भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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अनुभाष्य-कुरुक्षेत्रमें वृष्णियों (यादवों) के साथ गोपोंके मिलनके बाद शुकदेव गोस्वामीके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंके मनोभावका वर्णन— यत्प्रेक्षणे (यस्य श्रीकृष्णस्य दर्शने) दृशिषु (नेत्रेषु) पक्ष्मकृतं (व्यवधानकारक-नेत्रलोम-कृतं विधातारं) शपन्ति (भर्त्सयन्ति) सर्वाः गोप्यः [तं] अभीष्टं (कृष्णं) चिरात् (बहुकालानन्तरं) [कुरुक्षेत्रे] उपलभ्य दृग्भिः (नेत्रद्वारैः) हृदिकृतं (हृदये प्रवेशितं) परिरभ्य (आलिङ्ग्य) नित्ययुजां (आरूढयोगिनाम्) अपि दुरापं (दुर्लभं) तद्भावं (परमानन्दघनताम्) आपुः (प्रापुः)। श्लोक-भावानुवाद—उन गोपियोंने बहुत समयके बाद अपने अभीष्ट श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें प्राप्त करके अपने नेत्रके द्वारोंसे हृदयमें प्रवेश कराके प्रगाढ़ आलिङ्गन किया, परन्तु श्रीकृष्णके दर्शन करनेपर आँखोंपर दर्शनमें व्यवधान लानेवाली पलकोंके स्रष्टा विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। इस प्रकार उन्होंने नित्य-निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी दुर्लभ उस परमानन्दघन भावको प्राप्त किया॥ १५२॥ श्रीमद्भागवत (१०/३१/१५)— अटति यद्भवानह्नि काननं, त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते, जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ १५३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे कृष्ण ! दिनके समयमें जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको ना देखकर हमारा एक-एक त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जो विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती हैं॥” १५३॥ अनुभाष्य—रासके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके दर्शनके लिये गोपियोंका विलापगीत— यत् (यदा) अह्नि (दिवाभागे) भवान् काननं (वृन्दावनम्) अटति (गच्छति), तदा त्वाम् अपश्यतां [प्राणिनां] त्रुटिः (क्षणार्द्धमपि कालः) युगायते (युगमितकालप्रतीतिर्भवति)। ते (तव) कुटिलकुन्तलं (कुटिलाः वक्राः कुन्तलाः केशाः यस्मिन् तं) श्रीमुखम् उदीक्षताम् (उच्चैः ईक्षमाणानां) च दृशां पक्ष्मकृत् (निमेषस्रष्टा विधाता) जड़ः (मूर्खः) एव। श्लोक-भावानुवाद—जब दिनके समय आप वृन्दावनमें जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका काल भी युगके समान प्रतीत होता है। वनसे लौटनेपर घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारे परम सुन्दर मुखारविन्दका सिर उठाकर दर्शन करती तो हैं, परन्तु पलकें उसमें बड़ी बाधा देती हैं, इसलिये उन्हें बनानेवाला विधाता (ब्रह्मा) मूर्ख ही है॥ १५३॥ श्रीकृष्णरूप दर्शनमें ही नेत्रोंकी सार्थकता :— कृष्णावलोकन बिना नेत्रे फल नाहि आन। येइ जन कृष्ण देखे, सेइ भाग्यवान्॥ १५४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंका और कोई फल (प्रयोजन) नहीं है। जो व्यक्ति श्रीकृष्णके दर्शन करता है, वही भाग्यवान् है॥ १५४॥

चौथा अध्याय | २९१