भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/१५६-१६१ ]

स्वतः एव) अनुसवाभिनवं (प्रतिक्षणम् अभिनवं) दुरापं (दुर्लभं) यशसः श्रियः ऐश्वरस्य एकान्तधाम रूपं दृग्भिः पिबन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५६॥ अपूर्व माधुरी कृष्णेर, अपूर्व तार बल। याहार श्रवणे मन हय टलमल॥१५७॥ कृष्णेर माधुर्ये कृष्णे उपजय लोभ। सम्यक् आस्वादिते नारे, मने रहे क्षोभ॥१५८॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी माधुरी अपूर्व है और उसका अपूर्व बल है। उस माधुरीका श्रवण करनेसे हृदय टलमल (अस्थिर) हो जाता है। श्रीकृष्णको भी अपने माधुर्यके आस्वादनका लोभ होता है। किन्तु [श्रीमती राधिकाके मादनाख्या महाभावके अभावमें] उसका पूर्ण रूपसे आस्वादन ना कर पानेके कारण उनके मनमें क्षोभ रह जाता है॥१५७-१५८॥ (३) तृतीय वाञ्छा :– एइ त' द्वितीय हेतुर कहिल विवरण। तृतीय हेतुर एबे शुनह लक्षण॥१५९॥ एकमात्र स्वरूपदामोदर ही भक्तिरसामृतके मूल महाजन :– अत्यन्त निगूढ़ एइ रसेर सिद्धान्त। स्वरूप गोसाञि मात्र जानेन एकान्त॥१६०॥ येबा केह अन्य जाने, सेह ताँहा हैते। चैतन्यगोसाञिर तँह अत्यन्त मर्म याते॥१६१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी दूसरी इच्छाका अभी वर्णन किया, अब तीसरी इच्छाका विवरण श्रवण करो। इस रसका सिद्धान्त अत्यन्त निगूढ़ है, जिसे केवल श्रीस्वरूप दामोदर ही जानते हैं। यदि अन्य कोई इस सिद्धान्तके विषयमें जानता है, तो वह श्रीस्वरूप दामोदरकी कृपासे ही जानता है। क्योंकि श्रीस्वरूप दामोदर श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय हैं और उनके गुप्त भावोंको जानते हैं॥१५९-१६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आश्रयजातीय प्रेमके द्वारा कृष्णमाधुरीका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करनेका लोभ होनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पानेके कारण श्रीकृष्ण क्षुब्ध हुए। राधिकाके भावग्रहण करनेका दूसरा गूढ़ कारण यह है॥१५९॥ अमृतानुकणिका—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी बहुत वर्षोंतक श्रीस्वरूप दामोदरके सङ्ग रहे और महाप्रभु-सम्बन्धी समस्त कथाएँ उनके मुखसे सुनी। ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामीने वृन्दावनमें दास गोस्वामीसे ये सब कथाएँ श्रवण की। (मध्य, २/८४)– 'श्रीचैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तँहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताहाँ किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इहाँ विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे॥

चौथा अध्याय | २१३