भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 2549 में से

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४/८३-८७ ] बृहद्गौतमीतन्त्र :- देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा ॥८३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परदेवता राधिकादेवी 'साक्षात्कृष्णमयी', 'सर्वलक्ष्मीमयी', 'सर्वकान्ति', 'कृष्णसम्मोहिनी' और 'पराशक्ति' नामसे कही गयी हैं॥८३॥ अनुभाष्य-राधिका (आराधयति या सा), देवी (द्योतते इति) कृष्णमयी (कृष्णाभिन्ना कृष्णस्फूर्त्तिमती), परदेवता (परमपूज्या), सर्वलक्ष्मीमयी (लक्ष्मीगणनां मूलाधिष्ठात्री), सर्वकान्तिः (सर्वाःकान्तयः शोभाः यस्यां सा) सम्मोहिनी (श्रीकृष्णं सम्मोहयितुं शीलं यस्याः सा) परा प्रोक्ता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-जो श्रीकृष्णकी आराधना करती हैं, जो दीप्तिमान् हैं, जो श्रीकृष्णसे अभिन्न हैं और जिनको सर्वत्र श्रीकृष्णकी स्फूर्ति होती है, जो परमपूज्या हैं, जो लक्ष्मियोंकी मूल अधिष्ठात्री हैं, जो श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंकी कान्ति अर्थात् शोभा हैं, जो अपने शील स्वभावसे श्रीकृष्णको मोहित करनेवाली हैं, वे पराशक्ति कही गयी हैं॥८३॥ श्लोकार्थ-(१) सौन्दर्य अथवा विलासका आधार :- 'देवी' कहि द्योतमाना, परमा सुन्दरी। किम्बा, कृष्णपूजा-क्रीड़ार वसति नगरी ॥८४॥ (२) श्रीकृष्णमें एकान्त तन्मयता :- कृष्णमयी-कृष्ण यार भितरे बाहिरे। याँहा याँहा नेत्र पड़े, ताँहा कृष्ण स्फुरे ॥८५॥ श्रीकृष्णके साथ अभेदात्मता :- किम्बा, प्रेमरसमय कृष्णेर स्वरूप। ताँर शक्ति ताँर सह हय एकरूप ॥८६॥ (३) श्रीकृष्णवाञ्छापूरणरूप श्रीकृष्णाराधनके कारण 'राधा'-संज्ञा :- कृष्णवाञ्छा-पूर्त्तिरूप करे आराधने। अतएव 'राधिका'-नाम पुराणे बाखाने ॥८७॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकाको 'देवी' कहनेका तात्पर्य है कि वे दीप्तिमान् और परमा सुन्दरी हैं। अथवा अन्य अर्थ है जो श्रीकृष्णकी पूजारूप क्रीड़ाका वासस्थान हैं। 'कृष्णमयी' अर्थात् श्रीकृष्ण जिनके भीतर और बाहर भी हैं। जहाँ-जहाँ उनकी दृष्टि पड़ती है, उन्हें वहाँ-वहाँ श्रीकृष्णकी स्फूर्त्ति होती है। अथवा 'कृष्णमयी' का अर्थ यह भी है कि वे श्रीकृष्णका स्वरूप प्रेमरसमय है और वे श्रीकृष्णकी ह्लादिनीशक्ति होनेके कारण उनके साथ एकरूप हैं। श्रीकृष्णकी समस्त इच्छाओं और अभिलाषाओंको पूर्ण करना ही उनकी आराधना है। इसलिये पुराणोंमें उनका 'राधिका' नामसे बखान किया गया है ॥८४-८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दीप्तिमान् परमा सुन्दरी होनेके कारण, अथवा श्रीकृष्णपूजारूप जो क्रीड़ा है, उसका वासस्थान होनेके कारण वे 'देवी' हैं। 'कृष्णमयी' शब्दके दो अर्थ हैं। एक अर्थ चौथा अध्याय | १८९

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