श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/२५-२८ ] अनुवाद-इन्हीं तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण अपने नित्य परिकरोंके साथ अनादि कालसे अनन्त कालतक केवल लीलाओंमें ही रत हैं अर्थात् वे सृष्टि-पालन-संहारादि कोई भी कार्य नहीं करते हैं॥ २५॥ अनुभाष्य-‘तिन लोके’—गोकुल, मथुरा और द्वारकामें॥ २५॥ परव्योम-वैकुण्ठमें चतुर्भुज-नारायणरूपमें आधिपत्य :- परव्योम-मध्ये करि' स्वरूप-प्रकाश। नारायणरूपे करेन विविध विलास॥ २६॥ अनुवाद-परव्योममें श्रीकृष्ण नारायण रूपमें अपना प्रकाश करते हैं और नाना प्रकारके विलास करते हैं॥ २६॥ स्वयंरूप श्रीकृष्ण-द्विभुज, ऐश्वर्यविलास नारायण-चतुर्भुज :- स्वरूपविग्रह कृष्णेर केवल द्विभुज। नारायणरूपे सेइ तनु चतुर्भुज॥ २७॥ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म, महैश्वर्यमय। श्री-भू-नीला-शक्ति याँर चरण सेवय॥ २८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २७-२८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णका स्वरूपविग्रह सदा द्विभुज है। परव्योममें उनका स्वरूप-प्रकाश नारायणरूपमें चतुर्भुज है और श्री, भू एवं नीला, ये तीन शक्तियाँ सदा उनकी सेवा करती हैं। (श्रीसम्प्रदायके वैष्णवोंके ग्रन्थोंमें इन तीन प्रकारकी शक्तियोंका विशेष वर्णन है)॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-‘श्री-भू-नीला’—नीलाको बङ्गालमें कोई-कोई 'लीलाशक्ति' कहते हैं। ये तीनों शक्तियाँ वैकुण्ठमें नारायणकी सेवामें विराजमान रहती हैं। जब तीन आल्वार् (सिद्ध महापुरुष)—भूतयोगी, सरयोगी और भ्रान्तयोगीने गेहलीग्राममें रात्रिके समय एक ब्राह्मणके घरमें आश्रय ग्रहण किया था, तब नारायणने उन्हें साक्षात् दर्शन दिये थे। 'प्रपन्नामृत'–७७/६१-६२ श्लोकोंमें उन्होंने नारायणका वर्णन इस प्रकार किया है— “ताक्ष्र्याधिरूढं तड़िदम्बुदाभं लक्ष्मीधरं वक्षसि पङ्कजाक्षम्। हस्तद्वये शोभितशङ्खचक्रं विष्णुं ददृशुर्भगवन्तमाद्यम्॥ आजानुबाहुं कमनीयगात्रं पार्श्वद्वये शोभितभूमिनीलम्। पीताम्बरं भूषणभूषिताङ्गं चतुर्भुजं चन्दनरुषिताङ्गम्॥” अर्थात् “गरुड़की पीठपर बैठे हुए चतुर्भुज आदिपुरुष भगवान् विष्णुका विद्युत-समन्वित मेघवर्णका कमनीय शरीर है। उनके कमलके समान नेत्र हैं, घुटनोंतक लम्बी भुजायें हैं और उनके दो हाथोंमें शङ्ख एवं चक्र शोभायमान हो रहे हैं। उन्होंने पीताम्बर धारण किया हुआ है, उनके चन्दनलेपित श्रीअङ्ग विभिन्न अलङ्कारोंसे विभूषित हैं और वक्षःस्थलपर 'लक्ष्मी' (श्री) तथा दोनों ओर 'भू' और 'नीला' अवस्थित हैं।” सीतोपनिषदि— “महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपाचेतनाऽचेतनात्मिका। सा देवी त्रिविधा भवति—शक्त्यात्मना इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति। इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति—श्री-भू-नीलात्मिका।” पाँचवाँ अध्याय | २६१