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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

४/१५-१६ ] रसिक-शेखर कृष्ण परमकरुण। एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम॥ १६ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, इसलिये अपने ही प्रेमरसके सारका आस्वादन और वे परम करुण हैं, इसलिये जगत्में बद्धजीवोंके उद्धारके लिये रागमार्ग भक्तिका प्रचार—इन दो कारणोंसे श्रीकृष्णकी अवतीर्ण होनेकी इच्छा उत्पन्न हुई॥ १५-१६॥ अमृतानुकणिका—'प्रेमरस निर्यास'—विभाव-अनुभावादिके मिलनसे परमास्वादन-चमत्कारिता-प्राप्त प्रेमका सार। 'रागमार्ग भक्ति'—रागानुगा भक्ति। (भःरःसिः पूर्व २/२७२,२७०)— “इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्। तन्मयी या भवेद्भक्तिः साऽत्र रागात्मिकोदिता॥ विराजन्तीमभिव्यक्तं व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते॥” अर्थात् “इष्ट (श्रीकृष्ण) में स्वाभाविकी जो एक प्रेममयी तृष्णा है, उसके कारण इष्टमें परमाविष्टता अथवा आवेश हुआ करता है। उस प्रेममयी-तृष्णाका नाम है—'राग'। रागमयी भक्तिको 'रागात्मिका-भक्ति' कहते हैं और यह व्रजवासी-जनोंमें सुस्पष्ट भावसे विराजमान है। उस रागात्मिका-भक्तिका जो अनुगमन अथवा अनुसरण करती है, उसे 'रागानुगा-भक्ति' कहते हैं।” अन्य युगावतार जगत्में वैधीभक्तिकी स्थापनाके लिये अवतीर्ण होते हैं। परन्तु स्वसुख-वासनाशून्य और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमयी सेवामें श्रीकृष्णके प्रति भक्तोंका जो ऐश्वर्यज्ञानहीन विशुद्ध प्रेम प्रकाश पाता है, उस प्रेम-रस-सारका आस्वादन करनेके लिये और जीवोंमें रागानुगा भक्तिके प्रचारके लिये श्रीकृष्ण व्रजमें अवतीर्ण हुए—यही स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका अन्तरङ्ग कारण है। इन दो उद्देश्योंकी सिद्धिकी इच्छा उनके दो स्वरूपानुबन्धि गुणोंके कारण ही हुई, किसी अन्यके द्वारा नहीं। श्रीकृष्णका रसिक-शेखरत्व और परम-करुणत्व—ये दो गुण उनके स्वरूपानुबन्धि गुण हैं। वे रसिक शेखर हैं, इसलिये उत्कृष्ट रसास्वादनकी उनकी स्वाभाविकी इच्छा है, रसोंमें भक्तोंका प्रेमरस-निर्यास (सार) सर्वोत्कृष्ट है। तभी उनकी भक्तोंके प्रेमरस-निर्यासके आस्वादनकी इच्छा हुई। मायाबद्ध जीव संसारमें अनादिकालसे दुःख भोग रहे हैं। उनके इस संसार दुःखको दूरकर अपने श्रीचरणसेवाका अन्तरङ्गतम अधिकार देकर परमसुखके अधिकारी बनानेके अभिप्रायसे परम-करुण श्रीकृष्णकी रागानुगाभक्तिके प्रचारकी इच्छा हुई। जगत्में तब केवल वैधीभक्ति प्रचलित थी, परन्तु वैधीभक्तिके द्वारा व्रजके भावको प्राप्त नहीं किया जा सकता। 'रसिक-शेखर'—रसिकोंमें सर्वश्रेष्ठ; रसिकेन्द्र चूड़ामणि। परतत्त्व श्रीकृष्णको श्रुतियोंमें कहा गया हैं—'रसो वै सः' अर्थात् वे रसस्वरूप हैं। रस-शब्दके दो अर्थ हैं। 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः'—जिसका आस्वादन किया जाय, वह रस है; जैसे मधु। और 'रसयति आस्वादयति इति रसः'—जो आस्वादन करे, उसे भी रस कहा गया है; जैसे भ्रमर। इसलिये रस-शब्दके अर्थ हैं—आस्वाद्य रस और आस्वादक रसिक। इस पयारमें आस्वादक रसिक—केवल एक ही अर्थका उल्लेख हुआ है। श्रीकृष्ण अद्वय-तत्त्व हैं, उनके समान रसिक अन्य कोई नहीं हैं, इसलिये वे रसिक-शेखर हैं। चौथा अध्याय | १५१

