श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१६२-१६६ ] अनुवाद-काम और प्रेम दोनोंके अलग-अलग लक्षण हैं, जैसे लोहे और स्वर्णका अपना-अपना स्वरूप है॥१६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-लोहे और स्वर्णका स्वरूप जिस प्रकार परस्पर भिन्न है, काम और प्रेम प्रायः एकजातीय होनेपर भी उनके लक्षण अलग-अलग हैं॥१६४॥ काम और प्रेमकी संज्ञा :- आत्मेन्द्रियप्रीति-वाञ्छा-तारे बलि 'काम'। कृष्णेन्द्रियप्रीति-इच्छा धरे 'प्रेम' नाम ॥१६५॥ अनुवाद-अपनी इन्द्रियोंकी प्रीतिकी इच्छाको 'काम' कहा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सुखी करनेकी इच्छाको 'प्रेम' कहा जाता है॥१६५॥ अनुभाष्य-“सर्वथा ध्वंससहितं सत्यपि ध्वंसकारणे। यद्भावबन्धनं यूनोः स प्रेमा परिकीर्त्तितः ॥” अर्थात् “ध्वंसका कारण उत्पन्न होनेपर भी दम्पत्तिका जो सुदृढ़ भाव-बन्धन किसी प्रकारसे भी ध्वंस नहीं होता है, उसे 'प्रेम' कहा जाता है।” एकान्तभावसे सर्वात्मा द्वारा आश्रयजातीय गोपियाँ श्रीकृष्णके भावबन्धनमें सुदृढ़रूपसे आबद्ध हैं। वे कामरूप आत्मसुखके त्यागका सर्वोच्च आदर्श हैं और वे श्रीकृष्णके आनन्दका विधान करनेके लिये उनकी सेवामें ही सदा तत्पर रहती हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये आत्मसुख-ध्वंसमें उनका प्रचुर आनन्द और उनके भावबन्धनकी सुदृढ़ता ही लक्षित होती है॥१६५॥ कामेर तात्पर्य-निजसम्भोग केवल। कृष्णसुखतात्पर्य मात्र प्रेम त' प्रबल ॥१६६॥ अनुवाद-'काम' का अर्थ केवल अपने इन्द्रियसुखका भोग है। किन्तु 'प्रेम' का तात्पर्य केवल श्रीकृष्णको सुखी करना है, इसलिये यह अति प्रबल है॥१६६॥ अमृतानुकणिका-प्रेम और काम, दोनोंका अर्थ है-प्रीतिकी इच्छा। तो क्या प्रेम और काम एक ही हैं? इसके उत्तरमें ही १६२ पयार संख्यामें कहा गया है-'विशुद्ध निर्मल' आदि। काम और प्रेम, दोनोंका अर्थ ही 'प्रीतिकी इच्छा' होनेपर भी भक्तके सम्बन्धमें यह प्रीतिकी इच्छा दो प्रकारकी होती है-निज-प्रीतिकी इच्छा और श्रीकृष्ण-प्रीतिकी इच्छा। रूढ़ि-अर्थसे 'निज-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे काम कहते हैं, वह सङ्कीर्ण और स्वार्थमय है, इसलिये वह निन्दनीय है। और 'श्रीकृष्ण-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे प्रेम कहते हैं, वह अत्यन्त व्यापक, अत्यन्त उदार, अत्यन्त प्रशंसनीय है, यह सहज ही समझा जा सकता है। इसलिये प्रेमसे प्रीति-इच्छाकी उज्ज्वलतम परिणति होती है और कामसे प्रीति-इच्छाकी मलिनता होती है। प्रेममें यह मलिनता नहीं है, इसलिये प्रेमको निर्मल कहा गया है। प्राकृत काम षड्रिपुओंमें अन्यतम है। रिपु अर्थात् शत्रु, विरोधी आदि। इस कामकी उत्पत्तिके विषयमें गीतामें भगवान् कहते है- “ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥ (२/६२) चौथा अध्याय | २१५