भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/८-१३ ] रोहिणीके उदरमें स्थापित करो। देवकीके गर्भसे आकर्षण किये जानेके कारण रोहिणीनन्दन इस भूतलपर 'सङ्कर्षण' नामसे प्रसिद्ध होंगे, गोकुलवासियोंका आनन्द विधान करनेके कारण 'राम' एवं बलकी अधिकताके कारण अर्थात् सन्धिनीशक्तिके मूर्तिमान विग्रह होनेके कारण 'बलभद्र' के नामसे कीर्त्तित होंगे।” यहाँ बलकी अधिकताका तात्पर्य केवल शारीरिक बलसे नहीं है, अपितु उनका श्रीकृष्ण-प्रेमबल अथवा श्रीकृष्ण-प्रेमाधिक्य ही विशेषरूपसे लक्षित होता है। 'सृष्टिलीला-कार्य'-शब्दसे सृष्टिको लीला कहा गया है। (मध्य, २०/२५५-२५७) - “क्रियाशक्ति-प्रधान सङ्कर्षण बलराम। प्राकृताप्राकृत-सृष्टि करेन निर्माण॥ अङ्गद्वारे अधिष्ठाता कृष्णेर इच्छाय। गोलोक, वैकुण्ठ सृजे चिच्छक्तिद्वारा॥ यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्तिविलास। तथापि सङ्कर्षण-इच्छाय ताहार प्रकाश॥” अर्थात् “श्रीसङ्कर्षणमें ही क्रिया-शक्तिकी प्रधानता है। वे उस शक्तिके द्वारा प्राकृत और अप्राकृत ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हैं। श्रीकृष्णकी लीला-निर्वाहके लिये श्रीबलराम महासङ्कर्षण रूपमें चित्-शक्तिके विलास विशेष सन्धिनी-प्रधान शुद्धसत्त्वके द्वारा वैकुण्ठादि अप्राकृत भगवद्धामसमूहको प्रकाश करते हैं। यद्यपि भगवद्धाम नित्य होनेके कारण उसकी सृष्टि सम्भव नहीं है, तथापि श्रीकृष्णकी इच्छासे इनका केवल वे प्रकाश करते हैं॥”८-११॥ श्रीनित्यानन्दतत्त्व-वर्णन करते हुए मङ्गलाचरणके सातवें श्लोककी चार श्लोकोंमें व्याख्या :- सप्तम श्लोकेर अर्थ करि चारिश्लोके। याते नित्यानन्दतत्त्व जाने सर्वलोके॥१२॥ अनुवाद-सातवें श्लोकका अर्थ मैं इन चार श्लोकोंके द्वारा बतला रहा हूँ, जिससे श्रीनित्यानन्दप्रभुके तत्त्वको सब लोग समझ पायेंगे॥१२॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'सप्तम श्लोकेर अर्थ'-सातवें श्लोकमें जो कहा गया है, उसे इस अध्यायके आठसे लेकर ग्यारह श्लोकमें बतलाया है॥१२॥ श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- मायातीते व्यापिवैकुण्ठलोके पूर्णैश्वर्ये श्रीचतुर्व्यूहमध्ये। रूपं यस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यं तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥१३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मायासे अतीत, सर्वव्यापक वैकुण्ठलोकमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त चतुर्व्यूह तत्त्वमें जो सङ्कर्षण रूपसे विराजमान हैं, उन श्रीनित्यानन्दस्वरूप रामके प्रति मैं शरणागत होता हूँ॥१३॥ अनुभाष्य-मायातीते (गुणमयदेशबहिर्भागे) व्यापिवैकुण्ठलोके (मायारहितासङ्कुचिताखण्डाधारे) पूर्णैश्वर्ये (परिपूर्णशक्तिसमन्विते) श्रीचतुर्व्यूहमध्ये (वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्ध-विष्णु चतुष्टयस्य मध्ये) यस्य (नित्यानन्दरामस्य) सङ्कर्षणाख्यं रूपम् उद्भाति (विराजते), तं नित्यानन्दरामम् अहं प्रपद्ये। श्लोक-भावानुवाद-गुणमय जगत्के बाहर मायारहित व्यापक वैकुण्ठलोकमें परिपूर्ण शक्तियुक्त पाँचवाँ अध्याय | २५३