श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/९६-१०५ ] एकस्वरूप होनेपर भी आस्वादक और आस्वादितरूपमें दो देह :— राधाकृष्ण ऐछे सदा एकइ स्वरूप। लीलारस आस्वादिते धरे दुइ रूप॥९८॥ अनुवाद—श्रीमती राधिका पूर्णशक्ति हैं और श्रीकृष्ण पूर्ण शक्तिमान् हैं। शास्त्रोंके प्रमाणके अनुसार दोनों वस्तुओं—शक्ति और शक्तिमान्में कोई भेद नहीं है। जिस प्रकार कस्तूरी और उसकी गन्ध अभिन्न हैं अथवा अग्नि और उसकी दाहिका शक्तिमें कोई भेद नहीं है, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण सदा एक ही स्वरूप हैं, किन्तु लीलारसके आस्वादनके लिये दो रूप धारण करते हैं॥९६-९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कस्तूरी और उसकी गन्ध पृथक् दो वस्तुएँ होनेपर भी वे जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं अर्थात् जिन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता, अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति पृथक् वस्तुएँ होनेपर भी जिस प्रकार अविच्छेद्य हैं, उसी प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्ण लीलारसास्वादनमें नित्य पृथक् होकर भी एक ही स्वरूप हैं॥९७॥ श्रीराधाके कृष्णप्रेमको वितरित करनेके लिये श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णका गौरावतार :— प्रेमभक्ति शिखाइते आपने अवतरि। राधा-भाव-कान्ति दुइ अङ्गीकार करि'॥९९॥ श्रीकृष्णचैतन्यरूपे कैल अवतार। एइ त' पञ्चम श्लोकेर अर्थ परचार॥१००॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने जगत्को प्रेमभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीराधाके भाव और कान्ति लेकर श्रीकृष्णचैतन्यरूपसे अवतार ग्रहण किया। यह पाँचवें श्लोकका अर्थ है॥९९-१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिकाके भाव और कान्ति अर्थात् वर्ण और सौन्दर्यको स्वयं ग्रहण करके॥९९॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमें छठे श्लोककी व्याख्या आरम्भ :— षष्ठ श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश। प्रथमे कहिये सेइ श्लोकेर आभास॥१०१॥ पूर्वाभास; नामसङ्कीर्तन-प्रवर्तन गौरावातारका बाह्य कारण :— अवतरि' प्रभु प्रचारिल सङ्कीर्त्तन। एहो बाह्य हेतु, पूर्वे करियाछि सूचन॥१०२॥ मुख्य और गूढ़ कारण—वह स्वयं श्रीकृष्णका निजकार्य और एकमात्र श्रीस्वरूपदामोदरको विज्ञात :— अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥१०३॥ अति गूढ़ हेतु सेइ त्रिविध प्रकार। दामोदरस्वरूप हैते याहार प्रचार॥१०४॥ स्वरूप-गोसाञि—प्रभुर अति अन्तरङ्ग। ताहाते जानेन प्रभुर एसब प्रसङ्ग॥१०५॥ चौथा अध्याय १९३