श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५/२८-३३ ] 'ततः सर्वेऽपि ते देवाः श्रुत्वा तद्वाक्य-चोदिताः। गौरीं लक्ष्मीं धराञ्चैव प्रणेमुर्भक्तितत्पराः॥' इति।" अर्थात् “परमधाममें रहनेवाले ईश्वरका वह रूप नित्य, शुभ और श्री-भू-नीलाशक्तिसे संवृत होकर नित्य सम्भोग्य है। महासंहितामें नाम और स्वरूपके निरूपणके द्वारा तीन शक्तियोंका विवेचन हुआ है; जैसे, - महात्मा श्रीभगवान्की (१) जीवमाया, वह 'श्री', 'भू' और 'दुर्गा', इन तीन स्वरूपोंसे भिन्न है। उनकी (२) आत्ममाया उनकी इच्छा है और (३) गुणमाया जड़ात्मिका है।" 'श्री' जगत्पालन शक्ति है, 'भू' उनकी सृष्टि शक्ति है और 'दुर्गा' उनकी प्रलय शक्ति है। इन तीन रूपोंमें जो भेदको प्राप्त हो रही है, उस जीव विषयक शक्तिको 'जीवमाया' कहा जाता है। पद्मपुराणमें श्रीकृष्ण-सत्यभामा संवादमें- 'मैं ही तीन प्रकारके भेदोंमें विभक्त, तीन प्रकारके गुणोंके सहित वर्तमान रहती हूँ।' इस वाक्यके बादमें कहा गया है- 'तब सब देवताओंने यह सुनकर उनके वाक्यके द्वारा प्रेरित होकर गौरी (दुर्गा), लक्ष्मी (श्री) और पृथ्वी (भू) को भक्तिपूर्वक प्रणाम किया।'॥२८॥ श्रीकृष्ण केवल लीलामय होनेपर भी जीवोंके प्रति अहैतुक-कृपामय :- यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ामात्र धर्म। तथापि जीवेर कृपाय करे एक कर्म॥२९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-केवल क्रीड़ामात्र ही उनका एकमात्र धर्म होनेपर भी श्रीकृष्ण जीवोंके प्रति कृपावशतः जीवनिस्ताररूप एक लीला करते हैं॥२९॥ चतुर्विध मुक्तिके द्वारा जीवोंका उद्धार-साधन अथवा वैकुण्ठमें लाना :- सालोक्य-सामीप्य-सार्ष्टि-सारूप्य-प्रकार। चारि मुक्ति दिया करे जीवेर निस्तार॥३०॥ अनुवाद-सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि और सारूप्य, ये चार प्रकारकी मुक्ति देकर श्रीकृष्ण जीवोंका निस्तार करते हैं॥३०॥ निर्विशेष ब्रह्मज्ञानीकी वैकुण्ठके बाहर स्थिति :- ब्रह्मसायुज्य-मुक्तेर ताँहा नाहि गति। वैकुण्ठ-बाहिरे हय तांसबार स्थिति॥३१॥ अनुवाद-ब्रह्म-सायुज्य मुक्ति पानेवालोंकी वहाँ गति नहीं है। उन सबकी स्थिति वैकुण्ठसे बाहर ही है॥३१॥ परव्योमके बाहरमें चिन्मय ब्रह्मलोक :- वैकुण्ठ-बाहिरे एक ज्योतिर्मय मण्डल। कृष्णेर अङ्गेर प्रभा, परम उज्ज्वल॥३२॥ मायातीत होनेपर भी वह चिद्विलासहीन, केवल चिन्मात्र :- 'सिद्धलोक' नाम तार प्रकृतिर पार। चित्स्वरूप, ताँहा नाहि चिच्छक्ति-विकार॥३३॥ पाँचवाँ अध्याय | २६३