श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१५५-१५६ श्रीमद्भागवत (१०/२१/७)— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनुवेणुजुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ १५५॥ अनुवाद—गोपियाँ अपनी निजसखियोंके प्रति कहती हैं—“अरी सखियों ! देखो नेत्रधारी जन और उनके नेत्रोंके सौभाग्यका हम क्या वर्णन करें? अर्थात् अनिर्वचनीय होनेके कारण हम वर्णन नहीं कर सकतीं; मैं तो समझती हूँ कि अव्यय शोभावाले श्रीकृष्ण-बलदेव, गोचारणके लिये अपने ग्वाल-बाल और गायोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हों, उन्होंने अपने अधरोंपर वेणु धारण कर रखा हो तथा स्मित हास्य करते हुए प्रेमपूर्ण कटाक्षका हमपर वर्षण कर रहे हों, बस, उस समय हम उनकी मुख-माधुरीका पान करती रहें॥”१५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे सखियों ! गौओंके साथ सखाओंके द्वारा परिवेष्टित होकर कृष्ण और बलराम जब वनमें प्रवेश करते हैं, तब उनके वेणुगीतयुक्त और अनुरक्त-जनोंके प्रति कटाक्षकारी मुखमण्डलका जो लोग अपने नेत्रोंके द्वारा सेवन करते हैं, वे लोग ही धन्य हैं। नेत्रधारी व्यक्तियोंके लिये इसकी अपेक्षा उत्कृष्ट फल और दिखलायी नहीं देता॥”१५५॥ अनुभाष्य—शरत्ऋतु आनेपर श्रीकृष्णके उद्देश्यसे श्रीगोपियोंका गीत— हे सख्यः, वयस्यै (सखिभिः) पशून् अनुविवेशयतोः (वनात् वनान्तरं प्रवेशयतोः) ब्रजेशसूतयोः (रामकृष्णयोः) अनुवेणुजुष्टं (वेणुं वादयत्) अनुरक्त-कटाक्ष-मोक्षं (स्निग्धकटाक्षविसर्गं) वक्त्रं यैः निपीतं (तैरैत् जुष्टं सेवितं तत्) इदं वै अक्षण्वतां (चक्षुष्मतां) फलं, परम् (अन्यत्) न विदामः (विद्मः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५५॥ श्रीमद्भागवत (१०/४४/१४)— गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्। दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य॥ १५६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मथुरावासिनियाँ बोलीं—“आहा! गोपियोंने ऐसी कौनसी तपस्या की! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व, लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥”१५६॥ अनुभाष्य—मथुरामें कंसकी रङ्गभूमिमें उसके दो मल्लयोद्धा मुष्टिक और चाणूरके साथ मल्लयुद्धमें संलग्न श्रीबलराम-कृष्णको देखकर वहाँ एकत्रित मथुरा नारियोंकी उक्ति,— गोप्यः किं तपः अचरन्, यत् (यस्मात्) अमुष्य (श्रीकृष्णस्य) लावण्यसारं (लावण्येन सारं श्रेष्ठम्) असमोर्ध्वं (न विद्यते समं उर्ध्वम् अधिकञ्च यस्य तत्) अनन्यसिद्धं (न अन्येन अलङ्कारादिना सिद्धं किन्तु २१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत