श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/८४-८९
यह है कि जिनके भीतरमें और बाहरमें श्रीकृष्ण हैं एवं जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, वहाँ-वहाँ उन्हें श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है। तथा दूसरा अर्थ है, श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और उनकी शक्ति उनके साथ एक ही तत्त्व है। श्रीकृष्णकी वाञ्छापूर्तिरूप आराधन-कार्यसे उनका नाम ‘राधिका’ कहा गया है॥८४-८७॥ भागवतमें राधानामका सङ्केत :- श्रीमद्भागवत (१०/३०/२८)— अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः। यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद्रहः ॥८८॥ अनुवाद—इस भाग्यवती रमणीने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरिकी यथार्थ रूपमें आराधनाकर उन्हें विशेष रूपसे सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे सहचरि! हमें परित्याग करके श्रीकृष्ण जिसको निभृत स्थानमें लेकर गये हैं, उसने ईश्वर श्रीहरिकी अवश्य ही अधिक आराधना की होगी। श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि होनेके कारण उनका नाम ‘राधिका’ हुआ है, यही इसका गूढ़ार्थ है॥८८॥ अनुभाष्य—रासलीलास्थलीसे श्रीराधा और श्रीगोविन्द, दोनोंके चले जानेके बाद गोपियोंकी उक्ति,— अनया (राधया) नूनं (निश्चितं) ईश्वरः (भक्ताभीष्टप्रदाता) भगवान् हरिः आराधितः (आराध्य वशीकृतः, न तु अस्माभिः व्रजवधूभिः); यत् (यस्मात्) गोविन्दः प्रीतः (प्रीतियुक्तः सन्) नः (अस्मान्) विहाय (विशेषेण त्यक्त्वा) यां (राधां) रहः (निर्जने प्रदेशे) अनयत्। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधाने निश्चित ही भक्तोंको उनके अभीष्टको प्रदान करनेवाले भगवान् श्रीहरिको अपनी आराधनासे वशीभूत किया है। श्रीगोविन्द हम गोपियोंके द्वारा वशीभूत नहीं हुए हैं, इसलिये वे हमारा परित्यागकर श्रीराधासे प्रीतियुक्त होकर उन्हें निर्जन स्थानमें ले गये हैं॥८८॥ (४) श्रीकृष्ण आकर्षिणी होनेसे सर्वश्रेष्ठा, समस्त भक्तों और भक्तिकी पोषिका और मूल आधार :- अतएव सर्वपूज्या, परम-देवता। सर्वपालिका, सर्व-जगतेर माता॥८९॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमती राधिका सभीकी पूज्या और परम-देवता हैं। वे सभीका पालन करनेवाली और समस्त जगत्की माता हैं॥८९॥ अमृतानुकणिका—‘सर्वपूज्या’—श्रीकृष्णकी प्रियतमा और श्रीकृष्णके प्रति सर्वापेक्षा अधिकरूपमें प्रेमवती कहनेसे श्रीराधा सभीकी पूजनीया हैं। क्योंकि जीवका कर्त्तव्य श्रीकृष्णसेवा है, उसे प्राप्त करनेके लिये श्रीकृष्णकी सेवाकी सर्वश्रेष्ठ अधिकारिणी श्रीराधाकी कृपा अति आवश्यक है, उनकी सेवा-पूजाके द्वारा ही उनकी कृपा स्फुरित होगी, इसलिये श्रीराधाको सर्वपूज्या कहा गया हैं। ‘परम-देवता’—श्रेष्ठ देवता। जो क्रीड़ाका विस्तार करे, उसे देवता कहते हैं। श्रीकृष्णकी क्रीड़ा-विस्तारकी सर्वश्रेष्ठा सहायकारिणी होनेके कारण श्रीराधाको परम-देवता कहा है।
१९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत