श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ ४/११७-१२१ औद्धत्यं यया सा तया) वाचा सखीनां अग्रे राधिकां व्रीडाकुञ्चितलोचनां (व्रीडया लज्जया कुञ्चिते लोचने यस्याः सा तथाविधां) विरचयन् (कुर्वन्) तद्वक्षोरुहचित्रकेलि-मकरीपाण्डित्यपारङ्गतः (तस्याः श्रीराधायाः वक्षोरुहयोः कुचयोः चित्रकेलिमकरीनिर्माणे यत् पाण्डित्यं तस्य पारं गतः इति सोपहासोक्तिः, तन्निर्माणकाले कर-कम्पनेन चित्रस्य वक्रत्वात्; अत्र पुनः पुनः वक्राङ्कनं सुष्ठुं कर्तुं ऋजुरेखानिर्माणव्याजेन पुनः पुनः वक्षस्पर्शात् रहसि द्विविध-सम्भोग-भेदस्यान्यतमः सम्प्रयोगावसरः) असौ हरिः (ब्रजविलासी) कुञ्जे विहारं कलयन् (कुर्वन्) कैशोरं (वयः) सफलीकरोति। श्लोक-भावानुवाद-श्रीकृष्णने अन्य रात्रिमें श्रीराधाके साथ जो रतिकला की थी, उसके कौशलका सखियोंके सामने प्रगल्भ वाक्योंसे प्रकाश करने लगे। यह सुनकर लज्जावशतः श्रीराधाके नेत्र नीचे हो गये। तब श्रीकृष्ण उनके वक्षस्थलपर चित्रकेलि और मकरी आदि चित्रितकर अपना पाण्डित्य दिखाने लगे, परन्तु उसे उनकी पारङ्गता कहना परिहासोक्ति ही है। चित्रकेलि बनानेके समय हाथ काँपनेके कारण चित्र टेढ़ा बनता और बार-बार उसे ठीक करके सीधी रेखा बनानेके बहानेसे श्रीकृष्णको पुनः-पुनः राधाजीके वक्षको स्पर्श करनेका अवसर मिलता (यह दो प्रकारके सम्भोगमें सम्प्रयोग नामक क्रीड़ा विशेष है)। इस प्रकार ब्रजविलासी श्रीकृष्णने कुञ्जोंमें विहार करते हुए कैशोर अवस्थाको सफल किया॥११७॥ विदग्धमाधव (७/३)- हरिरेष न चेदवातरिष्यन्मधुरायां मधुराक्षि राधिका च। अभविष्यदियं वृथा विसृष्टिर्मकराङ्कस्तु विशेषतस्तदात्र॥ ११८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखि! यदि मथुरामें श्रीहरि और मधुरनयनी श्रीराधिका प्रकट ना होते, तो सम्पूर्ण सृष्टि, विशेषकर कन्दर्पकी सृष्टि अवश्य ही विफल हो जाती ॥ ११८॥ अनुभाष्य-श्रीवृन्दादेवीने पौर्णमासीको कहा- हे मधुराक्षि, मथुरायाम् एषः हरिः राधिका च चेत् (यदि) न अवातरिष्यत्, तदा अत्र विसृष्टिः (जगत्सृष्टिः) वृथा अभविष्यत्; विशेषतः मकराङ्कः (कन्दर्पसर्गः) तु [वृथा अभविष्यत्]। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११८॥ श्रीकृष्णलीलामें तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण :- एइ मत पूर्वे कृष्ण रसेर सदन। यद्यपि करिल रस-निर्यास-चर्वण॥ ११९॥ तथापि नहिल तिन वाञ्छित पूरण। ताहा आस्वादिते यदि करिल यतन ॥ १२० ॥ अनुवाद-इस प्रकार सभी रसोंके आश्रय श्रीकृष्णने पहले उन रसोंके सारका तो चर्वण किया, परन्तु उस आस्वादनमें उनके प्रयास करनेपर भी उनकी तीन वाञ्छाएँ अपूर्ण ही रहीं॥ ११९-१२०॥ उनकी (१) प्रथम वाञ्छा :- ताँहार प्रथम वाञ्छा करिये व्याख्यान। कृष्ण कहे, - 'आमि हइ रसेर निदान ॥ १२१ ॥ २०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१२१-१२५ ] राधाप्रेमका सामर्थ्य और गाढ़त्व विचार :- पूर्णानन्दमय आमि चिन्मय पूर्णतत्त्व। राधिकार प्रेमे आमा कराय उन्मत्त ॥ १२२ ॥ ना जानि राधार प्रेमे आछे कत बल। ये बले आमारे करे सर्वदा विह्वल ॥ १२३ ॥ राधिकार प्रेम-गुरु, आमि-शिष्य नट। सदा आमा नाना नृत्य नाचाय उद्भट ॥ १२४ ॥ अनुवाद-अब मैं उनकी पहली अभिलाषाकी व्याख्या कर रहा हूँ। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही सभी रसोंका आदि कारण हूँ। मैं पूर्णानन्दमय और चिन्मय पूर्णतत्त्व हूँ, किन्तु राधिकाका प्रेम मुझे उन्मत्त कर देता है। राधाके प्रेममें ना जाने कितना बल है, जिस बलसे वह प्रेम मुझे सदा विह्वल कर देता है। राधिकाका प्रेम ही मेरा गुरु है और मैं उसका नट (नर्तक) शिष्य हूँ। वही प्रेम मुझे नाना प्रकारसे विचित्र नृत्य नचाता है ॥ १२१-१२४ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'रसेर निदान'-रसका मूल कारण। किन्हीं अन्य संस्करणोंमें 'रसेर निधान' अर्थात् रसका भण्डार, ऐसा भी मिलता है॥ १२१ ॥ श्रीगोविन्दलीलामृत (८/७७)- कस्माद्वृन्दे प्रियसखि हरेः पादमूलात् कुतोऽसौ कुण्डारण्ये किमिह कुरुते नृत्यशिक्षां गुरुः कः। तं त्वन्मूर्तिः प्रतितरुलतां दिग्विदिक्षु स्फुरन्ती शैलूषीव भ्रमति परितो नर्त्तयन्ती स्व-पश्चात् ॥ १२५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १२५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधाने पूछा-'हे प्रियसखि वृन्दे! तुम कहाँसे आ रही हो?' वृन्दा बोलीं-'राधे, मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंके समीपसे आ रही हूँ।' श्रीराधाने जिज्ञासा की-'श्रीकृष्ण कहाँ हैं?' वृन्दा बोलीं-'वे तुम्हारे कुण्डके तट स्थित वनमें हैं।' श्रीराधाने पुनः जिज्ञासा की-'वे क्या कर रहे हैं?' वृन्दा बोलीं-'नृत्यकी शिक्षा ले रहे हैं।' श्रीराधाने पूछा-'नृत्यशिक्षाके गुरु कौन हैं?' वृन्दा बोलीं-'तुम्हारी मूर्ति प्रत्येक दिशामें सभी वृक्ष-लताओंको स्फूर्ति कराकर शैलूषी अर्थात् बाजीकरकी भाँति अपने पीछे-पीछे नृत्य करा रही है, उनके साथ ही श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे हैं।' यह प्रश्नोत्तरमय श्लोक है॥ १२५ ॥ अनुभाष्य-श्रीराधाकृष्णकी माध्याह्निक लीलाके अन्तर्गत श्रीराधा और वृन्दाका परस्परमें वार्त्तालाप- हे प्रियसखि वृन्दे! त्वं कस्मात् ? (आगता इति श्रीराधिकायाः प्रश्नस्योत्तरे वृन्दा वदति,) हरेः (भगवतो यशोदानन्दनस्य) पादमूलात्; असौ श्रीकृष्णः कुतः ? (कुत्र इति श्रीराधायाः पुनः प्रश्ने, वृन्दायाः उत्तरं) कुण्डारण्ये (राधाकुण्डसमीपस्थकानने)। [श्रीराधा पुनः पृच्छति,] इह [सः] किं कुरुते ? [वृन्दाह,] नृत्यशिक्षाम्; [राधाह,] गुरुः कः ? [वृन्दोवाच,] दिग्विदिक्षु (दशदिशि) प्रतितरुलतां (तरुलताः प्रति) शैलूषी (उत्कृष्टनटी) इव स्फुरन्ती तन्मूर्तिः तं (कृष्णं) स्वपश्चात् परितो नर्त्तयन्ती भ्रमति। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १२५ ॥ चौथा अध्याय | २०३
[ ४/१२५-१३० श्रीकृष्ण और श्रीराधाके परस्पर प्रेमकी तुलना और वैशिष्ट्य :— “निज-प्रेमास्वादे मोर हय ये आह्लाद। ताहा हइते कोटिगुण राधा-प्रेमास्वाद ॥ १२६ ॥ आमि यैछे परस्पर विरुद्धधर्माश्रय । राधाप्रेम तैछे सदा विरुद्धधर्ममय ॥ १२७ ॥ राधा-प्रेमा विभु-यार बाड़िते नाहि ठाञि। तथापि से क्षणे क्षणे बाड़ये सदाइ ॥ १२८ ॥ याहा वइ गुरुवस्तु नाहि सुनिश्चित। तथापि गुरुर धर्म गौरव-वर्जित ॥ १२९ ॥ याहा वइ सुनिर्मल द्वितीय नाहि आर। तथापि सर्वदा वाम्य-वक्र-व्यवहार ॥ १३० ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं—“अपने प्रेम आस्वादनमें मुझे जो आनन्द होता है, उससे कोटि गुणा आनन्द राधाको अपने प्रेमके आस्वादनमें होता है। जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्म मुझमें एक साथ वास करते हैं, उसी प्रकार राधाका प्रेम भी सदा विरुद्धधर्ममय है। यद्यपि राधाका प्रेम विभु अर्थात् सर्वव्यापक है, जिसका और अधिक बढ़नेका कोई स्थान नहीं है, तथापि वह क्षण-क्षणमें सब समय बढ़ता रहता है। यद्यपि यह सुनिश्चित है कि राधिकाके प्रेमसे बड़ी और कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम गौरवपूर्ण आचरणसे विहीन है; यही महानताका लक्षण है। यद्यपि राधिकाके प्रेमसे सुनिर्मल अन्य कोई वस्तु नहीं है, तथापि वह प्रेम सदा वामता और कुटिलतापूर्ण व्यवहारयुक्त रहता है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कृष्ण जिस प्रकार सभी विरुद्ध धर्मोंका आश्रय हूँ, जैसे निर्विकार होनेपर भी स्वेच्छामय, सर्वव्यापी होनेपर भी सुन्दर मूर्तिमान, निरपेक्ष होनेपर भी भक्तपक्षपाती, आत्माराम होनेपर भी भक्तप्रेमका आकाङ्क्षी आदि हूँ, वैसे ही राधाप्रेम भी विरुद्धधर्मसे परिपूर्ण है। जैसे चरम महाभावमय होनेपर भी सदा वृद्धिशील, प्रेम-गौरवसे परिपूर्ण होनेपर भी गौरवविहीन और निर्मल होनेपर भी वाम्यादिसे पूर्ण है ॥ १२७-१३० ॥ अमृतानुकणिका—वाम्य—वामा नायिकाका भाव। उःनीः सखीप्रकरण (८/३२)— “मानग्रहे सदोद्युक्ता तच्छैथिल्ये च कोपना। अभेद्या नायके प्रायः क्रूरा वामेति कीर्त्त्यते ॥” अर्थात् “जो नायिका मानग्रहण करनेमें सदा आन्तरिक रूपमें चेष्टाशील होती है, मानमें शैथिल्य होनेसे अत्यन्त कोप करती है, नायक जिसको सहज ही वशीभूत करनेमें समर्थ नहीं होता तथा जो नायकके प्रति प्रायः कठोर होती है, उसको रसशास्त्रमें वामा कहा गया है।” श्रीराधाका प्रेम अत्यन्त सुनिर्मल-विशुद्ध, सरल और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय है। अपना सर्वस्व देकर सभी प्रकारसे श्रीकृष्णका प्रीति विधान ही इस प्रेमकी चेष्टा है। इसलिये इस प्रेममें वामता और कुटिलताका कोई स्थान नहीं है। मिलनके लिये श्रीकृष्णकी बलवती उत्कण्ठाके समय मिलनेकी अनिच्छा अथवा अनादरका प्रकाश ही वाम्य है, स्वभावतः ही यह (वाम्य) श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमय प्रेमका विरोधी है। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीराधाप्रेम २०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१२७-१३२ ]
सुनिर्मल होनेपर भी उसमें वाम्यता और कुटिलता दिखायी देती है। वाम्य और वक्र व्यवहारसे राधाप्रेमकी सुनिर्मलताकी हानि नहीं होती। किसी वस्तुमें यदि विजातीय वस्तु मिल जाय, तो उस वस्तुकी सुनिर्मलताकी हानि होती है। जैसे जलमें उससे भिन्न वस्तु कीचड़ मिल जाय, तो जल निर्मल नहीं रहता। वाम्यता और वक्रता प्रेमसे भिन्न जातीय वस्तुएँ नहीं हैं। समुद्रकी तरङ्गोंके समान वाम्यता और वक्रता प्रेमकी तरङ्ग-विशेष हैं; इनके मिश्रणसे प्रेम मलिन नहीं होता, अपितु उसकी उज्ज्वलता और आस्वादन-चमत्कारिता ही सम्पादित होती है॥१२७-१३०॥ दानकेलिकौमुदी (२)— विभुरपि कलयन् सदाभिवृद्धिं गुरुरपि गौरवचर्य्यया विहीनः। मुहुरुपचितवक्रिमापि शुद्धो जयति मुरद्विषि राधिकानुरागः॥१३१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—राधिकाका अनुराग विभु अर्थात् असीम होनेपर भी सदा वर्धनशील है, अत्यन्त गुरु (महान्) होकर भी गौरवाचरण-विहीन है, शुद्ध और निर्मल होकर भी बार-बार वक्रगतिवाला है; इस प्रकार श्रीकृष्णके प्रति राधिकाका जो अनुराग है, वह जययुक्त हो॥१३१॥ अनुभाष्य—विभुः (व्यापकः) अपि सदा अभिवृद्धिम् (अभितोवृद्धिं) कलयन् (धारयन्) गुरुः अपि (श्रेष्ठोऽपि) गौरवचर्यया विहीनः (दाक्षिण्यसेवया हीनः) [मदीयतामय-मधुस्नेहोत्थत्वात्] मुहुः (पुनः पुनः) उपचितवक्रिमा (उपचितः वर्द्धितः वक्रिमा कौटिल्य-पर्यायः वाम्यलक्षणो यस्मिन् तथाभूतः) अपि शुद्धः (निरुपाधिकः) मुरद्विषि (मुरारौ श्रीकृष्णो) राधिकानुरागः (श्रीराधिकायाः अनुरागः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद—व्यापक होकर भी जो सदा वर्धनशील है, श्रेष्ठ होकर भी जो गौरवरहित अर्थात् दाक्षिण्य सेवारहित है [मधुस्नेहके कारण श्रीकृष्ण मेरे हैं, यह भाव है], निरुपाधिक होनेपर भी जो बार-बार कुटिलता अर्थात् वाम्यभाव प्रदर्शित करता है, मुरारि श्रीकृष्णके प्रति श्रीराधाका वह अनुराग सर्वोत्कृष्ट रूपसे विराजमान हो॥१३१॥ अमृताणुकणिका—'विभु'—सर्वोत्कृष्ट, सम्पूर्ण। यह इस श्लोकमें श्रीराधानुरागका विशेषण है। श्रीराधाका श्रीकृष्णमें अनुराग विभु है। अनुराग जब यावदाश्रयवृत्तित्व लाभ करता है अर्थात् जहाँ तक वर्द्धित होना सम्भव है, वहाँ तक जब वर्द्धित होता है, तब उसे विभु (सम्पूर्ण) कहते हैं। इसलिये यावदाश्रय-वृत्ति अनुराग ही विभु अनुराग है। किन्तु यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागको ही भाव अथवा महाभाव कहते हैं और मादनाख्या-महाभाव ही महाभाव अथवा यावदाश्रय-वृत्ति अनुरागका चरम उत्कर्ष है। इसलिये 'विभु अनुराग' कहनेसे यहाँ मादनाख्या-महाभावको ही लक्ष्य किया गया है, यही श्रीराधाके प्रेमकी विशिष्टावस्था है॥१३१॥ उस प्रेमके 'विषय' श्रीकृष्ण, और 'आश्रय' राधिका :— सेइ प्रेमार राधिका परम 'आश्रय'। सेइ प्रेमार आमि हइ केवल 'विषय'॥१३२॥
चौथा अध्याय | २०५
[ ४/१३२-१३७ विषय और आश्रयके परस्पर सुखका तारतम्य :- विषयजातीय सुख आमार आस्वाद। आमा हैते कोटिगुण आश्रयेर आह्लाद ॥१३३॥ आश्रयके सुखाधिक्य-दर्शनसे विषयकी आश्रय होनेकी इच्छा :- आश्रयजातीय सुख पाइते मन धाय। यत्ने आस्वादिते नारि, कि करि उपाय ॥१३४॥ कभु यदि एइ प्रेमार हइये आश्रय। तबे एइ प्रेमानन्देर अनुभव हय॥”१३५॥ अनुवाद-राधिका उस प्रेमकी परम ‘आश्रय’ हैं और मैं केवल उसका ‘विषय’ हूँ। प्रेमका विषय होनेके कारण मैं विषयजातीय सुखका ही आस्वादन कर सकता हूँ, किन्तु मुझसे कोटि गुणा अधिक आनन्द आश्रय राधिकाको होता है। आश्रयजातीय सुख पानेके लिये मेरा मन दौड़ता है, किन्तु अनेक चेष्टाएँ करनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पा रहा हूँ। मैं क्या उपाय करूँ? यदि कभी इस प्रेमका मैं आश्रय बन जाऊँ, तब उस प्रेमानन्दका अनुभव होगा॥”१३२-१३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो प्रेम करते हैं, वे प्रेमके ‘आश्रय’ हैं; जिनसे प्रेम किया जाता है, वे प्रेमके ‘विषय’ हैं। रसतत्त्वमें ‘विभाव’, ‘अनुभाव’, ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’-ये चार प्रकारकी सामग्रियाँ हैं। विभावरूप सामग्री दो प्रकारकी है-‘आलम्बन’ और ‘उद्दीपन’। आलम्बन पुनः दो प्रकारके हैं-विषय और आश्रय। राधाके प्रेमकी आश्रय राधिका हैं और प्रेमके एकमात्र विषय श्रीकृष्ण हैं। ‘मैं कृष्ण हूँ, मुझे जिस सुखका आस्वादन होता है, वह विषयजातीय सुख है; किन्तु आश्रयमें जो आनन्द या सुख है, वह मेरे विषयजातीय सुखसे कोटि गुणा अधिक है। आश्रयजातीय सुख राधिका ही भोग करती हैं, मैं कृष्णरूपसे उसका भोग नहीं कर सकता। यदि कभी मैं उस प्रेमका ‘आश्रय’ हो जाऊँ, तभी आश्रयजातीय सुखरूप परमानन्द अनुभव कर पाऊँगा। इसी आश्रयगत प्रेमके आस्वादनका लोभ ही मेरी अभिलाषा है॥’१३२-१३५॥ एइ चिन्ति’ रहे कृष्ण परमकौतुकी। हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ धक्धकि॥१३६॥ अनुवाद-यह सब चिन्ता करते हुए कौतुकी रसिकशेखर श्रीकृष्ण उस प्रेमका आस्वादन करनेकी चिन्ता करते रहे। उस प्रेमके प्रति लोभ बढ़ते हुए उनके हृदयमें धधकने लगा॥१३६॥ अमृतानुकणिका-‘धक्धकि’-धक्धक् करना; क्रमशः वृद्धिशीलगतिसे। घी अथवा अन्य ईन्धन पाकर अग्नि जैसे क्रमशः वृद्धिशील गतिसे धक्धक् करके जलने लगती है, श्रीराधा प्रेमास्वादनका उपाय अवलम्बन नहीं कर पानेपर भी प्रेमास्वादनका लोभ श्रीकृष्णके चित्तमें क्रमशः वृद्धिशील गतिसे बलवान होने लगा॥१३६॥ (२) द्वितीय वाञ्छा :- एइ एक, शुन आर लोभेर प्रकार। स्वमाधुर्य देखि’ कृष्ण करेन विचार॥१३७॥ २०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१३७-१४५ ] अपने ही माधुर्यसे स्वयं ही चमत्कृत और आकर्षित :- 'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण मोर मधुरिमा। त्रिजगते इहार केह नाहि पाय सीमा॥१३८॥ एइ प्रेमद्वारे नित्य राधिका एकलि। आमार माधुर्यामृत आस्वादे सकलि॥१३९॥ अनुवाद-यह एक लोभ था, अब एक और लोभके विषयमें श्रवण करो। अपने माधुर्यको देखकर श्रीकृष्ण विचार करने लगे-'मेरी मधुरिमा अद्भुत, अनन्त और पूर्ण है, तीनों जगत्में कोई इसका पूर्ण आस्वादन नहीं कर सकता। केवल राधिका ही अपने प्रेमके द्वारा मेरे माधुर्यामृतका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करती है॥१३७-१३९॥ अमृताणुकणिका-इस पयारमें श्रीकृष्ण-माधुर्यके अपूर्वत्वके साथ-साथ श्रीराधाप्रेमकी अद्भुत महिमा व्यक्त हुई है। जिसे कोई भी आस्वादन करनेमें समर्थ नहीं है, यहाँ तक कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण भी जिसका आस्वादन करनेमें असमर्थ हैं, श्रीराधाप्रेम उस (श्रीकृष्ण-माधुर्य) को भी सम्पूर्णरूपसे आस्वादन करनेमें समर्थ है॥१३७-१३९॥ यद्यपि निर्मल राधार सत्प्रेमदर्पण। तथापि स्वच्छता तार बाड़े क्षणे क्षण॥१४०॥ आमार माधुर्य नाहि बाड़िते अवकाशे। ए दर्पणेर आगे नव नव रूपे भासे॥१४१॥ अनुवाद-यद्यपि राधिकाका सत्प्रेमरूपी दर्पण निर्मल है अर्थात् स्वसुखवासनासे पूर्णता रहित है, तथापि उस प्रेमरूपी दर्पणकी स्वच्छता अर्थात् श्रीकृष्ण माधुर्यके आस्वादनकी लालसा प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरे माधुर्यका बढ़नेका और अवकाश अर्थात् स्थान नहीं है, किन्तु उस प्रेमरूपी दर्पणके सामने वह नये-नये रूपसे प्रकाशित होता है॥१४१॥ मन्माधुर्य, राधार प्रेम-दोंहे होड़ करि'। क्षणे क्षणे बाड़े दोंहे, केह नाहि हारि॥१४२॥ आमार माधुर्य नित्य नव नव हय। स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप भक्ते आस्वाद्य॥१४३॥ दर्पणाद्ये देखि' यदि आपन-माधुरी। आस्वादिते हय लोभ, आस्वादिते नारि॥१४४॥ अपने ही माधुर्यके आस्वादनके लिये उसके आस्वादनकारिणीके स्वरूपग्रहणका लोभ :- विचार करिये यदि आस्वाद-उपाय। राधिका-स्वरूप हइते तबे मन धाय॥'१४५॥ अनुवाद-मेरे माधुर्य और राधाके प्रेममें होड़ लगती है। दोनों प्रतिक्षण बढ़ते रहते हैं, किन्तु दोनोंमें कोई नहीं हारता। मेरा माधुर्य नित्य नये-नये रूपमें प्रकट होता है, जिसका भक्त अपने-अपने प्रेमके विकासके अनुरूप आस्वादन करते हैं। दर्पणादिमें यदि मैं अपनी रूपमाधुरी देखता हूँ, तो उसका आस्वादन करनेके लिये मेरे हृदयमें लोभ होता है, किन्तु उसका चौथा अध्याय | २०७
[ ४/१३७-१४६ आस्वादन नहीं कर पाता हूँ। जब मैं इसे आस्वादन करनेका उपाय विचार करता हूँ, तब राधिकाके स्वरूपको ग्रहण करनेके लिये मेरा मन ललायित होता है॥'१४२-१४५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णकी दूसरी वाञ्छा यह है—'मेरा माधुर्य अद्भुत, अनन्त और असीम है। इस माधुर्यका केवल राधिका अपने आश्रयगत प्रेमके द्वारा आस्वादन करती है। राधिकाका शुद्धप्रेमरूपी दर्पण अत्यन्त निर्मल होनेपर भी उसकी स्वच्छता प्रतिक्षण बढ़ती रहती है। मेरा माधुर्य असीम होनेके कारण बढ़ने योग्य ना होनेपर भी बढ़ता रहता है और राधिकाके स्वच्छतापूर्ण प्रेमदर्पणके सामने वह नये-नये रूपमें प्रकट होता है। इसलिये मेरा माधुर्य और राधाका प्रेम, दोनों ही परस्पर स्पर्धा करके एक-दूसरेसे अधिक बढ़ना चाहते हैं और कोई हारना नहीं चाहता। उसी अपनी माधुरीको राधिकाके प्रेमदर्पणादिमें देखकर आस्वादन करनेके लिये मेरा लोभ उत्पन्न हो रहा है। उसी लोभसे राधिकाके स्वरूपको अङ्गीकार करनेके लिये मेरा चित्त धावित हो रहा है॥१३७-१४५॥ अनुभाष्य—'होड़ करि'—स्पर्द्धा करना॥ १४२॥ अमृताणुकणिका—प्रेम ही श्रीकृष्ण-माधुर्यके आस्वादनका कारण है। “प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्यरस-आस्वाद-कारण॥ (आदि ४/४९)।” प्रेम नहीं होनेपर केवल नेत्र-कर्णादि इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। इसलिये श्रीकृष्णके साक्षात् प्रकट होनेपर भी जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे ही उनके माधुर्यका आस्वादन कर सकेंगे और जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम नहीं है, वे कुछ भी आस्वादन नहीं कर पायेंगे—जैसे बहरा व्यक्ति कोयलके स्वर-माधुर्यको अनुभव नहीं कर सकता। जिनका श्रीकृष्णमें प्रेम है, वे भी समान भावसे श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकते। जिसका प्रेम जितना विकसित है, वह उतना ही माधुर्यका आस्वादन कर सकता है। जिसका प्रेम पूर्णतमरूपमें विकसित है, वही माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन कर सकता है। सभी व्रजवासियोंका प्रेम समानभावसे विकसित नहीं है, विभिन्न व्रजवासियोंका प्रेम विभिन्न स्तरतक विकसित है। किन्तु श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त अन्य किसीका प्रेम पूर्णतम विकसित नहीं है, इसलिये श्रीमती राधिकाके अतिरिक्त कोई भी पूर्णतमरूपमें श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादन नहीं कर सकता। कारण, श्रीकृष्ण ही जिस प्रकार स्वयं-भगवान् हैं, अन्य कोई कभी भी स्वयं-भगवान् नहीं हो सकता, वैसे ही श्रीमती राधिका ही सभी शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति हैं, उन्हींमें ही प्रेमका पूर्णतम विकास है, अन्य कोई कभी भी सर्वश्रेष्ठा स्वरूपशक्ति नहीं हो सकता, अन्य किसीमें भी प्रेमका पूर्णतम विकास मादनाख्या-महाभाव नहीं हो सकता, इसलिये अन्य कोई भी श्रीकृष्णके माधुर्यका पूर्णतम आस्वादन नहीं कर सकता॥ १४३॥ ललितमाधव (८/३४)— अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरति मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव॥ १४६॥ २०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१४६-१५१ ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण बोले—“अहो! यह प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन है? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी इच्छा हो रही है॥”१४६॥ अनुभाष्य—द्वारका स्थित नववृन्दावनमें मणिभित्तिमें श्रीकृष्ण अपनी छविमें अपने ही सौन्दर्यका दर्शन करके कह रहे हैं— अपरिकलितपूर्वः (अननुभूत पूर्वः) चमत्कारकारी (विस्मयोत्पादकः) एषः गरीयान् मम कः [अनिर्वचनीयः] माधुर्यपूरः (सौन्दर्यपुञ्जः) स्फुरति (प्रकाशयति)। अयम् अहं (कृष्णः) अपि यं (प्रतिबिम्बरूपं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) राधिका इव लुब्धचेताः [सन्] सरभसं (सोत्सुक्यं) उपभोक्तु श्लोक-भावानुवाद—अहो! इसके पूर्व जिसका अनुभव नहीं किया, ऐसा विस्मयको उत्पन्न करनेवाला यह श्रेष्ठ पुरुष कौन है जो अनिर्वचनीय माधुर्यको प्रकाश कर रहा है? यह मेरा ही प्रतिबिम्बरूप है, तो भी इसे देखकर राधिकाकी भाँति लुब्धचित्त होकर परम उत्सुकतासे इसका आलिङ्गन करनेकी अभिलाषा कर रहा हूँ॥१४६॥ श्रीकृष्णमाधुर्यका बल और उसके आस्वादनके लिये श्रीकृष्णकी चेष्टा :— कृष्णमाधुर्येर एक स्वाभाविक बल। कृष्ण आदि नरनारी करये चञ्चल॥१४७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमाधुर्यका एक स्वाभाविक बल है, जो सभी नर-नारियोंके साथ-साथ स्वयं श्रीकृष्णको भी चञ्चल कर देता है॥१४७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका माधुर्य स्वयं श्रीकृष्णसे लेकर गोपियों, श्रीबलदेव, नारायण, लक्ष्मी और अन्य सभी प्राणियोंके चित्तको चञ्चल करनेमें स्वाभाविक रूपसे समर्थवान् है॥१४७॥ श्रवणे, दर्शने आकर्षये सर्वमन। आपना आस्वादिते कृष्ण करेन यतन॥१४८॥ श्रीकृष्णमाधुर्यपानमें तृप्तिका अभाव, केवल लोभमें वृद्धि :— ए माधुर्यामृत सदा येइ पान करे। तृष्णाशान्ति नहे, तृष्णा बाड़े निरन्तरे॥१४९॥ अतृप्त हइया करे विधिर निन्दन। ‘अविदग्ध विधि भाल ना जाने सृजन॥१५०॥ कोटि नेत्र नाहि दिल, सबे दिल दुइ। ताहाते निमेष,—कृष्ण कि देखिब मुञि॥’१५१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी मधुर वाणीके श्रवणसे, उनके सुन्दर रूपके दर्शनसे सभीका मन आकर्षित हो जाता है; यहाँ तक कि स्वयं श्रीकृष्ण भी इसका आस्वादन करनेकी चेष्टा करते हैं। इस माधुर्यामृतका जो पान करता है, उसकी तृष्णा कभी मिटती नहीं, अपितु तृष्णा निरन्तर बढ़ती ही रहती है। (ऐसा रसिक भक्त श्रीकृष्णके सौन्दर्यपानमें) अतृप्त होकर विधि (स्रष्टा ब्रह्मा) की निन्दा करते हुए कहता है—‘इस मूर्ख ब्रह्माको ठीकसे सृजन करना नहीं आता। चौथा अध्याय | २०९
[ ४/१४८-१५२ सभीको करोड़ों नेत्र ना देकर केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं और उनके ऊपर पलकें भी बना दी हैं। (पलकें बार-बार झपककर श्रीकृष्णके दर्शनमें बाधा देती हैं) हाय! ऐसी अवस्था में मैं श्रीकृष्णका दर्शन कैसे करूँ?'॥ १४८-१५१॥ अमृतकणिका-श्रीकृष्ण-माधुर्य दर्शन करनेपर उसके आस्वादनकी लालसा तो उत्पन्न होती ही है, उस माधुर्यकी कथा अन्योंके मुखसे सुनकर भी लोभ जाग्रत होता है। श्रीकृष्णके माधुर्यका ऐसा स्वभाव है, किसी भी रूपसे किसी भी इन्द्रियके गोचरीभूत होनेसे अपने आस्वादन करनेके निमित्त यह बलवती लालासाको जाग्रत कर देता है। अतृप्त होकर रसिक भक्त कहता है- "पलकहीन कोटि-कोटि नेत्र होनेपर श्रीकृष्णका असमोर्ध्व माधुर्य जो प्रतिक्षण नव-नवरूपमें वर्धित होता रहता है, उसका आस्वादनकर किञ्चित् तृप्ति लाभकी सम्भावना हो सकती है, किन्तु विधाताने मुझे कोटि नेत्र दिये नहीं, केवलमात्र दो ही नेत्र दिये हैं। यदि ये दो नेत्र पलकहीन होते, तो इनके द्वारा निर्बाधरूपमें जितना भी माधुर्यका पान सम्भव होता, उसके द्वारा स्वयंको कृतार्थ मान लेता, किन्तु इन दो नेत्रोंपर भी पलकें दे दीं। मैं किस प्रकार श्रीकृष्णका माधुर्य आस्वादन करूँ? यदि किसीका प्याससे कण्ठ सूख रहा हो और वह सुस्वादु, निर्मल, सुगन्धित जलके समुद्रके पास पहुँचकर एक चुल्लु-भर जल पान करे, तो उसकी प्यास कुछ शान्त होगी। किन्तु चुल्लुभर जलके स्थानपर कुछ-कुछ समयके अन्तरालपर एक कुशाग्रसे एक-एक बूँद जल उसके मुखमें दिया जाय, तो शमित होनेके स्थानपर अग्निमें घी देनेके समान प्यासकी जलन और वर्धित हो जायेगी। बार-बार झपकनेवाली पलकोंसे युक्त मात्र दो नेत्र लेकर असमोर्ध्व-माधुर्यमय श्रीकृष्णरूपके साक्षात् उपस्थित होनेपर भी मेरे जैसे हतभागा माधुर्य-पिपासुकी पिपासाकी तीव्रज्वाला उसी प्रकार वरं उसकी अपेक्षा कोटि गुणा अधिक रूपमें वर्द्धित हुई है। विधाताका यह कैसा निष्ठुर परिहास है! विधाता सृष्टिकार्य तो करता है, किन्तु वह रसज्ञान-शून्य है। यदि उसे रसज्ञान होता, तो जो अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके मुखकमलका दर्शन करेंगे, उनको कोटि नेत्र देता और उनपर पलकें भी नहीं बनाता ॥"१४८-१५१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४०)- गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य चिरादभीष्टं यत्प्रेक्षणे दृशिषु पक्ष्मकृतं शपन्ति। दृग्भिर्हृदिकृतमलं परिरभ्य सर्वा- स्तद्भावमापुरपि नित्ययुजां दुरापम्॥१५२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कुरुक्षेत्रमें गोपियोंने चिरकालसे अभिलाषित श्रीकृष्णको प्राप्त करके उनके दर्शन किये। दर्शनके समय पलकोंके झपकनेसे बाधा आनेपर गोपियाँ नेत्रोंपर पलकोंकी सृष्टि करनेवाले विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। उन सभी गोपियोंने अपने नेत्रोंके द्वारा श्रीकृष्णको अपने हृदयमें ले जाकर उनका यथेष्ट आलिङ्गनकर जिस प्रेमभावको प्राप्त किया, वह प्रेमभाव ब्रह्मका ध्यान करनेवाले योगियोंको भी अप्राप्य है॥ १५२॥ २१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१५२-१५४ ]
अनुभाष्य-कुरुक्षेत्रमें वृष्णियों (यादवों) के साथ गोपोंके मिलनके बाद शुकदेव गोस्वामीके द्वारा श्रीकृष्णके प्रति गोपियोंके मनोभावका वर्णन— यत्प्रेक्षणे (यस्य श्रीकृष्णस्य दर्शने) दृशिषु (नेत्रेषु) पक्ष्मकृतं (व्यवधानकारक-नेत्रलोम-कृतं विधातारं) शपन्ति (भर्त्सयन्ति) सर्वाः गोप्यः [तं] अभीष्टं (कृष्णं) चिरात् (बहुकालानन्तरं) [कुरुक्षेत्रे] उपलभ्य दृग्भिः (नेत्रद्वारैः) हृदिकृतं (हृदये प्रवेशितं) परिरभ्य (आलिङ्ग्य) नित्ययुजां (आरूढयोगिनाम्) अपि दुरापं (दुर्लभं) तद्भावं (परमानन्दघनताम्) आपुः (प्रापुः)। श्लोक-भावानुवाद—उन गोपियोंने बहुत समयके बाद अपने अभीष्ट श्रीकृष्णको कुरुक्षेत्रमें प्राप्त करके अपने नेत्रके द्वारोंसे हृदयमें प्रवेश कराके प्रगाढ़ आलिङ्गन किया, परन्तु श्रीकृष्णके दर्शन करनेपर आँखोंपर दर्शनमें व्यवधान लानेवाली पलकोंके स्रष्टा विधाताकी भर्त्सना करने लगीं। इस प्रकार उन्होंने नित्य-निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगियोंके लिये भी दुर्लभ उस परमानन्दघन भावको प्राप्त किया॥ १५२॥ श्रीमद्भागवत (१०/३१/१५)— अटति यद्भवानह्नि काननं, त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते, जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ १५३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे कृष्ण ! दिनके समयमें जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको ना देखकर हमारा एक-एक त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जो विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती हैं॥” १५३॥ अनुभाष्य—रासके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनके दर्शनके लिये गोपियोंका विलापगीत— यत् (यदा) अह्नि (दिवाभागे) भवान् काननं (वृन्दावनम्) अटति (गच्छति), तदा त्वाम् अपश्यतां [प्राणिनां] त्रुटिः (क्षणार्द्धमपि कालः) युगायते (युगमितकालप्रतीतिर्भवति)। ते (तव) कुटिलकुन्तलं (कुटिलाः वक्राः कुन्तलाः केशाः यस्मिन् तं) श्रीमुखम् उदीक्षताम् (उच्चैः ईक्षमाणानां) च दृशां पक्ष्मकृत् (निमेषस्रष्टा विधाता) जड़ः (मूर्खः) एव। श्लोक-भावानुवाद—जब दिनके समय आप वृन्दावनमें जाते हो, तब तुम्हारे अदर्शनसे हमें आधे क्षणका काल भी युगके समान प्रतीत होता है। वनसे लौटनेपर घुँघराले केशोंसे सुशोभित तुम्हारे परम सुन्दर मुखारविन्दका सिर उठाकर दर्शन करती तो हैं, परन्तु पलकें उसमें बड़ी बाधा देती हैं, इसलिये उन्हें बनानेवाला विधाता (ब्रह्मा) मूर्ख ही है॥ १५३॥ श्रीकृष्णरूप दर्शनमें ही नेत्रोंकी सार्थकता :— कृष्णावलोकन बिना नेत्रे फल नाहि आन। येइ जन कृष्ण देखे, सेइ भाग्यवान्॥ १५४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके दर्शनके अतिरिक्त नेत्रोंका और कोई फल (प्रयोजन) नहीं है। जो व्यक्ति श्रीकृष्णके दर्शन करता है, वही भाग्यवान् है॥ १५४॥
चौथा अध्याय | २९१
[ ४/१५५-१५६ श्रीमद्भागवत (१०/२१/७)— अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननुविवेशयतोर्वयस्यैः। वक्त्रं ब्रजेशसुतयोरनुवेणुजुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम्॥ १५५॥ अनुवाद—गोपियाँ अपनी निजसखियोंके प्रति कहती हैं—“अरी सखियों ! देखो नेत्रधारी जन और उनके नेत्रोंके सौभाग्यका हम क्या वर्णन करें? अर्थात् अनिर्वचनीय होनेके कारण हम वर्णन नहीं कर सकतीं; मैं तो समझती हूँ कि अव्यय शोभावाले श्रीकृष्ण-बलदेव, गोचारणके लिये अपने ग्वाल-बाल और गायोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हों, उन्होंने अपने अधरोंपर वेणु धारण कर रखा हो तथा स्मित हास्य करते हुए प्रेमपूर्ण कटाक्षका हमपर वर्षण कर रहे हों, बस, उस समय हम उनकी मुख-माधुरीका पान करती रहें॥”१५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियाँ बोलीं—“हे सखियों ! गौओंके साथ सखाओंके द्वारा परिवेष्टित होकर कृष्ण और बलराम जब वनमें प्रवेश करते हैं, तब उनके वेणुगीतयुक्त और अनुरक्त-जनोंके प्रति कटाक्षकारी मुखमण्डलका जो लोग अपने नेत्रोंके द्वारा सेवन करते हैं, वे लोग ही धन्य हैं। नेत्रधारी व्यक्तियोंके लिये इसकी अपेक्षा उत्कृष्ट फल और दिखलायी नहीं देता॥”१५५॥ अनुभाष्य—शरत्ऋतु आनेपर श्रीकृष्णके उद्देश्यसे श्रीगोपियोंका गीत— हे सख्यः, वयस्यै (सखिभिः) पशून् अनुविवेशयतोः (वनात् वनान्तरं प्रवेशयतोः) ब्रजेशसूतयोः (रामकृष्णयोः) अनुवेणुजुष्टं (वेणुं वादयत्) अनुरक्त-कटाक्ष-मोक्षं (स्निग्धकटाक्षविसर्गं) वक्त्रं यैः निपीतं (तैरैत् जुष्टं सेवितं तत्) इदं वै अक्षण्वतां (चक्षुष्मतां) फलं, परम् (अन्यत्) न विदामः (विद्मः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५५॥ श्रीमद्भागवत (१०/४४/१४)— गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्। दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य॥ १५६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मथुरावासिनियाँ बोलीं—“आहा! गोपियोंने ऐसी कौनसी तपस्या की! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व, लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥”१५६॥ अनुभाष्य—मथुरामें कंसकी रङ्गभूमिमें उसके दो मल्लयोद्धा मुष्टिक और चाणूरके साथ मल्लयुद्धमें संलग्न श्रीबलराम-कृष्णको देखकर वहाँ एकत्रित मथुरा नारियोंकी उक्ति,— गोप्यः किं तपः अचरन्, यत् (यस्मात्) अमुष्य (श्रीकृष्णस्य) लावण्यसारं (लावण्येन सारं श्रेष्ठम्) असमोर्ध्वं (न विद्यते समं उर्ध्वम् अधिकञ्च यस्य तत्) अनन्यसिद्धं (न अन्येन अलङ्कारादिना सिद्धं किन्तु २१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१५६-१६१ ]
स्वतः एव) अनुसवाभिनवं (प्रतिक्षणम् अभिनवं) दुरापं (दुर्लभं) यशसः श्रियः ऐश्वरस्य एकान्तधाम रूपं दृग्भिः पिबन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५६॥ अपूर्व माधुरी कृष्णेर, अपूर्व तार बल। याहार श्रवणे मन हय टलमल॥१५७॥ कृष्णेर माधुर्ये कृष्णे उपजय लोभ। सम्यक् आस्वादिते नारे, मने रहे क्षोभ॥१५८॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी माधुरी अपूर्व है और उसका अपूर्व बल है। उस माधुरीका श्रवण करनेसे हृदय टलमल (अस्थिर) हो जाता है। श्रीकृष्णको भी अपने माधुर्यके आस्वादनका लोभ होता है। किन्तु [श्रीमती राधिकाके मादनाख्या महाभावके अभावमें] उसका पूर्ण रूपसे आस्वादन ना कर पानेके कारण उनके मनमें क्षोभ रह जाता है॥१५७-१५८॥ (३) तृतीय वाञ्छा :– एइ त' द्वितीय हेतुर कहिल विवरण। तृतीय हेतुर एबे शुनह लक्षण॥१५९॥ एकमात्र स्वरूपदामोदर ही भक्तिरसामृतके मूल महाजन :– अत्यन्त निगूढ़ एइ रसेर सिद्धान्त। स्वरूप गोसाञि मात्र जानेन एकान्त॥१६०॥ येबा केह अन्य जाने, सेह ताँहा हैते। चैतन्यगोसाञिर तँह अत्यन्त मर्म याते॥१६१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी दूसरी इच्छाका अभी वर्णन किया, अब तीसरी इच्छाका विवरण श्रवण करो। इस रसका सिद्धान्त अत्यन्त निगूढ़ है, जिसे केवल श्रीस्वरूप दामोदर ही जानते हैं। यदि अन्य कोई इस सिद्धान्तके विषयमें जानता है, तो वह श्रीस्वरूप दामोदरकी कृपासे ही जानता है। क्योंकि श्रीस्वरूप दामोदर श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय हैं और उनके गुप्त भावोंको जानते हैं॥१५९-१६१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आश्रयजातीय प्रेमके द्वारा कृष्णमाधुरीका सम्पूर्ण रूपसे आस्वादन करनेका लोभ होनेपर भी उसका आस्वादन नहीं कर पानेके कारण श्रीकृष्ण क्षुब्ध हुए। राधिकाके भावग्रहण करनेका दूसरा गूढ़ कारण यह है॥१५९॥ अमृतानुकणिका—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी बहुत वर्षोंतक श्रीस्वरूप दामोदरके सङ्ग रहे और महाप्रभु-सम्बन्धी समस्त कथाएँ उनके मुखसे सुनी। ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामीने वृन्दावनमें दास गोस्वामीसे ये सब कथाएँ श्रवण की। (मध्य, २/८४)– 'श्रीचैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तँहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताहाँ किछु ये शुनिलुँ, ताँहा इहाँ विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे॥
चौथा अध्याय | २१३
[ ४/१५९-१६४ “श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ समस्त रत्नोंकी शिरोमणि हैं। इन लीलाओंमें उनके सङ्गी श्रीस्वरूप दामोदर इनके साक्षी और भण्डारी हैं। उन्होंने ये लीलाएँ श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कण्ठस्थ करायी थीं। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे जो कुछ मैंने सुनी, उन्हींका यहाँ विस्तारसे वर्णन किया है और यह भक्तोंके निमित्त भेंट है।” (मध्य, २/९३)— “स्वरूप-गोसाञिर मत, रूप-रघुनाथ जाने यत, ताइ लिखि’ नाहि मोर दोष॥” “मैंने श्रीस्वरूप गोस्वामीके विचारोंको जैसे श्रीरूप और श्रीरघुनाथ गोस्वामीसे श्रवण करके समझा, उसी रूपमें लिखा है। मैंने इसमें अपने विचारानुसार कोई संशोधन नहीं किया है, इसलिये मेरे लिखनेमें कोई दोष नहीं है॥” १५९-१६१॥ गोपीप्रेमकी संज्ञा :- गोपीगणेर प्रेमेर ‘रूढ़भाव’ नाम। विशुद्ध निर्मल प्रेम, कभु नहे काम ॥ १६२ ॥ अनुवाद—गोपियोंके प्रेमका नाम ‘रूढ़भाव’ है। यह प्रेम विशुद्ध और निर्मल है; यह कभी भी (जड़ीय) ‘काम’ नहीं है॥ १६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘प्रेमेर रूढ़भाव नाम’—प्रेमका नाम रूढ़भाव है। वास्तवमें निर्मलप्रेमकी काम शब्दके द्वारा व्याख्या नहीं होती ॥ १६२ ॥ अनुभाष्य—गोपियोंके महाभावमें सभी सात्त्विकभाव उद्दीप्त अवस्थामें हैं, इसलिये गोपियोंका प्रेम ‘रूढ़भाव’ कहलाता है। “उद्दीप्ता सात्त्विका यत्र स रूढ़ इति भण्यते।” अर्थात् “स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, उसको रूढ़ भाव कहते हैं।” केवल श्रीकृष्णके सुखके लिये होनेके कारण उनका प्रेम निर्मल है, इसलिये वह श्रीकृष्ण-इतर भोगमय घृणित ‘काम’ शब्दके द्वारा वाच्य नहीं है॥ १६२॥ गोपियोंका काम और प्रेम एक ही वस्तु :- भक्तिरसामृतसिन्धु (१/२/२८३-२८४) गौतमीय तन्त्रवाक्य— प्रेमैव गोपरामाणां काम इत्यगमत् प्रथाम्। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥ १६३ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके शुद्धप्रेमको ही ‘काम’ नामसे अभिहित करनेकी प्रथा हुई है। भगवद्भक्त उद्धवादि भी इस प्रेमके पिपासु हैं॥ १६३॥ अनुभाष्य—गोपरामाणां (व्रजललनानां) प्रेमा एव काम इति प्रथां (ख्यातिम्) अगमत्; इति [हेतोः] उद्धवादयः भगवत्प्रियाः (अपर-रस-रसिकभक्ताः) अपि एतं (प्रेमाणं) वाञ्छन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १६३ ॥ काम और प्रेमके स्वरूप-लक्षण भेद :- काम, प्रेम,—दोंहाकार विभिन्न लक्षण। लौह आर हेम यैछे स्वरूपे विलक्षण ॥ १६४ ॥ २१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१६२-१६६ ] अनुवाद-काम और प्रेम दोनोंके अलग-अलग लक्षण हैं, जैसे लोहे और स्वर्णका अपना-अपना स्वरूप है॥१६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-लोहे और स्वर्णका स्वरूप जिस प्रकार परस्पर भिन्न है, काम और प्रेम प्रायः एकजातीय होनेपर भी उनके लक्षण अलग-अलग हैं॥१६४॥ काम और प्रेमकी संज्ञा :- आत्मेन्द्रियप्रीति-वाञ्छा-तारे बलि 'काम'। कृष्णेन्द्रियप्रीति-इच्छा धरे 'प्रेम' नाम ॥१६५॥ अनुवाद-अपनी इन्द्रियोंकी प्रीतिकी इच्छाको 'काम' कहा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंको सुखी करनेकी इच्छाको 'प्रेम' कहा जाता है॥१६५॥ अनुभाष्य-“सर्वथा ध्वंससहितं सत्यपि ध्वंसकारणे। यद्भावबन्धनं यूनोः स प्रेमा परिकीर्त्तितः ॥” अर्थात् “ध्वंसका कारण उत्पन्न होनेपर भी दम्पत्तिका जो सुदृढ़ भाव-बन्धन किसी प्रकारसे भी ध्वंस नहीं होता है, उसे 'प्रेम' कहा जाता है।” एकान्तभावसे सर्वात्मा द्वारा आश्रयजातीय गोपियाँ श्रीकृष्णके भावबन्धनमें सुदृढ़रूपसे आबद्ध हैं। वे कामरूप आत्मसुखके त्यागका सर्वोच्च आदर्श हैं और वे श्रीकृष्णके आनन्दका विधान करनेके लिये उनकी सेवामें ही सदा तत्पर रहती हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये आत्मसुख-ध्वंसमें उनका प्रचुर आनन्द और उनके भावबन्धनकी सुदृढ़ता ही लक्षित होती है॥१६५॥ कामेर तात्पर्य-निजसम्भोग केवल। कृष्णसुखतात्पर्य मात्र प्रेम त' प्रबल ॥१६६॥ अनुवाद-'काम' का अर्थ केवल अपने इन्द्रियसुखका भोग है। किन्तु 'प्रेम' का तात्पर्य केवल श्रीकृष्णको सुखी करना है, इसलिये यह अति प्रबल है॥१६६॥ अमृतानुकणिका-प्रेम और काम, दोनोंका अर्थ है-प्रीतिकी इच्छा। तो क्या प्रेम और काम एक ही हैं? इसके उत्तरमें ही १६२ पयार संख्यामें कहा गया है-'विशुद्ध निर्मल' आदि। काम और प्रेम, दोनोंका अर्थ ही 'प्रीतिकी इच्छा' होनेपर भी भक्तके सम्बन्धमें यह प्रीतिकी इच्छा दो प्रकारकी होती है-निज-प्रीतिकी इच्छा और श्रीकृष्ण-प्रीतिकी इच्छा। रूढ़ि-अर्थसे 'निज-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे काम कहते हैं, वह सङ्कीर्ण और स्वार्थमय है, इसलिये वह निन्दनीय है। और 'श्रीकृष्ण-प्रीतिके निमित्त जो इच्छा है', उसे प्रेम कहते हैं, वह अत्यन्त व्यापक, अत्यन्त उदार, अत्यन्त प्रशंसनीय है, यह सहज ही समझा जा सकता है। इसलिये प्रेमसे प्रीति-इच्छाकी उज्ज्वलतम परिणति होती है और कामसे प्रीति-इच्छाकी मलिनता होती है। प्रेममें यह मलिनता नहीं है, इसलिये प्रेमको निर्मल कहा गया है। प्राकृत काम षड्रिपुओंमें अन्यतम है। रिपु अर्थात् शत्रु, विरोधी आदि। इस कामकी उत्पत्तिके विषयमें गीतामें भगवान् कहते है- “ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते॥ (२/६२) चौथा अध्याय | २१५
[ ४/१६२-१६६
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥” (३/३७) अर्थात् “शब्दादि विषयोंका निरन्तर चिन्तन करनेसे उन-उन विषयोंमें चिन्तनकारी पुरुषकी आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे काम एवं कामसे क्रोधकी उत्पत्ति होती है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न होता है और काममें बाधा आनेपर तमोगुणसे क्रोध उत्पन्न होता है। कामके समान मनुष्यका कोई और दुर्जेय वैरी नहीं है।” इसके द्वारा चालित होकर ऐसा कोई भी अन्याय-कर्म नहीं है, जो मनुष्य नहीं कर सकता। मोह अथवा भगवत्-सम्बन्धज्ञानके अभावसे ही हमारी सब प्रकारकी वासना उदित होती है। कामके द्वारा आक्रान्त होकर जीवकी संसार गति उपस्थित होती है और अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर जीव बहुत भोगके विषयोंकी कल्पना करता है। भोगके विषय सत्य ना होने पर भी वर्तमानमें हमारी अवस्थाके अनुसार अर्थात् भगवान्के साथ सम्बन्धज्ञानके अभावमें वे सत्य प्रतीत होते हैं। साधारणतः प्रेम कहनेसे हमारे मनमें विचार आता है कि जो हमें अच्छा या प्यारा लगता है। अधिकांशतः युवक-युवतीके प्यार अथवा आकर्षणको ही प्रेम शब्दसे सम्बोधित किया जाता है। किन्तु प्रेमका यह वास्तविक अर्थ नहीं है। प्रेम नित्य वस्तु है। इसलिये अनित्य वस्तुमें यह किस प्रकारसे सम्भव है? आज मुझे यदि कोई अच्छा लगता है, कल वही मेरा शत्रु होकर खड़ा हो सकता है। इसलिये इस स्थानपर उसकी नित्यता नहीं है और उसे काम शब्दसे ही अभिहित करना उचित है। हमारा प्यार करनेका कारण है—काम। जहाँ कामके पूर्ण होनेमें बाधा आती है, वहीं प्यार दूर हो जाता है। पति-पत्नीके प्यारको प्रेम नहीं कह सकते, क्योंकि उसका भी कारण काम है। पति-पत्नीका परस्पर स्वार्थ उस सम्बन्धमें विजड़ित है। एक व्यक्ति स्वार्थसे परिचालित होकर दूसरेको प्यार करता है। उपनिषदमें एक बड़ा सुन्दर उपदेश है। श्रुति (बृः उः दूसरा अध्याय चौथा ब्राह्मण पाँचवाँ मन्त्र)— “स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति। न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति। न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति। न वा अरे क्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति। न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रिया भवन्ति। न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवत्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति। न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।” अर्थात् महर्षि याज्ञवल्क्य मैत्रेयीको कह रहे हैं—“हे मैत्रेयी! पतिकी कामना तृप्तिके लिये पत्नीको पति प्रिय नहीं होता। किन्तु पत्नी अपनी निज कामना सिद्धिके लिये ही पतिको प्रिय मानती है। इसी प्रकार पत्नीके सुखसाधनरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये पत्नी कभी भी पतिकी प्रिया नहीं होती, किन्तु अपनी कामना सिद्धिके लिये पत्नी पतिकी प्रिया होती है। पुत्रकी कामना तृप्तिके लिये पिताके लिये पुत्र प्रिय नहीं होता, परन्तु पुत्रके द्वारा अपनी कामना परिपूर्ण
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४/१६२-१६६ ] करवानेके लिये ही पुत्र पिताका प्रिय होता है। इसी प्रकार धनके सुख विधान करनेके लिये धन लोगोंको प्रिय नहीं होता, किन्तु धनके द्वारा अपने इन्द्रियतर्पण करानेके लिये धन लोगोंका इतना प्रिय होता है। ब्राह्मणकी प्रीतिके लिये ब्राह्मण अन्योंके प्रिय नहीं होते, किन्तु ब्राह्मणके द्वारा अपनी कामनाएँ परिपूर्ण करानेके लिये ही ब्राह्मण लोगोंके प्रिय होते हैं। राजाके सुखविधानके लिये राजा प्रजाका प्रिय नहीं होता, किन्तु राजाके द्वारा स्वार्थसिद्धि करवा लेनेके लिये राजा प्रजाका प्रिय होता है। स्वर्गादि स्थानके सुखोत्पादनके लिये स्वर्गादि स्थान जीवोंको प्रिय नहीं होते, किन्तु स्वर्गसे इन्द्रियतृप्ति दोहन करनेके लिये स्वर्ग लोगोंका प्रिय है। देवताओंकी प्रीति उत्पादनके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय नहीं हैं, किन्तु देवताओंसे कामनासिद्धिका सुखभोग दोहन करनेके लिये देवतागण लोगोंके प्रिय होते हैं। प्राणी-जगत्के सुख उत्पादनके लिये प्राणीगण लोगोंके प्रिय नहीं होते, किन्तु इन सब प्राणियोंके द्वारा इन्द्रियतर्पण करवा लेनेके लिये ही प्राणीगण लोगोंके प्रिय होते हैं। मैत्रेयी ! अधिक क्या कहूँ, दूसरोंके सुखके लिये कोई कभी भी प्रिय नहीं होता, केवल अपनी-अपनी कामनातृप्तिका दोहन करनेके लिये ही सभी लोग प्रिय होते हैं।” शास्त्रोंमें कहा गया है कि पतिकी सेवा करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म है। किन्तु पतिव्रता स्त्रीके हृदयके अन्तरतम प्रदेशमें यदि निजस्वार्थ छिपा ना हो, तो पति-सेवनिष्ठता भी सम्भव नहीं होगी। यदि स्त्रीके भीतर कहीं भी निज स्वार्थकी कोई भावना ना हो, तब पति यदि कोढ़ग्रस्त हो जाय, तो स्त्रीकी वह सेवनिष्ठा क्यों नहीं रहती ? और किसी-किसी उदाहरणमें कोढ़ग्रस्त पतिकी सेवा दिखलायी देनेपर भी वह स्वर्गादिकी कामनाके द्वारा ही परिचालित होती है। इसलिये वहाँपर भी शुद्ध निःस्वार्थ पतिव्रता धर्म परिलक्षित नहीं होता। स्वार्थपर प्यारका परिणाम अति भयावह है, मायाबद्ध जीव यह समझ नहीं पाते हैं। भागवत (११/१७/५७-५८)में कहा गया है- “अहो मे पितरौ वृद्धौ भार्या बालात्मजात्मजा। अनाथा मामृते दीनाः कथं जीवन्ति दुःखिताः ॥५७॥ एवं गृहाश्याक्षिप्तः कृपणो मूढधीरयम्। अतृप्तस्ताननुध्यायन्मृतोऽन्धं विशते तमः॥५८॥ अर्थात् “जो भगवत् बहिर्मुख जीव हैं, उनकी स्त्री-पुत्रादिमें आसक्ति इतनी प्रबल है कि उन्हें भगवत्-भजन करनेकी बात कहते ही वे तुरन्त उत्तरमें कहते हैं- मेरे वृद्ध माता-पिता, पत्नी, अनाथ सन्तानकी यदि मैं नहीं देखभाल नहीं करूँ, तो वे किस प्रकार जीवन धारण करेंगे ? इस प्रकारसे गृहासक्त वे मूर्ख लोग संसारासक्तिके फलस्वरूप मृत्युके पश्चात् अन्धतम नरकमें प्रवेश करते हैं।” आजकल अनेक लोग दरिद्रोंकी सेवा करते हुए उन्हें 'दरिद्र नारायण' की संज्ञा देते हैं। इस प्रकार वे लक्ष्मीपति नारायणको दरिद्र कहनेसे भी सङ्कोच नहीं करते- यह बड़ा हास्यास्पद विषय है। अधिकांश समाजसेवियोंका कहना है- 'प्रत्येक प्राणीके शारीरिक और मानसिक अभाव-असुविधा दूर करना ही 'प्राणीमात्रसे प्रेम' है और ये सभी प्राणी ही बहुरूपमें ईश्वर हैं। उनकी सेवा ही ईश्वरकी सेवा है।' किन्तु शास्त्रके विचारसे यह प्रेम शब्दका अति विकृत चौथा अध्याय | २१७
[ ४/१६२-१६६ अर्थ है। जीवको कभी भी ईश्वर नहीं कहा जा सकता। जीव विभु चैतन्य श्रीभगवान्का विभिन्नांश अणुचित् है। ईश्वर मायाधीश हैं और जीव मायाके वशीभूत होने योग्य है। 'काम' शब्दका पारिभाषिक अर्थ जाननेपर उसके भ्रमसे मुक्त होनेकी आशा हो सकती है। 'आत्मेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छा ..' का तटस्थ होकर विचार करनेसे यह समझ सकते हैं कि 'काम' वाञ्छाके अन्तर्भुक्त होनेपर भी वाञ्छामात्र ही 'काम' नहीं है। भुक्तिकामी—जो भोगके द्वारा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियकी तुष्टिकी ही कामना करते हैं, मुक्तिकामी—जो त्रितापसे मुक्त होकर 'अहं ब्रह्मास्मि', इस भावको हृदयमें धारणकर मनकी तुष्टिके लिये व्यस्त हैं, और सिद्धिकामी—जो अष्टाङ्ग-योगके द्वारा अणिमा-लघिमादि अष्टसिद्धियोंके द्वारा लोगोंके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित करनेके लिये मनकी तुष्टिको लक्ष्य करते हैं, उन्हें ही समझना चाहिये। ये सभी अपनी इन्द्रियोंकी तुष्टिके लिये कार्य करते हैं, इसलिये ये सभी कामी हैं। काम अनेक रूपोंमें आकर लोगोंकी वञ्चना करता है। कभी वह अत्यन्त निकृष्ट स्थूल भावसे देहसे देहमें आकर्षण या स्त्री-पुरुषके कामके रूपमें, कभी त्याग, परार्थ-परता, आत्मदान, मातृस्नेह, भ्रातृभाव, देश-प्रीतिके रूपमें सजकर प्रच्छन्न भावसे उपस्थित होता है। निःस्वार्थपरता या त्याग आकाश-कुसुमके जैसे निरर्थक वाक्यविशेष हैं। एक जड़ मन-बुद्धि-अहङ्कारयुक्त मानव एक मानवके जड़देहके दुःखोंसे दुःखित होकर उसके दुःखको दूर करनेमें व्यस्त है, उसे कामके अतिरिक्त क्या कह सकते हैं? एक भगवतोन्मुख जीवात्मा जब एक जीवात्माकी कृष्णसेवा-विमुखता देखकर दुःखी होकर हरिकथा-कीर्तनके द्वारा साधु-शास्त्रके उपदेशके द्वारा उसको श्रीकृष्णसेवामें उन्मुख करनेके लिये व्यग्र होता है, तब इस वृत्तिको प्रेमकी पूर्व अवस्था कहा जा सकता है। इसलिये विभुचित् परमात्माके प्रति अणुचित् आत्माका जो स्वाभाविक निरन्तर अहैतुक आकर्षण है, वही सेवा है। उस सेवाकी परिपक्व अवस्था ही प्रेम है। प्रेम अप्राकृत वस्तु है। शुद्ध चेतन और शुद्ध चेतनमें प्रेम होता है। अचेतनसे अचेतन अथवा चेतनसे अचेतनका प्रेम नहीं हो सकता, वह काम ही है। आत्मा ही केवल स्वरूपसे भगवत्-सेवा प्रवृत्तिविशिष्ट है, सेवाके अतिरिक्त निर्मल जीवात्माकी और कोई वृत्ति नहीं है, इसलिये देह और मनकी अधीनतासे मुक्त आत्मा केवल श्रीकृष्णसेवा ही चाहती है, यही उसका स्वभाव है और यह इन्द्रियोंकी तुष्टि नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णभक्त निष्काम हैं। प्रेम कहनेसे भगवत्तोषणमें जो एकाग्रता, अव्यभिचारिणी रति होती है, उसीको समझना चाहिये। तत्त्वज्ञानके अभावके कारण फल्गु या शुष्क वैरागी लोग यह मानते हैं कि जो राग नश्वर पदार्थ और उसके केवल कामरूप आकारका ही है, उसके अभावमें वह समूल ध्वंसको प्राप्त होता है। रागके कामरूप विलयसे उसका प्रेमरूप आकार जो स्वतः ही प्रकट होता है, उसे शुष्क-वैरागी लोग नहीं जानते हैं। क्योंकि उन्हें प्रेमका परिचय ज्ञात नहीं है, इसलिये वे हरिसेवोपयोगी सामग्री अथवा क्रियाको प्रापञ्चिक पदार्थकी भाँति कार्यविशेष मानते हैं और उसमें हेयज्ञान करके उसमें श्रद्धा नहीं रखते हैं। सर्वप्रकार काम, मूल कामदेव श्रीकृष्णमें नियोजित ना होने तक काम दूर नहीं होता। काम अन्धतम एक अवस्था है और आत्मेन्द्रिय २१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१६२-१६६ ] प्रीति ही इसकी प्रवर्त्तक है। कृष्णेन्द्रिय प्रीतिरूप प्रेम भास्करके उदय होनेसे ही काम दूर होता है। जैसे (भःरःसिः १/२/२५६)— “प्रापञ्चकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि वस्तुनः। मुमुक्षुभिः परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते॥” अर्थात् “जो भगवत्सेवाको जीवनका चरम प्रयोजनीय तत्त्व जानकर क्रमशः भक्तिपथपर अग्रसर होते हैं, वे धीरे-धीरे रागके हेय आकार अथवा कामरूप मलराशिका परित्याग कर देते हैं।” भक्ति अथवा भगवान्में स्वाभाविक आत्मवृत्तिके द्वारा ही भगवान् सेवित होते हैं। अच्युत भगवान्की भक्तिके द्वारा सब जीवोंकी सेवा स्वतः ही हो जाती है। भागवत (४/३१/१४)— “यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखाः। प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या॥” अर्थात् “जिस प्रकार वृक्षकी जड़को भलीभाँति सींचनेसे उसका तना, शाखा, उपशाखा, पत्र-पुष्पादि सभी सञ्जीवित हो जाते हैं तथा भोजनके द्वारा प्राणोंको तृप्त करनेसे समस्त इन्द्रियोंकी तृप्ति हो जाती है, उसी प्रकार एकमात्र श्रीभगवान्की सेवाके द्वारा सभी जीवोंकी, सभी देवताओंकी, चराचर जो कुछ भी है, प्रत्येककी सेवा होती है। (परन्तु जो ऐसा ना करके आँखमें, कानमें, नाकमें भोजन अर्पण करे, तो बहुत स्थानोंमें भोजन अर्पण करनेके क्लेशसे और निराहार होनेसे मृत्यु हो जायेगी)।” क्योंकि प्रत्येक प्राणीके अन्तर्यामीरूपमें वे भगवान् ही अधिष्ठित हैं। भगवान्की सेवा होनेसे, उनकी सन्तुष्टि होनेसे उनके नित्यदासगण भी सन्तुष्ट हो जाते हैं— “तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।” भक्तिरसामृतसिन्धु (१/४/१) में 'प्रेम'की संज्ञा इस प्रकार निर्दिष्ट हुई है— “सम्यङ् मसृणित-स्वान्तो ममत्वाश्याङ्कतः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते॥” अर्थात् “अन्तःकरण सम्यक् मसृणित होकर अतिशय ममतायुक्त भाव-गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसको 'प्रेम' कहते है।” महावदान्यावतार श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतीर्ण होनेसे पूर्व प्रेम और कामका यह पार्थक्य लोग नहीं जानते थे, वे कामको ही प्रेम कहकर भ्रमित होते थे। महाप्रभुने ही हमें प्रेमका सन्धान दिया है। इस विषयमें श्रीलप्रबोधानन्द सरस्वतीपादने कहा है— “प्रेमा नामाद्भुतार्थः श्रवणपथगतः कस्य नाम्नां महिम्नः को वेत्ता कस्य वृन्दावनविपिन-महामाधुरीषु प्रवेशः। को वा जानाति राधां परमरसचमत्कारमाधुर्यसीमा- मेकश्चैतन्यचन्द्रः परमकरुणया सर्वमाविश्चकार॥” अर्थात् “प्रेम नामक परम पुरुषार्थ किसके श्रवणगोचर हुआ था? कौन श्रीनामकी महिमा जानता था? किसका वृन्दावनके गहन-महामाधुरी-कदम्बमें प्रवेश था? कौन परम-चमत्कार अधिरूढ़-महाभाव-माधुर्यकी पराकाष्ठा श्रीवार्षभानवीको (उपास्यवस्तु रूपमें) जानता था? एक श्रीचैतन्यचन्द्रने ही परम औदार्यलीला प्रकट करके इन सबका आविष्कार किया है।” चौथा अध्याय | २१९
[ ४/१६२-१७० एक ग्रन्थ 'रामकृष्णकथामृत'में लिखा है—"जब केवल ईश्वरका ही दर्शन करना चाहते हो और धन, मान, देहसुख कुछ भी नहीं चाहते हो, तो इसका नाम शुद्धा भक्ति है।" किन्तु श्रीचैतन्यदेवने कहा—"धन, मान, देहसुख मात्र ना चाहना ही केवल शुद्ध भक्तिका मापदण्ड नहीं है, भगवान्के दर्शनकी इच्छा भी एक सम्भोगलालसा है। भगवान्के द्वारा दर्शन देनेपर मुझे सुख होगा, उससे भगवान्को सुख नहीं होता। भगवान्के सुखका अनुसन्धान ही 'शुद्धा भक्ति या प्रेम' है।" श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित 'शुद्धा भक्ति' या 'प्रेम' सम्भोगवादके ऊपर प्रतिष्ठित नहीं है, वह विप्रलम्भमय है। सभी इन्द्रियोंसे श्रीकृष्णकी इन्द्रिय-तृप्तिके लिये समस्त चेष्टाओंके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा, कृष्णसे इतर वस्तुकी पूजा, निर्भेदज्ञान, नित्य-नैमित्तिक कर्म, हठयोग, राजयोगादि, फल्गुवैराग्य-तपस्या आदि समस्तका परित्याग करके अनुकूल भावसे सभी इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके अनुशीलनका नाम ही शुद्धभक्ति है। यही पञ्चरात्र और श्रीमद्भागवत अनुमोदित 'शुद्धभक्ति' है। श्रीमद्भागवत और श्रीचैतन्यदेवके निकट शुद्धभक्ति और प्रेमकी शिक्षा छोड़कर अभक्तके निकट प्रेमकी शिक्षाके लिये नहीं जाना चाहिये; कुम्हारकी दुकानमें कोहीनूर हीरा नहीं मिलता॥ १६२-१६६॥ श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण और परिचय :- लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म। लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख-मर्म॥ १६७॥ दुस्त्यज आर्यपथ, निज परिजन। स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन॥ १६८॥ सर्वत्याग करि' करे कृष्णेर भजन। कृष्णसुखहेतु करे प्रेम-सेवन॥ १६९॥ इहाके कहिये कृष्णे दृढ़ अनुराग। स्वच्छ धौतवस्त्रे यैछे नाहि कोन दाग॥ १७०॥ अनुवाद—गोपियोंने दुस्त्यज्य लोकधर्म अर्थात् समाजके नियम, वेदधर्म, देहधर्म अर्थात् देहकी रक्षा-पोषणादि, [सकाम] कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, आत्मसुख और वर्णाश्रमधर्मका त्याग कर दिया। उन्होंने श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपने परिवारवालोंकी डाँट-फटकार-दण्डकी भी परवाह नहीं की। उन्होंने केवल श्रीकृष्णको सुखी करनेके लिये उनकी प्रेममयी सेवा की। इसीको श्रीकृष्णमें दृढ़ अनुराग कहते हैं। स्वच्छ धुले हुए वस्त्रकी भाँति इसमें कोई भी स्वसुखवासनारूप दाग नहीं होता है॥ १६७-१७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अपने सुख-भोगके उद्देश्यवाली इच्छाओंका नाम 'काम' है। वेदोंमें स्वजनतृष्णा, पुत्रतृष्णा, धनतृष्णा आदि शब्दोंके द्वारा जो कामनाएँ वर्णित हैं, वे ही लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य, देहसुख, मुक्ति आदि रूप निजसुख, आर्यपथ, सम्बन्धियोंसे प्रीति और उनको ताड़न-भर्त्सन एवं भय—ये सब कामरूप अपनी इन्द्रिय-प्रीतिकी वाञ्छाएँ हैं और इन सब कार्योंमें अपनी इन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छा ही प्रवर्तक है। 'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ'—ऐसी बुद्धिके अनुगत जितनी भी इच्छाएँ हैं, वे श्रीकृष्णकी इन्द्रियोंकी प्रीतिवाञ्छा होती हैं। 'मैं २२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
फलका भोक्ता हूँ'—ऐसी बुद्धिसे जो समस्त इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं, वे समस्त कामवाञ्छाएँ ही हैं। इन सबके त्यागके द्वारा देहकार्य-मनःकार्यादिके परित्यागका परामर्श नहीं है। देहकार्य-मनःकार्य सभीमें यदि 'मैं कृष्णदास हूँ', ऐसी बुद्धिके द्वारा प्रवर्तन करनेवाली प्रवृत्ति रहती है, तो वह 'काम' नहीं है॥१६५-१७०॥ अमृतानुकणिका—'लोकधर्म'—लोक समाजमें परस्पर सौहार्द, मर्यादा रक्षाके निमित्त जो सब आचरण पालन करते हैं, वे सभी लोकधर्म हैं। यदि कोई मेरी विपत्तिमें सहायता करता है, तो मेरा भी कर्त्तव्य होता है, उस व्यक्तिकी विपत्तिमें सहायतादि करना। सभी लोकाचार सम्बन्ध इसी प्रकार हैं; लोकधर्मके पालनमें निजी सुविधा है और पालन ना करनेमें असुविधा, इसलिये लोकधर्म पालन कामके ही अन्तर्गत है। 'वेदधर्म'—वेद-विहित कर्मादि; यज्ञानुष्ठानादि; वेद विहित कर्मादि करनेसे परकालमें स्वर्गादि-सुखभोग और इहकालमें धन-सम्पत्ति आदि प्राप्तिकी सम्भावना होती है। इस प्रकार आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे वेदधर्म भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहधर्म'—भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदिकी निवृत्तिके जो कुछ किया जाता है, वह देहधर्म कहलाता है; ये सब कर्म अपने सुखके लिये किये जाते हैं, इसलिये देहधर्म भी कामके अन्तर्गत है। 'कर्म'—सकाम कर्म अर्थात् जो भी वेद विहित कर्म अपने सुखके निमित्त किये जाते हैं, वे भी कामके अन्तर्गत हैं। 'लज्जा' एवं 'धैर्य'—लज्जा एवं धैर्यकी रक्षा नहीं करनेसे समाजमें कलङ्कित होनेपर दुःख होगा, इसलिये लज्जा-धैर्य-रक्षाके द्वारा आत्मसुखका पोषण होनेके कारण ये भी कामके ही अन्तर्गत हैं। 'देहसुख'—देहके सुखजनक कार्य; जैसे पाद-सम्वाहन, ग्रीष्मकालमें पंखेके द्वारा हवा, शीतकालमें अग्नि-तापादि, ये सभी आत्मेन्द्रिय-तृप्तिमूलक होनेके कारण कामके अन्तर्गत ही हैं। 'आत्मसुख-मर्म'—उपरोक्त लोकधर्म, वेदधर्म, देहधर्म, कर्म, लज्जा, धैर्य और देहसुख-ये सभी ही आत्मसुख-मर्म अर्थात् इन सभीका मर्म अथवा तात्पर्य आत्मेन्द्रिय-तृप्ति है, इसलिये ये सभी ही काम हैं। 'आर्यपथ'—आर्य किसे कहते हैं? “कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन्। तिष्ठति प्रकृताचारो यः स आर्य इति स्मृतः॥” अर्थात् “कर्त्तव्य कर्मका आचरण और अकर्त्तव्य कर्मका अनाचरण करते हुए जो व्यक्ति वास्तविक आचार पालन करता है, उसे आर्य कहा जाता है।” इस प्रकार सदाचार-परायण आर्योंने जिसे सदाचार कहकर निर्दिष्ट किया है, वही आर्य पथ है। जैसे कुलरमणीके लिये पातिव्रत्यादि आर्यपथ है और इसका लोकसमाजमें रहते हुए त्याग करना दुष्कर है, क्योंकि इसके त्यागसे उनपर कलङ्क लगेगा और उनकी निन्दा होगी। परन्तु जो आर्यपथमें अवस्थित हैं, वे लोकसमाजमें सुख, ख्याति, सम्मानादि भोग करते हैं, इसलिये यह भी आत्मसुख पोषक होनेके कारण कामके ही अन्तर्गत है। 'निज परिजन'—कुलरमणी यदि पिता-माता, सास-ससुरादिका त्याग करके स्वतन्त्र आचरण करे, तो वह समाजमें कलङ्कित होती है तथा दुःख भोग करती है। परन्तु निज परिजनके बन्धनमें रहनेसे सभी सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है। 'स्वजने करये यत ताड़न-भर्त्सन'—परिवारजनोंकी डाँट-फटकार और अपमानके भयसे आर्यपथमें अवस्थान करना भी आत्मसुखका ही पोषण करता है, इसलिये यह भी कामके अन्तर्गत है।