श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/६१-६२ अनुवाद—सच्चिदानन्द और स्वयंमें पूर्ण, यह श्रीकृष्णका स्वरूप है। उनकी चित्-शक्ति एक ही होकर तीन रूप धारण करती है॥६१॥ आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे सन्धिनी। चिदंशे सम्वित्—यारे ज्ञान करि' मानि॥६२॥ अनुवाद—वह चित्-शक्ति आनन्द-अंशसे ह्लादिनी, सत्-अंशसे सन्धिनी और चित्-अंशसे सम्वित् जिसको ज्ञान भी कहा जाता है, इन तीन रूपोंको धारण करती है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्णतत्त्व श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द स्वरूप हैं। उनकी एक ही चित्-शक्ति पहले सत्-अंशसे सन्धिनी अर्थात् सत्ताका विस्तार करनेवाली है, चित्-अंशसे पूर्ण ज्ञानरूप सम्वित्तत्त्व अर्थात् श्रीकृष्णका स्वरूपतत्त्व है और आनन्द-अंशसे ह्लादिनी अर्थात् उसी स्वरूपतत्त्वको आह्लाद-प्रदान करनेवाली है॥६१-६२॥ अनुभाष्य—श्रीजीवप्रभु श्रीभगवत्-सन्दर्भमें (संख्या १०२) में कह रहे हैं— “सद्रूपत्वेन व्यपदिश्यमानो यया सत्तां दधति धारयति च सा सर्वदेश-काल-द्रव्यादि-प्राप्तिकरी सन्धिनी; तथा सम्विद्रूपोऽपि यया सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा सम्वित्; तथा ह्लादरूपोऽपि यया सम्विदुत्कर्षरूपया तं ह्लादं सम्वेत्ति सम्वेदयति च, सा ह्लादिनीति विवेचनीयम्। तदेवं तस्या मूलशक्तेस्त्रयात्मकत्वे सिद्धे येन स्वप्रकाशतालक्षणेन तद्वृत्तिविशेषेण स्वरूपं स्वयं स्वरूपशक्तिर्वा विशिष्टं वाविर्भवति तद्विशुद्धसत्त्वम्। तच्चान्य-निरपेक्षस्तत्प्रकाश इति ज्ञापनज्ञानवृत्तिकत्वात् सम्विदेव। अस्य मायया स्पर्शाभावात् विशुद्धत्वम्। यतश्च सत्त्वात् लोको वैकुण्ठाख्यः प्रकाशते। सत्त्व-शब्देन स्वप्रकाशता-लक्षण-स्वरूप-शक्तिवृत्तिविशेष उच्यते। प्रकृतिगुणः सत्त्व-मित्यशुद्धसत्त्व-लक्षणप्रसिद्धयनुसारेण तथाभूतश्विच्छक्तिविशेषः सत्त्वमिति सङ्गतिलाभात्। ततश्च तस्य स्वरूपशक्तिवृत्तित्वेन स्वरूपात्मतैवेत्युक्तम्। प्राकृताः सत्त्वादयो गुणा जीवस्यैव न त्वीशस्येति श्रूयते। यथैकादशे—‘सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे’ इति। श्रीविष्णुपुराणे च—‘सत्त्वादयो न सन्तीशे यत्र न प्राकृता गुणाः। स शुद्धः सर्वशुद्धेभ्यः पुमानाद्यः प्रसीदतु॥’ अत्र प्राकृता इति विशिष्याप्राकृतास्त्वन्ये गुणास्तस्मिन् सन्त्येवेति व्यञ्जितम्। तथा च दशमे देवेन्द्रणोक्तम्—‘विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्। मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहे न विद्यते ते ग्रहणानुबन्धः॥’ प्रकृतिगुणः सत्त्वं, गोचरस्य बहुरूपत्वे रजः, बहुरूपस्य तिरोहितत्वे तमः। तथा परस्परस्योदासीनत्वे सत्त्वम्; उपकारित्वे रजः; अपकारित्वे तमः। अत्र चेदमेव विशुद्धसत्त्वं सन्धिन्यंशप्रधानं चेदाधारशक्तिः; सम्विदंशप्रधानमात्मविद्या, ह्लादिनीसारांशप्रधानं गुह्यविद्या। युगपत् शक्तित्रयप्रधानं मूर्तिः। अत्राधारशक्त्या भगवद्धाम प्रकाशते।” (अर्थात्) “सत्-रूपसे प्रसिद्ध भगवान् जिस शक्तिके द्वारा सत्ताको धारण करते हैं और कराते हैं, वह समस्त देश-काल-द्रव्यादिको प्रकाशित करनेवाली ‘सन्धिनी’ शक्ति है; (उसी प्रकार सम्वित्-रूप होकर भी भगवान्) जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं जानते और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, वह ‘सम्वित्’ शक्ति है; (तथा आनन्दरूप होकर भी भगवान्) चित्-प्रधान जिस शक्तिके द्वारा वे स्वयं आनन्दको जानते हैं और दूसरोंको जनानेमें समर्थ होते हैं, उसको ‘ह्लादिनी’ शक्ति कहते हैं, ऐसा समझना होगा। इसलिये उस मूल पराशक्तिके तीन रूप सिद्ध हुए हैं; उसकी स्वतःप्रकाश लक्षणवाली जिस विशेष वृत्तिके द्वारा भगवान् स्वयं और उनकी स्वरूपशक्ति अथवा चित्-वैशिष्ट्यादिका आविर्भाव होता है, वही ‘विशुद्धसत्त्व’ है। वह किसी भी अन्यकी अपेक्षासे रहित और १७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत