भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 300

[ ५/१४-२० हैं' - स्कन्दपुराणके इस वाक्यके अनुसार वैकुण्ठमें जो सब स्थान विद्यमान हैं, वे-वे स्थान प्रपञ्चमें भी हैं- इस प्रकार जानना होगा। प्राकृत सृष्टिके ऊपरी भागमें सभी वैकुण्ठ लोकोंका स्थान है। स्वायम्भुवतन्त्रमें भी - स्वतन्तरूपसे सबके ऊपर वैकुण्ठका स्थान है- यह कहा गया है। इस ग्रन्थमें देवी-महेश्वर संवादमें चतुर्दश-अक्षरध्यानके प्रसङ्गमें कहा गया है- 'मन्त्रका जप करते हुए साधक नाना कल्पवृक्ष-लताओंसे व्याप्त, व्यापक, अखण्ड वैकुण्ठका स्मरण करेंगे। उस वैकुण्ठके नीचे जड़-जगत्की कारणस्वरूप सत्त्व-रज-तमगुणोंकी साम्यावस्थावाली प्रकृति अवस्थित है।' इसलिये 'जिस प्रकारसे पृथ्वीपर हरिधामसमूह वर्तमान हैं, वहाँपर भी उसी प्रकारसे हैं' - इस न्यायके अनुसार भी द्वारका, मथुरा और गोकुल धामवाले श्रीकृष्णलोककी स्वतन्त्रताकी ही उपलब्धि होती है, स्वयं भगवान्‌का विहारक्षेत्र होनेके कारण ये धाम सबसे ऊपर हैं, यह सिद्ध होता है। इसलिये वृन्दावन-गोकुल ही सर्वोपरि विराजमान हैं और ये गोलोक नामसे प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मसंहितामें भी कहा गया है- 'गोकुल नामक श्रीकृष्णलोक हजार पत्रोंसे युक्त कमलके सदृश है। उसके बाहर चारों ओर चतुर्भुजाकार 'श्वेतद्वीप' नामक अद्भुत धाम है।' उस श्रीकृष्णके धाममें नन्द-यशोदादिके साथ वासयोग्य श्रीकृष्णका महा-अन्तःपुर है। गोकुलका स्वरूप इस प्रकार है- श्रीबलदेव प्रभुके अंश अनन्तसे गोकुलका आविर्भाव हुआ है और यह नित्य धाम है। तन्त्रशास्त्रसे भी ऐसा ही समझा जाता है। अनन्तदेव जिनके अंश हैं, उन श्रीबलदेव प्रभुका जहाँ जन्म और निवासस्थान है, वही भगवद्धाम है। गोकुलके आवरणोंका वर्णन इस प्रकार है-उस गोकुलके बाहर चारों दिशाओंमें स्थित एक चतुर्भुजाकार स्थल है जिसे 'श्वेतद्वीप' कहते हैं, इस अंश श्वेतद्वीपको गोकुल नहीं कहा जाता है। किन्तु चतुष्कोणात्मक स्थलका भीतरी मण्डल 'वृन्दावन' नामसे विख्यात है और केवल बाहरी मण्डल 'श्वेतद्वीप' नामसे जाना जाता है तथा इसका दूसरा नाम 'गोलोक' है। 'ब्रह्मलोक' शब्दसे 'वैकुण्ठ' को समझना चाहिये। नारद-पञ्चरात्रमें विजयाख्यान-प्रसङ्गमें कहा गया है- 'वैकुण्ठमें सबसे ऊपरी भागमें गोलोकमें सदा स्वयं श्रीगोपीनाथ गोकुलाधिपति श्रीगोविन्ददेव परमानन्दसे विहार करते हैं। इसलिये सभी लोकोंके ऊपर श्रीकृष्णलोककी स्थिति सिद्ध होती है। उस श्रीकृष्णलोकमें ही उन-उन लीला और परिकरभेदसे और अंशभेदसे 'द्वारका', 'मथुरा' और 'गोकुल' नामक तीन विशिष्ट स्थान हैं, यही निर्णीत हुआ है। अन्यत्र यह कहा गया है-प्रपञ्चमें पृथ्वीमें उन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध स्थान उन्हींके समान हैं, ऐसा सुना जाता है, क्योंकि वे भी वैकुण्ठके समान प्रपञ्चसे अतीत, नित्य, अलौकिक रूपविशिष्ट और भगवान्‌के नित्य प्रिय कहे जानेके कारण इन्हें वैकुण्ठमें स्थित श्रीकृष्णलोकसे अभिन्न जानना चाहिये ॥ १४-१८ ॥ वह स्वप्रकाशित, श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुआ है :- ब्रह्माण्डे प्रकाश ताँर कृष्णेर इच्छाय। एकइ स्वरूप ताँर, नाहि दुइ काय ॥ १९॥ भोगनेत्रोंसे प्रपञ्चके समान दिखनेपर भी भक्तिनेत्रोंसे श्रीकृष्णविलासक्षेत्र चिन्मयी चिन्तामणि-भूमि :- चिन्तामणि-भूमि, कल्पवृक्षमय वन। चर्मचक्षे देखे ताँरे प्रपञ्चेर सम ॥ २० ॥ २५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत