श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 261, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें४/१६२-१६६ ] प्रीति ही इसकी प्रवर्त्तक है। कृष्णेन्द्रिय प्रीतिरूप प्रेम भास्करके उदय होनेसे ही काम दूर होता है। जैसे (भःरःसिः १/२/२५६)— “प्रापञ्चकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि वस्तुनः। मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥” अर्थात् “जो भगवत्सेवाको जीवनका चरम प्रयोजनीय तत्त्व जानकर क्रमशः भक्तिपथपर अग्रसर होते हैं, वे धीरे-धीरे रागके हेय आकार अथवा कामरूप मलराशिका परित्याग कर देते हैं।” भक्ति अथवा भगवान्में स्वाभाविक आत्मवृत्तिके द्वारा ही भगवान् सेवित होते हैं। अच्युत भगवान्की भक्तिके द्वारा सब जीवोंकी सेवा स्वतः ही हो जाती है। भागवत (४/३१/१४)— “यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥” अर्थात् “जिस प्रकार वृक्षकी जड़को भलीभाँति सींचनेसे उसका तना, शाखा, उपशाखा, पत्र-पुष्पादि सभी सञ्जीवित हो जाते हैं तथा भोजनके द्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे समस्त इन्द्रियोंकी तृप्ति हो जाती है, उसी प्रकार एकमात्र श्रीभगवान्की सेवाके द्वारा सभी जीवोंकी, सभी देवताओंकी, चराचर जो कुछ भी है, प्रत्येककी सेवा होती है। (परन्तु जो ऐसा ना करके आँखमें, कानमें, नाकमें भोजन अर्पण करे, तो बहुत स्थानोंमें भोजन अर्पण करनेके क्लेशसे और निराहार होनेसे मृत्यु हो जायेगी)।” क्योंकि प्रत्येक प्राणीके अन्तर्यामीरूपमें वे भगवान् ही अधिष्ठित हैं। भगवान्की सेवा होनेसे, उनकी सन्तुष्टि होनेसे उनके नित्यदासगण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं— “तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।” भक्तिरसामृतसिन्धु (१/४/१) में 'प्रेम'की संज्ञा इस प्रकार निर्दिष्ट हुई है— “सम्यङ् मसृणित-स्वान्तो ममत्वाश्याङ्कतः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते॥” अर्थात् “अन्तःकरण सम्यक् मसृणित होकर अतिशय ममतायुक्त भाव-गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसको 'प्रेम' कहते है।” महावदान्यावतार श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पूर्व प्रेम और कामका यह पार्थक्य लोग नहीं जानते थे, वे कामको ही प्रेम कहकर भ्रमित होते थे। महाप्रभुने ही हमें प्रेमका सन्धान दिया है। इस विषयमें श्रीलप्रबोधानन्द सरस्वतीपादने कहा है— “प्रेमा नामाद्भुतार्थः श्रवणपथगतः कस्य नाम्नां महिम्नः को वेत्ता कस्य वृन्दावनविपिन-महामाधुरीषु प्रवेशः। को वा जानाति राधां परमरसचमत्कारमाधुर्यसीमा- मेकश्चैतन्यचन्द्रः परमकरुणया सर्वमाविश्चकार॥” अर्थात् “प्रेम नामक परम पुरुषार्थ किसके श्रवणगोचर हुआ था? कौन श्रीनामकी महिमा जानता था? किसका वृन्दावनके गहन-महामाधुरी-कदम्बमें प्रवेश था? कौन परम-चमत्कार अधिरूढ़-महाभाव-माधुर्यकी पराकाष्ठा श्रीवार्षभानवीको (उपास्यवस्तु रूपमें) जानता था? एक श्रीचैतन्यचन्द्रने ही परम औदार्यलीला प्रकट करके इन सबका आविष्कार किया है।” चौथा अध्याय | २१९