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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

फलका भोक्ता हूँ'—ऐसी बुद्धिसे जो समस्त इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, वे समस्त कामवाञ्छाएँ ही हैं। इन सबके त्यागके द्वारा देहकार्य-मनःकार्यादिके परित्यागका परामर्श नहीं है। देहकार्य-मनःकार्य सभीमें यदि 'मैं कृष्णदास हूँ', ऐसी बुद्धिके द्वारा प्रवर्तन करनेवाली प्रवृत्ति रहती है, तो वह 'काम' नहीं है॥१६५-१७०॥ अमृतानुकणिका—'लोकधर्म'—लोक समाजमें परस्पर सौहार्द, मर्यादा रक्षाके निमित्त जो सब आचरण पालन करते हैं, वे सभी लोकधर्म हैं। यदि कोई मेरी विपत्तिमें सहायता करता है, तो मेरा भी कर्त्तव्य होता है, उस व्यक्तिकी विपत्तिमें सहायतादि करना। सभी लोकाचार सम्बन्ध इसी प्रकार हैं; लोकधर्मके पालनमें निजी सुविधा है और पालन ना करनेमें असुविधा, इसलिये लोकधर्म पालन कामके ही अन्तर्गत है। 'वेदधर्म'—वेद-विहित कर्मादि; यज्ञानुष्ठानादि; वेद विहित कर्मादि करनेसे परकालमें स्वर्गादि-सुखभोग और इहकालमें धन-सम्पत्ति आदि प्राप्तिकी सम्भावना होती है। इस प्रकार आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे वेदधर्म भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहधर्म'—भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदिकी निवृत्तिके जो कुछ किया जाता है, वह देहधर्म कहलाता है; ये सब कर्म अपने सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये देहधर्म भी कामके अन्तर्गत है। 'कर्म'—सकाम कर्म अर्थात् जो भी वेद विहित कर्म अपने सुखके निमित्त किये जाते हैं, वे भी कामके अन्तर्गत हैं। 'लज्जा' एवं 'धैर्य'—लज्जा एवं धैर्यकी रक्षा नहीं करनेसे समाजमें कलङ्कित होनेपर दुःख होगा, इसलिये लज्जा-धैर्य-रक्षाके द्वारा आत्मसुखका पोषण होनेके कारण ये भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहसुख'—देहके सुखजनक कार्य; जैसे पाद-सम्वाहन, ग्रीष्मकालमें पंखेके द्वारा हवा, शीतकालमें अग्नि-तापादि, ये सभी आत्मेन्द्रिय-तृप्तिमूलक होनेके कारण कामके अन्तर्गत ही हैं। 'आत्मसुख-मर्म'—उपरोक्त लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य और देहसुख-ये सभी ही आत्मसुख-मर्म अर्थात् इन सभीका मर्म अथवा तात्पर्य आत्मेन्द्रिय-तृप्ति है, इसलिये ये सभी ही काम हैं। 'आर्यपथ'—आर्य किसे कहते हैं? “कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः॥” अर्थात् “कर्त्तव्य कर्मका आचरण और अकर्त्तव्य कर्मका अनाचरण करते हुए जो व्यक्ति वास्तविक आचार पालन करता है, उसे आर्य कहा जाता है।” इस प्रकार सदाचार-परायण आर्योंने जिसे सदाचार कहकर निर्दिष्ट किया है, वही आर्य पथ है। जैसे कुलरमणीके लिये पातिव्रत्यादि आर्यपथ है और इसका लोकसमाजमें रहते हुए त्याग करना दुष्कर है, क्योंकि इसके त्यागसे उनपर कलङ्क लगेगा और उनकी निन्दा होगी। परन्तु जो आर्यपथमें अवस्थित हैं, वे लोकसमाजमें सुख, ख्याति, सम्मानादि भोग करते हैं, इसलिये यह भी आत्मसुख पोषक होनेके कारण कामके ही अन्तर्गत है। 'निज परिजन'—कुलरमणी यदि पिता-माता, सास-ससुरादिका त्याग करके स्वतन्त्र आचरण करे, तो वह समाजमें कलङ्कित होती है तथा दुःख भोग करती है। परन्तु निज परिजनके बन्धनमें रहनेसे सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है। 'स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन'—परिवारजनोंकी डाँट-फटकार और अपमानके भयसे आर्यपथमें अवस्थान करना भी आत्मसुखका ही पोषण करता है, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है।

[ ४/१६७-१७३ अपने लिये परम-दुःखकर स्वजनोंकी डाँट-फटकार स्वीकार करके तथा मृत्युकी अपेक्षा भी दुःखजनक स्वजन-आर्यपथ-लज्जा-धैर्य आदिका पत्यागकर ब्रजसुन्दरियाँ श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा करती हैं। वे स्वजनोंकी डाँट-फटकारसे तनिक भी दुःखी नहीं होतीं अपितु सेवाके द्वारा श्रीकृष्णको सुखी देखकर स्वयंको कृतार्थ और सौभाग्यवती मानती हैं। लोकसमाजमें देखा जाता है कि कोई-कोई कुलटा स्त्री अपने सुखके लिये लोकधर्म-वेदधर्मादिका त्याग करती है, परन्तु वह निज सुखके निमित्त होनेके कारण काम ही है, प्रेम नहीं। ब्रजगोपियोंका आचरण श्रीकृष्णोन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक प्रेम है, आत्मेन्द्रिय-प्रीति-इच्छा-मूलक काम नहीं है॥ १६७-१७०॥ काम और प्रेमका पार्थक्य :- अतएव काम-प्रेमे बहुत अन्तर। काम-अन्धतमः, प्रेम-निर्मल भास्कर॥ १७१॥ काम और गोपियोंका श्रीकृष्णप्रेम :- अतएव गोपीगणेर नाहि कामगन्ध। कृष्णसुख लागि मात्र, कृष्ण से सम्बन्ध॥ १७२॥ अनुवाद-इसलिये काम और प्रेममें बहुत अन्तर है। काम गहनतम अन्धकारके समान है और प्रेम चमकते हुए सूर्यकी भाँति है। इसलिये गोपियोंके प्रेममें कामकी गन्ध भी नहीं है, केवलमात्र श्रीकृष्ण-सुखके लिये उनका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध है॥ १७१-१७२॥ अमृतानुकणिका-सूर्य और अन्धकार जिस प्रकार विरोधी वस्तुएँ हैं, प्रेम और काम भी उसी प्रकार परस्पर विरोधी हैं। अन्धकार और सूर्यके दृष्टान्तके द्वारा यह व्यञ्जित हो रहा है-जिस स्थानपर अन्धकार है, वहाँ सूर्यका अभाव है, इसी प्रकार जिस हृदयमें काम है, उस हृदयमें प्रेम नहीं रह सकता। और जहाँ सूर्य है, वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता; सूर्यके आगमनसे जैसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार जिस हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, उसमें काम दूर हो जाता है। गोपियोंके हृदयमें विशुद्ध प्रेम है, इसलिये वहाँ कामका अत्यन्त अभाव है-गोपीप्रेममें कामकी गन्धमात्र भी नहीं है॥ १७१-१७२॥ गोपियोंके गाढ़ श्रीकृष्णप्रेमका परिचय :- श्रीमद्भागवत (१०/३१/१९)- यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु। तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः॥ १७३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गोपियाँ बोलीं- “हे प्रिय! हम तुम्हारे सुकोमल चरणकमलोंको अपने कठोर स्तनोंपर धीरे-धीरे धारण करतीं हैं, उन्हीं चरणोंके द्वारा तुम अभी वनमें भ्रमण कर रहे हो, वहाँ छोटे-छोटे कङ्कड़-पत्थरादि चुभनेके द्वारा अवश्य ही तुम्हें कष्ट हो रहा होगा। तुम हमारे जीवन स्वरूप हो, इसलिये तुम्हारी चिन्तामें व्याकुल होकर हम सबकी बुद्धि भ्रमित हो रही है॥ १७३॥ २२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१७३-१७६ ]

अनुभाष्य-रासलीलासे श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके लिये गोपियोंका विलापगीत- हे प्रिय, ते (तव) यत् सुजातचरणााम्बुरुहं (सुजातं सुकुमारं चरणाम्बुरुहं पदकमलं) कर्कशेषु (कठिनेषु) स्तनेषु भीताः (स्पर्शनदुःखाशङ्किताः सत्यः वयं) शनैः (सावधानाः) दधीमहि (धारयामः) तेन (चरणेन) अटवीं (वनस्थलीम्) अटसि (विचरसि), तदा [त्वत्चरणकमलं] कूर्पादिभिः (सूक्ष्मपाषाणखण्डैः) किं स्वित् न व्यथते इति भवदायुषां (भवान् एव आयुः जीवनं यासां तासां) नः (अस्माकं) धीः भ्रमति (चञ्चलतां गच्छति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७३॥ गोपियोंका शुद्धकृष्णप्रेम :- आत्म-सुख-दुःखे गोपीर नाहिक विचार। कृष्णसुखहेतु करे सब व्यवहार॥१७४॥ कृष्ण लागि' आर सब करि' परित्याग। कृष्णसुखहेतु करे शुद्ध अनुराग॥१७५॥ अनुवाद-गोपियोंमें अपने सुख या दुखका कोई विचार नहीं है, उनके सभी चेष्टाएँ और भावनाएँ केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये हैं। गोपियाँने श्रीकृष्णके लिये सब कुछ परित्याग कर दिया। श्रीकृष्णसुखके लिये ही उनका श्रीकृष्णसे शुद्ध अनुराग है॥१७४-१७५॥ गोपियोंके प्रेममें आबद्ध श्रीकृष्णकी अन्तर्धान होनेके लिये क्षमा-याचना :- श्रीमद्भागवत (१०/३२/२१)- एवं मदर्थोज्झितलोकवेद- स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबलाः। मया परोक्षं भजता तिरोहितं मासूतियितुं मार्हथ तत् प्रियं प्रियाः॥१७६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे गोपियों! मेरे लिये तुम लोगोंने लोकधर्म, वेदधर्म और सभी बन्धु-बान्धवोंका परित्याग किया है, तथापि मुझमें तुम्हारे प्रेमकी वृद्धि होगी, यह सोचकर मैं अन्तर्धान हो गया था। हे प्रियाओं! मैं तुम्हारे प्रियसाधनमें प्रवृत्त हूँ, इसलिये मेरे प्रति दोषारोपण मत करो॥१७६॥ अनुभाष्य-रासस्थलीमें पुनः प्रकट होकर श्रीकृष्णने गोपियोंके वाक्य सुनकर कहा- हे प्रियाः अबलाः, एवं (अनेन प्रकारेण) मदर्थोज्झितलोकवेदस्वानां (मदर्थं मत्प्राप्तिनिमित्तं उज्झिताः त्यक्ताः लोकाः संसार-धर्मादयः, वेदाः पारलौकिक-धर्माः स्वाः च निजसम्बन्धिपरिजनाश्च याभिः कृष्णैकप्राणाभिः तासां) वः (युष्माकं) मयि अनुवृत्तये (उक्तलक्षणानामन्येषां भक्तानामिवानुवृत्तिवृद्धयै) परोक्षम् (अदर्शनं यथा भवति तथा) भजता (उपकुर्वता) मया तिरोहितम् (अन्तर्धानेन स्थितं) हि तत् (तस्मात्) प्रियं मा (माम्) असूयितुं (दोषदृष्ट्या द्रष्टुं) मा (न) अर्हथ। श्लोक-भावानुवाद-हे प्रियाओं! हे अबलाओं! तुमलोग मेरी प्राप्तिके लिये संसारधर्म (लौकिकधर्म), वेदधर्म (पारलौकिकधर्म) और अपने सगे-सम्बन्धियों, सबका परित्यागकर मेरे पास आयी हो। मैं भी उसी प्रकारसे 'अनुवृत्तये' अर्थात् प्रेमकी वृद्धिके लिये उक्त लक्षणके अनुसार अन्यान्य भक्तोंकी भाँति परोक्ष रूपसे तुम्हारा भजन कर रहा था, अर्थात् तुम्हारा

चौथा अध्याय | २२३

[ ४/१७६-१८० प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये अन्तर्हित हो गया था। इसलिये मेरे प्रति दोषारोप करना तुम लोगोंके लिये उचित नहीं है॥१७६॥ शुद्धभक्तिके प्रकार-भेदसे श्रीकृष्णप्राप्तिका तारतम्य :- कृष्णेर प्रतिज्ञा एक आछे पूर्व हैते। ये यैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे॥१७७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने पहले एक प्रतिज्ञा की है कि जो मुझे जिस प्रकार भजता है, मैं भी उसका उसी प्रकारसे भजन करता हूँ॥१७७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥१७८॥ अनुवाद—हे पार्थ! जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, मैं भी उन्हें उसी रूपसे फल देकर उनका भजन किया करता हूँ। क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे पथका अनुसरण करते हैं॥१७८॥ गोपियोंके प्रेमके ऋण-शोधनमें श्रीकृष्णकी असमर्थता :- से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल गोपीर भजने। ताहाते प्रमाण कृष्ण-श्रीमुखवचने॥१७९॥ अनुवाद—परन्तु गोपियोंके भजन अर्थात् प्रेमसे वह प्रतिज्ञा भङ्ग हो गयी। इसका प्रमाण स्वयं श्रीकृष्णके मुखसे निकले वचन हैं॥१७९॥ श्रीमद्भागवत (१०/३२/२२)— न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः। या माऽभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥१८०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे गोपियों! मेरे साथ तुम्हारा मिलन निर्मल है। अनेक जन्मोंमें भी मैं अपने सत्कार्योंके द्वारा तुम्हारे प्रति कर्त्तव्यानुष्ठान नहीं कर सकता, क्योंकि तुम लोगोंने मेरी प्राप्तिके लिये अति कठिन संसार-शृङ्खलाको सम्पूर्णरूपसे तोड़कर मेरा अन्वेषण किया है। मैं तुम लोगोंके इस ऋणका परिशोधन करनेमें सक्षम नहीं हूँ। इसलिये तुम लोग अपने साधु कार्योंके द्वारा ही परितुष्ट होओ॥१८०॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण जब राससे अन्तर्धान हो गये और गोपियाँ उनके अदर्शनसे विलाप करने लगीं। उनके विलाप-गीतको श्रवणकर श्रीकृष्ण पुनः प्रकट होकर गोपियोंको इस प्रकार कहकर सान्त्वना प्रदान करने लगे— निरवद्यसंयुजां (निरवद्या निष्कपटा संयुक् सम्यक् मिलनं यासां तासां) वः (युष्माकं) स्वसाधुकृत्यं (स्वीयम् असाधारणं यत् साधुकृत्यं साधुकर्म तत्) अहं विबुधायुषापि (विबुधानां देवानां आयुस्तत्कालमितेनापि) न पारये २२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४।१८०-१८५ ] (शक्नोमि प्रतिदातुमित्यर्थः)। याः (भवत्यः) दुर्जरगेहशृङ्खलाः (दुर्जराः अनभिभव्याः याः गेहरूपाः शृङ्खलास्ताः) संवृश्च्य (निःशेषं छित्वा) मा (माम्) अभजन्, तासां वः (युष्माकम्) एव साधुना (साधुकृत्येन) तत् (युष्मत्साधुकृतं) प्रतियातु (प्रतिकृतं भवतु)। श्लोक-भावानुवाद—मेरे साथ तुम लोगोंका जो मिलन है, वह सर्वथा निष्कपट है। इसलिये देवताओंकी आयुकालतक भी मैं तुम लोगोंके साधुकर्मोंका प्रतिदान करनेमें समर्थ नहीं हूँ। [वे साधुकर्म किस प्रकारके हैं?]—तुम लोगोंने दुर्जर अर्थात् कठिन और ना टूटनेवाली घर-गृहस्थीकी शृङ्खलाओंको सम्पूर्ण रूपसे तोड़कर मेरा जो भजन किया है। मैं तुम लोगोंका इस प्रकार एकनिष्ठ भजन नहीं कर सकता, इसलिये तुम लोगोंके साधुकर्मोंके द्वारा ही तुम लोगोंका साधुकृत्य प्रत्युपकृत हो॥१८०॥ गोपियोंकी अपनी देहके शृङ्गारके मूलमें भी श्रीकृष्ण-सुखतात्पर्य :- तबे ये देखिये गोपीर निजदेहे प्रीत। सेहो त' कृष्णेर लागि, जानिह निश्चित॥१८१॥ 'एइ देह कैलुँ आमि कृष्णे समर्पण। ताँर धन, ताँर एइ सम्भोग-कारण॥१८२॥ ए देह-दर्शन-स्पर्शे कृष्ण-सन्तोषन।' एइ लागि' करे अङ्गेर मार्जन-भूषण॥१८३॥ अनुवाद—तब गोपियोंकी जो अपनी देहके प्रति प्रीति दिखायी देती है, तो यह निश्चित जानो कि वह श्रीकृष्णके सुखके लिये ही है। गोपियाँ सोचती हैं—'इस शरीरको मैंने कृष्णको समर्पण कर दिया है, अब यह उनका धन और उनके भोगका साधन है।' इस देहके दर्शन और स्पर्शसे श्रीकृष्णकी सन्तुष्टि हो, इसलिये वे अपने अङ्गोंका मार्जनकर उनको अलङ्कारों आदिसे सजाती हैं॥१८१-१८३॥ लघुभागवतामृत उत्तरखण्डमें (४०) आदिपुराणवचन— निजाङ्गमपि या गोप्यो ममेति समुपासते। ताभ्यः परं न मे पार्थ निगूढप्रेमभाजनम्॥१८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—“गोपियाँ अपने शरीरको मेरा भोग्य माननेके कारण उसके लिये यत्न (मार्जन-शृङ्गारादि) करती हैं। हे पार्थ! उन गोपियोंसे अधिक मेरे प्रेमका पात्र और कोई नहीं है॥”१८४॥ अनुभाष्य—हे पार्थ, या गोप्यः निजाङ्ग अपि मम इति (कान्तार्पितमिदं शरीरं भगवतः इति) समुपासते (भूषणादिभिरलङ्करोति) ताभ्यः (गोपीभ्यः) परम अन्यत् मे (मम) निगूढप्रेमभाजनं (निगूढप्रेमपात्रं) नास्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१८४॥ गोपियोंका सेवासुख श्रीकृष्णसुखकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक :- आर एक अद्भुत गोपीभावेर स्वभाव। बुद्धिर गोचर नहे याहार प्रभाव॥१८५॥ चौथा अध्याय | २२५

[ ४/१८५-१९३ गोपीगण करेन यबे कृष्ण दरशन। सुखवाञ्छा नाहि, सुख हय कोटिगुण ॥ १८६ ॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर ये आनन्द हय। ताहा हैते कोटिगुण गोपी आस्वादय ॥ १८७ ॥ अनुवाद—गोपीभावका और एक अद्भुत स्वभाव है, जिसका प्रभाव बुद्धिसे अतीत है। गोपियाँ जब श्रीकृष्णका दर्शन करती हैं, उनको अपने सुखकी अभिलाषा नहीं रहनेपर भी उनको श्रीकृष्णसे कोटि गुणा सुख होता है। गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द गोपियाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे आस्वादन करती हैं॥ १८४-१८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंमें निजसुखकी अभिलाषा नहीं है, तो भी गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णको जो सुख होता है, उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक सुखका आस्वादन गोपियोंको श्रीकृष्णका दर्शन करके होता है॥ १८६-१८७॥ ताँ सबार नाहि निजसुख-अनुरोध। तथापि बाड़ये सुख, पड़िल विरोध ॥ १८८ ॥ ए विरोधेर एकमात्र देखि समाधान। गोपिकार सुखे कृष्णसुख पर्यवसान ॥ १८९ ॥ पाठान्तर—गोपिकार सुख कृष्णसुखे पर्यवसान। अनुवाद—यद्यपि गोपियोंमें निजसुखकी लालसा नहीं रहती है, तो भी उनका सुख बढ़ता है। यह तो निःसन्देह विरोधाभास है, [क्योंकि सुखकी लालसा नहीं होनेसे सुखका आस्वादन कैसे हो सकता है?] इस विरोधाभासका एकमात्र जो समाधान दिखायी देता है—वह यह है कि गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखमें ही निहित है॥ १८८-१८९॥ गोपिका-दर्शने कृष्णेर बाड़े प्रफुल्लता। से माधुर्य बाड़े यार नाहिक समता ॥ १९० ॥ आमार दर्शने कृष्ण पाइल एत सुख। एइ सुखे गोपीर प्रफुल्ल अङ्गमुख ॥ १९१ ॥ अनुवाद—गोपियोंके दर्शनसे श्रीकृष्णके हृदयमें जो प्रफुल्लता होती है, उससे उनका अद्वितीय माधुर्य और बढ़ता है। 'अहो! हमारे दर्शनसे हमारे प्रिय कृष्णको इतना सुख मिला'—इसी सुखसे गोपियोंका मुखमण्डल और शरीर प्रफुल्लित हो जाता है अर्थात् उसकी शोभा और बढ़ जाती है॥ १९०-१९१॥ गोपी-शोभा देखि' कृष्णेर शोभा बाड़े यत। कृष्ण-शोभा देखि' गोपीर शोभा बाड़े तत ॥ १९२ ॥ एइमत परस्पर पड़े हुड़ाहूड़ी। परस्पर बाड़े, केह मुख नाहि मुड़ि ॥ १९३ ॥ अनुवाद—गोपियोंकी शोभाको देखकर, श्रीकृष्णकी शोभा जितनी बढ़ती है; श्रीकृष्णकी (उस २२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१९२-१९६ ] वर्द्धित) शोभाको देखकर गोपियोंकी शोभा उतनी ही और बढ़ जाती है। इस प्रकार दोनोंकी शोभाकी आपसमें होड़ लग जाती है और दोनों बढ़ती जाती हैं। इस प्रतिस्पर्धा में कोई हार नहीं मानती॥१९२-१९३॥ श्रीकृष्णके सुखमें गोपियोंका सुख :- किन्तु कृष्णेर सुख हय गोपी-रूप-गुणे। ताँर सुखे सुखवृद्धि हये गोपीगणे॥१९४॥ श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धिके कारण गोपीप्रेम 'काम' नहीं :- अतएव सेइ सुख कृष्ण-सुख पोषे। एइ हेतु गोपी-प्रेमे नाहि काम-दोष॥१९५॥ अनुवाद-किन्तु गोपियोंके रूप और गुणोंका आस्वादनकर श्रीकृष्णको सुख होता है और श्रीकृष्णके सुखको देखकर गोपियोंके सुखमें वृद्धि होती है। वही गोपियोंका सुख श्रीकृष्णके सुखका पोषण करता है, इसलिये गोपी-प्रेममें 'काम' का दोष नहीं है॥१९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि श्रीकृष्णके दर्शनसे गोपियोंको जो सुख होता है, उसे कोई-कोई 'काम' कहकर दोषारोपण कर सकते हैं, तो भी जब गोपियोंके मनका भाव इस प्रकार है कि 'कृष्ण-दर्शनसे हम लोग सुखी हुई हैं-इस भावको ग्रहण करनेपर कृष्णका सुख अधिक पुष्ट होगा' तब श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छा ही गोपियोंके सुखप्राप्तिका परम कारण है। इसलिये उसमें निजेन्द्रिय-सुखवाञ्छारूप काम-दोष नहीं है॥१९४-१९५॥ स्तवमालामें केशवाष्टक (८)- उपेत्य पथि सुन्दरीततिभिरभिरभ्यर्थितं स्मिताङ्कुरकरम्बितैर्नटदपाङ्गभङ्गीशतैः। स्तन-स्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं व्रजे विजयिनं भजे विपिनदेशतः केशवम्॥१९६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो केशव वनसे व्रजमें आ रहे हैं, मैं उनका भजन करता हूँ। वे मृदुहास्ययुक्त व्रजसुन्दरियोंकी सैकड़ों प्रकारसे नृत्यशील भङ्गीके द्वारा मार्गमें अर्चित हो रहे हैं। भ्रमरके समान उनके नेत्र-कटाक्ष उन गोपियोंके स्तनस्तबकके (स्तनोंको पुष्पोंका गुच्छा मानकर उनके) चारों ओर मँडरा रहे हैं॥१९६॥ अनुभाष्य-आभिः सुन्दरीततिभिः (व्रजविलासिनीश्रेणीभिः) उपेत्य (अट्टालिकामारुह्य) पथि (मार्गे) स्मिताङ्कुरकरम्बितैः (मन्दहास्याङ्कुरं तेन करम्बिताः युक्तास्तैः) नटदपाङ्गभङ्गीशतैः (नटत् अपाङ्गं नयनकटाक्षं यस्य तस्य भङ्गीशतानि तैः) अभ्यर्थितं (सर्वतोभावेन पूजितं) स्तनस्तबकसञ्चरन्नयनचञ्चरीकाञ्चलं (स्तनस्तबकाः गुच्छाः इव तेषु सञ्चरत् नयनयोः चञ्चरीकयोः भृङ्गयोः इव अञ्चलं प्रान्तभागः यस्य सः तं) विपिनदेशतः (अपराह्ने गोचारणात्) व्रजे (नन्दीश्वरे) विजयिनं केशवं (कृष्णं) भजे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९६॥ चौथा अध्याय | २२७

[ ४/१९७-२०२ गोपीप्रेमके स्वाभाविक लक्षण :- आर एक गोपीप्रेमेर स्वाभाविक चिह्न। ये-प्रकारे हय प्रेम काम-गन्ध-हीन॥१९७॥ गोपीप्रेमे करे कृष्णमाधुर्य्येर पुष्टि। माधुर्य बाड़ाय प्रेम हञा महातुष्टि॥१९८॥ सेव्य 'विषय'की प्रीतिमें ही सेवक 'आश्रय'की शुद्धप्रीति :- प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रयानन्द। ताँहा नाहि निजसुखवाञ्छार सम्बन्ध॥१९९॥ निरुपाधि प्रेम याँहा, ताँहा एइ रीति। प्रीतिविषयसुखे आश्रयेर प्रीति॥२००॥ अनुवाद-गोपीप्रेमका एक और प्रकारका स्वाभाविक लक्षण है जो दिखलाता है कि उसमें कामकी गन्ध भी नहीं है। गोपियोंका प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्यकी पुष्टि करता है और वही वर्धित माधुर्य उनके प्रेमको बढ़ाता है; इस प्रकार वे परम सन्तुष्ट होती हैं। जो प्रेमके विषय हैं, उनके आनन्दमें ही प्रेमके आश्रयका आनन्द निहित होता है। इसलिये इसमें निजसुख लालसाका कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँ निरुपाधिक प्रेम है, वहाँ यही रीति है। प्रेमके विषयके सुखसे ही आश्रयको सुख मिलता है॥१९७-२००॥ श्रीकृष्णसेवाकालमें निजेन्द्रियप्रीतिके प्रति घृणा और दूरसे ही परित्यज्य :- निज-प्रेमानन्दे कृष्ण-सेवानन्द बाधे। से आनन्देर प्रति भक्तेर हय महाक्रोधे॥२०१॥ अनुवाद-जब प्रेममें अपने आनन्दसे श्रीकृष्णके सेवानन्दमें बाधा उत्पन्न होती है, तो उस निज आनन्दके प्रति भक्तको अत्यधिक क्रोध होता है॥२०१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रीतिके विषय श्रीकृष्णको जो आनन्द होता है, उसीसे ही प्रीतिकी आश्रय गोपियोंको आनन्द होता है। इस प्रकार आनन्दसमृद्धिसे गोपियोंका अपनी सुख-अभिलाषासे कोई सम्बन्ध नहीं है। जहाँपर निरुपाधिक प्रेम होता है, वहाँपर यही रीति दिखलायी देती है अर्थात् प्रीतिके विषयके सुखमें ही प्रीतिके आश्रयका सुख निहित होता है। तो भी एक बात कही जा सकती है, जहाँ अपना प्रेमानन्द होता है, वहाँ श्रीकृष्णसेवानन्दमें बाधा अवश्य ही होगी। इसलिये जब सेवानन्दके बाधकरूप आनन्दका उदय होता है, तब भक्तके अन्दर महाक्रोध उपस्थित होता है॥१९९-२०१॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (३/२/६२)- अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्गयन्तं प्रेमानन्दं दारुको नाभ्यनन्दत्। कंसारातेर्बीजने येन साक्षादक्षोदीयानन्तरायो व्यधायि॥२०२॥ अनुवाद-अनुभाष्य भावानुवाद द्रष्टव्य है॥२०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णको चामर ढुलानेके समय प्रेमानन्दसे उत्पन्न शरीरकी जड़ताको सेवामें बाधा जानकर दारुकने उसका अभिनन्दन नहीं किया॥२०२॥ २२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२०२-२०६ ]

अनुभाष्य-येन (प्रेमानन्देन) कंसारातेः (कृष्णस्य) बीजने (चामरसेवने) साक्षात् अक्षोदीयान् (महान्) अन्तरायः (बाधकः) व्यधायि, दारुकः (श्रीकृष्णस्य सारथिः) अङ्गस्तम्भारम्भम् (अङ्गानां स्तम्भारम्भं जड़ीभावम्) उत्तुङ्गयन्तं (प्रापयन्तं) तं प्रेमानन्दं (निजानुभवार्हानन्दं) नाभ्यनन्दत् (आनुकूल्यकरत्वे नैव अभिलषितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-जब श्रीकृष्णके सारथी दारुक श्रीकृष्णको चामर झुला रहे थे, उस समय प्रेमानन्दसे उनके सारे अङ्गोंमें जड़ता उपस्थित हुई, किन्तु दारुकने इस प्रेमानन्दको साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें अवरोध मानकर उसका अभिनन्दन नहीं किया अर्थात् उसकी अभिलाषा नहीं की॥२०२॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/३/५४)- गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणम्। उच्चैरनिन्ददानन्दमरविन्दविलोचना॥२०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कमलनयना श्रीकृष्णभामिनीने श्रीकृष्णदर्शनके बाधास्वरूप नेत्रोंसे जलका वर्षण करनेवाले आनन्दकी अतिशय निन्दा की॥२०३॥ अनुभाष्य-अरविन्दविलोचना (कमलनेत्रा राधिका) गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि-वाष्पपूराभिवर्षिणं (गोविन्दस्य प्रेक्षणं तस्य आक्षेपी बाधको यो वाष्पपूराश्रुवृन्दं तम् अभिवर्षितुं स्वभावो यस्य तम्) आनन्दम् उच्चैः (अतिशयेन) अनिन्दत् (निनिन्द)। श्लोक-भावानुवाद-कमलनयना श्रीमती राधिकाने गोविन्दके दर्शनमें बाधक आनन्द जिसका स्वभाव नेत्रोंसे अश्रुवर्षण कराना है, उसकी अत्यधिक निन्दा की॥२०३॥ शुद्धभक्तकी श्रीकृष्णभक्ति बिना मुक्तिसे भी घृणा :- आर शुद्धभक्त कृष्ण-प्रेम-सेवा-बिने। स्वसुखार्थ सालोक्यादि ना करे ग्रहणे॥२०४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-और भी देखो, श्रीकृष्ण-प्रेमसेवाके बिना अपने सुखके लिये शुद्धभक्त सालोक्यादि मुक्तिको भी कभी ग्रहण नहीं करते॥२०४॥ श्रीकृष्णमें अहैतुकी और अप्रतिहता भक्ति ही निर्गुणा :- श्रीमद्भागवत (३/२९/११-१२)- मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ॥२०५॥ लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥२०६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०५-२०६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी

चौथा अध्याय | २२९

[ ४/२०५-२०८ अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है॥२०५-२०६॥ अनुभाष्य—श्रीकपिलदेवने माता देवहूतिसे कहा— मद्गुणश्रुतिमात्रेण (मम गुणश्रवणमात्रेण) सर्वगुहाशये (सर्वान्तःकरणवर्त्तिनि) मयि, अम्बुधौ (समुद्रे) गङ्गाम्भसः यथा, [तथा] अविच्छिन्ना (अप्रतिरुद्धा, विषयान्तरेण छेत्तुमशक्या या) मनोगतिः, पुरुषोत्तमे या अहैतुकी (फलानुसन्धानरहिता) अव्यवहिता (देहद्रविणजनतालोभपाषण्डत्वादि-व्यवधान-विवर्जिता) भक्तिः, सा निर्गुणस्य (त्रिगुणातीतस्य भगवतः) भक्तियोगस्य लक्षणम् उदाहृतं (कथितं) हि। श्लोक-भावानुवाद—मेरे गुणोंको श्रवण करनेमात्रसे सबके अन्तःकरणमें मुझ अन्तर्यामीमें समुद्रकी ओर बहते गङ्गाके प्रवाहके समान बिना किसी अवरोधके (विषयान्तर करनेमें अक्षम) फलाकाङ्क्षारहित, (देह-धन-जनके लोभ और पाखण्डादि) व्यवधानसे रहित मनकी गतिको ही त्रिगुणातीत भगवत्-भक्तियोगका लक्षण कहा गया है॥२०५-२०६॥ श्रीमद्भागवत (३/२९/१३)— सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः॥२०७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है॥२०७॥ अनुभाष्य—जनाः (हरिजनाः) मत्सेवनं बिना (मद्भजनं त्यक्त्वा) दीयमानं सालोक्यं (मया सह एकस्मिन् लोके वासं) सार्ष्टिं (समानमैश्वर्यं) सामीप्यं (निकटवर्त्तित्वं) सारूप्यं (समानरूपताम्) एकत्वम् उत (सायुज्यमपि) न गृह्णन्ति (नाभिनन्दन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०७॥ नश्वर भोग तो दूर रहे, भक्त मोक्षकी भी कामना नहीं करते :- श्रीमद्भागवत (९/४/६७)— मत्सेवया प्रतीतं ते सालोक्यादि-चतुष्टयम्। नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः कुतोऽन्यत् कालविप्लुतम्॥२०८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मेरी सेवासे ही परिपूर्ण-हृदयवाले शुद्धभक्त मेरी सेवाके द्वारा सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियाँ स्वयं आनेपर भी जब उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, तब मायिक (स्वर्गादि) भोग और सायुज्य मुक्ति, जो कालके द्वारा अति शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, उनकी इच्छा वे क्यों करेंगे? सायुज्यमुक्तिके द्वारा जीवकी सत्ता कालका ग्रास बन जाती है, इसलिये भुक्ति और सायुज्य-मुक्ति, ये स्थायी नहीं हैं॥२०८॥ अनुभाष्य—अम्बरीष जैसे भक्तोंके गुणोंका वर्णन करते हुए श्रीभगवान्ने दुर्वासासे कहा— २३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२०८-२१२ ] सेवया पूर्णाः ते (भक्ताः) मत्सेवया प्रतीतं (प्राप्तम् अपि) सालोक्यादिचतुष्टयं न इच्छन्ति (नाभिलषन्ति), अन्यत् (स्वर्गादिकं) कालविप्लुतं (काले नाशयोग्यं) कुतः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०८॥ गोपीप्रेमका वर्णन :- कामगन्धहीन स्वाभाविक गोपी-प्रेम। निर्मल, उज्ज्वल, शुद्ध येन दग्ध हेम॥२०९॥ श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका सम्पर्क :- कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी। गोपिका हयेन प्रिया शिष्या, सखी, दासी॥२१०॥ गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वाञ्छित। प्रेमसेवा परिपाटी, इष्ट-समीहित॥२११॥ अनुवाद-गोपियोंका प्रेम स्वाभाविक है जिसमें कामकी गन्ध तक भी नहीं है। वह प्रेम अग्निसे तपाये हुए (दोषरहित) स्वर्णकी भाँति निर्मल, उज्ज्वल और शुद्ध है। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सहायिका, गुरु, बान्धवी, प्रेयसी, प्रिय शिष्या, सखी और दासी हैं। गोपियाँ श्रीकृष्णकी सभी मनोवाञ्छाओंको जानती हैं और उन्हें पूर्ण करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवाकी रीति भी जानती हैं। श्रीकृष्णकी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण करनेके लिये ही उनकी सभी चेष्टाएँ होती हैं॥२०९-२११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-‘इष्ट-समीहित’ अर्थात् अभिलषित चेष्टा॥२११॥ श्रीकृष्णका अपने साथ गोपियोंका सम्बन्ध-वर्णन :- आदिपुराणवचन- सहाया गुरवः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः। सत्यं वदामि ते पार्थ गोप्यः किं मे भवन्ति न॥२१२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२१२॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा- “हे पार्थ! गोपियाँ मेरी सर्वस्व हैं- वे मेरी सहायिका अर्थात् प्रिया हैं, मुझे गुरुके समान स्नेह करती हैं, शिष्याके समान मेरी सेवा करती हैं, मेरी उपभोग्या जैसी दासी हैं, बन्धुके समान प्रेम आचरण करनेवाली हैं और विवाहिता स्त्रीके समान व्यवहार करती हैं।”२१२॥ अनुभाष्य- हे पार्थ ! ते (तुभ्यम्) अहं सत्यं (स-शपथं निश्चितं) वदामि- मे (मम) सहायाः (रासक्रीड़ादौ सहायाः) गुरवः (प्रेमशिक्षादौ उपदेष्टारः) शिष्याः (मदाज्ञापालनपराः) भुजिष्याः (दासीवत् मत्सेवापराः) बान्धवाः (बन्धुवत् प्रीत्याचरणशीलाः) स्त्रियः (स्वपत्नीवत् भोग्याः)-[अतः] गोप्यो मे किं न भवन्ति? [अपि तु मत्सर्वस्वा एवेत्यर्थः]। श्लोक-भावानुवाद- हे पार्थ! तुम्हें मैं शपथके साथ निश्चित रूपसे कह रहा हूँ मेरी रासक्रीड़ादिमें सहायिका, प्रेमकी शिक्षा देनेवाली गुरु, मेरी आज्ञाका पालन करनेवाली शिष्या, चौथा अध्याय | २३१

[ ४/२१२-२१६ दासीके समान सेवा करनेवाली, बन्धुके समान प्रीति-आचरणशील और विवाहिता पत्नीके समान भोग्या, गोपियाँ मेरी क्या नहीं हैं? [वे मेरी सर्वस्व हैं, यह अर्थ है] ॥ २१२ ॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्डमें (३९) आदिपुराणवचन :- मन्माहात्म्यं मत्सपर्यां मच्छ्र जानन्ति गोपिकाः पार्थ नान्ये जानन्ति तत्त्वतः॥ २१३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरा माहात्म्य, मेरी सेवा, मेरे प्रति श्रद्धा, मेरे मनके भाव केवल गोपियाँ ही जानतीं हैं। हे पार्थ! स्वरूपसे इन सबको और कोई नहीं जानता है॥ २१३॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! गोपिकाः मन्माहात्म्यं (मम महिमानं) मत्सपर्यां (मम सेवां) मच्छ्रद्धां (मम स्पृहनीयं) मन्मनोगतं (मम मनोऽभिप्रायं) तत्त्वतः (स्वरूपतः) जानन्ति, [अन्ये] भक्ताः न जानन्ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१३॥ गोपियोंमें श्रीराधिका ही सर्वश्रेष्ठा :- सेइ गोपीगण-मध्ये उत्तमा राधिका। रूपे, गुणे, सौभाग्ये, प्रेमे सर्वाधिका ॥ २१४॥ अनुवाद-उन गोपियोंमें राधिका ही सबसे श्रेष्ठा हैं। रूप, गुण, सौभाग्य और प्रेममें भी वे सबसे अधिक हैं॥२१४॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४५) पद्मपुराणवचन :- यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा। सर्वगोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्तवल्लभा ॥ २१५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधिका जिस प्रकार श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, राधाकुण्ड भी वैसे ही उनका प्रिय स्थान है। सभी गोपियोंमें श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी अत्यन्त प्रिया हैं॥ २१५॥ अनुभाष्य-विष्णोः (कृष्णस्य) राधा यथा प्रिया, तस्याः (राधायाः) कुण्डं तथा प्रियम्। सर्वगोपीषु सा (श्रीराधिका) एका एव विष्णोः अत्यन्तवल्लभाः (परा प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१५॥ लघुभागवतामृत, उत्तरखण्ड (४६) आदिपुराणवचन :- त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या यत्र वृन्दावनं पुरी। तत्रापि गोपिकाः पार्थ यत्र राधाभिधा मम ॥ २१६ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पृथ्वीपर वृन्दावनधामके अवतीर्ण होनेपर पृथ्वी तीनों लोकोंमें धन्य हुई है। उसमें भी गोपियाँ धन्य हैं, क्योंकि उनमें मेरी अत्यन्त प्रिय 'राधा' नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ अनुभाष्य-हे पार्थ! त्रैलोक्ये (भूर्भुवःस्वर्लोकत्रयमध्ये) पृथिवी धन्या, यत्र (पृथिव्यां) वृन्दावनं [नाम] पुरी [अस्ति]। तत्र (वृन्दावने) अपि गोपिकाः धन्याः, यत्र मम राधाभिधा [गोपीवर्त्तते]। २३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२१६-२१९ ] श्लोक-भावानुवाद-भू (पृथ्वी), भुवः और स्वर्ग, इन तीन लोकोंमें पृथ्वी धन्य है, जिसपर वृन्दावन नामक पुरी है। वृन्दावनमें भी गोपियाँ धन्य हैं, जिनमें मेरी राधा नामक गोपी विद्यमान है॥ २१६॥ मधुररसमें श्रीराधाके साथ ही मूल विलास, अन्य सब वस्तुएँ उसके उपकरण :- राधासह क्रीड़ा रस-वृद्धिर कारण। आर सब गोपीगण रसोपकरण॥ २१७॥ अनुवाद-श्रीराधाके साथ क्रीड़ा श्रीकृष्णके रसास्वादनकी वृद्धिका कारण है। अन्य सभी गोपियाँ उस रसकी वृद्धिकी उपकरण स्वरूप अर्थात् सहायिका हैं॥ २१७॥ अनुभाष्य-श्रीराधिका ही श्रीकृष्णकी सर्वस्व हैं। अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णकी श्रीराधाके साथ क्रीड़ारसकी वृद्धिके उद्देश्यसे रसकी उपकरणमात्र हैं। “समन्तान्माधवाकर्षिविभ्रमाः सन्ति सुभ्रुवः। तास्तु वृन्दावनेश्वर्याः सख्यः पञ्चविधा मताः॥ सख्यश्च नित्यसख्यश्च प्राणसख्यश्च काश्चन। प्रियसख्यश्च परमप्रेष्ठसख्यश्च विश्रुताः ॥ ××× आसां सुष्ठु द्वयोरेव प्रेम्णः परमकाष्ठया। क्वचिज्जातु क्वचिज्जातु तदाधिक्यमिवेक्ष्यते ॥ ××प्रेमलीलाविहाराणं सम्यग्विस्तारिका सखी ॥” काम-भावोंको उद्दीप्त करनेकी चेष्टाके द्वारा श्रीकृष्णको सभी प्रकारसे आकर्षित करनेमें समर्था उज्ज्वल वर्णवाली श्रीवृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधिकाकी पाँच प्रकारकी सखियाँ हैं। जैसे-सखी, नित्यसखी, प्राणसखी, प्रियसखी और परमप्रेष्ठसखी। परमप्रेष्ठ सखियाँ आठ हैं और इनमें प्रेमकी पराकाष्ठा होनेसे ये कभी राधाजीके मान करनेपर श्रीकृष्णका और कभी खण्डितावस्थामें श्रीराधाका पक्ष लेते हुए एकके प्रति अनुराग और दूसरेके प्रति विपक्ष भाव प्रदर्शन करते हुए रसकी वृद्धि करती हैं॥ २१७॥ कृष्णेर वल्लभा राधा, कृष्ण-प्राणधन। ताँहा बिनु सुखहेतु नहे गोपीगण॥ २१८॥ अनुवाद-श्रीराधा ही श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रिया तथा प्राणधन हैं, उनके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकती॥ २१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिकाके बिना अन्य गोपियाँ श्रीकृष्णके सुखका कारण नहीं हो सकतीं ॥ २१८॥ श्रीगीतगोविन्द (३/१)- कंसारिरपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलाम्। राधामाधाय हृदये तत्याज व्रजसुन्दरीः ॥ २१९॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कंसारि (कंसके शत्रु) श्रीकृष्ण सम्पूर्णसाररूपी रासलीला-वासनाकी शृङ्खला श्रीराधाको हृदयमें धारणकर अन्यान्य व्रजसुन्दरीयोंको त्यागकर चले गये॥ २१९॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके रासस्थलीको त्यागकर रासकी मूल-आश्रय श्रीराधाके पीछे जानेपर श्रीजयदेवका वाक्य- चौथा अध्याय | २३३

[ ४/२१९-२२३ कंसारिः (श्रीकृष्णः) अपि संसारवासनाबद्धशृङ्खलां (सम्यक् सारभूता रासलीला-वासना तया आबद्धा बन्धनं दृढ़ीकरणाय संयुक्ता शृङ्खला निगड़रूपा तां रासक्रीड़ा-परमाश्रयां) राधां हृदये आधाय (आ-सम्यक् प्रकारेण धृत्वा) व्रजसुन्दरीः (सर्वाः गोपवधूः) तत्याज। श्लोक-भावानुवाद-कंसारि (श्रीकृष्ण) ने सम्पूर्ण साररूप रासलीलाकी वासनाके बन्धनको दृढ़ करनेवाली शृङ्खलारूपी रासक्रीड़ाकी परमाश्रया श्रीराधाको हृदयमें पूर्णरूपसे धारण करके अन्य सभी गोपियोंको त्याग दिया॥२१९॥ अमृतानुकणिका-श्रीराधा जब रासमण्डली छोड़कर चली गयीं, तब अन्य सभी गोपियाँ रासमण्डलमें थीं, तथापि रासलीलाभिलाषी श्रीकृष्ण उन सबको छोड़कर केवल राधाजीका अन्वेषण करने लगे। इसके द्वारा यह समझा जाता है कि श्रीराधाके बिना शत-कोटि गोपियोंके द्वारा रासलीला सम्पन्न नहीं हो सकती, अन्यथा श्रीकृष्ण इन गोपियोंको लेकर रासलीला करते। श्रीराधाके बिना अन्य समस्त गोपियाँ भी स्वतन्त्रभावसे श्रीकृष्णके सुखका विधान नहीं कर सकतीं, इसका ही प्रमाण यह श्लोक है। इससे ही समस्त गोपियोंमें श्रीराधाका सर्वश्रेष्ठत्व प्रमाणित हुआ है॥२१९॥ मुख्यरूपसे राधाभावसे ही तीनों वाञ्छाओंकी पूर्ति, गौणरूपमें नामप्रेम प्रचार :- सेइ राधाभाव लञा चैतन्यावतार। युगधर्म नाम-प्रेम कैल परचार॥२२०॥ सेइभावे निजवाञ्छा करिल पूरण। अवतारेर एइ वाञ्छा मूल-कारण॥२२१॥ अनुवाद-उसी राधा-भावको लेकर ही चैतन्यावतार हुआ है। अवतीर्ण होकर उन्होंने युगधर्म नाम-सङ्कीर्तन और उसके द्वारा श्रीकृष्ण-प्रेमका प्रचार भी किया। उस राधा-भावको लेकर श्रीकृष्णने अपनी उपरोक्त तीन इच्छाओंको पूर्ण किया। ये तीन इच्छाएँ ही उनके अवतारकी मूल कारण है॥२२०-२२१॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णकी सर्वस्व, प्रीतिकी आश्रयस्वरूपा, सर्वोत्तम श्रीमती गान्धर्विका (राधिका) का भाव अर्थात् उनकी ऐकान्तिकी श्रीकृष्णसेवापरायण चित्तवृत्ति ही 'सेइ राधाभाव' (उसी राधाभाव) का तात्पर्य है॥२२०॥ सम्भोगरस-विग्रह श्रीनन्दनन्दन ही विप्रलम्भरस-विग्रह श्रीगौर :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि व्रजेन्द्रकुमार। रसमय-मूर्ति कृष्ण साक्षात् शृङ्गार॥२२२॥ सेइ रस आस्वादिते कैल अवतार। आनुषङ्गे कैल सब रसेर प्रचार॥२२३॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य ही रसमय मूर्ति व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्ण हैं, जो साक्षात् शृङ्गाररस हैं। उसी शृङ्गाररसका आस्वादन करनेके लिये उन्होंने अवतार ग्रहण किया और आनुषङ्गिक रूपसे दूसरे रसोंका भी प्रचार किया॥२२१-२२३॥ २३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२२४-२२७ ] व्रजललनाओंके साथ श्रीकृष्णका नित्य विलास :- श्रीगीतगोविन्द (१/११)- विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवर- श्रेणीश्यामलकोमलैरूपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः शृङ्गारः सखि मूर्त्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥ २२४॥ अनुवाद-हे सखि ! इस वसन्तकालमें विलास-रसमें उन्मत्त श्रीकृष्ण मूर्त्तिमान शृङ्गार रसस्वरूप होकर विहार कर रहे हैं। वे इन्दीवर कमलसे भी अतीव अभिराम कोमल श्यामल अङ्गोंसे कन्दर्प महोत्सवका सम्पादन कर रहे हैं। गोपियोंकी जितनी भी अभिलाषा है, उससे भी कहीं अधिक उनकी उन्मत्त लालसाओंको अति अनुरागके साथ तृप्त कर रहे हैं। परन्तु व्रजसुन्दरियाँ विपरीत रतिरसमें आविष्ट हो विवश होकर उनके प्रत्येक अङ्गप्रत्यङ्गको सम्यक् और स्वतन्त्र रूपसे आलिङ्गित कर रही हैं॥ २२४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि ! शृङ्गारस्वरूप श्रीकृष्ण अपने अङ्गसौन्दर्यके द्वारा जगत्में आनन्द उत्पन्न कराकर और इन्दीवरके (नीलकमलके) सदृश सुन्दर, कोमल हस्त-चरणादिके द्वारा व्रजाङ्गनाओंके हृदयमें कन्दर्पोत्सव उदय करते हुए व्रजसुन्दरियोंके द्वारा स्वच्छन्दतापूर्वक आलिङ्गित होकर वसन्तकालमें क्रीड़ा कर रहे हैं॥ २२४॥ अनुभाष्य-हे सखि ! अनुरञ्जनेन (प्रीणनेन) विश्वेषां (सर्वासां गोपरामाणां) आनन्दं जनयन्, इन्दीवरश्रेणी-श्यामलकोमलैः (हरिद्वर्णविविध-सुकुमार-नीलपद्मप्रतिमैः) अङ्गैः अनङ्गोत्सवं उपनयन् (प्रापयन्) स्वच्छन्दम् (असङ्कोचं यथा स्यात् तथा) अभितः व्रजसुन्दरीभिः प्रत्यङ्गं आलिङ्गितः मुग्धः हरिः मधौ (वसन्तसमये) मूर्त्तिमान् शृङ्गारः इव क्रीड़ति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २२४॥ गौरावतारमें रसनिधान श्रीकृष्णका नाना प्रकारसे गोपीप्रेम-रसास्वादन :- श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि रसेर सदन। अशेष-विशेष कैल रस आस्वादन ॥ २२५ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु रसका भण्डार हैं, उन्होंने सभी प्रकारसे रसका आस्वादन किया॥ २२५॥ चैतन्यदास ही चित्-शक्तिके आश्रयमें श्रीगौरावतार-रहस्यके ज्ञाता :- सेइ द्वारे प्रवर्त्ताइल कलियुग-धर्म। चैतन्येर दासे जाने एइ सब मर्म॥ २२६॥ अनुवाद-उसके द्वारा महाप्रभुने कलियुगके धर्मकी भी स्थापना की। इस रहस्यको केवल उनके भक्त ही जानते हैं॥ २२६ ॥ गौरपार्षद और गौरभक्त-वन्दना :- अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द, श्रीनिवास। गदाधर, दामोदर, मुरारि, हरिदास ॥ २२७ ॥ चौथा अध्याय | २३५

