव हि॥ तस्मान्न शास्त्रयुक्तिभ्यामुभयं तद्विरुद्ध्यते। तथाप्युच्चावचधियामनेवंतत्त्व- वेदिनाम्। मतानुसारतो भासि रज्जुवत् त्वं तथा तथा॥ ननु भोः केवलं ज्ञानं ब्रह्म स्याद् भगवान् पुनः। नानाधर्मेति तत्रापि स्वरूपद्वयमीक्ष्यते॥ इति प्राह स्वरूपेति तत्स्वरूपस्य नैव हि। कदापि द्वैतमेकस्य धर्मद्वयमिदं ध्रुवम्॥ ततो विरोधस्तच्छक्तिविलासानां यदीक्ष्यते। तदेवाचिन्त्यमैश्वर्यं भूषणं न तु दूषणम्॥ इयमेव विरोधिकोक्तिस्तृतीयेऽपि च दृश्यते॥ (भाः ३/४/१६)- 'कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते, दुर्गाश्रयोऽथारिभयात् पलायनम्। कालात्मनो यत् प्रमदायुताश्रमः, स्वात्मन्रतेः खिद्यति धीर्विदामिह॥' इति। तत्तन्न वास्तवं चेत् स्यात् विदां बुद्धिभ्रमस्तदा। न स्यादेवेत्यचिन्त्यैव शक्तिलीलासु कारणम्॥ यथा यथा च तस्येच्छा सा व्यन क्ति तथा तथा॥" “यहाँपर यह आपत्ति हो सकती है कि महावराहपुराणमें ऐसा सुननेको मिलता है—'उन परमात्मा हरिके सब प्रकारके शरीर ही नित्य हैं और सभी शरीर ही जगत्में पुनः-पुनः आविर्भूत होते रहते है। ये सब शरीर हानोपादानशून्य हैं, इसलिये ये कभी भी प्रकृतिसे उत्पन्न नहीं हैं। सभी शरीर ही घनीभूत-परमानन्द, चिदेकरस-स्वरूप, सब प्रकारके चिन्मयगुणोंसे युक्त और सभी दोषोंसे मुक्त हैं।' और नारदपञ्चरात्रमें भी कहा गया है कि 'जिस प्रकार वैदूर्यमणि अलग-अलग स्थानपर नीला-पीला आदि अलग रङ्ग धारण करती है, उसी प्रकार भगवान् अच्युत भी उपासना भेदसे अपने स्वरूपको विभिन्न आकारोंमें प्रकाश करते रहते हैं।' इसलिये किस कारणसे उन सभी अवतारोंके तारतम्यकी व्याख्या कर रहे हैं? इस आशङ्काके उत्तरमें यही कहा जा सकता है—अचिन्त्य-अनन्तशक्तिके प्रभावसे उन एक ही पुरुषोत्तममें एकत्व और पृथक्त्व, अंशत्व और अंशित्व हो सकता है, उनके लिये कुछ भी असम्भव या असङ्गत