भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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५/४-७ ] अमृतप्रवाह भाष्य—'ताँहार द्वितीय देह'—श्रीकृष्णकी विलास-देह ॥ ४॥ एकइ स्वरूप दोँहे, भिन्नमात्र काय। आद्य कायव्यूह, कृष्णलीलाय सहाय ॥ ५॥ अनुवाद—वे दोनों अभिन्न स्वरूप हैं, केवलमात्र देहका भेद है। श्रीबलराम श्रीकृष्णके आदिकायव्यूह अर्थात् उनकी देहका प्रथम विस्तार हैं और वे श्रीकृष्णकी लीलामें सहायक हैं॥ ५॥ अमृताणुकणिका—मूलरूपके साथ तदेकात्मरूपका स्वरूपसे अभेद होनेपर भी किसी लीला-विशेषके उद्देश्यसे भिन्न आकृतिमें (भिन्न वर्णमें, भिन्न वेशादिमें) प्रकटित स्वरूपका नाम विलास है। श्रीकृष्ण श्याम वर्ण हैं और श्रीबलराम श्वेत वर्ण, श्रीकृष्णके पीतवसन और श्रीबलरामके नीलवसन हैं; वर्ण और वेशमें भेद होनेसे श्रीबलराम श्रीकृष्णके विलास हैं। किसी विशेष उद्देश्यसे एक देहसे यदि एक अथवा एकसे अधिक देह प्रकटित हों, तब उन प्रकटित देहसमूहको कायव्यूह कहा जाता है। 'आद्य कायव्यूह'—प्रथम कायव्यूह। लीलाके अनुरोधसे श्रीकृष्ण जो सब रूपोंमें स्वयंको प्रकट करते हैं, उनमेंसे श्रीबलराम ही सर्वश्रेष्ठ और श्रीकृष्णके सर्वापेक्षा घनिष्ठ हैं। वे उनकी लीलामें कैसे सहायता करते हैं, इसका परवर्ती आठसे ग्यारह पयार संख्यामें वर्णन है॥ ५॥ श्रीकृष्ण—श्रीगौर, श्रीबलराम—श्रीनिताइ :- सेइ कृष्ण—नवद्वीपे श्रीचैतन्यचन्द्र। सेइ बलराम—सङ्गे श्रीनित्यानन्द ॥ ६॥ अनुवाद—वे श्रीकृष्ण ही नवद्वीपमें श्रीचैतन्यचन्द्रके रूपमें प्रकट हुए हैं और वे श्रीबलराम उनके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें हैं॥ ६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीबलदेव ही श्रीकृष्णके आदिकायव्यूह अर्थात् कायका विस्तार हैं और वे ही उनकी लीलाके सहायक हैं। वे श्रीकृष्ण ही नवद्वीपमें श्रीचैतन्यचन्द्रके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं और उनके आदिकायव्यूह वे श्रीबलराम ही उनके साथ श्रीनित्यानन्द रूपमें हैं॥ ५-६॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे सातवें श्लोककी व्याख्या :- सङ्कर्षण और कारण-गर्भ-क्षीर-जलशायिगण एवं शेषके अंशी श्रीनित्यानन्द अथवा श्रीबलदेव :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे— सङ्कर्षणः कारणतोयशायी गर्भोदशायी च पयोऽब्धिशायी। शेषश्च यस्यांशकलाः स नित्यानन्दाख्यरामः शरणं ममास्तु ॥ ७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सङ्कर्षण, कारणाब्धिशायी, गर्भोदशायी, पयोब्धिशायी और शेष जिनके अंश और कला हैं, वे श्रीनित्यानन्दराम मेरी शरणस्वरूप हों॥ ७॥ अनुभाष्य—सङ्कर्षणः (परव्योमस्थो महासङ्कर्षणः), कारणतोयशायी (आदिपुरुषावतारः), गर्भोदशायी (द्वितीय-पुरुषावतारः हिरण्यगर्भः समष्टिविष्णुः), पयोब्धिशायी (तृतीयपुरुषावतारः क्षीरशायी व्यष्टिविष्णुः), शेषः (अनन्तदेवः) यस्य अंशकलाः, सः नित्यानन्दाख्यारामः (नित्यानन्दनामा बलदेवः) मम शरणम् अस्तु। पाँचवाँ अध्याय | २५१