श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/४१-४८
चित्-शक्ति-सन्धिनी-परिणत तद्रूपवैभव :- चिच्छक्ति-विलास एक—'शुद्धसत्त्व' नाम। शुद्धसत्त्वमय यत वैकुण्ठादि-धाम ॥ ४३ ॥ षडैश्वर्यादि समस्त महासङ्कर्षणका चित्-वैभव :- षड्विधैश्वर्य ताँहा सकल चिन्मय। सङ्कर्षणे विभूति सब, जानिह निश्चय ॥ ४४ ॥ अनुवाद—इनमें श्रीबलराम महासङ्कर्षणके रूपमें हैं जो चित्-शक्तिके आश्रय हैं। वे सभी कारणोंके कारण हैं। चित्-शक्तिके एक विलासका नाम शुद्ध-सत्त्व है। वैकुण्ठमें सभी लोक शुद्धसत्त्वमय हैं। वहाँ जितना षड्विध ऐश्वर्य है, वह सब पूर्ण चिन्मय है और यह सब महासङ्कर्षणकी विभूति हैं, ऐसा निश्चित रूपसे जानना चाहिये॥ ४२-४४॥ महासङ्कर्षण ही जीवशक्तिके आश्रय :- 'जीव'-नाम तटस्थाख्य एक शक्ति हय। महासङ्कर्षण—सब जीवेर आश्रय ॥ ४५ ॥ अनुवाद—जीव नामकी एक तटस्था शक्ति है और उसके अंश सभी जीवोंके भी महासङ्कर्षण आश्रय हैं॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वारकामें जो श्रीकृष्ण-बलदेवादि चतुर्व्यूह हैं, उनका ही द्वितीय प्रकाश परव्योममें है। इस चतुर्व्यूहका नाम 'द्वितीय चतुर्व्यूह' है और यह भी चिन्मय एवं विशुद्ध है। वहाँ श्रीबलरामका स्वरूप महासङ्कर्षण है। उस परव्योममें 'शुद्धसत्त्व' नामक चित्-शक्तिका सन्धिनी-विलास है, जिसके द्वारा वैकुण्ठादि शुद्धसत्त्वमय धाम और षडैश्वर्य—ये सभी महासङ्कर्षणकी विभूतियाँ हैं। महासङ्कर्षण ही समस्त जीवोंके आश्रय हैं, इसलिये वे तटस्था नामक जीव-शक्तिके आश्रय हैं। चित्कण-जीव जीवशक्तिसे उत्पन्न होकर भी मायाशक्तिके द्वारा वश्य-रूपमें निर्मित होनेसे 'माया' और 'चित्', इन दोनों तटस्थ-धर्मजनित होनेके कारण इसका नाम 'तटस्थ' है॥ ४०-४५॥ सङ्कर्षणके ही अंश—कारणोदशायी विष्णु :- याँहा हैते विश्वोत्पत्ति, याँहाते प्रलय। सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण समाश्रय ॥ ४६ ॥ सर्वाश्रय, सर्वाद्भुत, ऐश्वर्य अपार। 'अनन्त' कहिते नारे महिमा याँहार ॥ ४७ ॥ तुरीय, विशुद्धसत्त्व, 'सङ्कर्षण' नाम। तिँहो याँर अंश, सेइ नित्यानन्द-राम ॥ ४८ ॥ अनुवाद—जिनसे जगत्की सृष्टि और प्रलय होती है, उन पुरुष (कारणोदशायी विष्णु) के मूल आश्रय श्रीसङ्कर्षण हैं। वे सङ्कर्षण सबके आश्रय हैं, वे सभी प्रकारसे अद्भुत हैं और उनका ऐश्वर्य असीम है। 'अनन्त' भी उनकी महिमाका बखान नहीं कर सकते हैं। सङ्कर्षण जो मायातीत विशुद्धसत्त्व हैं, वे श्रीनित्यानन्द-बलरामके अंश हैं॥ ४६-४८॥
२७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत