श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/७०-७२ ] उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीराधा-प्रकरणसे (३)— तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका। महाभावस्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी॥७०॥ अनुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावलीके मध्यमें भी श्रीराधा ही सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपिणी हैं अर्थात् उनका विग्रह महाभावमय हैं, क्योंकि वे ह्लादिनी शक्तिकी सारांश हैं और गुणोंमें भी अत्यन्त श्रेष्ठा हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजविलासिनी गोपियोंमें चन्द्रावली और राधिका श्रेष्ठा हैं। उन दोनोंमें भी श्रीमती राधिका सभी प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। वे महाभावस्वरूपा हैं, उनके तुल्य गुण किसी और गोपीमें भी नहीं हैं॥७०॥ अनुभाष्य—तयोः (श्रीराधाचन्द्रावल्योः) उभयोः अपि मध्ये राधिका सर्वथाधिका (सर्वप्रकारेण अधिका श्रेष्ठा)। इयं (श्रीराधिका) महाभावस्वरूपा (मादनाख्यमहाभावविशिष्टा अष्टभावसमन्वितविग्रहा) गुणैः (पञ्चविंशति संख्यकैः) अति वरीयसी (सर्वश्रेष्ठा)। श्लोक-भावानुवाद—श्रीराधा और श्रीचन्द्रावली, दोनोंके मध्यमें भी श्रीराधिका सब प्रकारसे श्रेष्ठा हैं। श्रीराधिका मादनाख्या महाभावविशिष्ट अष्ट-सात्त्विक भाव-समन्वित विग्रह हैं, वे पच्चीस दिव्य गुणोंसे युक्त सर्वश्रेष्ठा हैं॥७०॥ कृष्णप्रेम-भावित याँर चित्तेन्द्रिय-काय। कृष्ण-निजशक्ति राधा, क्रीड़ार सहाय॥७१॥ अनुवाद—श्रीराधाके चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमसे भावित (गठित) हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं और वे श्रीकृष्णकी सभी प्रकारकी लीलाओंमें सहायता करती हैं॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीमती राधिका पूर्ण चिन्मयी हैं, जड़-मायाबद्ध जीवकी भाँति उनकी जड़-इन्द्रियाँ, जड़-शरीर और लिङ्ग-शरीररूप चित्त नहीं है। उनके चिन्मय स्वरूपमें शुद्ध चिन्मय-चित्त, चिन्मय-इन्द्रियाँ और चिन्मय-शरीर है। उनका चित्त, इन्द्रियाँ और शरीर श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा भावित हैं। वे श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति हैं, इसलिये वे एकमात्र श्रीकृष्णकी क्रीड़ा (लीला) में सहायिका हैं। शक्तिमान्-तत्त्व श्रीकृष्ण, शक्तिसे पृथक् होनेपर किसी प्रकारकी क्रीड़ा नहीं कर सकते। स्वरूपशक्तिकी सन्धिनीने श्रीकृष्णके चिन्मय कलेवर (शरीर) को प्रकट किया है। उसी कलेवरमें जब श्रीकृष्ण क्रीड़ा करते हैं, उस समय श्रीमतीकी सहायताके बिना वे क्या कर सकेंगे? इसलिये राधिका ही श्रीकृष्णकी क्रीड़ामें एकमात्र सहायिका हैं॥७१॥ गोलोकमें गोपियोंके साथ नित्य रासविलासी गोविन्द :— ब्रह्मसंहिता (५/३७)— आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि- स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः। गोलोक एव निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७२॥ चौथा अध्याय | १८५