भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 286

[ ४/२६०-२६५ नासिकाको अद्भुत आनन्द प्राप्त होता है और श्रीकृष्णके अधरसुधापानमें जिनकी रसना सदा अनुरक्त रहती है, अपने मुखकमलको नीचे झुकाकर जो कपटतासे धैर्यपूर्वक बाहरसे वाम्यभावका प्रदर्शन कर रही हैं, परन्तु हृदयमें श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ाकी प्रबल उत्सुकताके कारण रोमाञ्चादि विकार शरीरमें लक्षित हो रहे हैं, उन श्रीराधाका मैं स्मरण करता हूँ॥२६०॥ श्रीकृष्णका अपने माधुर्यके बलका विचार :- ताते जानि, मोते आछे कोन एक रस। आमार मोहिनी राधा, तारे करे वश॥२६१॥ राधासुख-आस्वादन-हेतु श्रीकृष्णकी व्याकुलता :- आमा हैते राधा पाय ये जातीय सुख। ताहा आस्वादिते आमि सदाइ उन्मुख॥२६२॥ नाना यत्न करि आमि, नारि आस्वादिते। सेइ सुखमाधुर्य-घ्राणे लोभ बाड़े चित्ते॥२६३॥ अनुवाद-इससे मैं यह समझता हूँ कि मुझमें कोई एक अनूठा रस है, जो मेरी मोहिनी राधाको सम्पूर्ण रूपसे वशीभूत करता है। मुझसे राधाको जो आश्रयजातीय सुख मिलता है, उसका आस्वादन करनेके लिये मैं सदा व्यग्र रहता हूँ। नाना प्रकारके यत्न करके भी मैं उस रसका आस्वादन नहीं कर पाता हूँ। उस सुखमाधुर्यकी गन्धसे मेरे चित्तमें लोभ बढ़ता है॥२६१-२६३॥ अमृतानुकणिका-श्रीकृष्ण विचार करके इस निष्कर्षपर पहुँचे- “मेरा विश्वास था कि राधिकाके रूपादिके माधुर्यसे जब मेरी पञ्चेन्द्रियाँ परितृप्त होती हैं, तब रूपादिमें राधिका मुझसे श्रेष्ठ है। किन्तु मेरे रूपादिके प्रभावसे राधिकाकी जो अवस्था होती है, अब उसकी विवेचना करके यह देखा कि राधिकाके रूपादिसे मुझे जो आनन्द होता है, मेरे रूपादिसे राधिकाको उससे बहुत अधिक आनन्द होता है; इससे मैं यह मानता हूँ कि मुझमें कोई एक अनिर्वचनीय रस है जो अन्योंकी बात तो दूर, मुझे तक मोहित कर लेता है; वही राधिका तकको मुग्ध करके वशीभूत कर लेता है॥”२६१॥ विभिन्न भावोंमें राधाप्रेमरसके आस्वादन हेतु श्रीगौरावतार :- रस आस्वादिते आमि कैल अवतार। प्रेमरस आस्वादिब विविध प्रकार॥२६४॥ रागभजन-विधिका प्रचार एवं आचार :- रागमार्गे भक्त भक्ति करे ये प्रकारे। ताहा शिखाइब लीला-आचरणद्वारे॥२६५॥ अनुवाद-रसास्वादन करनेके लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा। मैं विभिन्न प्रकारसे प्रेमरसका आस्वादन करूँगा। रागमार्गमें भक्तको किस प्रकार भक्ति करनी चाहिये, अपने आचरणके द्वारा मैं उसकी शिक्षा दूँगा॥२६४-२६५॥ २४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत