भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 238

[ ४/१०५-१०६ समचित्तवृत्तिविशिष्ट ना होनेसे आचार्यकी इच्छानुरूप चेष्टाका बाह्य अभिनय करनेपर भी उनकी अन्तरङ्गकी श्रेणीमें गणना नहीं हो सकती। भुवन-पूजिता दुर्गा सृष्टि-स्थिति-प्रलयके लिये श्रीकृष्णकी इच्छानुरूप निरन्तर चेष्टा करनेपर भी 'बहिरङ्गा' शक्ति या छायाशक्ति कहलाती हैं। दुर्गादेवी कितनी कर्मतत्परता और विक्रम प्रदर्शित करके भगवान्के बाह्य वपुस्वरूप इस जगत्की सेवामें नियुक्त हैं; सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि कार्यके द्वारा कितने कोटि ब्रह्माण्डोंके अन्तर्गत जीवोंकी चमत्कारिता विधान करती हैं, कितनी अघटन-घटन-पटीयसी शक्ति प्रकाश करती हैं, किन्तु वे सात्वतजनोंके द्वारा बहिरङ्गा या आवरिका शक्ति ही कही जाती हैं। जो शरीरका अधिक आदर करते हैं—वे इस बहिरङ्गा शक्तिको ही 'अन्तरङ्गा शक्ति' कहकर प्रचार करते हैं और स्वयंको उनका 'अन्तरङ्ग भक्त' कहनेमें झिझकते नहीं हैं। किन्तु श्रीगोविन्द-सेवात्पर ब्रह्माजीकी वाणीमें यह सुनते हैं (ब्रह्मसंहिता ४४)— “सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा। इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥” अर्थात् “स्वरूपशक्ति या चित्-शक्तिकी छायारूपा प्रापञ्चिक जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकारिणी मायाशक्ति ही भुवन पूजिता 'दुर्गा' जी हैं। वे जिनकी इच्छाके अनुसार सारी चेष्टाएँ करती हैं, उन आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ।” अतः इच्छानुरूप चेष्टाका अभिनयमात्र ही अन्तरङ्ग सेवा नहीं है, और विराट् कर्मतत्परता या जाड्य किसी सेवाका लक्षण नहीं है। समचित्तवृत्तिविशिष्ट होकर हरि-गुरु-वैष्णवका मनोऽभीष्ट आचार और प्रचार ही अन्तरङ्ग भक्तका स्वभाव है॥१०५॥ श्रीराधाके महाभावमें मग्न श्रीगौरसुन्दर :- राधिकार भावमूर्त्ति प्रभुर अन्तर। सेइभावे सुख-दुःख उठे निरन्तर ॥ १०६ ॥ अनुवाद—श्रीमन्महाप्रभुका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंकी मूर्ति है। उन्हीं भावोंके अनुरूप उनके हृदयमें निरन्तर सुख-दुःख प्रकट होते थे॥१०६॥ अनुभाष्य—श्रीगौरसुन्दरका हृदय श्रीमती राधिकाके भावोंका मूर्त्तरूप है। 'भावमूर्ति'—शब्दसे स्थूलबुद्धि जड़ेन्द्रिय भोगोंमें रत लोग भावमय मूर्तिके स्वरूपकी उपलब्धि करनेमें असमर्थ हैं। अनर्थमुक्त जातरति भक्त आश्रिततत्त्व-विचारसे शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर, इन पाँच प्रकारके दिखायी देते हैं। श्रीमती राधिकाके भाव मधुररसकी परमोन्नत और सम्पूर्ण अवस्था हैं। वे भाव 'रूढ़' और 'अधिरूढ़' भेदसे दो प्रकारके हैं। भागवतमें महिषीगीत और गोपीगीतमें 'रूढ़' और 'अधिरूढ़', इन दो भावोंकी अभिव्यक्ति हुई है। श्रीगौरसुन्दरमें अधिरूढ़ महाभावका ही प्रकाश देखा जाता है। विधिके दूर होनेसे, लोभके विचारसे द्वारकाका अधिरूढ़ भाव गोकुलके भावमें पर्यवसित हुआ है। श्रीगौरसुन्दरके हृदयमें श्रीकृष्णविरहरूप विप्रलम्भ-दुःखाभास और श्रीकृष्ण-प्राप्तिरूप सम्भोगसुख प्रतिक्षण उदित होकर भावनाओंके पथका अतिक्रमणकर मधुररसका आस्वादन होता था। १९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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