भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 258

[ ४/१६२-१६६

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥” (३/३७) अर्थात् “शब्दादि विषयोंका निरन्तर चिन्तन करनेसे उन-उन विषयोंमें चिन्तनकारी पुरुषकी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे काम एवं कामसे क्रोधकी उत्पत्ति होती है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न होता है और काममें बाधा आनेपर तमोगुणसे क्रोध उत्पन्न होता है। कामके समान मनुष्यका कोई और दुर्जेय वैरी नहीं है।” इसके द्वारा चालित होकर ऐसा कोई भी अन्याय-कर्म नहीं है, जो मनुष्य नहीं कर सकता। मोह अथवा भगवत्-सम्बन्धज्ञानके अभावसे ही हमारी सब प्रकारकी वासना उदित होती है। कामके द्वारा आक्रान्त होकर जीवकी संसार गति उपस्थित होती है और अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर जीव बहुत भोगके विषयोंकी कल्पना करता है। भोगके विषय सत्य ना होने पर भी वर्तमानमें हमारी अवस्थाके अनुसार अर्थात् भगवान्‌के साथ सम्बन्धज्ञानके अभावमें वे सत्य प्रतीत होते हैं। साधारणतः प्रेम कहनेसे हमारे मनमें विचार आता है कि जो हमें अच्छा या प्यारा लगता है। अधिकांशतः युवक-युवतीके प्यार अथवा आकर्षणको ही प्रेम शब्दसे सम्बोधित किया जाता है। किन्तु प्रेमका यह वास्तविक अर्थ नहीं है। प्रेम नित्य वस्तु है। इसलिये अनित्य वस्तुमें यह किस प्रकारसे सम्भव है? आज मुझे यदि कोई अच्छा लगता है, कल वही मेरा शत्रु होकर खड़ा हो सकता है। इसलिये इस स्थानपर उसकी नित्यता नहीं है और उसे काम शब्दसे ही अभिहित करना उचित है। हमारा प्यार करनेका कारण है—काम। जहाँ कामके पूर्ण होनेमें बाधा आती है, वहीं प्यार दूर हो जाता है। पति-पत्नीके प्यारको प्रेम नहीं कह सकते, क्योंकि उसका भी कारण काम है। पति-पत्नीका परस्पर स्वार्थ उस सम्बन्धमें विजड़ित है। एक व्यक्ति स्वार्थसे परिचालित होकर दूसरेको प्यार करता है। उपनिषदमें एक बड़ा सुन्दर उपदेश है। श्रुति (बृः उः दूसरा अध्याय चौथा ब्राह्मण पाँचवाँ मन्त्र)— “स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति। न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवत्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।” अर्थात् महर्षि याज्ञवल्क्य मैत्रेयीको कह रहे हैं—“हे मैत्रेयी! पतिकी कामना तृप्तिके लिये पत्नीको पति प्रिय नहीं होता। किन्तु पत्नी अपनी निज कामना सिद्धिके लिये ही पतिको प्रिय मानती है। इसी प्रकार पत्नीके सुखसाधनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये पत्नी कभी भी पतिकी प्रिया नहीं होती, किन्तु अपनी कामना सिद्धिके लिये पत्नी पतिकी प्रिया होती है। पुत्रकी कामना तृप्तिके लिये पिताके लिये पुत्र प्रिय नहीं होता, परन्तु पुत्रके द्वारा अपनी कामना परिपूर्ण

२१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत