श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्बित्की विकृतिमय-क्रिया है। जड़व्यतिरेक निर्विशेषज्ञान भी जड़ज्ञानके सम्बन्धाश्रित होनेसे क्षुद्र है, वह केवल जीवगत सम्बित्-शक्तिका कार्य है, इसलिये असम्पूर्ण है। उस ज्ञानका नाम 'ब्रह्मज्ञान', 'आत्मज्ञान', 'निर्विशेषज्ञान', 'अभेदज्ञान' आदि है। चित्गत सम्बित्-शक्ति जब ह्लादिनीके साथ युक्त होकर जीवोंपर कृपा करती हैं, तब श्रीकृष्णमें भगवत्ता-ज्ञान उदित होता है; इसलिये यह ज्ञान ही सम्बित्का सार है। उपरोक्त ब्रह्मज्ञान और विषयज्ञान उनके परिवार अर्थात् अवस्था-भेदसे आवरणमात्र हैं॥६७॥ ह्लादिनीके विभाग और विविध चित्विकार; उस विकारके क्रमसे श्रीकृष्णप्रणय-पराकाष्ठा महाभाव-स्वरूपा ही श्रीराधा :- ह्लादिनीर सार 'प्रेम', प्रेमसार 'भाव'। भावेर परमकाष्ठा, नाम- 'महाभाव' ॥ ६८ ॥ महाभावस्वरूपा श्रीराधा-ठाकुराणी। सर्वगुणखनि कृष्णकान्ताशिरोमणि ॥ ६९ ॥ अनुवाद-ह्लादिनी शक्तिका सार 'प्रेम' है और प्रेमका सार 'भाव' है। भावकी पराकाष्ठाका नाम 'महाभाव' है। श्रीराधा-ठाकुराणी महाभावस्वरूपा हैं। वे सभी गुणोंकी खान और श्रीकृष्ण-प्रेयसियोंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ह्लादिनीकी क्रियाका नाम 'प्रेम' है। वह प्रेम दो प्रकारका होता है, शुद्धप्रेम और मिश्रित-प्रेम। श्रीकृष्णगत ह्लादिनीशक्ति श्रीकृष्णको आनन्द प्रदान करके जब शुद्ध सम्बित्के साथ मिलकर जीवपर कृपा करती है, तभी जीवका श्रीकृष्णसे प्रेम होता है। जीवगत ह्लादिनीका विकार जब मायाशक्तिके द्वारा जीवको आकर्षण करता है, उस समय जीव विषयप्रेममें मत्त होकर श्रीकृष्णप्रेमसे वञ्चित होकर संसारके सुख-दुःखके वशीभूत हो जाता है। जीवोंके प्रेमका आदर्श ब्रजकी गोपियाँ हैं और उनमें श्रीराधा सर्वश्रेष्ठा हैं। चित्स्वरूपगत ह्लादिनीका सार जो 'प्रेम' है और उस प्रेमका सार जो 'भाव' है तथा उस भावकी पराकाष्ठा जो 'महाभाव' है, वही श्रीमती राधिका ठाकुराणी हैं। वे ही सर्वगुणोंकी मूल हैं और श्रीकृष्णकान्ताओंकी शिरोमणि हैं॥६८-६९॥ अमृताणुकणिका-(उःनीः स्थायीभाव-प्रकरण)-प्रेम क्रमशः गाढ़ताको प्राप्त करता हुआ स्नेह, मान, प्रणय, राग और अनुराग अवस्थाओंके बाद जिस चरम सीमाको प्राप्त करता है, उसे भाव कहते हैं। जो प्रेम परिपक्व होकर चरमसीमाकी प्राप्तिकर चित्तरूपी प्रदीपको प्रकाशितकर हृदयको द्रवीभूत करता है, उसे स्नेह कहा जाता है। इस स्नेहके उदय होनेपर दर्शनादिमें अर्थात् परम मधुर रूप, गुण और लीलादिके यथायोग्य श्रवण, स्मरण और अनुमोदनादिसे कभी भी तृप्ति नहीं होती। जो स्नेह और भी उत्कृष्ट होकर श्रीराधाकृष्णयुगलको नित्य नये-नये माधुर्यका अनुभव कराता है और स्वयं बाहरमें कौटिल्यको धारण करता है, उसे मान कहते हैं। अत्यन्त प्रगाढ़ विश्वास धारण करनेपर उक्त मान ही प्रणयका नाम धारण करता है। प्रणयोत्कर्षवशतः जहाँ चित्तमें अत्यन्त दुःख भी अत्यन्त सुखके रूपमें अनुभूत होता है, उसका नाम राग है। जो राग नित्य नवनवायमान होकर अनुभूत प्रियजनको सदा सर्वदा
चौथा अध्याय | १८३