श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/७४-७८ ] तदंशा सिन्धुकन्या च क्षीरोदमन्थानोद्भवा। मर्त्यलक्ष्मीश्च सा देवी पत्नी क्षीरोदशायिनः ॥ तदंशा स्वर्गलक्ष्मीश्च शक्रादीनां गृहे गृहे। स्वयं देवी महालक्ष्मीः पत्नी वैकुण्ठशायिनः ॥ सावित्री ब्रह्मणः पत्नी ब्रह्मलोके निरामये। सरस्वती द्विधा भूता पुरैव साज्ञया हरे॥ सरस्वती भारती च योगेन सिद्ध योगिनी। भारती ब्रह्मणः पत्नी विष्णोः पत्नी सरस्वती ॥ रामाधिष्ठात्री देवी च स्वयं रामेश्वरी परा। वृन्दावने च सा देवी परिपूर्णतमा सती ॥ अर्थात् “जो ईश्वरके ऐश्वर्यकी अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं, वे श्रीराधाके बाएँ अङ्गसे आविर्भूत हुई हैं। क्षीरसमुद्रके मन्थनसे उद्भूता सिन्धुकन्या मर्त्यलक्ष्मी क्षीरोदशायीकी पत्नी हैं, वे महालक्ष्मीकी अंशा हैं। इन्द्रादि देवताओंके घर-घरमें जो स्वर्गलक्ष्मीके नामसे जानी जाती हैं, वे मर्त्यलक्ष्मीकी अंशा हैं। स्वयं महालक्ष्मी वैकुण्ठेश्वरकी पत्नी हैं। उन्होंने ही रोगादिरहित ब्रह्मलोकमें ब्रह्माकी पत्नीके रूपमें सावित्री नाम ग्रहण किया है। (श्रीराधा ही रसनाकी अधिष्ठात्रीरूपमें सरस्वती हैं; नाःपःराः २/३/५५)। पूर्वकालसे (अनादिकालसे) श्रीहरिके आदेशसे सरस्वती देवीने दो मूर्तियाँ धारणकी हैं—सरस्वती और भारती। भारती ब्रह्माकी पत्नी हुईं और सरस्वती विष्णुकी पत्नी हुईं। स्वयंरूपा परा देवी स्वयं रामेश्वरी रामाधिष्ठात्री श्रीराधा परिपूर्णतमा देवीरूपमें वृन्दावनमें विराजित हैं।” अथर्ववेदके अन्तर्गत पुरुषबोधिनी श्रुतिमें कहा गया हैं—लक्ष्मी-दुर्गा शक्तियाँ श्रीराधाकी अंशभूता हैं॥७४-७५॥ सभी श्रीकृष्णकान्ताएँ ही अंशिनी श्रीराधाकी अंश :— अवतारी कृष्ण यैछे करे अवतार। अंशिनी राधा हैते तिन गणेर विस्तार॥७६॥ वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति। बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप महिषीर तति ॥७७॥ द्वारकामें महिषीगण और नारायण-वासुदेवादिंकी लक्ष्मीगण :— लक्ष्मीगण ताँर वैभव-विलासांशरूप। महिषीगण प्राभव-प्रकाशस्वरूप ॥७८॥ अनुवाद—अवतारी श्रीकृष्ण जिस प्रकार अनेक अवतार लेते हैं, उसी प्रकार अंशिनी श्रीराधासे पूर्वोक्त तीन प्रकारकी कान्ताओंका विस्तार होता है। वैभवगण अर्थात् वैकुण्ठमें लक्ष्मीयाँ जिस प्रकार श्रीमती राधिकाकी अङ्ग-विभूतियाँ हैं, उस प्रकार महिषियाँ उनकी बिम्ब-प्रतिबिम्बरूपा हैं। लक्ष्मीयाँ श्रीमती राधिकाकी वैभव-विलास अंशरूपा हैं और महिषियाँ उनकी प्राभव-प्रकाशस्वरूपा हैं॥७६-७८॥ अनुभाष्य—'वैभवगण येन ताँर अङ्ग-विभूति'—इसका पाठान्तर 'लक्ष्मीगण हन ताँर अंशविभूति' भी देखा जाता है॥७७॥ चौथा अध्याय | १८७