श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनित्य-नवीन ही बोध कराता है, पण्डितलोग उस रागको अनुराग कहते हैं। वह अननुभूत तत्त्व अर्थात् अनास्वादनीयत्व, कहीं-कहींपर आंशिक रूपमें और कहीं-कहींपर सर्वांश रूपमें-दो प्रकारका होता है। अनुराग अपनी अनुभवावस्थाको प्राप्त करता हुआ जब स्वजातीयाशय स्निग्ध साधक भक्तोंमें भी व्याप्ति करता है अर्थात् जिसके अनुभवसे साधक भक्तगण भी अनुरागसे विवश हो जाते है, तब उसे भाव कहते हैं अथवा यावदाश्रयवृत्ति रूपमें अनुराग जब स्वसंवेद्य दशाको प्राप्त होकर प्रकाशित होता है, तब उसे भाव कहते हैं। पण्डितोंके मतमें यह महाभाव रूढ़ और अधिरूढ़ दो प्रकारका होता है। स्तम्भादि अष्टसात्त्विक भाव विकार जहाँपर उद्दीप्त होते हैं, (अत्यन्त कष्टसे भी किसी प्रकार उन्हें छिपाया नहीं जा सके) उसको रूढ़भाव कहते हैं। जिस समय उक्त अनुभावसमूह रूढ़भावमें कहे गये अनुभावोंसे भी उत्तरोत्तर किसी विशेष दशाको प्राप्त होते हैं, उसे अधिरूढ़ महाभाव कहते हैं। यह अधिरूढ़भाव दो प्रकारका होता है-मोदन और मादन। जिस अधिरूढ़ महाभावमें नायिका और नायकके स्तम्भादि सात्त्विक भावसमूह अतिशय उद्दीप्त रूपमें प्रकाशित होते हैं, उसे मोदन कहते हैं। यह मोदन ही दोनों प्रवासियोंमें उदित होकर विरहदशामें 'मोहन' नामसे कथित होता है। इस मोहन-महाभावमें भी विरह-विवशता हेतु सात्त्विकभावसमूह सूदीप्त रूपमें प्रकाशित हुआ करते हैं। रति आदि महाभावके भेद अधिरूढ़ मोदन तक भावोंका जो प्राकट्य होता है, उससे भी अधिक उत्कर्ष-विशिष्ट, अतः श्रेष्ठ मोदन महाभावसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट जो ह्लादिनी नामक महाशक्तिका स्थिरांश है, जो केवल श्रीमती राधिकामें ही सदाकाल विराजमान होता है, उसे मादन महाभाव कहते हैं। यह मादन ललिता इत्यादिमें भी उदित नहीं होता। इस पयारमें 'महाभाव स्वरूपा-श्रीराधा ठाकुरानी' कहनेसे महाभावकी सर्वोच्च अवस्था 'मादन'को ही समझना होगा। सर्वगुणखनि- (उःनीः राधा-प्रकरण) - श्रीकृष्णके समान श्रीमती राधिकाके भी असंख्य गुण हैं। उनमेंसे पच्चीस मुख्य गुण हैं- (१) मधुर अर्थात् वे देखनेमें परम सुन्दरी हैं, (२) नवयुवती अर्थात् किशोर वयसवाली हैं, (३) चञ्चल कटाक्षवाली हैं, (४) उज्ज्वल मृदुमधुर हास्यकारिणी हैं, (५) सुन्दर सौभाग्यको सूचित करनेवाली रेखाओंसे युक्त हैं, (६) अपनी अङ्गगन्धसे श्रीकृष्णको भी उन्मत्त करनेवाली हैं, (७) सङ्गीतविद्यामें पारदर्शी, (८) रम्यवाक्य अर्थात् मृदुभाषा बोलनेवाली, (९) नर्मपण्डिता अर्थात् परिहास करनेमें पटु, (१०) विनीता, (११) करुणापूर्ण अर्थात् दयालु, (१२) विदग्धा अर्थात् रसविषयमें अत्यन्त चतुर हैं, (१३) सब कार्योंमें चातुरीयुक्ता हैं, (१४) लज्जाशीला, (१५) सुमर्यादा अर्थात् साधुमार्गपर अटल रहनेवाली, (१६) धैर्यशालिनी, (१७) गम्भीर, (१८) सुविलासा अर्थात् सुविलासप्रिया हैं, (१९) महाभावके परमोत्कर्षको प्रकट करनेमें परम व्यग्र रहती हैं, (२०) गोकुलप्रेमवसति अर्थात् उनको देखते ही गोकुलवासियोंके हृदयमें प्रेम उमड़ पड़ता है, (२१) अखिल ब्रह्माण्डमें उनकी कीर्त्ति व्याप्त है, (२२) गुरुजनोंके स्नेहकी पात्री हैं, (२३) सखियोंके प्रणयके अधीन रहती हैं, (२४) श्रीकृष्णकी समस्त सखियोंमें प्रधाना हैं, और (२५) केशव सदा उनकी आज्ञाके अधीन रहते हैं॥ ६८-६९॥ १८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत