श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१६२-१६६ अर्थ है। जीवको कभी भी ईश्वर नहीं कहा जा सकता। जीव विभु चैतन्य श्रीभगवान्का विभिन्नांश अणुचित् है। ईश्वर मायाधीश हैं और जीव मायाके वशीभूत होने योग्य है। 'काम' शब्दका पारिभाषिक अर्थ जाननेपर उसके भ्रमसे मुक्त होनेकी आशा हो सकती है। 'आत्मेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छा ..' का तटस्थ होकर विचार करनेसे यह समझ सकते हैं कि 'काम' वाञ्छाके अन्तर्भुक्त होनेपर भी वाञ्छामात्र ही 'काम' नहीं है। भुक्तिकामी—जो भोगके द्वारा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियकी तुष्टिकी ही कामना करते हैं, मुक्तिकामी—जो त्रितापसे मुक्त होकर 'अहं ब्रह्मास्मि', इस भावको हृदयमें धारणकर मनकी तुष्टिके लिये व्यस्त हैं, और सिद्धिकामी—जो अष्टाङ्ग-योगके द्वारा अणिमा-लघिमादि अष्टसिद्धियोंके द्वारा लोगोंके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये मनकी तुष्टिको लक्ष्य करते हैं, उन्हें ही समझना चाहिये। ये सभी अपनी इन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये कार्य करते हैं, इसलिये ये सभी कामी हैं। काम अनेक रूपोंमें आकर लोगोंकी वञ्चना करता है। कभी वह अत्यन्त निकृष्ट स्थूल भावसे देहसे देहमें आकर्षण या स्त्री-पुरुषके कामके रूपमें, कभी त्याग, परार्थ-परता, आत्मदान, मातृस्नेह, भ्रातृभाव, देश-प्रीतिके रूपमें सजकर प्रच्छन्न भावसे उपस्थित होता है। निःस्वार्थपरता या त्याग आकाश-कुसुमके जैसे निरर्थक वाक्यविशेष हैं। एक जड़ मन-बुद्धि-अहङ्कारयुक्त मानव एक मानवके जड़देहके दुःखोंसे दुःखित होकर उसके दुःखको दूर करनेमें व्यस्त है, उसे कामके अतिरिक्त क्या कह सकते हैं? एक भगवतोन्मुख जीवात्मा जब एक जीवात्माकी कृष्णसेवा-विमुखता देखकर दुःखी होकर हरिकथा-कीर्तनके द्वारा साधु-शास्त्रके उपदेशके द्वारा उसको श्रीकृष्णसेवामें उन्मुख करनेके लिये व्यग्र होता है, तब इस वृत्तिको प्रेमकी पूर्व अवस्था कहा जा सकता है। इसलिये विभुचित् परमात्माके प्रति अणुचित् आत्माका जो स्वाभाविक निरन्तर अहैतुक आकर्षण है, वही सेवा है। उस सेवाकी परिपक्व अवस्था ही प्रेम है। प्रेम अप्राकृत वस्तु है। शुद्ध चेतन और शुद्ध चेतनमें प्रेम होता है। अचेतनसे अचेतन अथवा चेतनसे अचेतनका प्रेम नहीं हो सकता, वह काम ही है। आत्मा ही केवल स्वरूपसे भगवत्-सेवा प्रवृत्तिविशिष्ट है, सेवाके अतिरिक्त निर्मल जीवात्माकी और कोई वृत्ति नहीं है, इसलिये देह और मनकी अधीनतासे मुक्त आत्मा केवल श्रीकृष्णसेवा ही चाहती है, यही उसका स्वभाव है और यह इन्द्रियोंकी तुष्टि नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णभक्त निष्काम हैं। प्रेम कहनेसे भगवत्तोषणमें जो एकाग्रता, अव्यभिचारिणी रति होती है, उसीको समझना चाहिये। तत्त्वज्ञानके अभावके कारण फल्गु या शुष्क वैरागी लोग यह मानते हैं कि जो राग नश्वर पदार्थ और उसके केवल कामरूप आकारका ही है, उसके अभावमें वह समूल ध्वंसको प्राप्त होता है। रागके कामरूप विलयसे उसका प्रेमरूप आकार जो स्वतः ही प्रकट होता है, उसे शुष्क-वैरागी लोग नहीं जानते हैं। क्योंकि उन्हें प्रेमका परिचय ज्ञात नहीं है, इसलिये वे हरिसेवोपयोगी सामग्री अथवा क्रियाको प्रापञ्चिक पदार्थकी भाँति कार्यविशेष मानते हैं और उसमें हेयज्ञान करके उसमें श्रद्धा नहीं रखते हैं। सर्वप्रकार काम, मूल कामदेव श्रीकृष्णमें नियोजित ना होने तक काम दूर नहीं होता। काम अन्धतम एक अवस्था है और आत्मेन्द्रिय २१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत