भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 2549 में से

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५/१९-२२ ] प्रेमनेत्रे देखे ताँर स्वरूप प्रकाश। गोप-गोपीसङ्गे याँहा कृष्णेर विलास ॥ २१ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - श्रीकृष्णकी इच्छासे वह चिन्मय व्रजधाम जड़ ब्रह्माण्डमें प्रकाशित होकर भी एक ही स्वरूपसे विराजमान होता है। कोई-कोई व्यक्ति यह विचार रखते हैं कि परव्योममें स्थित गोलोकादि धाम प्रपञ्चमें प्रकटित व्रजधामसे भिन्न है, किन्तु यह सत्य नहीं है। वे एक ही स्वरूप हैं, एक ही समयमें परव्योम और प्रपञ्चमें प्रकाशित होकर विराजमान हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित व्रजमें भी भूमि चिन्तामणि है, वनोंके वृक्ष कल्प-वृक्ष हैं, उसका स्वरूप-प्रकाश प्रेम-नेत्रोंके द्वारा ही दिखलायी देता है, चर्म-चक्षुओंके द्वारा वह प्रपञ्चके समान ही प्रतीत होता है। गोप-गोपीके साथ श्रीकृष्ण यहाँ सदा विलास करते हैं॥ १९-२१॥ अमृतानुकणिका - प्रश्न हो सकता है- भौतिक ब्रह्माण्ड तो सीमाबद्ध और क्षुद्र है तथा उसके भी एक क्षुद्र अंशमें व्रजलोक प्रकटित हुआ है, तब व्रजलोक भी क्षुद्र और सीमाबद्ध होगा, परन्तु यह सत्य नहीं है। श्रीकृष्ण बाल्यलीलामें एक छोटे बालकके रूपमें दिखते हैं, परन्तु स्वरूपतः वे जैसे विभु- सर्वव्यापक हैं (यथा माँ यशोदाका स्तनपान करते हुए अपने मुखमें समस्त लोक दिखलाये थे), वैसे ही व्रजलोक धाम ब्रह्माण्डके एक क्षुद्र अंशमें प्रकट होनेपर सीमाबद्ध दिखनेपर भी विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, यह श्रीगोकुलकी अचिन्त्य शक्तिका प्रभावसे ही सम्भव हुआ है॥१९॥ गोलोकमें गोविन्द :- ब्रह्मसंहिता (५/२५)- चिन्तामणिप्रकरसद्मसु कल्पवृक्ष- लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्। लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ २२ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - लाखों-लाखों कल्पवृक्षोंसे परिवेष्टित, चिन्तामणिसमूहसे निर्मित स्थानमें, कामधेनु गायोंका पालन करनेवाले तथा लाखों लक्ष्मियोंके द्वारा सम्भ्रम भावसे सेवित उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥२२॥ अनुभाष्य - कल्पवृक्षलक्षावृतेषु (कल्पवृक्षाणां प्रार्थनोचिताभीष्टफलप्रदवृक्षाणां लक्षैः असंख्यैः आवृतेषु मण्डितेषु) चिन्तामणिप्रकरसद्मसु (चिन्तामणीनाम् अभीष्टफलदानसमर्थरत्नानां प्रकरेण समूहेन रचितानि सद्मानि हर्म्याणि तेषु) सुरभीः (कामधेनुः) अभिपालयन्तम् (अभि सर्वतोभावेन गोपोचित-गो-परिचर्याप्रकारेण पालयन्तं) लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रमसेव्यमानं (लक्ष्मयः गोपरामाः तासां सहस्राणां शतैः सम्भ्रमेण सेव्यमानं) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-प्रार्थनाके अनुरूप असंख्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले कल्पवृक्षोंसे मण्डित, चिन्तामणि अर्थात् अभीष्ट फलदान करनेमें समर्थ रत्नोंसे निर्मित भवनोंसे युक्त स्थानमें पाँचवाँ अध्याय | २५९

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