श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 309, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें५/३६ ] मैत्रेय ! यही तुम्हारे प्रश्नका उत्तर है। प्रतिकूल अनुशीलनके फलसे श्रीकृष्णके द्वेषी जब वैरानूबन्धके द्वारा भी सद्गति प्राप्त कर सकते हैं, तब अनुकूल अनुशीलनके फलसे शुद्धभक्त सर्वोत्तम गति, श्रीकृष्णके चरणकमल या श्रीकृष्णप्रेम प्राप्त करेंगे, इसमें क्या सन्देह है? पराशर मुनिने यह नहीं कहा कि वे दोनों दैत्य पहले भगवत्-पार्षद जय-विजय थे। उन्होंने केवल इतना ही कहा कि उन्होंने तीन जन्म ग्रहण किये थे। इसलिये ये दोनों भगवत्पार्षद प्रत्येक कल्पमें असुररूपमें जन्मग्रहण करते हैं, यह पराशर मुनिका अभिप्राय नहीं है। यह अभिप्राय नहीं होनेपर प्रतिकल्पमें ही भगवत्पार्षदोंका पतन होता है, यह बात अत्यन्त ही असङ्गत है। (अर्थात् भगवान् विष्णुमें सृष्टि करनेकी इच्छा-शक्तिकी भाँति युद्ध करनेकी इच्छा-शक्ति भी नित्य वर्तमान है। जैसे क्रीड़ा-प्रिय महाराजा अपने प्रतिकूल वृत्तिवाले खिलाड़ियोंके साथ सदा क्रीड़ा करते रहते हैं, उन खिलाड़ियोंकी अनुपस्थितिमें अपने पार्षदों या अनुचरोंको प्रतिद्वन्द्वी बनाकर उनके साथ क्रीड़ाका आनन्द लेते हैं और वे अनुचरगण भी प्रतिकूल-भावके साथ क्रीड़ा करके अपने स्वामीका सन्तोष विधान करते हैं, वैसे ही भगवान् विष्णु भी किसी प्रतिकूल भाववाले अनादि-बहिर्मुख जीवके साथ अथवा अपने किसी पार्षदको प्रतिकूल-भावयुक्त करके और स्वयं भी उसके प्रति प्रतिकूल-भाव धारणकर परस्परकी युद्धक्रीड़ा-वृत्ति चरितार्थ करते हैं, इसलिये प्रतिकल्पमें भगवत्पार्षदोंके पतनकी बात असङ्गत है।) भगवान् जो अलौकिक नृसिंहरूपमें आविर्भूत हुए थे, उसमें हिरण्यकशिपुकी विष्णु-बुद्धि नहीं हुई थी, किन्तु उसने उन्हें कोई अति पुण्यके फलस्वरूप उत्पन्न प्राणीमात्र ही समझा। रजोगुणके उद्रेकके कारण उसकी बुद्धि भ्रमित हो गयी और उसने भगवान् नृसिंहमें 'यह एक तेजस्वी प्राणी है', ऐसी भावना की; वह अन्तकालमें उनके रूपकी भावना नहीं कर पाया। इसलिये केवल भगवान् नृसिंहके हाथों मारे जानेपर उसने रावण-देहमें सुदुर्लभ भोग-सम्पत्ति प्राप्त की। विष्णु होनेकी निश्चित रूपसे धारणाके अभावमें और अतिद्वेषके अभावमें भगवान्में आवेशकी वृद्धि नहीं होती। वेन राजाकी भाँति आवेशवृद्धिके बिना भगवत्-द्वेष केवल नरकका कारण है। अत्यन्त आवेश ना होनेपर निन्दादि-जनित अपराधोंका विनाश नहीं हो सकता। अपराध नाश ना हो पानेके कारण हिरण्यकशिपु भगवान्के शुद्धस्वरूपका दर्शन नहीं कर पाया, इसलिये परब्रह्म नृसिंहदेवके प्रकट रहनेपर भी वह उनमें लीन नहीं हो पाया। रावण शरीरमें भी उसका चित्त प्रबल कामके अधीन था, इसलिये हिरण्यकशिपुकी भाँति उसकी भी श्रीराममें मनुष्य बुद्धि थी। इस कारण उस दैत्यने शिशुपालके रूपमें पुनः पहलेकी भाँति उत्तम भोग-सम्पत्ति प्राप्त की। श्रीकृष्णमें वासुदेवत्व रहनेके कारण उसी नामयोगके हेतु वह उस समय उनको पूर्व दो जन्मोंमें अपनी मृत्युका कारण मानकर अत्यन्त द्वेष और परम आवेशसे सदा निन्दा-तर्जनादिमें भी उन सब नामोंका कीर्तन करता और उनमें चतुर्भुजादिरूप दर्शन करके विष्णु बुद्धि रखकर नामकीर्तनकी भाँति उस रूपकी भी अनुक्षण चिन्ता करता रहता था। इसलिये द्वेषजनित पापराशि दग्ध होनेपर श्रीकृष्णके द्वारा छोड़े गये सुदर्शन चक्रकी दीप्तिसे उसका दैत्यभाव दूर हुआ और शुद्ध-संस्कृत दिव्यचक्षु प्राप्तकर उसने भगवान्की परब्रह्म पाँचवाँ अध्याय | २६७