भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 233

४/८९-९१ ] 'सर्वपालिका'- श्रीकृष्ण समस्त जगत्के पालनकर्त्ता हैं और उनसे अभिन्न कृष्णमयी श्रीराधा भी सभीकी पालनकर्त्री हैं। पद्मपुराण-पातालखण्डमें लिखा है- “बहिरङ्गैःप्रपञ्चस्य स्वांशैर्मायादिशक्तिभिः। अन्तरङ्गैरस्तथा नित्यं विभुतौस्तैश्चिदादिभिः। गोपनादुच्यते गोपी राधिका कृष्णवल्लभा॥” अर्थात् “श्रीकृष्णवल्लभा श्रीराधिका अपनी बहिरङ्ग अंशरूपा मायादिशक्तिके द्वारा और अन्तरङ्ग विभूतिरूपा चिदादिशक्तिके द्वारा भी प्रपञ्चको गोपन (रक्षा) करती हैं, इसलिये उन्हें गोपी (रक्षाकर्त्री, पालनकर्त्री) कहा गया है। 'सर्व-जगतेर माता'-नारद पञ्चरात्रमें कहा है- “श्रीकृष्णो जगतां तातो जगन्माता च राधिका। पितुः शतगुणा माता वन्द्या पूज्या गरीयसी॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण जगत्के पिता हैं और श्रीराधा जगत्की माता हैं। पिताकी अपेक्षा माता सौ गुणा अधिक वन्दनीया, पूजनीया और श्रेष्ठा हैं॥८९॥ (५) सभी श्रीकृष्णकान्ताओंकी अंशिनी :- 'सर्वलक्ष्मी'-शब्द पूर्वे करियाछि व्याख्यान। सर्वलक्ष्मीगणेर तिँहो हन अधिष्ठान॥९०॥ श्रीकृष्णकी सभी ऐश्वरी शक्तिकी मूल आश्रयस्वरूपा :- किम्वा, 'सर्वलक्ष्मी'-कृष्णेर षड्विध ऐश्वर्य। ताँर अधिष्ठात्री शक्ति-सर्वशक्तिवर्य॥९१॥ अनुवाद- 'सर्वलक्ष्मी' अर्थात् सभी लक्ष्मियाँ उनकी अंशरूपा हैं, इस शब्दकी व्याख्या मैं पहले कर चुका हूँ, श्रीमती राधिका ही सब लक्ष्मियोंकी अधिष्ठान अर्थात् मूल हैं। अथवा 'सर्वलक्ष्मी' कहनेका तात्पर्य है कि वे श्रीकृष्णके षड्-ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णकी सर्वोच्च शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती राधिका सब लक्ष्मियोंकी आश्रयस्वरूपा हैं; अथवा 'सर्वलक्ष्मी' शब्दका अर्थ श्रीकृष्णका षड्विध ऐश्वर्य है; वे ही श्रीकृष्णकी अधिष्ठात्री शक्ति हैं॥९०-९१॥ अमृताणुकणिका-'सर्वशक्तिवर्य'–पद्मपुराण पातलखण्डमें श्रीनारद श्रीराधासे बोले- “तत्त्वं विशुद्धसत्त्वासु शक्तिर्विद्यात्मिका परा। परमानन्दसन्दोहं दधती वैष्णवं परम्॥ कल्याश्चर्यविभवे ब्रह्मरुद्रादिदुर्गमे। योगीन्द्रानां ध्यानपथं न त्वं स्पृशसि कर्हिचित्॥ इच्छाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिस्तवेशितुः। तवांशमात्रमित्येवं मनीषा मे प्रवर्त्तते ॥ मायाविभूतयोऽचिन्त्यास्तन्मायार्भकमायिनः। परेशस्य महाविष्णोस्ताः सर्वास्ते कलाः कलाः॥” अर्थात् “विशुद्धसत्त्वसमूहमें आप ही तत्त्व अर्थात् ह्लादिनी-सन्धिनी-सम्वित्-रूप विशुद्ध सत्त्वकी चौथा अध्याय | १९१

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 233, कुल 2549 में से · BharatKosha