श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/१०१-१०५ अनुवाद-छठे श्लोकके अर्थको प्रकाश करनेके लिये पहले उसकी भूमिकाका वर्णन कर रहा हूँ। महाप्रभुने अवतरित होकर सङ्कीर्तन धर्मका प्रचार किया, यह बाह्य कारण है जिसे मैंने पहले भी कहा है। इस अवतार लेनेका एक अन्य मुख्य कारण है, जो रसिकशेखर श्रीकृष्णका अपना निजी कार्य है। श्रीगौरसुन्दरके अवतारका अति गूढ़ कारण तीन प्रकारका है, जिसे जगत्में श्रीस्वरूप दामोदरने ही प्रकाशित किया है। श्रीस्वरूप गोसाईं महाप्रभुके अत्यन्त अन्तरङ्ग पार्षद हैं, इसलिये वे महाप्रभुके ये सब रहस्य भली-भाँति जानते हैं॥१०१-१०५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गौर-अवतारका मुख्य कारण अत्यन्त गूढ़ है और वह कारण तीन प्रकारका है। यह बादमें 'श्रीराधायाः प्रणय महिमा' श्लोकमें कहा गया है॥१०४॥ अनुभाष्य-श्रीस्वरूप दामोदरका पूर्व नाम श्रीपुरुषोत्तम भट्टाचार्य था और वे नवद्वीपमें वास करते थे। महाप्रभुके संन्यास लेनेसे पूर्व ही वे स्वयं संन्यास ग्रहण करनेकी अभिलाषासे वाराणसीमें जाकर दशनामी दण्डियोंके दलमें ब्रह्मचारी हुए। इस कारण उनका नाम 'श्रीदामोदरस्वरूप' हुआ। बादमें संन्यासकी प्रक्रियाकी पूर्णताकी अपेक्षा ना करके श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंका आश्रयकर आजीवन नीलाचल (जगन्नाथपुरी) में वास किया। वे सब समय श्रीगौरसुन्दरके साथ रहते थे और उनके द्वारा उपदेश किये गये भजनादिका गान करके उनको हर पल प्रसन्नता प्रदान करते थे। श्रीमन्महाप्रभुके हृदयके गूढ़भावोंको उनकी कृपासे ही भक्तोंको जाननेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है। व्रजलीलामें ये महात्मा ललितादेवी हैं, जो श्रीमती राधिकाका दूसरा स्वरूप हैं। कविकर्णपूर रचित 'गौरगणोद्देशदीपिका' के अनुसार ये विशाखादेवी हैं- “कलामर्शिक्षयद् राधां या विशाखा व्रजे पुरा। साद्य स्वरूपगोस्वामी तत्तद्भावविलासवान्॥” अर्थात् “पहले व्रजमें जो विशाखा नामक सखी श्रीराधिकाको कला सिखाती थीं, वे ही अब श्रीगौरलीलामें राधाभावमूर्ति श्रीगौरहरिके भावोंमें विलास करनेवाले (उनके द्वितीय स्वरूप) श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी हैं।"॥१०५॥ अमृताणुकणिका-वैष्णव साहित्यमें 'अन्तरङ्ग'-शब्दका विशेष प्रचलन है। अन्तरङ्ग-शब्दका विपरीतार्थक शब्द 'बहिरङ्ग' है। अन्तः+अङ्ग=अन्तरङ्ग अर्थात् निजजन, परमात्मीय। बहिः+रङ्ग=बहिरङ्ग अर्थात् अनात्मीय या बाहरी व्यक्ति। वैष्णवकोषमें 'अन्तरङ्ग' शब्दका तात्पर्य है-स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति-विशिष्ट, सजातीयाशयस्निग्ध; और उसके विपरीत चित्तवृत्तियुक्त व्यक्ति बहिरङ्ग है। वैष्णव-साहित्यमें विषय और आश्रयके सम्बन्धको लेकर ही 'अन्तरङ्ग' और 'बहिरङ्ग'-शब्दका इस प्रकार प्रयोग होता है। विषयके साथ एकान्त समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर विषयके मनोभीष्ट-परिपूर्णके लिये सर्वक्षण सर्वेन्द्रियोंको नियुक्त करके जीवन-धारण ही 'अन्तरङ्ग'का एकमात्र स्वभाव है। विषयके सुखतात्पर्यताके अतिरिक्त पृथक् भावसे उनकी किसी प्रकारकी चेष्टा नहीं है। कनक, कामिनी और प्रतिष्ठा-ये सभी 'विषय'-सेवाके उपकरण हैं, यह भावना जिन 'आश्रय'की स्वाभाविक वृत्तिरूपमें अनुक्षण प्रकाशित होती है, वे ही अन्तरङ्ग कहलानेके योग्य हैं। यह अन्तरङ्गता किसी कृत्रिम उपायसे अर्जित नहीं की जा सकती; यह नित्यसिद्ध स्वरूप-वृत्ति है। १९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत