श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/६०-६१ ] भक्तवृन्देष्वेव निक्षिप्यमाणा भगवत्प्रीत्याख्यया वर्त्तते। अतस्तदनुभवेन श्रीभगवानपि श्रीमद्भक्तेषु प्रीत्यातिशयं भजत इति।” वेदोंमें भी यह वर्णित है कि भक्ति ही भक्तोंको भगवान्के निकट ले जाती है, भक्ति ही भक्तको भगवान्का दर्शन कराती है, भक्तिके द्वारा ही भगवान् वशीभूत होते हैं और वेदोंमें अधिकांश भक्तिका ही वर्णन है। इसलिये यह विचार करें कि जो वस्तुशक्ति भगवान्को अपने आनन्दके द्वारा उन्मत्त कराती है, उसके क्या लक्षण हैं? उसके उत्तरमें कह रहे हैं—सांख्यमतवादियोंके सिद्धान्तानुसार उस वस्तुशक्तिको कभी भी प्राकृत-सत्त्वगुणमयी मायिकी-आनन्दरूपा नहीं कह सकते। क्योंकि श्रुतियोंमें कहा गया है कि 'माया भगवान्का अतिक्रम नहीं कर सकती है' और 'भगवान् स्वयं तृप्त हैं', इसलिये स्वतः-तृप्त भगवान् मायाके गुणमें कभी भी आसक्त नहीं होते। उस वस्तुशक्तिको निर्विशेषवादियोंकी भाँति भगवत्स्वरूपानन्द भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह सिद्धान्त पूर्व और बादमें विचार करनेसे विशेषरूपसे असिद्ध है, क्योंकि भगवान् अपने स्वरूपानन्दकी अपेक्षा भक्त्यानन्दकी ही अधिक आकाङ्क्षा किया करते हैं। इसलिये वह जीवके स्वरूपानन्दरूपा भी नहीं है, क्योंकि जीव नित्य होनेपर भी अत्यन्त क्षुद्र है। वह भगवान्को वशीभूत नहीं कर सकता। इसलिये “हे भगवन्, सबके आश्रयस्वरूप आपमें केवल 'ह्लादिनी', 'सन्धिनी' और 'सम्वित्' नामक तीन शक्तियाँ अवस्थित हैं। गुणातीत आपमें आह्लाद (सात्त्विक) और क्लेश (तामसिक) तथा मिश्रा (राजसिक) भाव नहीं है”—इस विष्णुपुराण-वाक्यसे उनकी ह्लादिनी-नामक स्वरूपशक्ति ही आनन्दस्वरूपा है, क्योंकि इसी शक्तिके द्वारा ही भगवत्-स्वरूपमें आनन्द विशेष लक्षित होता है और भगवान् इस शक्तिके द्वारा ही वैसा आनन्द अन्य भक्तोंको प्रदान करते हैं—यही चरम सिद्धान्त है। भगवान्में ह्लादिनीशक्ति नित्य विद्यमान रहनेके कारण निर्विशेषवादियोंका उक्त सिद्धान्त विशेषरूपसे परित्यज्य है। क्योंकि श्रुतिके अर्थसमूहकी अन्यरूप असङ्गति होनेपर फलान्तरकी आशङ्का होती है अर्थात् विष्णुपुराणका उक्त प्रमाण वेदके अर्थके साथ एक रूपमें सिद्ध है, इसलिये निर्विशेषवादियोंकी इस प्रकारकी उक्ति वेदोंके अर्थसे विपर्ययजनक (विपरीत) और वेदार्थ-तात्पर्यके विषयीभूत नहीं है। उस ह्लादिनी शक्तिकी ही सर्वानन्दातिशायिनी किसी एक वृत्तिको भक्तोंमें नित्य प्रदान करनेपर वह 'भगवत्-प्रीति' कहलाती है। श्रीभगवान् भी उस प्रीतिको भक्तमें अनुभव करके भक्तके प्रति अतिशय प्रीति प्रदर्शित करते हैं। विष्णुपुराणमें श्रीभगवान्में तीन प्रकारकी शक्तियोंका वर्णन है, जो शक्ति भगवान्के आनन्दका विधान करती है, वह सांख्यके जड़ानन्द अथवा निर्विशेषवादियोंके शक्ति-शक्तिमान्के पार्थक्यकी अनभिज्ञताके कारण केवल चिदेकानन्द नहीं है। ह्लादिनी शक्ति ही भगवान्को आनन्द प्रदान करती है और भगवान् ह्लादिनी शक्तिके द्वारा जीवको उनका अपने प्रति प्रेमधर्म प्रदान करते हैं तथा भक्तकी भगवत्-प्रीतिसे बाध्य होकर प्रीति पुष्ट करते हैं॥६०॥ एक ही शक्तिमान्की एक ही शक्तिके तीन रूप :- सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर स्वरूप। एकइ चिच्छक्ति ताँर, धरे तिन रूप॥६१॥ चौथा अध्याय | १७७