भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 256

[ ४/१५९-१६४ “श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि हैं। इन लीलाओंमें उनके सङ्गी श्रीस्वरूप दामोदर इनके साक्षी और भण्डारी हैं। उन्होंने ये लीलाएँ श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कण्ठस्थ करायी थीं। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे जो कुछ मैंने सुनी, उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह भक्तोंके निमित्त भेंट है।” (मध्य, २/९३)— “स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत, ताइ लिखि’ नाहि मोर दोष॥” “मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा, उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई दोष नहीं है॥” १५९-१६१॥ गोपीप्रेमकी संज्ञा :- गोपीगणेर प्रेमेर ‘रूढ़भाव’ नाम। विशुद्ध निर्मल प्रेम, कभु नहे काम ॥ १६२ ॥ अनुवाद—गोपियोंके प्रेमका नाम ‘रूढ़भाव’ है। यह प्रेम विशुद्ध और निर्मल है; यह कभी भी (जड़ीय) ‘काम’ नहीं है॥ १६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘प्रेमेर रूढ़भाव नाम’—प्रेमका नाम रूढ़भाव है। वास्तवमें निर्मलप्रेमकी काम शब्दके द्वारा व्याख्या नहीं होती ॥ १६२ ॥ अनुभाष्य—गोपियोंके महाभावमें सभी सात्त्विकभाव उद्दीप्त अवस्थामें हैं, इसलिये गोपियोंका प्रेम ‘रूढ़भाव’ कहलाता है। “उद्दीप्ता सात्त्विका यत्र स रूढ़ इति भण्यते।” अर्थात् “स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, उसको रूढ़ भाव कहते हैं।” केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये होनेके कारण उनका प्रेम निर्मल है, इसलिये वह श्रीकृष्ण-इतर भोगमय घृणित ‘काम’ शब्दके द्वारा वाच्य नहीं है॥ १६२॥ गोपियोंका काम और प्रेम एक ही वस्तु :- भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२८३-२८४) गौतमीय तन्त्रवाक्य— प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥ १६३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके शुद्धप्रेमको ही ‘काम’ नामसे अभिहित करनेकी प्रथा हुई है। भगवद्भक्त उद्धवादि भी इस प्रेमके पिपासु हैं॥ १६३॥ अनुभाष्य—गोपरामाणां (व्रजललनानां) प्रेमा एव काम इति प्रथां (ख्यातिम्) अगमत्; इति [हेतोः] उद्धवादयः भगवत्प्रियाः (अपर-रस-रसिकभक्ताः) अपि एतं (प्रेमाणं) वाञ्छन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १६३ ॥ काम और प्रेमके स्वरूप-लक्षण भेद :- काम, प्रेम,—दोंहाकार विभिन्न लक्षण। लौह आर हेम यैछे स्वरूपे विलक्षण ॥ १६४ ॥ २१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत