श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/४१-४८ ]
अमृतप्रवाह भाष्य-महासङ्कर्षण चिन्मय विशुद्धसत्त्व हैं। वे श्रीनित्यानन्द-रामके अङ्ग अर्थात् प्रकाश हैं॥४८॥ अनुभाष्य-मूल पयारमें 'अंश' और अमृतप्रवाह भाष्यमें 'अङ्ग' प्रयोग हुआ है, इन दोनोंका एक ही अर्थ है। श्रीपाद शङ्कराचार्यने अपने भाष्यमें ब्रह्मसूत्रके द्वितीय पादमें द्वितीय अध्यायके 'उत्पत्त्यसम्भवाधिकरणे' में चतुर्व्यूहके विषयमें जो भ्रमपूर्ण विचार व्यक्त किये हैं, उसकी मीमांसा-स्वरूपमें ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास कविराज) ने 'पयार ४१-४७' के द्वारा उनको परास्त करके दिखाया है। अद्वयज्ञान विष्णुवस्तुको दृश्यजगत्की कोई एक वस्तु माननेकी श्रीपाद शङ्कराचार्यकी जो भ्रान्ति है, उसे पञ्चरात्रमें श्रीनारायणने स्वयं उनको बतलाया है, परन्तु श्रीनारायणकी आज्ञानुसार शिवजीके अवतार श्रीशङ्कराचार्यने बद्ध और आसुरिक स्वभाववाले जीवोंको मोहित करनेके लिये उसके विप्रलिप्साका (छलका) अवलम्बन करके जिस भ्रान्त धारणाका प्रचार किया, उसके फलस्वरूप उनकी परम्परामें दीक्षितादि अद्वैतपन्थी भ्रान्तिकी चरम सीमातक पहुँचे हैं। बद्धजीवोंमें चतुर्व्यूहके ज्ञानकी योग्यता सम्भवपर नहीं है। उनकी निर्बुद्धिताको बढ़ानेके लिये ही श्रीशङ्कराचार्यकी इस प्रकार दुरुक्ति है। चतुर्व्यूह शुद्धसत्त्वमय, चित्शक्तिविलासी और षडैश्वर्यसम्पन्न हैं। उनको दरिद्र और निःशक्तिक कहना या समझना मूढ़ जीवोंका धर्म है। ऐसे ही जीव मायाके द्वारा मोहित होनेके योग्य हैं। वैकुण्ठ और मायिक जगत्के भेदको समझ नहीं पानेसे इस प्रकारकी भ्रान्तिकी सम्भावना होती है। श्रीशङ्कराचार्यने ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्यायमें द्वितीयपादके ४२-४५ सूत्रोंके अपने भाष्यमें 'चतुर्व्यूहवाद' के अस्तित्वको नकारनेका वृथा प्रयास किया है। उनके भाष्यसे 'चतुर्व्यूह'के सम्बन्धमें उनके विकृत धारणामूलक वाक्य नीचे उद्धृत किये गये हैं। “उत्पत्त्यसम्भवात्” (सूत्र ४२, शङ्करभाष्य)-××× “तत्र भागवता मन्यन्ते, भगवानेवैको वासुदेवो निरञ्जनो ज्ञानस्वरूपः परमार्थ-तत्त्वम्। स चतुर्द्धात्मानं प्रविभज्य प्रतिष्ठितो वासुदेवव्यूहरूपेण सङ्कर्षणव्यूहरूपेण प्रद्युम्नव्यूहरूपेणाऽनिरुद्ध-व्यूहरूपेण च। वासुदेवो नाम परमात्मोच्यते, सङ्कर्षणो नाम जीवः, प्रद्युम्नो नाम मनः, अनिरुद्धो नामाहङ्कारः। तेषां वासुदेवः परा प्रकृतिः, इतरे सङ्कर्षणादयः कार्यम्। तत्र यत्तावदुच्यते, योऽसौ नारायणः परः परमात्मा सर्वात्मा, स आत्मानात्मनमनेकधा व्यूह्यावस्थित इति, तन्न निराक्रियते। यत् पुनरिदमुच्यते,-वासुदेवात् सङ्कर्षण उत्पद्यते, सङ्कर्षणाच्च प्रद्युम्नः, प्रद्यम्नाच्चानिरुद्ध इति, अत्र ब्रूमः-न वासुदेवसंज्ञकात् परमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञस्य जीवस्योत्पत्तिः सम्भवति, अनित्यत्वादिदोषप्रसङ्गात्। उत्पत्तिमत्त्वे हि जीवस्यानित्यत्वादयो दोषाः प्रसज्येरन्, ततश्च नैवास्य भगवत्प्राप्तिर्मोक्षः स्यात्, कारणाप्राप्तौ कार्यस्य प्रविलयप्रसङ्गात्। प्रतिषेधिष्यते चाचार्यों जीवस्योत्पत्तिं 'नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः' इति। तस्मादसङ्गतैषां कल्पना।” भाष्यका अर्थ-“भागवत-लोग (वैष्णव) सोचते हैं कि, भगवान् वासुदेव एक हैं, वे निरञ्जन हैं, ज्ञानमय उनका शरीर है और वे ही परमार्थतत्त्व हैं। वे स्वयं अपनेको चार भागोंमें विभक्त करके विराजमान हैं। वह चार प्रकारका व्यूह इस प्रकार है-पहला वासुदेव-व्यूह, दूसरा सङ्कर्षण-व्यूह, तीसरा प्रद्युम्न-व्यूह और चौथा अनिरुद्ध-व्यूह, यह चार प्रकारका व्यूह ही उनका शरीर है। वासुदेवका दूसरा नाम 'परमात्मा' है, सङ्कर्षणका अन्य नाम 'जीव' है, प्रद्युम्नका नामान्तर 'मन' है और अनिरुद्धका एक और नाम 'अहङ्कार' है। इन चतुर्व्यूहोंमें वासुदेव-व्यूह
पाँचवाँ अध्याय | २७१