भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/९०-९७ मूल अथवा स्वरूपशक्तिकी अधिष्ठात्री, आप ही प्रधान शक्तिरूपा, परा-विद्यात्मिका हैं। आपने ही विष्णुसम्बन्धी परम आनन्दराशिको धारण किया है। हे ब्रह्मा-रुद्रादिदेवगण-दुर्गमे ! आपके वैभवका प्रत्येक अंश आश्चर्यजनक है। आप कभी भी योगिन्द्रगणोंके ध्यानपथको स्पर्श नहीं करतीं। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति आपकी ही अंशमात्र हैं। आप ही समस्त शक्तियोंकी ईश्वरी हैं। योगमायाके प्रभावसे जो यशोदाके बालकके रूपमें लीला करते हैं, वे ही भगवान् महाविष्णु (स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण)की जितनी माया-विभूतियाँ हैं, वे सभी आपकी अंशस्वरूपा हैं॥९०-९१॥ (६) समस्त शोभाकी मूल आश्रयस्वरूपा :- सर्व-सौन्दर्य-कान्ति वैसये याँहाते। सर्वलक्ष्मीगणेर शोभा हय याँहा हैते ॥९२॥ श्रीकृष्णेच्छापूर्तिमयी :- किम्वा, 'कान्ति'-शब्दे कृष्णेर सब इच्छा कहे। कृष्णेर सकल वाञ्छा राधातेइ रहे ॥९३॥ राधिका करेन कृष्णेर वाञ्छित पूरण। 'सर्वकान्ति'-शब्देर एइ अर्थ विवरण ॥९४॥ (७) भुवनमोहन-मनोमोहिनी :- जगतमोहन कृष्ण, ताँहार मोहिनी। अतएव समस्तेर परा ठकुराणी ॥९५॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकामें समस्त सौन्दर्य और कान्ति वास करते हैं और सभी लक्ष्मियोंकी शोभा भी उनसे सिद्ध होती है। अथवा [कम्-धातुसे कान्ति-शब्द निष्पन्न हुआ है, कम्-धातुका अर्थ कामना अथवा वासना है, इसलिये] 'कान्ति' शब्दका अर्थ 'श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाएँ' भी होता है और श्रीकृष्णकी सभी अभिलाषाएँ श्रीमती राधिकामें ही रहती हैं। श्रीमती राधिका श्रीकृष्णकी सभी इच्छाएँ पूर्ण करती हैं—इसलिये उन्हें 'सर्वकान्ति' कहा गया है। श्रीकृष्ण जगतमोहन हैं, परन्तु उनको भी मोहित करनेवाली श्रीमती राधिका हैं। इसलिये श्रीमती राधिका सबकी परम ठकुराणी (स्वामिनी) हैं॥९२-९५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अतएव समस्तेर परा ठकुराणी', यहाँ तक 'देवी कृष्णमयी' श्लोकके प्रत्येक पदके अर्थपर विचार हुआ है॥९५॥ पूर्णचन्द्र श्रीकृष्णकी पूर्णिमास्वरूपिणी :- राधा-पूर्णशक्ति, कृष्ण-पूर्णशक्तिमान्। दुई वस्तु भेद नाहि, शास्त्र-परमाण ॥ ९६॥ श्रीराधा-कृष्णका परस्पर अविच्छेद्य सम्बन्ध :- मृगमद, तार गन्ध-यैछे अविच्छेद। अग्नि, ज्वालाते-यैछे कभु नाहि भेद ॥ ९७॥ १९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत