भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 292

[ ५/१-४ झामटपुर ग्राममें था। वे दो भाई थे। उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके पार्षद श्रीमीनकेतनरामदासको अपने घरमें आमन्त्रित किया था। श्रीमीनकेतनरामदास उनके पुजारी गुणार्णवमिश्रके व्यवहारसे असन्तुष्ट हुए। कविराज गोस्वामीके भाईने भी पुजारीका ही समर्थन करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके महात्म्यको स्वीकार नहीं किया। (इसलिये श्रील कविराज गोस्वामीने अपने भाईका तिरस्कार किया)। श्रीरामदास अपनी वंशीको तोड़कर उस स्थानसे चले गये। इस अपराधके कारण श्रील कविराज गोस्वामीके भाईका तुरन्त ही सर्वनाश हो गया। उसी रात्रिमें श्रील कविराज गोस्वामीने स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपा और आदेश पाकर अगले दिन ही वृन्दावनकी ओर प्रस्थान किया। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपाके बलसे श्रीनित्यानन्दस्वरूप-ज्ञान :- वन्देनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीनित्यानन्दमीश्वरम्। यस्येच्छया तत्स्वरूपमज्ञेनापि निरूप्यते ॥ १ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अनन्त-अद्भुत-ऐश्वर्यसे युक्त ईश्वर श्रीनित्यानन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। मूर्ख व्यक्ति भी उनकी इच्छासे उनके स्वरूपका निरूपण करनेमें समर्थ हो जाता है॥ १॥ अनुभाष्य-यस्य (नित्यानन्दस्य) इच्छया (अनुकम्पया) अज्ञेन (शास्त्रज्ञानानभिज्ञेन) अपि [मया] तत्स्वरूपं (नित्यानन्दतत्त्वं) निरूप्यते (वर्ण्यते), तम् अनन्ताद्भुतैश्वर्यम् (अनन्तम् अद्भुतम् ऐश्वर्यं यस्य तं देशकालपात्रातीतैश्वर्यसम्पन्नम्) ईश्वरं (देवदेवं) श्रीनित्यानन्दम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अनुकम्पासे शास्त्रोंको ना जाननेवाला (मुझ जैसा) व्यक्ति भी उनके तत्त्वको वर्णन करनेमें समर्थ हो जाता है। उन देश-काल-पात्रसे अतीत, अनन्त, अद्भुत ऐश्वर्यसम्पन्न देवोंके देव श्रीनित्यानन्द प्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमहाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु और श्रीमन्महाप्रभुके समस्त भक्तोंकी जय हो ॥ २ ॥ छह श्लोकोंमें श्रीगौर-तत्त्व, पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व :- एइ षट्श्लोके कहिल कृष्णचैतन्य-महिमा। पञ्चश्लोके कहि नित्यानन्दतत्त्व-सीमा ॥ ३ ॥ अनुवाद-पहले छह श्लोकोंमें मैंने श्रीकृष्णचैतन्यकी महिमाका वर्णन किया। अब पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व और उनकी महिमा कहूँगा ॥ ३ ॥ श्रीबलदेव-तत्त्व :- सर्व-अवतारी कृष्ण स्वयं भगवान्। ताँहार द्वितीय देह श्रीबलराम ॥ ४ ॥ अनुवाद-सभी अवतारोंके अवतारी श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। श्रीबलराम उनकी द्वितीय देहरूप हैं॥ ४॥ २५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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