श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् “परमेश्वरकी भिन्न-अभिन्नरूपा, चेतन-अचेतनात्मिका महालक्ष्मी अपनी शक्तिके द्वारा इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और साक्षात्शक्ति रूपोंमें तीन प्रकारकी हैं। इच्छाशक्ति पुनः श्री, भू और नीला भेदसे तीन प्रकारकी हैं।” श्रीमध्वाचार्य स्वकृत गीता-टीका (श्लोक ४/६)में— “महदादेस्तु माता या श्री-भू-नीलेति कल्पिता। विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुर्जॊऽपि हि। जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढ़-चेतसाम्॥” अर्थात् “महत्तत्त्वादिकी माता जो श्री-भू-नीलारूपमें निरूपित हैं और उन्हें विमोहनकारिणी ‘दुर्गा’ भी कहा जाता है। उनके साथ अजन्मा श्रीविष्णु भी अपने चित्-बलके प्रभावसे मूढ़ व्यक्तियोंको जन्म ग्रहण करनेवाले प्रतीत होते हैं।” व्यासयोग ७/१४ में— “श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी। तच्छक्त्यनन्तांशहीनाथापि तस्याश्रयात् प्रभोः॥ अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलापि हि। तेषां दुरत्ययाप्येषा बिना-विष्णुप्रसादतः॥” अर्थात् “श्री-भू-दुर्गा—इन तीन रूपोंमें भिन्ना जो वैष्णवी (विष्णुकी अंशरूपा) महामाया हैं, वे अनन्तांश-हीन होनेपर भी विष्णुके आश्रयमें होनेके कारण उनकी कलाभाग अर्थात् अंशकी अंश शक्ति भी अनन्त ब्रह्मा-रुद्रादिके पास नहीं है। विष्णुके अनुग्रहके बिना ब्रह्मा-रुद्रके लिये भी उस मायाका अतिक्रम करना दुष्कर है।” गीता १४/३ मध्वभाष्य— “महद्ब्रह्म प्रकृतिः। सा च श्री-भू-दुर्गेति भिन्ना। उमा-सरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः॥” अर्थात् “महद्-ब्रह्मको प्रकृति भी कहते हैं। वही प्रकृति पुनः श्री, भू और दुर्गा, इन तीन भिन्न रूपोंसे जानी जाती हैं। सरस्वती, उमादि भी उस शक्तिके अंशसे युक्त अन्य जीवमात्र हैं।” तथा च कार्ष्यायण-श्रुतिः— “श्रीभूर्दुर्गा महती तु माया, सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिका च। उमा वागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः॥” इति। अर्थात् “श्री, भू और दुर्गा, इन रूपोंमें महामाया ब्रह्माण्डोंको प्रसव करनेवाली और जगत्में बाँधनेवाली हैं। उमा, वाक् (सरस्वती) आदि अन्य जीव उनके अंश हैं और महामायाके प्रभावसे ही उनकी कीर्त्ति शास्त्रोंमें गायी गयी है।” श्रीजीव गोस्वामीकृत भगवत्सन्दर्भ (८० संख्यामें)— “यथा पाद्मे-‘नित्यं तद्रूपमीशस्य परं धाम्नि स्थितं शुभम्। नित्यं सम्भोग्यमीश्वर्या श्रिया भूम्या च संवृतम्॥’ नामस्वरूपयोर्निरूपणेन महासंहितायामपि विविक्तं; तत्त्रिशक्तिः-श्रीभूर्दुर्गेति या भिन्ना जीवमाया महात्मनः। आत्ममाया तदिच्छा स्यात् गुणमया जड़ात्मिका॥” और (२२ संख्यामें)— ‘श्रीरत्र जगत्पालनशक्तिः, भूस्तत्सृष्टिशक्तिः, दुर्गा तत्प्रलयशक्तिः। तत्तद्रूपेण या भेदं प्राप्ता, सा जीवविषया तच्छक्तिर्जीवमायेत्युच्यते। पाद्मे श्रीकृष्णसत्यभामा-संवादे-‘अहमेव त्रिधा भिन्ना तिष्ठामि त्रिविधैर्गुणैः’ इत्येतद्वाक्यानन्तरं