[ ४/२२७-२३१ आर यत चैतन्य-कृष्णेर भक्तगण। भक्तिभावे शिरे धरि सबार चरण ॥ २२८ ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य प्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीनिवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूपदामोदर, मुरारिगुप्त प्रभु, श्रील हरिदास ठाकुर और जितने भी महाप्रभुके भक्त हैं, भक्तिभावसे उनके चरणकमलोंको अपने सिरपर धारण करता हूँ॥२२७-२२८॥ अब तक छठे श्लोककी भूमिका वर्णन; अब विस्तृत व्याख्या :- षष्ठश्लोकेर एइ कहिल आभास। मूल श्लोकेर अर्थ शुन, करिये प्रकाश ॥ २२९ ॥ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थकी मैंने भूमिका बतलायी थी, अब श्लोकके मूल अर्थको प्रकाश कर रहा हूँ॥२२९॥ श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चा- श्रीराधायाः प्रणयमहिमा कीदृशो वानयैवा- स्वाद्यो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो वा मदीयः। सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभा- तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः ॥२३०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥२३०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाकी प्रणयमहिमा कैसी है? मेरी अद्भुत मधुरिमा-जिसको श्रीराधा आस्वादन करती है-वह कैसी है? मेरी मधुरिमाकी अनुभूतिसे श्रीराधाके हृदयमें कैसा सुख उदय होता है? इन तीन विषयोंके प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णरूप चन्द्रने शचीगर्भरूप समुद्रसे जन्मग्रहण किया॥२३०॥ अनुभाष्य-श्रीराधायाः (वार्षभानव्याः) प्रणयमहिमा (प्रणयमाहात्म्यः) वा कीदृशः, अनया (राधया) मदीयः अद्भुतमधुरिमा (अपूर्वमाधुर्यातिशयः) येन (प्रणयेन) कीदृशः वा आस्वाद्यः, मदनुभवतः (मदनुभवात्) अस्याः (श्रीराधायाः) सौख्यं कीदृशं वा-इति लोभात् तद्भावाढ्यः (तस्याः भावेन आढ्याः समन्वितः सन्) शचीगर्भसिन्धौ (शच्याः मातुः गर्भसमुद्रे) हरीन्दुः (कृष्णचन्द्रः) समजनि (प्रादुरासीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२३०॥ गूढ़ होनेपर भी रसिक भक्तोंके लिये वर्णन :- ए सब सिद्धान्त गूढ़,-कहिते ना यूयाय। ना कहिले, केह इहार अन्त नाहि पाय ॥ २३१ ॥ अनुवाद-अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥२३१॥ अनुभाष्य-श्रीगौरावतारका यही गूढ़ सिद्धान्त है-श्रीकृष्णकी हृदयगत वासनाको जगत्में प्रकाशित करना यद्यपि योग्य नहीं है, अथवा जगत्के श्रोताओंके अधिकारोचित नहीं है, तथापि यह कथा प्रकाशित ना होनेपर जीव अपनी चेष्टासे इसकी सीमाकी उपलब्धि नहीं कर पायेंगे अर्थात् उसकी पूर्ण महिमाको नहीं जान पायेंगे ॥ २३१॥ २३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२३२-२३५ ]

अतएव कहि किछु करिया निगूढ़। बुझिबे रसिक भक्त, ना बुझिबे मूढ़॥२३२॥ अनुवाद—इसलिये मैं इसका वर्णन कुछ रहस्यमय ढंगसे करूँगा जिसे रसिक भक्त तो समझेंगे, किन्तु मूर्ख व्यक्ति समझ नहीं पायेंगे॥२३२॥ श्रीगुरु-गौराङ्ग-दासका ही रससिद्धान्तमें अधिकार :- हृदये धरये ये चैतन्य-नित्यानन्द। एसब सिद्धान्ते सेइ पाइबे आनन्द॥२३३॥ ए सब सिद्धान्त हय आम्रेर पल्लव। भक्तगण-कोकिलेर सर्वदा वल्लभ॥२३४॥ अनुवाद—जिन्होंने अपने हृदयमें चैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुको धारण किया है, वे लोग ही ये सब सिद्धान्त समझकर हृदयमें आनन्दकी उपलब्धि करेंगे। ये सब सिद्धान्त अत्यन्त कोमल आमके पत्तोंकी भाँति हैं, जो भक्तरूपी कोयलको प्रिय है॥२३३-२३४॥ ग्रन्थकारको अभक्तोंकी दुर्बुद्धिका भय, परन्तु उनकी अज्ञतासे सुख :- अभक्त-उष्ट्र तबे चित्ते हय मोर आनन्द-विशेष॥२३५॥ अनुवाद—यदि अभक्तरूपी ऊँट इसमें प्रवेश नहीं करें, तो मेरे हृदयमें विशेष आनन्द होगा। [क्योंकि कँटीली झाड़ियोंको खानेपर ऊँटकी जीभ कट जाती है और उससे रक्त निकलता है। वह रक्त उसे बहुत स्वादिष्ट लगता है, परन्तु वह सोचता है कि यह स्वाद कँटीली झाड़ीका है। इसलिये उसकी रुचि काँटोंमें है, कोमल आम्र पल्लवोंमें नहीं]॥२३५॥ अनुभाष्य—यह सब कथा गौर-नित्यानन्दके भक्तोंके ही आनन्दका विधान करती है। गौरभक्त कोयलकी भाँति हैं और सिद्धान्त आम्रपल्लवस्वरूप हैं। कोयलकी जिस प्रकार आम्रपल्लवमें विशेष प्रीति है, वैसे ही भक्त लोग इन सिद्धान्तोंमें परमानन्द प्राप्त करते हैं। पक्षान्तरमें, ऊँट जिस प्रकार काँटोंके द्वारा अपनी जिह्वाको क्षत-विक्षत ना करवाकर आम्रपल्लवादि खानेकी इच्छा नहीं करता है, उस प्रकार अभक्त ज्ञानी, कर्मी और अन्याभिलाषी मिथ्याभक्तरूपी ऊँट इन सब सिद्धान्तोंमें कुतर्क करते हैं॥२३४-२३५॥ अमृतानुकणिका—श्रीमन्महाप्रभुने कहा—“अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत गोचर।” किन्तु श्रीकृष्णमें भोगबुद्धिवाले व्यक्तियोंका यह स्वभाव यह है कि वे अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा मापने या भोग करनेकी चेष्टा करते हैं। अप्राकृत वस्तुको प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करनेकी चेष्टाको ही सात्वतजन ‘श्रीकृष्णमें भोगबुद्धि' कहते हैं। अप्राकृत वस्तुमें प्राकृत इन्द्रियोंका प्रवेशाधिकार नहीं है—यह बात प्राकृत व्यक्तियोंके मस्तिष्कमें कुछ भी प्रवेश नहीं करती। वे सोचते हैं, जब हम नेत्रों, कानों, जिह्वा, त्वचा या मनके द्वारा सब कुछ जान सकते हैं, तब अप्राकृत वस्तु नामक और क्या हो सकता है? किन्तु अप्राकृतरसके रसिकजनोंका कहना है—अप्राकृत तत्त्वमें या सिद्धान्तमें अभक्त, ज्ञानी, कर्मी, अन्याभिलाषी या मिथ्याभक्तोंका प्रवेशाधिकार नहीं है। श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु ग्रन्थमें श्रीरूप गोस्वामीने इसे स्पष्ट रूपमें कहा है—

चौथा अध्याय | २३७

[ ४/२३५-२३६ अप्राकृत कामदेव मन्मथमन्मथ भगवान्‌की मधुर लीलाकथा आजकल एक खेलकी वस्तु हो गयी है, लोगोंकी विलासिताकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आचार्यवर श्रील सनातन गोस्वामीने रासपञ्चाध्यायके अति आरम्भमें लिखा है— “तत्तस्तादृश-भक्तैरेवैतच्छ्र श्रीशुक उवाचेति पाठे तु ॰ ॰ तत्तस्तादृशचित्ततयैव श्रोतव्यमिदमिति व्यञ्जितम्।” अर्थात् श्रीशुकदेव गोस्वामी ही इस परम उज्ज्वलरससे परिपूर्ण रासलीला प्रसङ्गके उपयुक्त वक्ता हैं। इसलिये वक्ताकी भाँति श्रोताको भी उज्ज्वलरसमें आविष्ट चित्त रहकर श्रवण करना उचित है, यही 'शुक' शब्दके प्रयोगकी व्यञ्जना (सङ्केतिक अर्थ) है। साक्षात् भागवत (१०/३३/३०) में भी कहा गया है— “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद् यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “परन्तु जो अनीश्वर-असमर्थ है, उन्हें शरीरसे करना तो दूर रहा, मनसे भी वैसी बात कभी नहीं सोचनी चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ईश्वरकी इस लीलाका अनुकरणकर ऐसा आचरण कर बैठेगा, तो वह नष्ट-पतित हो जायेगा। भगवान् शिवने समुद्रसे उत्पन्न हलाहल विष पी लिया था, उनकी देखा-देखी यदि कोई दूसरा पियेगा, तो वह निश्चय ही जलकर भस्म हो जायेगा।” वर्तमान युगमें श्रीमद्भागवतके आदेश, श्रीमन्महाप्रभुके आचरण, आचार्य गोस्वामियोंके उपदेश और महाजनोंके वाक्योंका उल्लङ्घन करके श्रीराधागोविन्दकी अप्राकृतलीलाको नाना प्रकारसे विलासके द्रव्यरूपमें परिणत करके जगत्में जो नास्तिकता और व्यभिचारकी दुर्गन्ध विस्तार हो रही है, उसे वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन चण्डीदास, विद्यापति और जयदेव गोस्वामीकी मधुर कोमलकान्त पदावली, अप्राकृत-चिद्विलासवैचित्र्य-कथाका श्रीमन्महाप्रभुने कुछ पवित्रतम चरित्र अन्तरङ्ग भक्तोंके साथ आस्वादन किया था, आज वही लीलाएँ कामुक लोगोंके विलासकी वस्तुरूपमें परिणत हो गयी है। आज प्राकृत जड़-साहित्यिकगण अप्राकृत चित्-साहित्यको अवैधरूपमें अपने भोग्यवस्तु मानकर स्वयं तो परमार्थसे चिरकालसे वञ्चित हैं और जगत्‌को भी उसी मार्गपर ले जा रहे हैं। उनकी धारणा है कि प्राकृत ही अप्राकृतमें परिणत होती है। इस प्रकारका विचार नास्तिकता या बौद्धवादके अतिरिक्त कुछ नहीं है। अप्राकृतका ही तुच्छ प्रतिफलन प्राकृत है। प्रतिफलित वस्तु होनेके कारण अप्राकृतके साथ प्राकृतका कुछ साम्य है, किन्तु वह अप्राकृत नहीं। प्राकृतमें तुच्छता, अवास्तविकता, वञ्चना, न्यूनता, नश्वरता आदि धर्म विद्यमान हैं। इसलिये छायाको सत्यवस्तु माननेसे या छायाका अनुसरण करनेसे कभी भी सत्यवस्तु प्राप्त नहीं होती॥२३५॥ ये लागि कहिते भय, से यदि ना जाने। इहा वइ किबा सुख आछे त्रिभुवने॥२३६॥ अनुवाद—जिन अभक्त लोगोंके कारण ये सब सिद्धान्त कहनेमें भय लगता है, वे यदि इन्हें ना समझ पायें, तो इससे अधिक इस त्रिभुवनमें और क्या सुख होगा?॥२३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि मेरे हृदयमें यह आनन्द हो रहा है कि जिन सब अभक्तोंसे मुझे २३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२३५-२४१ ] भय लगता है, उनकी इस ग्रन्थमें प्रवेशकी सम्भावना नहीं है। इसलिये वे लोग इस ग्रन्थको नहीं पढ़ेंगे (अथवा पढ़कर भी नहीं समझेंगे)। मुझे इससे अधिक और क्या सुख हो सकता है?॥२३५-२३६॥ अमृताणुकणिका—अभक्त लोग इन गूढ़ सिद्धान्तोंका वास्तविक अर्थ ना समझकर उसके विपरीत अर्थको ग्रहणकर अपराध करेंगे, इसलिये उनके समक्ष इन्हें प्रकाशित करना उचित नहीं है। मेरे द्वारा प्रच्छन्न वर्णनके द्वारा वे इन सिद्धान्तोंके विषयमें कुछ जान नहीं पायेंगे, इसलिये अपराधसे उनकी रक्षा होगी। परम गूढ़ रहस्यको अभक्तोंको प्रकाश करना उचित नहीं है, ऐसा गीता (१८/६७) में श्रीकृष्णने सर्वगुह्यतम भजन रहस्य अर्जुनको प्रकाशितकर कहा— “इदन्ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥” अर्थात् “इस गीताशास्त्रको तुम कभी भी असंयमित, अभक्त, सेवाविहीन और मुझसे द्वेष करनेवालेको नहीं बतलाना।”॥२३६॥ अतएव भक्तगणे करि नमस्कार। निःशङ्के कहिये, तार हउक चमत्कार ॥ २३७ ॥ अनुवाद—इसलिये भक्तोंको प्रणाम करके मैं निःसङ्कोच होकर ये सब सिद्धान्त कह रहा हूँ जिससे भक्तोंके हृदयमें चमत्कार होगा अर्थात् अत्यधिक प्रसन्नता होगी॥२३७॥ श्रीकृष्णकी गौरावतार-चिन्ता, ह्लादिनी-शक्तिका महात्म्य :- कृष्णेर विचार एक आछये अन्तरे। 'पूर्णानन्द-रसस्वरूप सबे कहे मोरे ॥ २३८ ॥ ह्लादिनी-माधुर्यसे श्रीकृष्ण-माधुर्यकी हीनता और पराजय :— आमा हैते आनन्दित हय त्रिभुवन। आमाके आनन्द दिबे—ऐछे कोन् जन॥ २३९॥ आमा हैते यार हय शत शत गुण। सेइजन आह्लादिते पारे मोर मन॥ २४०॥ आमा हैते गुणी बड़ जगते असम्भव। एकलि राधाते ताहा करि' अनुभव॥ २४१॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण अपने मनमें यह विचार करने लगे—“सभी तत्त्वज्ञ मुझे पूर्णानन्द और रसस्वरूप कहते हैं। मुझसे ही यह त्रिभुवन आनन्दित होता है, किन्तु जो मुझे आनन्द प्रदान करे ऐसा कौन है? जिसमें मुझसे सैकड़ों गुणा अधिक गुण हैं, वही केवल मेरे मनको आनन्दित कर सकता है। मुझसे अधिक गुणवान् व्यक्ति इस जगत्में होना असम्भव है, केवल राधामें ही ऐसे गुणोंको मैं अनुभव करता हूँ॥२३८-२४१॥ अमृताणुकणिका—रस-स्वरूप अथवा आनन्द-स्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होकर सभी आनन्दित होते हैं। (तैत्तिरीय २/७)— चौथा अध्याय | २३९

[ ४/२३९-२४८ “रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयति॥” अर्थात् “वे परमतत्त्व ही रसस्वरूप हैं। उस रसस्वरूपको प्राप्तकर जीव आनन्दका अनुभव करते हैं। यदि वे परमतत्त्व रसरूप-आनन्दस्वरूप नहीं होते, तो कौन जीवित रहता और प्राण-रक्षाकी चेष्टा करता? वे ही सबको आनन्द प्रदान करते हैं।”॥२३९॥ कोटिकाम जिनि' रूप यद्यपि आमार। असमोध्वंमाधुर्य-साम्य नाहि यार॥ २४२॥ मोर रूपे आप्यायित हय त्रिभुवन। राधार दर्शने मोर जुड़ाय नयन॥ २४३॥ अनुवाद-यद्यपि मेरा सौन्दर्य करोड़ों कामदेवोंसे भी अधिक है और इस अतुलनीय माधुर्यके सामान माधुर्य किसीमें नहीं हो सकता, मेरा रूप तीनों लोकोंको आनन्द प्रदान करनेवाला है, तथापि राधाके दर्शनसे मेरे नेत्रोंको आनन्द होता है॥२४२-२४३॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण मदनमोहन हैं। श्रीकृष्णका माधुर्य करोड़ों कामदेवोंके असाधारण सौन्दर्यको कुचलनेमें समर्थ है। श्रीकृष्णके रूपके समान अथवा उससे अधिक माधुर्य किसी वस्तुमें नहीं है। श्रीकृष्णके रूपके साथ अन्य किसी रूपवान्की तुलना हो ही नहीं सकती॥ २४२-२४३॥ मोर वंशी-गीत आकर्षये त्रिभुवन। राधार वचने हरे आमार श्रवण॥ २४४॥ यद्यपि आमार गन्धे जगत् सुगन्ध। मोर चित्त-घ्राण हरे राधा-अङ्ग-गन्ध॥ २४५॥ यद्यपि आमार रसे जगत् सरस। राधार अधर-रसे आमा करे वश॥ २४६॥ यद्यपि आमार स्पर्श कोटीन्दु-शीतल। राधिकार स्पर्शे आमा करे सुशीतल॥ २४७॥ अनुवाद-मेरा मधुर वंशी-गान तीनों लोकोंको आकर्षित करता है, किन्तु राधाके मधुर वचन मेरे कानोंको हर लेते हैं। यद्यपि मेरी अङ्गोंकी सुगन्धसे जगत् सुगन्धित होता है, तथापि मेरे चित्त और नासिकाको राधाके अङ्गोंकी सुगन्ध हर लेती है। यद्यपि मेरे रससे सम्पूर्ण जगत् सरस होता है, तथापि राधाके अधरोंका रस मुझे वशीभूत कर लेता है। यद्यपि मेरा स्पर्श करोड़ों चन्द्रमाओंसे भी शीतल है, तथापि राधिकाका स्पर्श मुझे सुशीतल करता है॥२४३-२४७॥ राधिकाका रूप-गुण ही श्रीकृष्णके जीवनका सर्वस्व :- एइ मत जगतेर सुखे आमि हेतु। राधिकार रूप-गुण आमार जीवातु॥ २४८॥ अनुवाद-इस प्रकार जगत्के सुखका कारण मैं ही हूँ, किन्तु राधिकाके रूप और गुण मेरे जीवनके आधार हैं॥ २४८॥ २४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत