श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वरूप दामोदरको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहा है, क्योंकि वे महाप्रभुके साथ समचित्तवृत्ति-विशिष्ट हैं। अप्राकृत विप्रलम्भ-विग्रह महाप्रभुकी चित्तवृत्तिके साथ सम्भोग-चित्तवृत्तिविशिष्ट व्यक्तिका मिलन नहीं हो सकता। जो सर्वतोभावेन सर्वाङ्गसे सर्वक्षण महाप्रभुके उस विप्रलम्भरसकी पुष्टि करते हैं, वे ही उनके अन्तरङ्ग हैं। उसमें किसी बाह्य विचारका अवकाश नहीं है। स्त्री या पुरुष, गृहस्थ या संन्यासी, ब्राह्मण या शूद्र-इन सब बाह्य पोशाकका किसी प्रकारका विचार अन्तरङ्गके विचारमें नहीं है। श्रीस्वरूप दामोदर बाह्य-दर्शनसे त्यागी वेश धारण करके रहते थे और उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंके मध्य होती है; और श्रीराय रामानन्द विषयी गृहस्थ या ब्राह्मणेतर (कायस्थ) कुलमें आविर्भूत होनेकी लीला प्रदर्शन करके भी महाप्रभुके नित्यसिद्ध अन्तरङ्ग भक्त हैं। माधवी माताकी बाह्य दर्शनसे स्त्री होनेपर भी उनकी गणना महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंमें होती है। और अन्यत्र श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने कहा है (अन्त्य ६/६, ८-११)- “रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर गान। विरह-वेदनाय प्रभुर राखये पराण ॥६॥ ताँर सुखहेतु सङ्गे रहे दुइजना। कृष्णरस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥८॥ सुबल यैछे पूर्वे कृष्णसुखेर सहाय। गौरसुखदान-हेतु तैछे राम-राय ॥९॥ पूर्वे यैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान। तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे प्रभुर प्राण ॥१०॥ दुइ जनार सौभाग्य कहन ना याय। प्रभुर ‘अन्तरङ्ग’ बलि’ याँरे लोके गाय ॥ ११ ॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण विरह-वेदनासे पीड़ित महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा श्रीराय रामानन्दकी श्रीकृष्णकथा और श्रीस्वरूप दामोदरके गानके द्वारा ही होती थी। उनके सुखके लिये ही ये दोनों जन सदा उनके साथ रहते थे और श्रीकृष्णरस, श्लोक और गीतोंके द्वारा उन्हें सान्त्वना प्रदान करते थे। श्रीकृष्णलीलामें जैसे सुबल श्रीकृष्णके सुखके सहायक थे, वैसे ही श्रीगौरको सुख प्रदान करनेके लिये श्रीराय रामानन्द हैं। पूर्वकालमें जैसे ललिताजी श्रीराधाकी परम सहायिका थीं, वैसे ही श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके प्राणोंकी रक्षा करते हैं। इन दोनोंके सौभाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता, इन दोनोंको महाप्रभुका अन्तरङ्ग कहकर लोग इनकी महिमाका गान करते हैं।” उपरोक्त पदसमूहसे स्पष्ट होता है कि विषयकी सुखानुसन्धान-परता और समचित्तवृत्तिविशिष्टता ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। जहाँ विषयके साथ आन्तरिक समचित्तवृत्ति नहीं है, अपितु विषयके सुखानुसन्धान-चेष्टाका छल या अभिनय है, वह अन्तरङ्गताका लक्षण नहीं है। सजातीयाशयस्निग्धता और स्वयूथाश्रित समचित्तवृत्ति ही अन्तरङ्गताका लक्षण है। कोई-कोई मानते हैं-जो गुरु-वैष्णवकी इच्छानुरूप बाह्यतत्परता प्रदर्शन करते हैं, किंवा उनकी दैहिक परिचर्या करते हैं, या अनुक्षण उनके साथ रहते हैं, वे ही अन्तरङ्ग हैं।
चौथा अध्याय | १९५