भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/७९-८२ ललितादि ब्रजाङ्गनाएँ कायव्यूह :- आकार-स्वरूप-भेदे व्रजदेवीगण। कायव्यूहरूप ताँर रसेर कारण॥७९॥ रसके वर्धन और चमत्कारिताके लिये एक ही ह्लादिनीके अनेक प्रकाश :- बहु कान्ता बिना नहे रसेर उल्लास। लीलार सहाय लागि' बहुत' प्रकाश॥८०॥ उसमें व्रजविलास ही श्रीकृष्णप्रीतिकी श्रेष्ठ चमत्कारिता :- तार मध्ये व्रजे नाना भाव-रस-भेदे। कृष्णके कराय रासादिक-लीलास्वादे॥८१॥ अनुवाद-रूप और स्वरूपके भेदसे अलग-अलग व्रजदेवियाँ हैं। वे श्रीमती राधिकाकी कायव्यूहरूपा हैं और उनकी विविधता ही अनेक प्रकारके रसोंका कारण है। अनेक प्रेयसियोंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये श्रीकृष्णकी लीला सहायताके लिये श्रीमती राधिका अनेक कान्ताओंके रूपमें अपने प्रकाश प्रकट करती हैं। श्रीमती राधिका इन प्रकाशरूप व्रजाङ्गनाओंके साथ व्रजके शृङ्गाररसकी पुष्टिके लिये विभिन्न प्रकारके भावों और रसोंके द्वारा श्रीकृष्णको रासादि लीलाओंमें रसास्वादन कराती हैं॥७९-८१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अवतारी-स्वरूप श्रीकृष्ण जिस प्रकार पुरुषादि अवतारोंके रूपमें अपना विस्तार करते हैं, उसी प्रकार श्रीमती राधिका सभी कान्ताओंकी अंशिनी हैं अर्थात् उनके अंशसे लक्ष्मियों, महिषियों और व्रजाङ्गनाओंका विस्तार होता है। इन सभी कान्ताओंकी गणना उनके अङ्ग-विभूतिरूपसे वैभवोंमें होती हैं। बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपमें महिषियोंका विस्तार है। इसके मध्य यह विचार है कि लक्ष्मियाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास-अंशरूपा और महिषियाँ उनके प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं। व्रजदेवियाँ उनकी अपनी कायव्यूह-रूपा हैं और वे आकार तथा स्वरूपके प्रभेदसे रसका कारण होती हैं। अनेक कान्ताओंके बिना रसका उल्लास नहीं होता, इसलिये लीलाके सहायकरूप इस प्रकार उनके अनेक 'प्रकाश' दिखायी देते हैं; इन सब रसोंमें व्रजरस सर्वाधिक आस्वाद्यनीय है। विभिन्न प्रकारके भाव तथा रसभेदसे व्रजाङ्गनाएँ श्रीकृष्णको वहाँपर रासादि लीलाओंका आस्वादन कराती हैं॥७६-८१॥ अनुभाष्य-'स्वरूप' शब्दके स्थानपर अन्यान्य संस्करणोंमें 'स्वभाव' शब्द है॥७९॥ श्रीराधाके पाँच नाम :- गोविन्दानन्दिनी, राधा, गोविन्दमोहिनी। गोविन्दसर्वस्व, सर्वकान्ता-शिरोमणि॥८२॥ अनुवाद-गोविन्दानन्दिनी अर्थात् गोविन्दको आनन्द प्रदानकरनेवाली, राधा, गोविन्दमोहिनी अर्थात् गोविन्दको मोहित करनेवाली, गोविन्दसर्वस्व अर्थात् गोविन्दकी सर्वस्व और सर्वकान्ता-शिरोमणि अर्थात् सभी प्रियाओंमें श्रेष्ठा-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ अनुभाष्य-ये श्रीराधाके पाँच नाम हैं॥८२॥ १८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत