श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/५७-६० ] अनुवाद-वे दोनों अब मिलकर एक चैतन्य गोसाईं हुए हैं। भावके आस्वादनके लिये दोनों एक शरीर हुए हैं॥५७॥ अमृताणुकणिका-यदि कहें-रसास्वादनके लिये श्रीराधा-कृष्ण एक होनेपर भी इन दो रूपोंमें हुए और कुछ समय रसास्वादनके बाद श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें एक देह हुए हैं, तो ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि इससे श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाका अनादित्व और नित्यत्व नहीं होगा। श्रीकृष्ण और श्रीराधा जैसे अनादिकालसे विद्यमान हैं, उनके मिलित विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य भी अनादिकालसे विद्यमान हैं, कलियुगमें वे केवल इस प्रपञ्चमें प्रकटित हुए हैं। श्रीकृष्णचैतन्य श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं। श्रीकृष्णके सभी अविर्भाव अथवा स्वरूप नित्य और अनादिकालसे विद्यमान हैं॥५७॥ गौरतत्त्व-महिमा वर्णनके लिये राधागोविन्दकी प्रणय-व्याख्या :- इथि लागि' आगे करि ताहार विवरण। याहा हैते हय गौरेर महिमा-कथन ॥५८॥ अनुवाद-इसलिये पहले श्रीराधाकृष्णकी एकात्मताका वर्णन कर रहा हूँ, जिससे श्रीगौरचन्द्रकी महिमा प्रकाशित होगी॥५८॥ श्रीराधाका तत्त्व और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध :- राधिका हयेन कृष्णेर प्रणय-विकार। स्वरूपशक्ति-‘ह्लादिनी’ नाम याँहार॥५९॥ अनुवाद-श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके प्रणयका विकार हैं। वे श्रीकृष्णकी 'ह्लादिनी' नामक स्वरूपशक्ति हैं॥५९॥ ह्लादिनी-शक्तिका लक्षण :- ह्लादिनी कराय कृष्णे आनन्दास्वादन। ह्लादिनीर द्वारा करे भक्तेर पोषण॥६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राधाजी वास्तवमें श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति ह्लादिनी हैं। वे श्रीकृष्णको परमानन्दमें निमग्न करके रखती हैं, इसलिये उनका नाम ह्लादिनी है। और भी, वे श्रीकृष्णके चित्-विभिन्नांशरूप जीवोंके स्वरूपगत प्रेमपुष्टिकी क्रियाके द्वारा लक्षित होती हैं॥५९-६०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभुने 'प्रीतिसन्दर्भ' (६५ संख्या) में लिखा है- “अथ श्रुतौ च-‘भक्तिरेवैनं नयति, भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुषः, भक्तिरेव भूयसी' इति श्रूयते। तस्मादेवं विविच्यते-या चैवं भगवन्तं स्वानन्देन मदयति, सा किंलक्षणा स्यात्? इति। न तावत् सांख्यानामिव प्राकृतसत्त्वमय-मायिकानन्दरूपा, भगवतो मायानभिभाव्यत्वश्रुतेः, स्वतस्तृप्तत्वाच्च। न च निर्विशेषवादिनामिव भगवत्स्वरूपानन्दरूपा, अतिशयानुपपत्तेः। अतो नतरां जीवस्य स्वरूपानन्दरूपा, -अत्यन्तक्षुद्रत्वात् तस्य। ततो 'ह्लादिनी सन्धिनी संवित्त्वय्येका सर्वसंश्रये। ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते॥' इति श्रीविष्णुपुराणानुसारेण (१/१२/६९) ह्लादिन्याख्य-त्वदीयस्वरूपशक्त्यानन्द-रूपैवेत्यवशिष्यते, यया खलु भगवान् स्वरूपानन्दविशेषी भवति, ययैव तं तमानन्दमन्यानप्यनुभावयतीति। अथ तस्या अपि भगवति सदैव वर्त्तमानतयातिशयानुपपत्तेस्त्वेवं विवेचनीयं- श्रुताथान्यथानुपपत्त्यार्थापत्तिप्रमाणसिद्धत्वात्। तस्या ह्लादिन्या एव कापि सर्वानन्दातिशायिनी वृत्तिर्नित्यं १७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत