भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ५/७-११

श्लोक-भावानुवाद—परव्योम-स्थित महासङ्कर्षण, कारणोदशायी (आदिपुरुषावतार), गर्भोदशायी (द्वितीय पुरुषावतार हिरण्यगर्भ—समस्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त विष्णु), क्षीरोदशायी (तृतीय पुरुषावतार—सभी जीवोंके हृदयमें स्थित विष्णु) और अनन्तदेव जिनके अंश और कला हैं, वे श्रीनित्यानन्द नामक श्रीबलदेव मेरी शरणस्वरूप हों॥७॥ मूल-सङ्कर्षण श्रीबलदेवकी पाँच रूपोंमें श्रीकृष्णसेवा :— श्रीबलराम गोसाञि मूल-सङ्कर्षण। पञ्चरूप धरि' करेन कृष्णेर सेवन॥८॥ आपने करेन कृष्णलीलार सहाय। सृष्टिलीला-कार्य करे धरि' चारि काय॥९॥ चित्-अचित्-सृष्टि, स्थिति और अनुप्रवेशादि-कार्यमें चाररूप तथा शेषरूपमें दस देहसे सेवा :— सृष्ट्यादिक सेवा,—ताँर आज्ञार पालन। 'शेष'-रूपे करे कृष्णेर विविध सेवन॥१०॥ सर्वरूपे आस्वाद्ये कृष्ण-सेवानन्द। सेइ बलराम—गौरसङ्गे नित्यानन्द॥११॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८-११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिकायव्यूह श्रीबलरामको मूल-सङ्कर्षण कहा जा सकता है, क्योंकि वे अपने द्वितीय स्वरूपमें अंश रूपसे 'महासङ्कर्षण' और कलास्वरूपसे 'कारणाब्धिशायी', 'गर्भोदशायी', 'पयोब्धिशायी' और 'शेष'—ये पाँच रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। वे स्वयं श्रीकृष्णकी लीलामें सहायक रूपसे रहकर महासङ्कर्षण, कारणाब्धिशायी, गर्भोदशायी और पयोब्धिशायी—इन चार रूपोंमें श्रीकृष्णकी आज्ञानुसार सृष्टिलीलादिका कार्य करते हैं। 'शेष'-नामक 'अनन्त' रूपसे श्रीकृष्णकी विभिन्न प्रकारसे सेवा करते हैं। इन सभी रूपोंमें वे ही श्रीबलराम श्रीकृष्ण-सेवानन्दका आस्वादन करते हैं। वे श्रीबलराम ही श्रीगौरसुन्दरके सङ्गी श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं॥८-११॥ अनुभाष्य—श्रीबलरामजीके पाँच रूप—१) महासङ्कर्षण, २) कारणोदशायी, ३) गर्भोदशायी, ४) क्षीरोदशायी और ५) शेषशायी॥८॥ अमृताणुकणिका—कंसने देवकीके छह पुत्रोंकी जन्म लेते ही हत्या कर दी। तब देवकीके सप्तम गर्भमें श्रीबलराम आये। उसी समय रोहिणीका गर्भ भी प्रकाशित होते देखकर वसुदेवने स्वयं ही किसी व्यक्तिके द्वारा श्रीरोहिणीको गुप्त रूपसे नन्दालयमें भेज दिया था। तब कंसके अत्याचारकी आशङ्कासे श्रीकृष्णने योगमायाको आदेश दिया (भाः १०/२/८, १३)— “देवक्या जठरे गर्भं शेषाख्यं धाम मामकम्। तत् सन्निकृष्य रोहिण्या उदरे सन्निवेशय ॥ गर्भसङ्कर्षणात् तं वै प्राहुः सङ्कर्षणं भुवि। रामेति लोकरमणाद्बलभद्रं बलोच्छ्र अर्थात् “तुम वहाँ जाकर देवकीके उदरसे मेरे द्वितीय स्वरूप या आश्रय-स्वरूप जो सङ्कर्षण हैं, जिन्हें शेष भी कहा जाता है, उन्हें बिना किसी कष्टके आकर्षणकर अलक्षित रूपसे

२५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत