भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 308

[ ५/३६ प्रतिकल्पं समञ्जसः॥ नृसिंहरूपं हरिणा यदाविष्कृतमद्भुतम्। हिरण्यकशिपोरस्मिन् विष्णुबुद्धिर्न निश्चिता॥ किन्त्वेष पुण्यसम्पन्नः कोऽपीति कृतनिश्चयः। रज-उद्रिक्तता नुन्नमतिस्तद्भावयोगतः॥ ततोऽवाप्तविनाशहेतु- कामखिलोत्त्तमाम्। अवाप भोगसम्पत्तिं रावणत्वे सुदुर्लभाम्॥ विष्णुत्वानिश्चयान्नातिद्वेषान्नावेशसन्ततिः। तां बिना च भवेद् द्वेषो नरकायैव वेणवत्॥ किन्त्वस्य सम्पत्सम्प्राप्तिस्तत्करेण मृतेः परम्। एवमाहैव-शब्देन तत्सादृगुण्यमनुस्मरन्॥ आवेशाभावतो दोषानाशाच्छुद्धमपश्यतः। प्रकटेऽपि परब्रह्म-रूपे तत्रास्य नो लयः॥ रावणत्वे महाकाम-पराधीनीकृतात्मनः। तद्धन्मनुष्यधीरस्य श्रीरामेऽभून्मृतावपि॥ अतोऽसौ चेदिराजत्वे पुनरापोत्तमां श्रियम्॥ तत्र कृष्णे समस्तानामेव नाम्नां रमापतेः। कारणानि प्रवृत्तेस्तु निमित्तान्यभवंस्तदा॥ तेन निश्चित्य तं विष्णुं स्वस्य द्विर्मरणं यतः। अतिद्वेषान्महावेशात् तानि नामानि सर्वशः। प्रजल्प सततं शश्वन्निन्दा-सन्तर्जनादिषु॥ रूपञ्च तादृशं दृष्ट्वा विष्णुरेवेति निश्चयात्। नामवत् तच्च सर्वत्र सर्वदा चैव संस्मरन्॥ दग्धतद्द्वेषजाघौघः क्षिप्ते चक्रे च तद्रुचा। अपेतदैत्यभावोऽन्ते तथा संस्कृतदृष्टिकः। तदा तूज्ज्वलमद्राक्षीत् परं ब्रह्म नराकृति॥ तदैव चक्रघातेन दैत्यदेहे विनाशिते। तदेव ब्रह्म परमनुलीनत्वमाययौ॥ इत्युक्तवाप्यत्र बक्यादेर्मोक्षमप्यर्भलीलया। अमोक्षं कालनेम्यादेरन्यत्रापीशचेष्टया। मुनिः स्मृत्वा पुनः प्राख्यत् ‘अयं हि भगवान्’ इति॥ ‘हि’ प्रसिद्धं अयं कृष्णो भगवान् स्वयमेव यत्। प्रीणतां द्विषतां चातश्चेतांस्याकर्षति द्रुतम्। तस्मात् कीर्त्तित इत्यादि माहात्म्यं चित्रमत्र न॥” मर्मानुवाद-“(विष्णुपुराणके चौथे अंशमें) मैत्रेयने पराशर मुनिसे प्रश्न किया-‘हिरण्यकशिपु और रावणका शरीर धारणकर जिस दैत्यने देवताओंको भी दुष्प्राप्य भोग प्राप्त किये थे, किन्तु मुक्ति प्राप्त नहीं की, पुनः उसी दैत्यने शिशुपालका शरीर धारण करके किस प्रकार श्रीकृष्णसे सायुज्य प्राप्त किया?’ पराशरने कहा-‘श्रीनृसिंहदेवके आविर्भूत होनेपर हिरण्यकशिपु उनमें ‘ये विष्णु हैं’ ऐसी बुद्धि ना करके उनको कोई अति पुण्यवान् तेजस्वी प्राणी समझने लगा। रजोगुणके उद्रेकके कारण मृत्युके समय वह उनके रूपकी चिन्ता नहीं कर सका। इस कारणसे भगवान्‌को आलम्बन अर्थात् सेव्य विषयविग्रह ना माननेके कारण उसका मन भगवान्‌में विलीन नहीं हुआ। किन्तु उनके हाथों मारे जानेके फलस्वरूप दूसरे जन्ममें उसने रावणके शरीरमें तीनों लोकोंपर अधिकार करके अतिशय भोग-सम्पत्तिको प्राप्त किया। उस रावणके शरीरमें कामके वशीभूत होकर जानकीमें आसक्तचित्तसे उसने भगवान् श्रीरामचन्द्रके केवल रूपका दर्शन किया था। किन्तु मृत्युके समय श्रीराममें विष्णुबुद्धि ना होकर, उसके अन्तःकरणमें केवल उनके प्रति मनुष्य बुद्धि हुई थी। पुनः श्रीरामके हाथों मरनेके फलस्वरूप उसने शिशुपाल शरीरमें प्रसिद्ध चेदिराज वंशमें जन्म और प्रचुर ऐश्वर्य प्राप्त किया। श्रीकृष्णको वासुदेव मानकर उसकी उनमें विष्णु-बुद्धि थी। बहुत जन्मोंतक विद्वेषके फलसे उसके चित्तमें वही विद्वेष दृढ़रूपमें रहनेके कारण वह श्रीकृष्णकी निन्दा और उनपर क्रोध करते हुए उनके नामका उच्चारण करता था। और घोर विद्वेषके प्रभावसे चलते-फिरते, भोजन करते, स्नान करते, बैठते-उठते और सोते हुए सभी अवस्थाओंमें किसी भी प्रकारसे भी भगवान्‌का वह सुन्दर रूप शिशुपालके श्रीकृष्णाविष्ट चित्तसे दूर नहीं हुआ। आक्रोशादिमें श्रीकृष्णके नामका उच्चारण और हृदयमें उनके रूपको धारण करते-करते अन्तिम समयमें उसके द्वेषादि अपराध दूर हो गये और उसने अपने विनाशके लिये आये सुदर्शन-चक्रकी किरणछटामें परमब्रह्म भगवत्स्वरूपके दर्शन किये। (प्रतिकूल होनेपर भी) भगवत्-स्मरणके प्रभावसे उसके अनर्थ ध्वंस हो गये और शिशुपाल भगवान्‌के चक्रके द्वारा मारे जानेपर भगवान्‌के समीप जाकर उनमें लयको प्राप्त हुआ। हे २६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत