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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ ४/८४-८९

यह है कि जिनके भीतरमें और बाहरमें श्रीकृष्ण हैं एवं जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ-वहाँ उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है। तथा दूसरा अर्थ है, श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और उनकी शक्ति उनके साथ एक ही तत्त्व है। श्रीकृष्णकी वाञ्छापूर्तिरूप आराधन-कार्यसे उनका नाम ‘राधिका’ कहा गया है॥८४-८७॥ भागवतमें राधानामका सङ्केत :- श्रीमद्भागवत (१०/३०/२८)— अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥८८॥ अनुवाद—इस भाग्यवती रमणीने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरिकी यथार्थ रूपमें आराधनाकर उन्हें विशेष रूपसे सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि! हमें परित्याग करके श्रीकृष्ण जिसको निभृत स्थानमें लेकर गये हैं, उसने ईश्वर श्रीहरिकी अवश्य ही अधिक आराधना की होगी। श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि होनेके कारण उनका नाम ‘राधिका’ हुआ है, यही इसका गूढ़ार्थ है॥८८॥ अनुभाष्य—रासलीलास्थलीसे श्रीराधा और श्रीगोविन्द, दोनोंके चले जानेके बाद गोपियोंकी उक्ति,— अनया (राधया) नूनं (निश्चितं) ईश्वरः (भक्ताभीष्टप्रदाता) भगवान् हरिः आराधितः (आराध्य वशीकृतः, न तु अस्माभिः व्रजवधूभिः); यत् (यस्मात्) गोविन्दः प्रीतः (प्रीतियुक्तः सन्) नः (अस्मान्) विहाय (विशेषेण त्यक्त्वा) यां (राधां) रहः (निर्जने प्रदेशे) अनयत्। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधाने निश्चित ही भक्तोंको उनके अभीष्टको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीहरिको अपनी आराधनासे वशीभूत किया है। श्रीगोविन्द हम गोपियोंके द्वारा वशीभूत नहीं हुए हैं, इसलिये वे हमारा परित्यागकर श्रीराधासे प्रीतियुक्त होकर उन्हें निर्जन स्थानमें ले गये हैं॥८८॥ (४) श्रीकृष्ण आकर्षिणी होनेसे सर्वश्रेष्ठा, समस्त भक्तों और भक्तिकी पोषिका और मूल आधार :- अतएव सर्वपूज्या, परम-देवता। सर्वपालिका, सर्व-जगतेर माता॥८९॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमती राधिका सभीकी पूज्या और परम-देवता हैं। वे सभीका पालन करनेवाली और समस्त जगत्की माता हैं॥८९॥ अमृतानुकणिका—‘सर्वपूज्या’—श्रीकृष्णकी प्रियतमा और श्रीकृष्णके प्रति सर्वापेक्षा अधिकरूपमें प्रेमवती कहनेसे श्रीराधा सभीकी पूजनीया हैं। क्योंकि जीवका कर्त्तव्य श्रीकृष्णसेवा है, उसे प्राप्त करनेके लिये श्रीकृष्णकी सेवाकी सर्वश्रेष्ठ अधिकारिणी श्रीराधाकी कृपा अति आवश्यक है, उनकी सेवा-पूजाके द्वारा ही उनकी कृपा स्फुरित होगी, इसलिये श्रीराधाको सर्वपूज्या कहा गया हैं। ‘परम-देवता’—श्रेष्ठ देवता। जो क्रीड़ाका विस्तार करे, उसे देवता कहते हैं। श्रीकृष्णकी क्रीड़ा-विस्तारकी सर्वश्रेष्ठा सहायकारिणी होनेके कारण श्रीराधाको परम-देवता कहा है।

१९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/८९-९१ ] 'सर्वपालिका'- श्रीकृष्ण समस्त जगत्के पालनकर्त्ता हैं और उनसे अभिन्न कृष्णमयी श्रीराधा भी सभीकी पालनकर्त्री हैं। पद्मपुराण-पातालखण्डमें लिखा है- “बहिरङ्गैःप्रपञ्चस्य स्वांशैर्मायादिशक्तिभिः। अन्तरङ्गैरस्तथा नित्यं विभुतौस्तैश्चिदादिभिः। गोपनादुच्यते गोपी राधिका कृष्णवल्लभा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णवल्लभा श्रीराधिका अपनी बहिरङ्ग अंशरूपा मायादिशक्तिके द्वारा और अन्तरङ्ग विभूतिरूपा चिदादिशक्तिके द्वारा भी प्रपञ्चको गोपन (रक्षा) करती हैं, इसलिये उन्हें गोपी (रक्षाकर्त्री, पालनकर्त्री) कहा गया है। 'सर्व-जगतेर माता'-नारद पञ्चरात्रमें कहा है- “श्रीकृष्णो जगतां तातो जगन्माता च राधिका। पितुः शतगुणा माता वन्द्या पूज्या गरीयसी॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण जगत्के पिता हैं और श्रीराधा जगत्की माता हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौ गुणा अधिक वन्दनीया, पूजनीया और श्रेष्ठा हैं॥८९॥ (५) सभी श्रीकृष्णकान्ताओंकी अंशिनी :- 'सर्वलक्ष्मी'-शब्द पूर्वे करियाछि व्याख्यान। सर्वलक्ष्मीगणेर तिँहो हन अधिष्ठान॥९०॥ श्रीकृष्णकी सभी ऐश्वरी शक्तिकी मूल आश्रयस्वरूपा :- किम्वा, 'सर्वलक्ष्मी'-कृष्णेर षड्विध ऐश्वर्य। ताँर अधिष्ठात्री शक्ति-सर्वशक्तिवर्य॥९१॥ अनुवाद- 'सर्वलक्ष्मी' अर्थात् सभी लक्ष्मियाँ उनकी अंशरूपा हैं, इस शब्दकी व्याख्या मैं पहले कर चुका हूँ, श्रीमती राधिका ही सब लक्ष्मियोंकी अधिष्ठान अर्थात् मूल हैं। अथवा 'सर्वलक्ष्मी' कहनेका तात्पर्य है कि वे श्रीकृष्णके षड्-ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णकी सर्वोच्च शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका सब लक्ष्मियोंकी आश्रयस्वरूपा हैं; अथवा 'सर्वलक्ष्मी' शब्दका अर्थ श्रीकृष्णका षड्विध ऐश्वर्य है; वे ही श्रीकृष्णकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृताणुकणिका-'सर्वशक्तिवर्य'–पद्मपुराण पातलखण्डमें श्रीनारद श्रीराधासे बोले- “तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा। परमानन्दसन्दोहं दधती वैष्णवं परम्॥ कल्याश्चर्यविभवे ब्रह्मरुद्रादिदुर्गमे। योगीन्द्रानां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित्॥ इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिस्तवेशितुः। तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्त्तते ॥ मायाविभूतयोऽचिन्त्यास्तन्मायार्भकमायिनः। परेशस्य महाविष्णोस्ताः सर्वास्ते कलाः कलाः॥” अर्थात् “विशुद्धसत्त्वसमूहमें आप ही तत्त्व अर्थात् ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्-रूप विशुद्ध सत्त्वकी चौथा अध्याय | १९१

[ ४/९०-९७ मूल अथवा स्वरूपशक्तिकी अधिष्ठात्री, आप ही प्रधान शक्तिरूपा, परा-विद्यात्मिका हैं। आपने ही विष्णुसम्बन्धी परम आनन्दराशिको धारण किया है। हे ब्रह्मा-रुद्रादिदेवगण-दुर्गमे ! आपके वैभवका प्रत्येक अंश आश्चर्यजनक है। आप कभी भी योगिन्द्रगणोंके ध्यानपथको स्पर्श नहीं करतीं। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति आपकी ही अंशमात्र हैं। आप ही समस्त शक्तियोंकी ईश्वरी हैं। योगमायाके प्रभावसे जो यशोदाके बालकके रूपमें लीला करते हैं, वे ही भगवान् महाविष्णु (स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण)की जितनी माया-विभूतियाँ हैं, वे सभी आपकी अंशस्वरूपा हैं॥९०-९१॥ (६) समस्त शोभाकी मूल आश्रयस्वरूपा :- सर्व-सौन्दर्य-कान्ति वैसये याँहाते। सर्वलक्ष्मीगणेर शोभा हय याँहा हैते ॥९२॥ श्रीकृष्णेच्छापूर्तिमयी :- किम्वा, 'कान्ति'-शब्दे कृष्णेर सब इच्छा कहे। कृष्णेर सकल वाञ्छा राधातेइ रहे ॥९३॥ राधिका करेन कृष्णेर वाञ्छित पूरण। 'सर्वकान्ति'-शब्देर एइ अर्थ विवरण ॥९४॥ (७) भुवनमोहन-मनोमोहिनी :- जगतमोहन कृष्ण, ताँहार मोहिनी। अतएव समस्तेर परा ठकुराणी ॥९५॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकामें समस्त सौन्दर्य और कान्ति वास करते हैं और सभी लक्ष्मियोंकी शोभा भी उनसे सिद्ध होती है। अथवा [कम्-धातुसे कान्ति-शब्द निष्पन्न हुआ है, कम्-धातुका अर्थ कामना अथवा वासना है, इसलिये] 'कान्ति' शब्दका अर्थ 'श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाएँ' भी होता है और श्रीकृष्णकी सभी अभिलाषाएँ श्रीमती राधिकामें ही रहती हैं। श्रीमती राधिका श्रीकृष्णकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करती हैं—इसलिये उन्हें 'सर्वकान्ति' कहा गया है। श्रीकृष्ण जगतमोहन हैं, परन्तु उनको भी मोहित करनेवाली श्रीमती राधिका हैं। इसलिये श्रीमती राधिका सबकी परम ठकुराणी (स्वामिनी) हैं॥९२-९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अतएव समस्तेर परा ठकुराणी', यहाँ तक 'देवी कृष्णमयी' श्लोकके प्रत्येक पदके अर्थपर विचार हुआ है॥९५॥ पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णकी पूर्णिमास्वरूपिणी :- राधा-पूर्णशक्ति, कृष्ण-पूर्णशक्तिमान्। दुई वस्तु भेद नाहि, शास्त्र-परमाण ॥ ९६॥ श्रीराधा-कृष्णका परस्पर अविच्छेद्य सम्बन्ध :- मृगमद, तार गन्ध-यैछे अविच्छेद। अग्नि, ज्वालाते-यैछे कभु नाहि भेद ॥ ९७॥ १९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/९६-१०५ ] एकस्वरूप होनेपर भी आस्वादक और आस्वादितरूपमें दो देह :— राधाकृष्ण ऐछे सदा एकइ स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥९८॥ अनुवाद—श्रीमती राधिका पूर्णशक्ति हैं और श्रीकृष्ण पूर्ण शक्तिमान् हैं। शास्त्रोंके प्रमाणके अनुसार दोनों वस्तुओं—शक्ति और शक्तिमान्में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार कस्तूरी और उसकी गन्ध अभिन्न हैं अथवा अग्नि और उसकी दाहिका शक्तिमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण सदा एक ही स्वरूप हैं, किन्तु लीलारसके आस्वादनके लिये दो रूप धारण करते हैं॥९६-९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कस्तूरी और उसकी गन्ध पृथक् दो वस्तुएँ होनेपर भी वे जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं अर्थात् जिन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता, अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति पृथक् वस्तुएँ होनेपर भी जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण लीलारसास्वादनमें नित्य पृथक् होकर भी एक ही स्वरूप हैं॥९७॥ श्रीराधाके कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णका गौरावतार :— प्रेमभक्ति शिखाइते आपने अवतरि। राधा-भाव-कान्ति दुइ अङ्गीकार करि'॥९९॥ श्रीकृष्णचैतन्यरूपे कैल अवतार। एइ त' पञ्चम श्लोकेर अर्थ परचार॥१००॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने जगत्को प्रेमभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णचैतन्यरूपसे अवतार ग्रहण किया। यह पाँचवें श्लोकका अर्थ है॥९९-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिकाके भाव और कान्ति अर्थात् वर्ण और सौन्दर्यको स्वयं ग्रहण करके॥९९॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमें छठे श्लोककी व्याख्या आरम्भ :— षष्ठ श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश। प्रथमे कहिये सेइ श्लोकेर आभास॥१०१॥ पूर्वाभास; नामसङ्कीर्तन-प्रवर्तन गौरावातारका बाह्य कारण :— अवतरि' प्रभु प्रचारिल सङ्कीर्त्तन। एहो बाह्य हेतु, पूर्वे करियाछि सूचन॥१०२॥ मुख्य और गूढ़ कारण—वह स्वयं श्रीकृष्णका निजकार्य और एकमात्र श्रीस्वरूपदामोदरको विज्ञात :— अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥१०३॥ अति गूढ़ हेतु सेइ त्रिविध प्रकार। दामोदरस्वरूप हैते याहार प्रचार॥१०४॥ स्वरूप-गोसाञि—प्रभुर अति अन्तरङ्ग। ताहाते जानेन प्रभुर एसब प्रसङ्ग॥१०५॥ चौथा अध्याय १९३

[ ४/१०१-१०५ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थको प्रकाश करनेके लिये पहले उसकी भूमिकाका वर्णन कर रहा हूँ। महाप्रभुने अवतरित होकर सङ्कीर्तन धर्मका प्रचार किया, यह बाह्य कारण है जिसे मैंने पहले भी कहा है। इस अवतार लेनेका एक अन्य मुख्य कारण है, जो रसिकशेखर श्रीकृष्णका अपना निजी कार्य है। श्रीगौरसुन्दरके अवतारका अति गूढ़ कारण तीन प्रकारका है, जिसे जगत्में श्रीस्वरूप दामोदरने ही प्रकाशित किया है। श्रीस्वरूप गोसाईं महाप्रभुके अत्यन्त अन्तरङ्ग पार्षद हैं, इसलिये वे महाप्रभुके ये सब रहस्य भली-भाँति जानते हैं॥१०१-१०५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गौर-अवतारका मुख्य कारण अत्यन्त गूढ़ है और वह कारण तीन प्रकारका है। यह बादमें 'श्रीराधायाः प्रणय महिमा' श्लोकमें कहा गया है॥१०४॥ अनुभाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरका पूर्व नाम श्रीपुरुषोत्तम भट्टाचार्य था और वे नवद्वीपमें वास करते थे। महाप्रभुके संन्यास लेनेसे पूर्व ही वे स्वयं संन्यास ग्रहण करनेकी अभिलाषासे वाराणसीमें जाकर दशनामी दण्डियोंके दलमें ब्रह्मचारी हुए। इस कारण उनका नाम 'श्रीदामोदरस्वरूप' हुआ। बादमें संन्यासकी प्रक्रियाकी पूर्णताकी अपेक्षा ना करके श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रयकर आजीवन नीलाचल (जगन्नाथपुरी) में वास किया। वे सब समय श्रीगौरसुन्दरके साथ रहते थे और उनके द्वारा उपदेश किये गये भजनादिका गान करके उनको हर पल प्रसन्नता प्रदान करते थे। श्रीमन्महाप्रभुके हृदयके गूढ़भावोंको उनकी कृपासे ही भक्तोंको जाननेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। व्रजलीलामें ये महात्मा ललितादेवी हैं, जो श्रीमती राधिकाका दूसरा स्वरूप हैं। कविकर्णपूर रचित 'गौरगणोद्देशदीपिका' के अनुसार ये विशाखादेवी हैं- “कलामर्शिक्षयद् राधां या विशाखा व्रजे पुरा। साद्य स्वरूपगोस्वामी तत्तद्भावविलासवान्॥” अर्थात् “पहले व्रजमें जो विशाखा नामक सखी श्रीराधिकाको कला सिखाती थीं, वे ही अब श्रीगौरलीलामें राधाभावमूर्ति श्रीगौरहरिके भावोंमें विलास करनेवाले (उनके द्वितीय स्वरूप) श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी हैं।"॥१०५॥ अमृताणुकणिका-वैष्णव साहित्यमें 'अन्तरङ्ग'-शब्दका विशेष प्रचलन है। अन्तरङ्ग-शब्दका विपरीतार्थक शब्द 'बहिरङ्ग' है। अन्तः+अङ्ग=अन्तरङ्ग अर्थात् निजजन, परमात्मीय। बहिः+रङ्ग=बहिरङ्ग अर्थात् अनात्मीय या बाहरी व्यक्ति। वैष्णवकोषमें 'अन्तरङ्ग' शब्दका तात्पर्य है-स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति-विशिष्ट, सजातीयाशयस्निग्ध; और उसके विपरीत चित्तवृत्तियुक्त व्यक्ति बहिरङ्ग है। वैष्णव-साहित्यमें विषय और आश्रयके सम्बन्धको लेकर ही 'अन्तरङ्ग' और 'बहिरङ्ग'-शब्दका इस प्रकार प्रयोग होता है। विषयके साथ एकान्त समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर विषयके मनोभीष्ट-परिपूर्णके लिये सर्वक्षण सर्वेन्द्रियोंको नियुक्त करके जीवन-धारण ही 'अन्तरङ्ग'का एकमात्र स्वभाव है। विषयके सुखतात्पर्यताके अतिरिक्त पृथक् भावसे उनकी किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं है। कनक, कामिनी और प्रतिष्ठा-ये सभी 'विषय'-सेवाके उपकरण हैं, यह भावना जिन 'आश्रय'की स्वाभाविक वृत्तिरूपमें अनुक्षण प्रकाशित होती है, वे ही अन्तरङ्ग कहलानेके योग्य हैं। यह अन्तरङ्गता किसी कृत्रिम उपायसे अर्जित नहीं की जा सकती; यह नित्यसिद्ध स्वरूप-वृत्ति है। १९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

स्वरूप दामोदरको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहा है, क्योंकि वे महाप्रभुके साथ समचित्तवृत्ति-विशिष्ट हैं। अप्राकृत विप्रलम्भ-विग्रह महाप्रभुकी चित्तवृत्तिके साथ सम्भोग-चित्तवृत्तिविशिष्ट व्यक्तिका मिलन नहीं हो सकता। जो सर्वतोभावेन सर्वाङ्गसे सर्वक्षण महाप्रभुके उस विप्रलम्भरसकी पुष्टि करते हैं, वे ही उनके अन्तरङ्ग हैं। उसमें किसी बाह्य विचारका अवकाश नहीं है। स्त्री या पुरुष, गृहस्थ या संन्यासी, ब्राह्मण या शूद्र-इन सब बाह्य पोशाकका किसी प्रकारका विचार अन्तरङ्गके विचारमें नहीं है। श्रीस्वरूप दामोदर बाह्य-दर्शनसे त्यागी वेश धारण करके रहते थे और उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंके मध्य होती है; और श्रीराय रामानन्द विषयी गृहस्थ या ब्राह्मणेतर (कायस्थ) कुलमें आविर्भूत होनेकी लीला प्रदर्शन करके भी महाप्रभुके नित्यसिद्ध अन्तरङ्ग भक्त हैं। माधवी माताकी बाह्य दर्शनसे स्त्री होनेपर भी उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंमें होती है। और अन्यत्र श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने कहा है (अन्त्य ६/६, ८-११)- “रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान। विरह-वेदनाय प्रभुर राखये पराण ॥६॥ ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना। कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥८॥ सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय। गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय ॥९॥ पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान। तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण ॥१०॥ दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय। प्रभुर ‘अन्तरङ्ग’ बलि’ याँरे लोके गाय ॥ ११ ॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण विरह-वेदनासे पीड़ित महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा श्रीराय रामानन्दकी श्रीकृष्णकथा और श्रीस्वरूप दामोदरके गानके द्वारा ही होती थी। उनके सुखके लिये ही ये दोनों जन सदा उनके साथ रहते थे और श्रीकृष्णरस, श्लोक और गीतोंके द्वारा उन्हें सान्त्वना प्रदान करते थे। श्रीकृष्णलीलामें जैसे सुबल श्रीकृष्णके सुखके सहायक थे, वैसे ही श्रीगौरको सुख प्रदान करनेके लिये श्रीराय रामानन्द हैं। पूर्वकालमें जैसे ललिताजी श्रीराधाकी परम सहायिका थीं, वैसे ही श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा करते हैं। इन दोनोंके सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, इन दोनोंको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहकर लोग इनकी महिमाका गान करते हैं।” उपरोक्त पदसमूहसे स्पष्ट होता है कि विषयकी सुखानुसन्धान-परता और समचित्तवृत्तिविशिष्टता ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। जहाँ विषयके साथ आन्तरिक समचित्तवृत्ति नहीं है, अपितु विषयके सुखानुसन्धान-चेष्टाका छल या अभिनय है, वह अन्तरङ्गताका लक्षण नहीं है। सजातीयाशयस्निग्धता और स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। कोई-कोई मानते हैं-जो गुरु-वैष्णवकी इच्छानुरूप बाह्यतत्परता प्रदर्शन करते हैं, किंवा उनकी दैहिक परिचर्या करते हैं, या अनुक्षण उनके साथ रहते हैं, वे ही अन्तरङ्ग हैं।

चौथा अध्याय | १९५

[ ४/१०५-१०६ समचित्तवृत्तिविशिष्ट ना होनेसे आचार्यकी इच्छानुरूप चेष्टाका बाह्य अभिनय करनेपर भी उनकी अन्तरङ्गकी श्रेणीमें गणना नहीं हो सकती। भुवन-पूजिता दुर्गा सृष्टि-स्थिति-प्रलयके लिये श्रीकृष्णकी इच्छानुरूप निरन्तर चेष्टा करनेपर भी 'बहिरङ्गा' शक्ति या छायाशक्ति कहलाती हैं। दुर्गादेवी कितनी कर्मतत्परता और विक्रम प्रदर्शित करके भगवान्के बाह्य वपुस्वरूप इस जगत्की सेवामें नियुक्त हैं; सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि कार्यके द्वारा कितने कोटि ब्रह्माण्डोंके अन्तर्गत जीवोंकी चमत्कारिता विधान करती हैं, कितनी अघटन-घटन-पटीयसी शक्ति प्रकाश करती हैं, किन्तु वे सात्वतजनोंके द्वारा बहिरङ्गा या आवरिका शक्ति ही कही जाती हैं। जो शरीरका अधिक आदर करते हैं—वे इस बहिरङ्गा शक्तिको ही 'अन्तरङ्गा शक्ति' कहकर प्रचार करते हैं और स्वयंको उनका 'अन्तरङ्ग भक्त' कहनेमें झिझकते नहीं हैं। किन्तु श्रीगोविन्द-सेवात्पर ब्रह्माजीकी वाणीमें यह सुनते हैं (ब्रह्मसंहिता ४४)— “सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा। इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥” अर्थात् “स्वरूपशक्ति या चित्-शक्तिकी छायारूपा प्रापञ्चिक जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकारिणी मायाशक्ति ही भुवन पूजिता 'दुर्गा' जी हैं। वे जिनकी इच्छाके अनुसार सारी चेष्टाएँ करती हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ।” अतः इच्छानुरूप चेष्टाका अभिनयमात्र ही अन्तरङ्ग सेवा नहीं है, और विराट् कर्मतत्परता या जाड्य किसी सेवाका लक्षण नहीं है। समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर हरि-गुरु-वैष्णवका मनोऽभीष्ट आचार और प्रचार ही अन्तरङ्ग भक्तका स्वभाव है॥१०५॥ श्रीराधाके महाभावमें मग्न श्रीगौरसुन्दर :- राधिकार भावमूर्त्ति प्रभुर अन्तर। सेइभावे सुख-दुःख उठे निरन्तर ॥ १०६ ॥ अनुवाद—श्रीमन्महाप्रभुका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंकी मूर्ति है। उन्हीं भावोंके अनुरूप उनके हृदयमें निरन्तर सुख-दुःख प्रकट होते थे॥१०६॥ अनुभाष्य—श्रीगौरसुन्दरका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंका मूर्त्तरूप है। 'भावमूर्ति'—शब्दसे स्थूलबुद्धि जड़ेन्द्रिय भोगोंमें रत लोग भावमय मूर्तिके स्वरूपकी उपलब्धि करनेमें असमर्थ हैं। अनर्थमुक्त जातरति भक्त आश्रिततत्त्व-विचारसे शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर, इन पाँच प्रकारके दिखायी देते हैं। श्रीमती राधिकाके भाव मधुररसकी परमोन्नत और सम्पूर्ण अवस्था हैं। वे भाव 'रूढ़' और 'अधिरूढ़' भेदसे दो प्रकारके हैं। भागवतमें महिषीगीत और गोपीगीतमें 'रूढ़' और 'अधिरूढ़', इन दो भावोंकी अभिव्यक्ति हुई है। श्रीगौरसुन्दरमें अधिरूढ़ महाभावका ही प्रकाश देखा जाता है। विधिके दूर होनेसे, लोभके विचारसे द्वारकाका अधिरूढ़ भाव गोकुलके भावमें पर्यवसित हुआ है। श्रीगौरसुन्दरके हृदयमें श्रीकृष्णविरहरूप विप्रलम्भ-दुःखाभास और श्रीकृष्ण-प्राप्तिरूप सम्भोगसुख प्रतिक्षण उदित होकर भावनाओंके पथका अतिक्रमणकर मधुररसका आस्वादन होता था। १९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

जो लोग भाव (चिन्मय भाव) और अभाव (जड़ीय भाव) का भेद नहीं समझते हैं, वे 'अधिरूढ़' महाभावको भी जड़ीय भावके समान मान बैठते हैं। इस कारण उन लोगोंको अपने स्वरूप अर्थात् जीव आश्रित-तत्त्व है, इस बातकी उपलब्धि नहीं होती है। स्वरूपका उदय ना होनेके कारण दुर्गतिको प्राप्त जीव श्रीगौरसुन्दरको व्रजनागरी श्रीमती राधिकाके भावोंमें उन्मत्त ना जानकर अपने जड़ीय भोगके विषय-ज्ञानसे उन्हें 'नागर' कह कर रसाभासके दोषी होते हैं॥१०६॥ शेषलीलाय प्रभुर कृष्णविरह-उन्माद। भ्रममय चेष्टा, आर प्रलापमय वाद॥१०७॥ अनुवाद—शेषलीलामें गम्भीरामें अवस्थान कालमें महाप्रभु सब समय श्रीकृष्णविरहमें उन्माद दशामें रहते थे। [प्राकृत विद्वानोंको] उनकी चेष्टाएँ भ्रममय और उनके वचन प्रलाप जैसे लगते थे॥१०७॥ अनुभाष्य—श्रीगौरहरिने सिद्ध भक्तकी चेष्टाके द्वारा विप्रलम्भ रसके चरमोत्कर्षका प्रदर्शन किया है। परन्तु प्राकृत विद्वान उनकी उस साक्षात् अनुभूतिको प्रलाप वाक्य और भ्रममय चेष्टाएँ ही मानते थे। सदा इन्द्रिय भोगोंमें लिप्त, भौतिक त्रितापमें जलते हुए मूढ़ व्यक्तियोंका सेव्य-वस्तु चिन्मयी मूर्तिमें आकर्षण नहीं होता। वे जैसे प्रत्यक्ष जगत्को अपने भोगका केन्द्र मानते हैं, वैसे ही वे श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको भी जड़भोगके समान ही समझते हैं। विकृत 'नदिया-नागरी'-वाद नामक असत् मतका आनुगत्यकर इन्द्रियभोगकी चेष्टा श्रीगौरसुन्दर और उनके अनुगत भक्तोंके द्वारा प्रदर्शित पथ नहीं है। ये मतवादी लोग जड़भोगवादी हैं, इसलिये विष्णुविद्वेषी हैं॥१०७॥ राधिकार भाव यैछे उद्धवदर्शने। सेइ भावे मत्त प्रभु रहे रात्रिदिने॥१०८॥ अनुवाद—उद्धवजीको देखकर माथुर विरहणी श्रीमती राधिका जैसे दिव्योन्मादकी दशाको प्राप्त हुई थीं, महाप्रभु भी रात-दिन उसी भावमें मत्त रहते थे॥१०८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णने अपना कुशल-संवाद देनेके लिये मथुरासे उद्धवजीको गोपियोंके पास भेजा था। उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने कई विचित्र भावोंको प्रकाश किया था॥१०८॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने गोपियों और पिता-माताकी उत्कण्ठाको कुछ कम करनेकी इच्छासे अपने सुहृद् उद्धवको गोकुलमें भेजा था। श्रीकृष्ण-सुहृद उद्धवजीको देखकर श्रीमती राधिकाने अपने सुतीव्र सर्वोच्च उत्कण्ठामय प्रचुर भावमय गूढ़ रोषको विविध शब्दोंमें प्रकाशित किया था, उन्हीं माथुर-विरहकातर भावोंमें श्रीगौरसुन्दर श्रीराधात्मयता लाभकर सर्वदा मत्त रहते थे—यही 'चित्रजल्प' भाव है। उज्ज्वलनीलमणीमें चित्रजल्पकी परिभाषा— “प्रेष्ठस्य सुहृदालोके गूढ़रोषाभिजृम्भितः। भूरिभावमयो जल्पो यस्तीव्रोत्कण्ठितान्तिमः॥” अर्थात् “प्रियजनके सुहृदके साथ भेंट होनेपर अवहित्था अवलम्बनसे गूढ़ रोषके कारण

चौथा अध्याय | १९७

[ ४/१०८-११३ सुप्रकाशित—गर्व, असूया, दैन्य, चापल्य, औत्सुक्यादि भावोंमें प्रचुर और अन्तमें तीव्र उत्कण्ठा-विशिष्ट आलापको चित्रजल्प कहते हैं।” श्रीगौरपादाश्रित भक्तोंके लिये यह सुदीर्घ विप्रलम्भ ही श्रीकृष्णभजन है। सुदीर्घ विप्रलम्भ ही सम्भोगका कारण है, इस बातको बहुत लोग नहीं समझते हैं। सम्भोगका स्वरूपज्ञान ना होनेके कारण वे नहीं जानते कि साधकावस्था और सिद्धावस्था, दोनोंमें ही विप्रलम्भ-रसोद्दीपन आवश्यक है॥१०८॥ महाप्रभुके हृदयभाव-प्रकाश और स्वरूपदामोदरका उन्हें सुख प्रदान :- रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर कण्ठ धरि'। आवेशे आपन भाव कहये उघाड़ि'॥१०९॥ यबे येइ भाव उठे प्रभुर अन्तर। सेइ गीत-श्लोके सुख देन दामोदर ॥११०॥ अनुवाद-महाप्रभु रात भर श्रीस्वरूप दामोदरके गलेमें हाथ डालकर प्रलाप करते हुए अपने भावोंको खोलकर कहते। जब जिस प्रकारका भाव महाप्रभुके हृदयमें उठता था, तब श्रीस्वरूप दामोदर उसी भावके अनुरूप गीत अथवा श्लोक सुनाकर उन्हें सुख प्रदान करते॥१०९-११०॥ एबे कार्य नाहि, किछु एसब विचारे। आगे इहा विवरिब करिया विस्तारे॥१११॥ अनुवाद-अभी यह सब विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है, बादमें इसे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥१११॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे इहा' अर्थात् अन्त्यलीलामें॥१११॥ व्रजमें तीन प्रकारके वयस (अवस्था) धर्म :- पूर्वे व्रजे कृष्णेर त्रिविध वयोधर्म। कौमार, पौगण्ड, आर कैशोर अतिमर्म ॥ ११२॥ अनुवाद-पूर्वकालमें व्रजमें श्रीकृष्णकी कौमार, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाभेदसे तीन प्रकारकी लीलाएँ दिखायी देती हैं। इनमें कैशोर अवस्था अतिश्रेष्ठ और विशेषरूपसे सार्थक है॥११२॥ श्रीकृष्णकी अवस्था-भेदसे लीला-भेद :- वात्सल्य-आवेशे कैल कौमार सफल। पौगण्ड सफल कैल लञा सखाबल॥११३॥ अनुवाद-वात्सल्य रसका आस्वादनकर श्रीकृष्णने कौमार अवस्थाको सफल किया और सखाओंके साथ क्रीड़ा (खेलकूद) में पौगण्ड अवस्थाको सफल किया॥११३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पाँच वर्षकी आयु तक 'कौमार'; दस वर्षकी आयु तक 'पौगण्ड'; ग्यारहसे सोलह वर्षकी आयु तक 'कैशोर' और उसके बाद 'यौवन' काल होता है। श्रीकृष्णने कौमार अवस्थामें वात्सल्य, पौगण्ड अवस्थामें सख्य और कैशोर अवस्थामें शृङ्गार-रसका आस्वादन किया॥११२-११३॥ १९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/११४-११५ ] किशोरलीलामें सभीकी सार्थकता-सम्पादन :- राधिकादि लञा कैल रासादि-विलास। वाञ्छा भरि' आस्वादिल रसेर निर्यास॥ ११४॥ अनुवाद—राधिका आदि सखिओंके साथ रास-विलास करते हुए श्रीकृष्णने अपनी इच्छानुसार पूर्णरूपसे रसके निर्यासका आस्वादन किया॥ ११४॥ कैशोर-वयसे काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥ ११५॥* अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'काम' अर्थात् साक्षात् मन्मथ (कामदेव) स्वरूप स्वेच्छामय श्रीकृष्णने कैशोर अवस्थामें रासादि लीला करके सम्पूर्ण जगत्को और बाल्य, पौगण्ड तथा कैशोर—इन तीन अवस्थाओंको सफल किया॥ ११५॥ *अन्यान्य संस्करणोंमें ऐसा भी मिलता है— “कैशोर वयस, काम, जगत्सकल। रासादि-लीलाय तिन करिल सफल॥” अमृताणुकणिका—'कैशोर-वयसे'—कैशोर अवस्था आनेपर युवतीको अपने प्रति अनुरागवान, रूप-गुण-सम्पन्न किसी विदग्ध युवकके सङ्गकी इच्छा होती है और युवकको भी ऐसी रूप-गुण-सम्पन्ना युवतीके सङ्गकी अभिलाषा होती है। यही कैशोर अवस्थाका कार्य है। मिलन सुखकी असमोर्ध्व वैचित्री और उसके पूर्णतम आस्वादनके निमित्त नायक-नायिकामें नायकोचित और नायिकोचित रूप-गुणादिकी भी पूर्णतम अभिव्यक्ति आवश्यक है। किन्तु प्राकृत नायक-नायिकामें यह असम्भव है, क्योंकि प्राकृत नायक-नायिकाके रूप-गुणादि क्षुद्र, असम्पूर्ण और अचिरस्थायी हैं; उनकी देहमें कैशोर अवस्था भी अस्थायी है; उनका परस्परके प्रति जो अनुराग है, यह भी स्वसुख-वासनामूलक और मोहजनित है, स्वाभाविक नहीं। उनके मिलनमें कैशोर अवस्था सफलता लाभ नहीं करती, क्योंकि उसमें अविच्छिन्न सुख नहीं है ('नाल्पे सुखमस्ति'—अल्पमें सुख नहीं है)। इसलिये प्राकृत नायक-नायिकाके मिलनमें कैशोर अवस्थाकी सफलता असम्भव है। अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहोंके और उनकी प्रेयसिगणोंके रूप-गुणादि नित्य हैं, उनके विग्रहोंमें किशोर अवस्था भी नित्य अवस्थान करती है। उनके रूप-गुणादि भी अन्योंके रूप-गुणादिकी अपेक्षा सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। भगवत्-प्रेयसियाँ श्रीभगवान्‌की स्वरूपशक्ति ह्लादिनीकी अभिव्यक्ति हैं, इसलिये उनका परस्परके प्रति अनुराग भी स्वाभाविक है। इसलिये अप्राकृत भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहों और भगवत्-प्रेयसियोंके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी सफलता सम्भव है। किन्तु जिस स्वरूपमें रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है, उसी स्वरूपके आश्रयमें ही कैशोर अवस्थाकी पूर्णतम सफलता है। अनन्त भगवत्-स्वरूपोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमें ही रूप-गुणादिकी असमोर्ध्व अभिव्यक्ति है; उनके रूप-गुणसे नारायणादि अन्यान्य भगवत्-स्वरूप तो आकृष्ट होते ही हैं, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने रूपसे आकृष्ट हो चौथा अध्याय | १९९

[ ४/११५-११६ जाते हैं। श्रीकृष्णके रूपकी कथा सुनकर नारायणकी वक्षस्थल-विलासिनी लक्ष्मीजीका चित्त भी चञ्चल हो जाता है। समस्त भगवद्धाममें भगवत्-स्वरूपसमूहकी जो समस्त प्रेयसियाँ हैं, उनके मध्य रूप-गुण-वैदग्धी आदि सब विषयोंमें ब्रजगोपियाँ ही श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णमें उनका अनुराग इतना अधिक है कि वे अपने सुख-दुःखका विचार नहीं करके केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये ही सभी चेष्टाएँ करती हैं और श्रीकृष्णके लिये ही वे सभी कुछ परित्याग भी करती हैं। इसलिये गोपियोंमें नायिकोचित गुणसमूहोंका पूर्णतम विकास है और उसका चरम सीमा श्रीमती राधिकामें है। श्रीकृष्णका भी गोपियोंके प्रति इतना अनुराग है कि वे स्वयंको उनके प्रेमका ऋणी मानते हैं और श्रीकृष्णमें भी नायकोचित गुणोंका पूर्णतम विकास है। नायक-नायिकाका अवलम्बन करके ही कैशोरवयसोचित रसकी स्फूर्ति होती है। इसलिये नायकश्रेष्ठ व्रजेन्द्रनन्दनके साथ नायिकाश्रेष्ठा श्रीराधाके मिलनमें कैशोरवयसोचित रसका पूर्णतम विकास सम्भव है। इसलिये समस्त भगवत्-स्वरूपों और उनकी प्रेयसिगणोंकी लीलाओंमेंसे व्रजाङ्गनाओंके साथ श्रीकृष्णकी रासलीला सर्वश्रेष्ठ है। इसे स्वयं श्रीकृष्णने अपने मुखसे व्यक्त किया है-लघुभागवतामृत कृष्ण-विभाग (श्लोक ५३१)में- “सन्ति यद्यपि मे प्राज्या लीलास्तास्ता मनोहराः। न हि जाने स्मृते रासे मनो मे कीदृशं भवेत्॥” अर्थात् “यद्यपि मेरी अनेक प्रकारकी मनोहारी प्रचुर लीलाएँ विद्यमान हैं, तो भी रासलीलाका स्मरण करते ही मेरा मन जिस प्रकार भावापन्न होता है, उसे मैं व्यक्त नहीं कर सकता।” इस रासलीलामें लक्ष्मीका अधिकार भी नहीं है, द्वारकाकी महिषियोंके अधिकारके विषयमें भी नहीं सुना जाता है। एकमात्र श्रीराधिका और उनकी कायव्यूहा व्रजदेवियोंका इस रासलीलामें अधिकार है। सौन्दर्य-माधुर्य-विलास-वैदग्धी आदिमें निखिल रमणियोंकी शिरोमणि नित्यकिशोरी व्रजाङ्गनाओंके साथ निखिल पुरुषकुल-शिरोमणि नित्यकिशोर व्रजेन्द्रनन्दनकी रासलीलामें ही निखिल विलास वैचित्री और निखिल रस-वैचित्रीकी निर्बाधरूपसे पूर्णतम अभिव्यक्ति सम्भव है। इसलिये कैशोर अवस्था श्रीकृष्णका आश्रय करके इस रासलीलामें ही अपनी सार्थकताकी पराकाष्ठा लाभ करती है॥११५॥ विष्णुपुराण (५/१३/६०)- सोऽपि कैशोरक-वयो मानयन्मधुसूदनः। रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थः क्षपासु क्षपिताहितः॥११६॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अमङ्गलशून्य श्रीकृष्णने कैशोर-अवस्थामें रात्रिमें स्त्रियोंके सङ्ग विहार करते हुए कैशोर-अवस्थाको विशेष सम्मान प्रदान किया। महाभावमयी श्रीराधा और भावमयी गोपियोंके मध्य स्थित परमचैतन्य श्रीकृष्ण ही कूटस्थ तत्त्व हैं॥११६॥ अनुभाष्य-क्षपिताहितः (क्षपितं विनाशितं अहितं अकल्याणं येन सः) सोऽपि मधुसूदनः (श्रीकृष्णः अपि) २०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/११६-११७ ] कैशोरकवयः मानयन् (सफलीकुर्वन्) स्त्रीरत्नकूटस्थः (स्त्रीरत्नानां गोपीनां कूटेषु समूहेषु स्थितः सन्) क्षपासु (शारदीय-निशासु) रेमे। श्लोक-भावानुवाद-अमङ्गलका विनाश करनेवाले श्रीकृष्णने कैशोर अवस्थाको सफल करते हुए गोपियोंके समूहमें स्थित होकर शरद-पूर्णिमाकी रात्रिमें उनके साथ रमण किया ॥११६॥ अमृतानुकणिका-'क्षपिताहितः' - यह मधुसूदनका विशेषण है। व्रजसुन्दिरियोंके साथ रासलीला सम्पादन करके श्रीकृष्ण 'क्षपिताहित' हुए - जगत्के समस्त अमङ्गलको दूर किया। रासलीलाके द्वारा जगत्का अमङ्गल कैसे दूर होगा? इसका उत्तर-जगत्के अमङ्गलका कारण श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता है। श्रीकृष्णसे विमुख होकर जीव अपने स्वरूपको भूल जाता है और देहमें आत्माभिमान करता है। परन्तु साधुके मुखसे श्रीकृष्णकी महिमा श्रवणकर सौभाग्यवान् व्यक्तिकी श्रीकृष्णमें क्रमशः श्रद्धा, रति और भक्ति (प्रेम) उत्पन्न होती है। विशेषतः रासलीलाके श्रवण-कीर्तनके विषयमें भागवत (१०/३३/३९) में कहा है- “विक्रीड़ितं व्रजवधूभिरिदञ्च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥” अर्थात् “जो धीरपुरुष व्रजदेवियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके इस चिन्मय रासविलासका श्रद्धाके साथ बारम्बार श्रवण या वर्णन करता है, उसे प्रथमतः भगवान्के चरणोंमें पराभक्तिकी प्राप्ति होती है और फिर वह बहुत शीघ्र ही जितेन्द्रिय होकर अपने हृदयके रोग अर्थात् लौकिक कामभावसे सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है।” इसलिये रासादिलीलाके द्वारा जो जगत्के अमङ्गल विनाशका प्रकृष्ट पथ निर्दिष्ट हुआ है, उसमें और सन्देह नहीं है॥११६॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (२/१/२३१)- वाचा सूचितशर्वरी-रतिकला-प्रागल्भ्यया राधिकां व्रीड़ाकुञ्चितलोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ। तद्वक्षोरुह-चित्रकेलिमकरी-पाण्डित्यपारं गतः कैशोरं सफलीकरोति कलयन् कुञ्जे विहारं हरिः॥११७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्ण प्रगल्भ (वाक्चातुर्य) वाक्योंके साथ पूर्वरात्रिमें श्रीमती राधिकाके सङ्ग घटित रतिकलाका वृत्तान्त वर्णन करने लगे। उससे लज्जावशतः श्रीमती राधिकाके दोनों नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके स्तनयुगलपर चित्रकेलि-भ्रमरादि चित्रित करते हुए सखियोंके मध्य विशेष पाण्डित्यका प्रकाश करने लगे। इस प्रकारकी रसक्रीड़ाके द्वारा कुञ्जमें विहार करते हुए श्रीहरिने कैशोर-अवस्थाको सफल किया॥११७॥ अनुभाष्य-धीरललित नायकके लक्षण वर्णन करते हुए श्रीकृष्णचन्द्रका धीरललित-नायकत्व दिखा रहे हैं- सूचितशर्वरीरतिकलाप्रागल्भ्यया (सूचितं प्रकाशीकृतं शर्वर्याः यामिन्याः रतेः कलायाः कौशलस्य प्रागल्भ्यं चौथा अध्याय | २०१

[ ४/११७-१२१ औद्धत्यं यया सा तया) वाचा सखीनां अग्रे राधिकां व्रीडाकुञ्चितलोचनां (व्रीडया लज्जया कुञ्चिते लोचने यस्याः सा तथाविधां) विरचयन् (कुर्वन्) तद्वक्षोरुहचित्रकेलि-मकरीपाण्डित्यपारङ्गतः (तस्याः श्रीराधायाः वक्षोरुहयोः कुचयोः चित्रकेलिमकरीनिर्माणे यत् पाण्डित्यं तस्य पारं गतः इति सोपहासोक्तिः, तन्निर्माणकाले कर-कम्पनेन चित्रस्य वक्रत्वात्; अत्र पुनः पुनः वक्राङ्कनं सुष्ठुं कर्तुं ऋजुरेखानिर्माणव्याजेन पुनः पुनः वक्षस्पर्शात् रहसि द्विविध-सम्भोग-भेदस्यान्यतमः सम्प्रयोगावसरः) असौ हरिः (ब्रजविलासी) कुञ्जे विहारं कलयन् (कुर्वन्) कैशोरं (वयः) सफलीकरोति। श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णने अन्य रात्रिमें श्रीराधाके साथ जो रतिकला की थी, उसके कौशलका सखियोंके सामने प्रगल्भ वाक्योंसे प्रकाश करने लगे। यह सुनकर लज्जावशतः श्रीराधाके नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके वक्षस्थलपर चित्रकेलि और मकरी आदि चित्रितकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगे, परन्तु उसे उनकी पारङ्गता कहना परिहासोक्ति ही है। चित्रकेलि बनानेके समय हाथ काँपनेके कारण चित्र टेढ़ा बनता और बार-बार उसे ठीक करके सीधी रेखा बनानेके बहानेसे श्रीकृष्णको पुनः-पुनः राधाजीके वक्षको स्पर्श करनेका अवसर मिलता (यह दो प्रकारके सम्भोगमें सम्प्रयोग नामक क्रीड़ा विशेष है)। इस प्रकार ब्रजविलासी श्रीकृष्णने कुञ्जोंमें विहार करते हुए कैशोर अवस्थाको सफल किया॥११७॥ विदग्धमाधव (७/३)- हरिरेष न चेदवातरिष्यन्मधुरायां मधुराक्षि राधिका च। अभविष्यदियं वृथा विसृष्टिर्मकराङ्कस्तु विशेषतस्तदात्र॥ ११८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि! यदि मथुरामें श्रीहरि और मधुरनयनी श्रीराधिका प्रकट ना होते, तो सम्पूर्ण सृष्टि, विशेषकर कन्दर्पकी सृष्टि अवश्य ही विफल हो जाती ॥ ११८॥ अनुभाष्य-श्रीवृन्दादेवीने पौर्णमासीको कहा- हे मधुराक्षि, मथुरायाम् एषः हरिः राधिका च चेत् (यदि) न अवातरिष्यत्, तदा अत्र विसृष्टिः (जगत्सृष्टिः) वृथा अभविष्यत्; विशेषतः मकराङ्कः (कन्दर्पसर्गः) तु [वृथा अभविष्यत्]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ श्रीकृष्णलीलामें तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण :- एइ मत पूर्वे कृष्ण रसेर सदन। यद्यपि करिल रस-निर्यास-चर्वण॥ ११९॥ तथापि नहिल तिन वाञ्छित पूरण। ताहा आस्वादिते यदि करिल यतन ॥ १२० ॥ अनुवाद-इस प्रकार सभी रसोंके आश्रय श्रीकृष्णने पहले उन रसोंके सारका तो चर्वण किया, परन्तु उस आस्वादनमें उनके प्रयास करनेपर भी उनकी तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण ही रहीं॥ ११९-१२०॥ उनकी (१) प्रथम वाञ्छा :- ताँहार प्रथम वाञ्छा करिये व्याख्यान। कृष्ण कहे, - 'आमि हइ रसेर निदान ॥ १२१ ॥ २०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१२१-१२५ ] राधाप्रेमका सामर्थ्य और गाढ़त्व विचार :- पूर्णानन्दमय आमि चिन्मय पूर्णतत्त्व। राधिकार प्रेमे आमा कराय उन्मत्त ॥ १२२ ॥ ना जानि राधार प्रेमे आछे कत बल। ये बले आमारे करे सर्वदा विह्वल ॥ १२३ ॥ राधिकार प्रेम-गुरु, आमि-शिष्य नट। सदा आमा नाना नृत्य नाचाय उद्भट ॥ १२४ ॥ अनुवाद-अब मैं उनकी पहली अभिलाषाकी व्याख्या कर रहा हूँ। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही सभी रसोंका आदि कारण हूँ। मैं पूर्णानन्दमय और चिन्मय पूर्णतत्त्व हूँ, किन्तु राधिकाका प्रेम मुझे उन्मत्त कर देता है। राधाके प्रेममें ना जाने कितना बल है, जिस बलसे वह प्रेम मुझे सदा विह्वल कर देता है। राधिकाका प्रेम ही मेरा गुरु है और मैं उसका नट (नर्तक) शिष्य हूँ। वही प्रेम मुझे नाना प्रकारसे विचित्र नृत्य नचाता है ॥ १२१-१२४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'रसेर निदान'-रसका मूल कारण। किन्हीं अन्य संस्करणोंमें 'रसेर निधान' अर्थात् रसका भण्डार, ऐसा भी मिलता है॥ १२१ ॥ श्रीगोविन्दलीलामृत (८/७७)- कस्माद्वृन्दे प्रियसखि हरेः पादमूलात् कुतोऽसौ कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्यशिक्षां गुरुः कः। तं त्वन्मूर्तिः प्रतितरुलतां दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती शैलूषीव भ्रमति परितो नर्त्तयन्ती स्व-पश्चात् ॥ १२५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १२५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाने पूछा-'हे प्रियसखि वृन्दे! तुम कहाँसे आ रही हो?' वृन्दा बोलीं-'राधे, मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंके समीपसे आ रही हूँ।' श्रीराधाने जिज्ञासा की-'श्रीकृष्ण कहाँ हैं?' वृन्दा बोलीं-'वे तुम्हारे कुण्डके तट स्थित वनमें हैं।' श्रीराधाने पुनः जिज्ञासा की-'वे क्या कर रहे हैं?' वृन्दा बोलीं-'नृत्यकी शिक्षा ले रहे हैं।' श्रीराधाने पूछा-'नृत्यशिक्षाके गुरु कौन हैं?' वृन्दा बोलीं-'तुम्हारी मूर्ति प्रत्येक दिशामें सभी वृक्ष-लताओंको स्फूर्ति कराकर शैलूषी अर्थात् बाजीकरकी भाँति अपने पीछे-पीछे नृत्य करा रही है, उनके साथ ही श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं।' यह प्रश्नोत्तरमय श्लोक है॥ १२५ ॥ अनुभाष्य-श्रीराधाकृष्णकी माध्याह्निक लीलाके अन्तर्गत श्रीराधा और वृन्दाका परस्परमें वार्त्तालाप- हे प्रियसखि वृन्दे! त्वं कस्मात् ? (आगता इति श्रीराधिकायाः प्रश्नस्योत्तरे वृन्दा वदति,) हरेः (भगवतो यशोदानन्दनस्य) पादमूलात्; असौ श्रीकृष्णः कुतः ? (कुत्र इति श्रीराधायाः पुनः प्रश्ने, वृन्दायाः उत्तरं) कुण्डारण्ये (राधाकुण्डसमीपस्थकानने)। [श्रीराधा पुनः पृच्छति,] इह [सः] किं कुरुते ? [वृन्दाह,] नृत्यशिक्षाम्; [राधाह,] गुरुः कः ? [वृन्दोवाच,] दिग्विदिक्षु (दशदिशि) प्रतितरुलतां (तरुलताः प्रति) शैलूषी (उत्कृष्टनटी) इव स्फुरन्ती तन्मूर्तिः तं (कृष्णं) स्वपश्चात् परितो नर्त्तयन्ती भ्रमति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १२५ ॥ चौथा अध्याय | २०३

[ ४/१२५-१३० श्रीकृष्ण और श्रीराधाके परस्पर प्रेमकी तुलना और वैशिष्ट्य :— “निज-प्रेमास्वादे मोर हय ये आह्लाद। ताहा हइते कोटिगुण राधा-प्रेमास्वाद ॥ १२६ ॥ आमि यैछे परस्पर विरुद्धधर्माश्रय । राधाप्रेम तैछे सदा विरुद्धधर्ममय ॥ १२७ ॥ राधा-प्रेमा विभु-यार बाड़िते नाहि ठाञि। तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥ १२८ ॥ याहा वइ गुरुवस्तु नाहि सुनिश्चित। तथापि गुरुर धर्म गौरव-वर्जित ॥ १२९ ॥ याहा वइ सुनिर्मल द्वितीय नाहि आर। तथापि सर्वदा वाम्य-वक्र-व्यवहार ॥ १३० ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—“अपने प्रेम आस्वादनमें मुझे जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द राधाको अपने प्रेमके आस्वादनमें होता है। जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्म मुझमें एक साथ वास करते हैं, उसी प्रकार राधाका प्रेम भी सदा विरुद्धधर्ममय है। यद्यपि राधाका प्रेम विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, जिसका और अधिक बढ़नेका कोई स्थान नहीं है, तथापि वह क्षण-क्षणमें सब समय बढ़ता रहता है। यद्यपि यह सुनिश्चित है कि राधिकाके प्रेमसे बड़ी और कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम गौरवपूर्ण आचरणसे विहीन है; यही महानताका लक्षण है। यद्यपि राधिकाके प्रेमसे सुनिर्मल अन्य कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम सदा वामता और कुटिलतापूर्ण व्यवहारयुक्त रहता है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कृष्ण जिस प्रकार सभी विरुद्ध धर्मोंका आश्रय हूँ, जैसे निर्विकार होनेपर भी स्वेच्छामय, सर्वव्यापी होनेपर भी सुन्दर मूर्तिमान, निरपेक्ष होनेपर भी भक्तपक्षपाती, आत्माराम होनेपर भी भक्तप्रेमका आकाङ्क्षी आदि हूँ, वैसे ही राधाप्रेम भी विरुद्धधर्मसे परिपूर्ण है। जैसे चरम महाभावमय होनेपर भी सदा वृद्धिशील, प्रेम-गौरवसे परिपूर्ण होनेपर भी गौरवविहीन और निर्मल होनेपर भी वाम्यादिसे पूर्ण है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतानुकणिका—वाम्य—वामा नायिकाका भाव। उःनीः सखीप्रकरण (८/३२)— “मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना। अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्त्यते ॥” अर्थात् “जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदा आन्तरिक रूपमें चेष्टाशील होती है, मानमें शैथिल्य होनेसे अत्यन्त कोप करती है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ नहीं होता तथा जो नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है, उसको रसशास्त्रमें वामा कहा गया है।” श्रीराधाका प्रेम अत्यन्त सुनिर्मल-विशुद्ध, सरल और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय है। अपना सर्वस्व देकर सभी प्रकारसे श्रीकृष्णका प्रीति विधान ही इस प्रेमकी चेष्टा है। इसलिये इस प्रेममें वामता और कुटिलताका कोई स्थान नहीं है। मिलनके लिये श्रीकृष्णकी बलवती उत्कण्ठाके समय मिलनेकी अनिच्छा अथवा अनादरका प्रकाश ही वाम्य है, स्वभावतः ही यह (वाम्य) श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय प्रेमका विरोधी है। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीराधाप्रेम २०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१२७-१३२ ]

सुनिर्मल होनेपर भी उसमें वाम्यता और कुटिलता दिखायी देती है। वाम्य और वक्र व्यवहारसे राधाप्रेमकी सुनिर्मलताकी हानि नहीं होती। किसी वस्तुमें यदि विजातीय वस्तु मिल जाय, तो उस वस्तुकी सुनिर्मलताकी हानि होती है। जैसे जलमें उससे भिन्न वस्तु कीचड़ मिल जाय, तो जल निर्मल नहीं रहता। वाम्यता और वक्रता प्रेमसे भिन्न जातीय वस्तुएँ नहीं हैं। समुद्रकी तरङ्गोंके समान वाम्यता और वक्रता प्रेमकी तरङ्ग-विशेष हैं; इनके मिश्रणसे प्रेम मलिन नहीं होता, अपितु उसकी उज्ज्वलता और आस्वादन-चमत्कारिता ही सम्पादित होती है॥१२७-१३०॥ दानकेलिकौमुदी (२)— विभुरपि कलयन् सदाभिवृद्धिं गुरुरपि गौरवचर्य्यया विहीनः। मुहुरुपचितवक्रिमापि शुद्धो जयति मुरद्विषि राधिकानुरागः॥१३१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधिकाका अनुराग विभु अर्थात् असीम होनेपर भी सदा वर्धनशील है, अत्यन्त गुरु (महान्) होकर भी गौरवाचरण-विहीन है, शुद्ध और निर्मल होकर भी बार-बार वक्रगतिवाला है; इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति राधिकाका जो अनुराग है, वह जययुक्त हो॥१३१॥ अनुभाष्य—विभुः (व्यापकः) अपि सदा अभिवृद्धिम् (अभितोवृद्धिं) कलयन् (धारयन्) गुरुः अपि (श्रेष्ठोऽपि) गौरवचर्यया विहीनः (दाक्षिण्यसेवया हीनः) [मदीयतामय-मधुस्नेहोत्थत्वात्] मुहुः (पुनः पुनः) उपचितवक्रिमा (उपचितः वर्द्धितः वक्रिमा कौटिल्य-पर्यायः वाम्यलक्षणो यस्मिन् तथाभूतः) अपि शुद्धः (निरुपाधिकः) मुरद्विषि (मुरारौ श्रीकृष्णो) राधिकानुरागः (श्रीराधिकायाः अनुरागः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—व्यापक होकर भी जो सदा वर्धनशील है, श्रेष्ठ होकर भी जो गौरवरहित अर्थात् दाक्षिण्य सेवारहित है [मधुस्नेहके कारण श्रीकृष्ण मेरे हैं, यह भाव है], निरुपाधिक होनेपर भी जो बार-बार कुटिलता अर्थात् वाम्यभाव प्रदर्शित करता है, मुरारि श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका वह अनुराग सर्वोत्कृष्ट रूपसे विराजमान हो॥१३१॥ अमृताणुकणिका—'विभु'—सर्वोत्कृष्ट, सम्पूर्ण। यह इस श्लोकमें श्रीराधानुरागका विशेषण है। श्रीराधाका श्रीकृष्णमें अनुराग विभु है। अनुराग जब यावदाश्रयवृत्तित्व लाभ करता है अर्थात् जहाँ तक वर्द्धित होना सम्भव है, वहाँ तक जब वर्द्धित होता है, तब उसे विभु (सम्पूर्ण) कहते हैं। इसलिये यावदाश्रय-वृत्ति अनुराग ही विभु अनुराग है। किन्तु यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागको ही भाव अथवा महाभाव कहते हैं और मादनाख्या-महाभाव ही महाभाव अथवा यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागका चरम उत्कर्ष है। इसलिये 'विभु अनुराग' कहनेसे यहाँ मादनाख्या-महाभावको ही लक्ष्य किया गया है, यही श्रीराधाके प्रेमकी विशिष्टावस्था है॥१३१॥ उस प्रेमके 'विषय' श्रीकृष्ण, और 'आश्रय' राधिका :— सेइ प्रेमार राधिका परम 'आश्रय'। सेइ प्रेमार आमि हइ केवल 'विषय'॥१३२॥

चौथा अध्याय | २०५

[ ४/१३२-१३७ विषय और आश्रयके परस्पर सुखका तारतम्य :- विषयजातीय सुख आमार आस्वाद। आमा हैते कोटिगुण आश्रयेर आह्लाद ॥१३३॥ आश्रयके सुखाधिक्य-दर्शनसे विषयकी आश्रय होनेकी इच्छा :- आश्रयजातीय सुख पाइते मन धाय। यत्ने आस्वादिते नारि, कि करि उपाय ॥१३४॥ कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रय। तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय॥”१३५॥ अनुवाद-राधिका उस प्रेमकी परम ‘आश्रय’ हैं और मैं केवल उसका ‘विषय’ हूँ। प्रेमका विषय होनेके कारण मैं विषयजातीय सुखका ही आस्वादन कर सकता हूँ, किन्तु मुझसे कोटि गुणा अधिक आनन्द आश्रय राधिकाको होता है। आश्रयजातीय सुख पानेके लिये मेरा मन दौड़ता है, किन्तु अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पा रहा हूँ। मैं क्या उपाय करूँ? यदि कभी इस प्रेमका मैं आश्रय बन जाऊँ, तब उस प्रेमानन्दका अनुभव होगा॥”१३२-१३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो प्रेम करते हैं, वे प्रेमके ‘आश्रय’ हैं; जिनसे प्रेम किया जाता है, वे प्रेमके ‘विषय’ हैं। रसतत्त्वमें ‘विभाव’, ‘अनुभाव’, ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’-ये चार प्रकारकी सामग्रियाँ हैं। विभावरूप सामग्री दो प्रकारकी है-‘आलम्बन’ और ‘उद्दीपन’। आलम्बन पुनः दो प्रकारके हैं-विषय और आश्रय। राधाके प्रेमकी आश्रय राधिका हैं और प्रेमके एकमात्र विषय श्रीकृष्ण हैं। ‘मैं कृष्ण हूँ, मुझे जिस सुखका आस्वादन होता है, वह विषयजातीय सुख है; किन्तु आश्रयमें जो आनन्द या सुख है, वह मेरे विषयजातीय सुखसे कोटि गुणा अधिक है। आश्रयजातीय सुख राधिका ही भोग करती हैं, मैं कृष्णरूपसे उसका भोग नहीं कर सकता। यदि कभी मैं उस प्रेमका ‘आश्रय’ हो जाऊँ, तभी आश्रयजातीय सुखरूप परमानन्द अनुभव कर पाऊँगा। इसी आश्रयगत प्रेमके आस्वादनका लोभ ही मेरी अभिलाषा है॥’१३२-१३५॥ एइ चिन्ति’ रहे कृष्ण परमकौतुकी। हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ धक्धकि॥१३६॥ अनुवाद-यह सब चिन्ता करते हुए कौतुकी रसिकशेखर श्रीकृष्ण उस प्रेमका आस्वादन करनेकी चिन्ता करते रहे। उस प्रेमके प्रति लोभ बढ़ते हुए उनके हृदयमें धधकने लगा॥१३६॥ अमृतानुकणिका-‘धक्धकि’-धक्धक् करना; क्रमशः वृद्धिशीलगतिसे। घी अथवा अन्य ईन्धन पाकर अग्नि जैसे क्रमशः वृद्धिशील गतिसे धक्धक् करके जलने लगती है, श्रीराधा प्रेमास्वादनका उपाय अवलम्बन नहीं कर पानेपर भी प्रेमास्वादनका लोभ श्रीकृष्णके चित्तमें क्रमशः वृद्धिशील गतिसे बलवान होने लगा॥१३६॥ (२) द्वितीय वाञ्छा :- एइ एक, शुन आर लोभेर प्रकार। स्वमाधुर्य देखि’ कृष्ण करेन विचार॥१३७॥ २०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१३७-१४५ ] अपने ही माधुर्यसे स्वयं ही चमत्कृत और आकर्षित :- 'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण मोर मधुरिमा। त्रिजगते इहार केह नाहि पाय सीमा॥१३८॥ एइ प्रेमद्वारे नित्य राधिका एकलि। आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि॥१३९॥ अनुवाद-यह एक लोभ था, अब एक और लोभके विषयमें श्रवण करो। अपने माधुर्यको देखकर श्रीकृष्ण विचार करने लगे-'मेरी मधुरिमा अद्भुत, अनन्त और पूर्ण है, तीनों जगत्में कोई इसका पूर्ण आस्वादन नहीं कर सकता। केवल राधिका ही अपने प्रेमके द्वारा मेरे माधुर्यामृतका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करती है॥१३७-१३९॥ अमृताणुकणिका-इस पयारमें श्रीकृष्ण-माधुर्यके अपूर्वत्वके साथ-साथ श्रीराधाप्रेमकी अद्भुत महिमा व्यक्त हुई है। जिसे कोई भी आस्वादन करनेमें समर्थ नहीं है, यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण भी जिसका आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं, श्रीराधाप्रेम उस (श्रीकृष्ण-माधुर्य) को भी सम्पूर्णरूपसे आस्वादन करनेमें समर्थ है॥१३७-१३९॥ यद्यपि निर्मल राधार सत्प्रेमदर्पण। तथापि स्वच्छता तार बाड़े क्षणे क्षण॥१४०॥ आमार माधुर्य नाहि बाड़िते अवकाशे। ए दर्पणेर आगे नव नव रूपे भासे॥१४१॥ अनुवाद-यद्यपि राधिकाका सत्प्रेमरूपी दर्पण निर्मल है अर्थात् स्वसुखवासनासे पूर्णता रहित है, तथापि उस प्रेमरूपी दर्पणकी स्वच्छता अर्थात् श्रीकृष्ण माधुर्यके आस्वादनकी लालसा प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरे माधुर्यका बढ़नेका और अवकाश अर्थात् स्थान नहीं है, किन्तु उस प्रेमरूपी दर्पणके सामने वह नये-नये रूपसे प्रकाशित होता है॥१४१॥ मन्माधुर्य, राधार प्रेम-दोंहे होड़ करि'। क्षणे क्षणे बाड़े दोंहे, केह नाहि हारि॥१४२॥ आमार माधुर्य नित्य नव नव हय। स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप भक्ते आस्वाद्य॥१४३॥ दर्पणाद्ये देखि' यदि आपन-माधुरी। आस्वादिते हय लोभ, आस्वादिते नारि॥१४४॥ अपने ही माधुर्यके आस्वादनके लिये उसके आस्वादनकारिणीके स्वरूपग्रहणका लोभ :- विचार करिये यदि आस्वाद-उपाय। राधिका-स्वरूप हइते तबे मन धाय॥'१४५॥ अनुवाद-मेरे माधुर्य और राधाके प्रेममें होड़ लगती है। दोनों प्रतिक्षण बढ़ते रहते हैं, किन्तु दोनोंमें कोई नहीं हारता। मेरा माधुर्य नित्य नये-नये रूपमें प्रकट होता है, जिसका भक्त अपने-अपने प्रेमके विकासके अनुरूप आस्वादन करते हैं। दर्पणादिमें यदि मैं अपनी रूपमाधुरी देखता हूँ, तो उसका आस्वादन करनेके लिये मेरे हृदयमें लोभ होता है, किन्तु उसका चौथा अध्याय | २०७

[ ४/१३७-१४६ आस्वादन नहीं कर पाता हूँ। जब मैं इसे आस्वादन करनेका उपाय विचार करता हूँ, तब राधिकाके स्वरूपको ग्रहण करनेके लिये मेरा मन ललायित होता है॥'१४२-१४५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी दूसरी वाञ्छा यह है—'मेरा माधुर्य अद्भुत, अनन्त और असीम है। इस माधुर्यका केवल राधिका अपने आश्रयगत प्रेमके द्वारा आस्वादन करती है। राधिकाका शुद्धप्रेमरूपी दर्पण अत्यन्त निर्मल होनेपर भी उसकी स्वच्छता प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरा माधुर्य असीम होनेके कारण बढ़ने योग्य ना होनेपर भी बढ़ता रहता है और राधिकाके स्वच्छतापूर्ण प्रेमदर्पणके सामने वह नये-नये रूपमें प्रकट होता है। इसलिये मेरा माधुर्य और राधाका प्रेम, दोनों ही परस्पर स्पर्धा करके एक-दूसरेसे अधिक बढ़ना चाहते हैं और कोई हारना नहीं चाहता। उसी अपनी माधुरीको राधिकाके प्रेमदर्पणादिमें देखकर आस्वादन करनेके लिये मेरा लोभ उत्पन्न हो रहा है। उसी लोभसे राधिकाके स्वरूपको अङ्गीकार करनेके लिये मेरा चित्त धावित हो रहा है॥१३७-१४५॥ अनुभाष्य—'होड़ करि'—स्पर्द्धा करना॥ १४२॥ अमृताणुकणिका—प्रेम ही श्रीकृष्ण-माधुर्यके आस्वादनका कारण है। “प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ (आदि ४/४९)।” प्रेम नहीं होनेपर केवल नेत्र-कर्णादि इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। इसलिये श्रीकृष्णके साक्षात् प्रकट होनेपर भी जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे ही उनके माधुर्यका आस्वादन कर सकेंगे और जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम नहीं है, वे कुछ भी आस्वादन नहीं कर पायेंगे—जैसे बहरा व्यक्ति कोयलके स्वर-माधुर्यको अनुभव नहीं कर सकता। जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे भी समान भावसे श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकते। जिसका प्रेम जितना विकसित है, वह उतना ही माधुर्यका आस्वादन कर सकता है। जिसका प्रेम पूर्णतमरूपमें विकसित है, वही माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन कर सकता है। सभी व्रजवासियोंका प्रेम समानभावसे विकसित नहीं है, विभिन्न व्रजवासियोंका प्रेम विभिन्न स्तरतक विकसित है। किन्तु श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त अन्य किसीका प्रेम पूर्णतम विकसित नहीं है, इसलिये श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त कोई भी पूर्णतमरूपमें श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकता। कारण, श्रीकृष्ण ही जिस प्रकार स्वयं-भगवान् हैं, अन्य कोई कभी भी स्वयं-भगवान् नहीं हो सकता, वैसे ही श्रीमती राधिका ही सभी शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति हैं, उन्हींमें ही प्रेमका पूर्णतम विकास है, अन्य कोई कभी भी सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति नहीं हो सकता, अन्य किसीमें भी प्रेमका पूर्णतम विकास मादनाख्या-महाभाव नहीं हो सकता, इसलिये अन्य कोई भी श्रीकृष्णके माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन नहीं कर सकता॥ १४३॥ ललितमाधव (८/३४)— अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव॥ १४६॥ २०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१४६-१५१ ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण बोले—“अहो! यह प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”१४६॥ अनुभाष्य—द्वारका स्थित नववृन्दावनमें मणिभित्तिमें श्रीकृष्ण अपनी छविमें अपने ही सौन्दर्यका दर्शन करके कह रहे हैं— अपरिकलितपूर्वः (अननुभूत पूर्वः) चमत्कारकारी (विस्मयोत्पादकः) एषः गरीयान् मम कः [अनिर्वचनीयः] माधुर्यपूरः (सौन्दर्यपुञ्जः) स्फुरति (प्रकाशयति)। अयम् अहं (कृष्णः) अपि यं (प्रतिबिम्बरूपं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) राधिका इव लुब्धचेताः [सन्] सरभसं (सोत्सुक्यं) उपभोक्तु श्लोक-भावानुवाद—अहो! इसके पूर्व जिसका अनुभव नहीं किया, ऐसा विस्मयको उत्पन्न करनेवाला यह श्रेष्ठ पुरुष कौन है जो अनिर्वचनीय माधुर्यको प्रकाश कर रहा है? यह मेरा ही प्रतिबिम्बरूप है, तो भी इसे देखकर राधिकाकी भाँति लुब्धचित्त होकर परम उत्सुकतासे इसका आलिङ्गन करनेकी अभिलाषा कर रहा हूँ॥१४६॥ श्रीकृष्णमाधुर्यका बल और उसके आस्वादनके लिये श्रीकृष्णकी चेष्टा :— कृष्णमाधुर्येर एक स्वाभाविक बल। कृष्ण आदि नरनारी करये चञ्चल॥१४७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्यका एक स्वाभाविक बल है, जो सभी नर-नारियोंके साथ-साथ स्वयं श्रीकृष्णको भी चञ्चल कर देता है॥१४७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका माधुर्य स्वयं श्रीकृष्णसे लेकर गोपियों, श्रीबलदेव, नारायण, लक्ष्मी और अन्य सभी प्राणियोंके चित्तको चञ्चल करनेमें स्वाभाविक रूपसे समर्थवान् है॥१४७॥ श्रवणे, दर्शने आकर्षये सर्वमन। आपना आस्वादिते कृष्ण करेन यतन॥१४८॥ श्रीकृष्णमाधुर्यपानमें तृप्तिका अभाव, केवल लोभमें वृद्धि :— ए माधुर्यामृत सदा येइ पान करे। तृष्णाशान्ति नहे, तृष्णा बाड़े निरन्तरे॥१४९॥ अतृप्त हइया करे विधिर निन्दन। ‘अविदग्ध विधि भाल ना जाने सृजन॥१५०॥ कोटि नेत्र नाहि दिल, सबे दिल दुइ। ताहाते निमेष,—कृष्ण कि देखिब मुञि॥’१५१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणीके श्रवणसे, उनके सुन्दर रूपके दर्शनसे सभीका मन आकर्षित हो जाता है; यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी इसका आस्वादन करनेकी चेष्टा करते हैं। इस माधुर्यामृतका जो पान करता है, उसकी तृष्णा कभी मिटती नहीं, अपितु तृष्णा निरन्तर बढ़ती ही रहती है। (ऐसा रसिक भक्त श्रीकृष्णके सौन्दर्यपानमें) अतृप्त होकर विधि (स्रष्टा ब्रह्मा) की निन्दा करते हुए कहता है—‘इस मूर्ख ब्रह्माको ठीकसे सृजन करना नहीं आता। चौथा अध्याय | २०९