भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

४/१६२-१६६ ] करवानेके लिये ही पुत्र पिताका प्रिय होता है। इसी प्रकार धनके सुख विधान करनेके लिये धन लोगोंको प्रिय नहीं होता, किन्तु धनके द्वारा अपने इन्द्रियतर्पण करानेके लिये धन लोगोंका इतना प्रिय होता है। ब्राह्मणकी प्रीतिके लिये ब्राह्मण अन्योंके प्रिय नहीं होते, किन्तु ब्राह्मणके द्वारा अपनी कामनाएँ परिपूर्ण करानेके लिये ही ब्राह्मण लोगोंके प्रिय होते हैं। राजाके सुखविधानके लिये राजा प्रजाका प्रिय नहीं होता, किन्तु राजाके द्वारा स्वार्थसिद्धि करवा लेनेके लिये राजा प्रजाका प्रिय होता है। स्वर्गादि स्थानके सुखोत्पादनके लिये स्वर्गादि स्थान जीवोंको प्रिय नहीं होते, किन्तु स्वर्गसे इन्द्रियतृप्ति दोहन करनेके लिये स्वर्ग लोगोंका प्रिय है। देवताओंकी प्रीति उत्पादनके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय नहीं हैं, किन्तु देवताओंसे कामनासिद्धिका सुखभोग दोहन करनेके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय होते हैं। प्राणी-जगत्के सुख उत्पादनके लिये प्राणीगण लोगोंके प्रिय नहीं होते, किन्तु इन सब प्राणियोंके द्वारा इन्द्रियतर्पण करवा लेनेके लिये ही प्राणीगण लोगोंके प्रिय होते हैं। मैत्रेयी ! अधिक क्या कहूँ, दूसरोंके सुखके लिये कोई कभी भी प्रिय नहीं होता, केवल अपनी-अपनी कामनातृप्तिका दोहन करनेके लिये ही सभी लोग प्रिय होते हैं।” शास्त्रोंमें कहा गया है कि पतिकी सेवा करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म है। किन्तु पतिव्रता स्त्रीके हृदयके अन्तरतम प्रदेशमें यदि निजस्वार्थ छिपा ना हो, तो पति-सेवनिष्ठता भी सम्भव नहीं होगी। यदि स्त्रीके भीतर कहीं भी निज स्वार्थकी कोई भावना ना हो, तब पति यदि कोढ़ग्रस्त हो जाय, तो स्त्रीकी वह सेवनिष्ठा क्यों नहीं रहती ? और किसी-किसी उदाहरणमें कोढ़ग्रस्त पतिकी सेवा दिखलायी देनेपर भी वह स्वर्गादिकी कामनाके द्वारा ही परिचालित होती है। इसलिये वहाँपर भी शुद्ध निःस्वार्थ पतिव्रता धर्म परिलक्षित नहीं होता। स्वार्थपर प्यारका परिणाम अति भयावह है, मायाबद्ध जीव यह समझ नहीं पाते हैं। भागवत (११/१७/५७-५८)में कहा गया है- “अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजात्मजा। अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः ॥५७॥ एवं गृहाश्याक्षिप्तः कृपणो मूढधीरयम्। अतृप्तस्ताननुध्यायन्मृतोऽन्धं विशते तमः॥५८॥ अर्थात् “जो भगवत् बहिर्मुख जीव हैं, उनकी स्त्री-पुत्रादिमें आसक्ति इतनी प्रबल है कि उन्हें भगवत्-भजन करनेकी बात कहते ही वे तुरन्त उत्तरमें कहते हैं- मेरे वृद्ध माता-पिता, पत्नी, अनाथ सन्तानकी यदि मैं नहीं देखभाल नहीं करूँ, तो वे किस प्रकार जीवन धारण करेंगे ? इस प्रकारसे गृहासक्त वे मूर्ख लोग संसारासक्तिके फलस्वरूप मृत्युके पश्चात् अन्धतम नरकमें प्रवेश करते हैं।” आजकल अनेक लोग दरिद्रोंकी सेवा करते हुए उन्हें 'दरिद्र नारायण' की संज्ञा देते हैं। इस प्रकार वे लक्ष्मीपति नारायणको दरिद्र कहनेसे भी सङ्कोच नहीं करते- यह बड़ा हास्यास्पद विषय है। अधिकांश समाजसेवियोंका कहना है- 'प्रत्येक प्राणीके शारीरिक और मानसिक अभाव-असुविधा दूर करना ही 'प्राणीमात्रसे प्रेम' है और ये सभी प्राणी ही बहुरूपमें ईश्वर हैं। उनकी सेवा ही ईश्वरकी सेवा है।' किन्तु शास्त्रके विचारसे यह प्रेम शब्दका अति विकृत चौथा अध्याय | २१७