भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 291

पाँचवाँ अध्याय पाँचवें अध्यायका कथासार-इस अध्यायमें पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमा इस प्रकार वर्णित हुई है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं; उनकी विलासमूर्ति अर्थात् द्वितीय देह श्रीबलरामजी हैं। प्रकृतिसे परे 'परव्योम' नामक एक चिन्मय धाम है, जिसके सबसे ऊपरी भागमें 'कृष्णलोक' है। कृष्णलोकमें द्वारका, मथुरा और गोकुल-ये तीन प्रकोष्ठ हैं। वहाँ स्वयं भगवान् अपना विस्तारकर मूल चतुर्व्यूह रूप अर्थात् श्रीकृष्ण, श्रीबलदेव, प्रद्युम्न अर्थात् कामदेव और अनिरुद्ध, इन चार रूपोंमें वास करते हैं। इस कृष्णलोकमें वृन्दावनमें स्थित 'श्वेतद्वीप' नामक धाम है। कृष्णलोकके नीचे 'परव्योम' नामक वैकुण्ठ है, जहाँ श्रीकृष्णकी विलासमूर्ति चतुर्भुज नारायण विराजमान हैं। कृष्णलोकमें जो श्रीबलदेव हैं, वे ही मूल सङ्कर्षण हैं। परव्योम-वैकुण्ठमें महासङ्कर्षण उनकी विलासमूर्ति हैं। उन्हीं महासङ्कर्षणकी चित्-शक्तिके द्वारा परव्योममें समस्त शुद्धसत्त्वका प्रकाश है और उनकी जीव-शक्तिके द्वारा समस्त शुद्धजीव वहाँ वर्तमान हैं, परन्तु उनकी (बहिरङ्गा) माया-शक्तिकी वहाँ अवस्थिति नहीं है। नारायण धाममें भगवान्का द्वितीय कायव्यूह वर्तमान है। उस परव्योमके बाहर ज्योतिर्मय धामरूप 'ब्रह्मलोक' है। उसके बाहर चिन्मयजलका कारणसमुद्र है। कारणसमुद्रके दूसरी ओर, उसे स्पर्श ना करते हुए मायाकी अवस्थिति है। कारणसमुद्रमें मूलसङ्कर्षणके अंशरूप आदिपुरुषावतार महाविष्णु वास करते हैं। वे दूरसे ही मायाके ऊपर दृष्टिपात करते हैं। उनके एक अङ्गाभाससे (अर्थात् जो अङ्ग जैसा प्रतीत होता है, परन्तु अङ्ग नहीं है) मायाके उपादान-कारणका मिलन होता है। माया ही उपादान-कारण रूपमें 'प्रधान' और निमित्त-कारण रूपमें 'प्रकृति' है। महाविष्णुका ईक्षण ही जड़रूपा प्रकृतिका मूल निमित्त-कारण है, इसलिये प्रकृति केवल गौण निमित्त-कारण है। वे कारणाब्धिशायी महाविष्णु ही समस्त जगत्में प्रवेशकर गर्भोदशायी और प्रत्येक ब्रह्माण्डमें, प्रत्येक जीवमें प्रवेशकर क्षीरोदशायी हैं। वे गर्भोदशायी पुरुष प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक-एक वैकुण्ठको प्रकटकर वहाँ विष्णु-परमात्मा-ईश्वरादि रूपमें विराजमान हैं और ब्रह्माण्डके जलांशमें शेष-शय्यापर शयन करते हैं; वे ही ब्रह्माके पिता हैं और उनके एक अंशकी ही विराट् रूपमें कल्पना की गयी है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें क्षीरसमुद्रके मध्य एक-एक 'श्वेतद्वीप' प्रकट हुआ है और उसमें विष्णु वास करते हैं। इसलिये दो श्वेतद्वीप हैं-एक कृष्णलोकमें और एक प्रत्येक ब्रह्माण्डमें क्षीरसमुद्रमें। कृष्णलोकका 'श्वेतद्वीप' वहाँ स्थित वृन्दावनसे अभिन्नरूपमें श्रीकृष्णकी किसी परिशिष्ट लीलाकी भूमि है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें 'शेष'-मूर्ति विष्णुकी छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आवास, यज्ञसूत्र, सिंहासनादि रूपोंमें सेवा करते हैं। कृष्णलोकमें श्रीबलदेव प्रभु ही श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं, इसलिये वे मूल-सङ्कर्षण हैं। परव्योमके महासङ्कर्षण और उनके पुरुषावतारगण इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभुके अंश और कला हैं। इस अध्यायमें ग्रन्थकारने अपनी वृन्दावन यात्रा और वहाँ उनकी सर्वसिद्धिके विषयमें एक कथा लिखी है। उसमें उन्होंने लिखा है,- उनका पूर्व निवास कटोआ जिलेमें नेहाटीके निकट

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