[ ४/१५-१९ 'एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम'-ये दो इच्छाएँ श्रीकृष्ण अवतारके मूल कारण होनेपर भी दोनों इच्छाओंको एक समान प्रधान नहीं कहा जा सकता। रसास्वादन उनका निजी कार्य है, केवल अपने लिये है- “अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥” (आदि ४/१०३) और करुणा उनका एक स्वरूपगत गुण है, इसीके वशीभूत होकर वे जीवके निस्तारकी चेष्टा करते हैं- “'लोक निस्तारिब', - एइ ईश्वर-स्वभाव॥” (अन्त्य २/६) इस करुणाके वशीभूत होकर उन्होंने जीवोंके निस्तारके उद्देश्यसे रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छा की। रसास्वादन-स्पृहाके परिपूर्ण होनेसे जीवोंके लिये रागमार्गकी भक्तिका प्रचार आनुषङ्गिक रूपसे स्वतः ही सम्पन्न हो जायेगा। इसलिये प्रेमरस-निर्यासर-आस्वादन ही श्रीकृष्ण अवतारका मुख्य अन्तरङ्ग कारण है; और रागमार्ग भक्ति-प्रचारको गौण अन्तरङ्ग कारण मानना होगा। तथापि दोनों कारणोंको अन्तरङ्ग कहनेका हेतु यह है- दोनों कार्य श्रीकृष्णके निज कार्य हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्स्वरूप रागमार्गकी भक्तिका प्रचार नहीं कर सकते॥ १५-१६॥ ऐश्वर्यज्ञानेते सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥ १७॥ अनुवाद-सभी लोगोंकी भक्ति मेरे ऐश्वर्य ज्ञानसे मिश्रित है। किन्तु ऐसे ऐश्वर्य-ज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥ १७॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/१६ में यह पद्य द्रष्टव्य है॥ १७॥ आमारे ईश्वर माने, आपनाके हीन। तार प्रेमे वश आमि ना हइ अधीन॥ १८॥ अनुवाद-जो मुझे ईश्वर मानता है और स्वयंको हीन (छोटा) समझता है, ऐसे व्यक्तियोंके प्रेमसे मैं वशीभूत नहीं होता हूँ॥ १८॥ आमाके त' ये ये भक्त भजे येइ भावे। तारे से से भावे भजि, - ए मोर स्वभावे॥ १९॥ अनुवाद-जो-जो भक्त जिस-जिस भावसे मेरा भजन करता है, मैं उसी-उसी भावसे उसका भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है॥ १९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे, उसी समय जगत्के भार-हरणका काल भी उपस्थित हुआ। जगत्के भार-हरणका दायित्व स्थितिकर्त्ता विष्णुके ऊपर है, भार-हरण स्वयं-भगवान्का कार्य नहीं है। श्रीकृष्णके अवतीर्ण होनेके समय भारहरणका काल उपस्थित होनेसे, पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णमें इसलिये नारायण, चतुर्व्यूह अर्थात् वासुदेव- सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, मत्स्यादि सभी अंशावतार, युगावतार और मन्वन्तरावतार-सभी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें अवतीर्ण हुए थे। पूर्ण भगवान्में उनके अङ्ग और अंशादि-खण्डरूप सभी १५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/१७-२० ]

भगवतावतार अवश्य ही आश्रय करके रहते हैं तथा उनके द्वारा नियुक्त पालनकर्त्ता विष्णु श्रीकृष्णके स्वरूपमें ही थे। विष्णुके द्वारा ही श्रीकृष्ण सभी असुरोंका संहार करते हैं। असुरोंका वध श्रीकृष्णावतारका केवल आनुषङ्गिक कार्यमात्र है। किन्तु प्रेमरस-सारके आस्वादन और राग तथा भक्तिको जगत्में प्रचार करनेके लिये परम-रसिक और परम-करुणामय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की थी। श्रीकृष्णके मनका भाव यह है— “ऐश्वर्यज्ञानसे जगत् परिपूरित है; उस ऐश्वर्यज्ञानसे जो शिथिल प्रेम उदित होता है, उसमें मेरी प्रीति नहीं रहती। जो भक्त स्वयंको छोटा मानकर मुझे ईश्वर मानता है, उसका प्रेम ऐश्वर्यगत है, मैं कभी भी उस प्रेमके अधीन नहीं होता हूँ; मेरा जो जिस भावसे भजन करता है, मैं भी उसका उसी भावसे भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है।” ॥ १७-१९॥ अमृतानुक्रमणिका—ऐश्वर्यज्ञानी भक्त श्रीकृष्णको अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके और समस्त भगवत्स्वरूपोंके भी ईश्वर मानकर स्वयंको एक धूलिकणसे भी तुच्छ मानते हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णके अनुग्रहके प्रार्थी हैं अर्थात् श्रीकृष्णके अधीन हैं, किन्तु श्रीकृष्ण उनके अधीन नहीं हैं। प्रेमकी जिस अवस्थामें पहुँचकर भक्त श्रीकृष्णको वशीभूत कर सकते हैं, ऐश्वर्यज्ञानी भक्त प्रेमकी उस अवस्थाको प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि ऐश्वर्यज्ञानसे उनका प्रेम शिथिल हो जाता है और श्रीकृष्ण ऐसे प्रेमके वशीभूत नहीं होते तथा उस प्रेममें उनकी प्रीति नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है—श्रीकृष्ण शुद्धप्रेमवाले भक्तोंके अधीन होते हैं, किन्तु ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तोंके अधीन नहीं होते, तो क्या इसके द्वारा श्रीकृष्णका पक्षपातित्वरूप वैषम्य परिलक्षित नहीं होता? इसके उत्तरमें कह रहे हैं—जो भक्त जिस भावसे श्रीकृष्णका भजन करता है, वे उसपर उसीके अनुरूप अनुग्रह करते हैं। जो स्वयंको श्रीकृष्णके अधीन मानकर उनसे अनुग्रहकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें अपने अधीन भक्त मानकर अधीनसूचक अनुग्रह प्रकाश करते हैं। और जो भक्त श्रीकृष्ण-वशीकरण प्रेमकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें वह प्रेम प्रदानकर उसके अधीन हो जाते हैं। श्रीकृष्ण सदा ही भक्तोंकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करते हैं। यह श्रीकृष्णका स्वभाव है, इसलिये इसमें उनका पक्षपातित्व प्रकाश नहीं होता। यदि वे किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा करें और किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा नहीं करें, तब उनका पक्षपातित्व प्रकाशित होगा। यदि कहें कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण क्या इस भक्तका ऐश्वर्यज्ञान दूरकर उसे निजवशीकरण प्रेम नहीं प्रदान कर सकते? इस पयार (१९) में इसके उत्तरमें कह रहे हैं—भक्तकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करना ही श्रीकृष्णका स्वभाव अथवा स्वरूपानुबन्धि गुण है और इसमें कभी भी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये श्रीकृष्ण ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तके भावका परिवर्तन नहीं करते॥ १७-१९॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २० ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०॥

चौथा अध्याय | १५३

[ ४/२० अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ ! जो मेरी जिस भावसे उपासना करता है, मैं उसे उसी भावसे प्राप्य होता हूँ। सभी मनुष्य मेरे ही पथ अर्थात् मेरे द्वारा प्रदर्शित पथके अनुगामी हैं ॥२०॥ अनुभाष्य—भगवान्ने पहले सूर्यको जिस योगविषयमें उपदेश दिया था, उसके परम्पराक्रमसे आते हुए नष्ट हो जानेपर वे पुनः अर्जुनको वही उपदेश कर रहे हैं। भगवान् अपनी प्रकटलीलाका कारण बतलाते हुए यह श्लोक कह रहे हैं— हे पार्थ (अर्जुन), ये (भक्ताः) यथा (येन भावेन) मां (कृष्णं) प्रपद्यन्ते, अहं तथैव तान् भजामि (अनुगृह्णामि)। मनुष्याः सर्वशः (सर्वप्रकारेण एव) मम वर्त्म (सिद्धमार्गं) अनुवर्त्तन्ते (अनुसरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन ! भक्त जिस भावसे मेरी शरण ग्रहण करता है, मैं भी उसी भावसे उसपर अनुग्रह करता हूँ। मनुष्य सभी प्रकारसे ही मेरे द्वारा सिद्ध किये गये मार्गका अनुसरण करते हैं ॥२०॥ अमृतानुकणिका—जो व्यक्ति जिस भावसे मेरे प्रति प्रपत्ति स्वीकार करते हैं, मैं उनका उसी भावसे भजन करता हूँ। सभी मतोंका चरम उद्देश्यस्वरूप मैं, सबको ही प्राप्य हूँ। शुद्ध भक्तगण मेरे सच्चिदानन्द विग्रहकी नित्य-सेवा प्राप्तिके लिये मेरी आराधना करते हैं, मैं ऐसे प्रेमी भक्तोंको अपना नित्य परिकर बनाकर उनको अभिलषित प्रेममयी सेवा प्रदान करता हूँ। सकाम कर्मियोंके निकट मैं कर्मफल प्रदाता ईश्वरके रूपमें प्राप्त होता हूँ। जो निर्विशेषवादी हैं, मैं उनको (उनके) आत्मविनाशके द्वारा निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप निर्वाण-मुक्ति प्रदान करता हूँ। मेरे सच्चिदानन्द विग्रहके नित्यत्वको स्वीकार नहीं करनेके कारण उनके चिदानन्द स्वरूपका लोप हो जाता है। उनमेंसे निष्ठाभेदके अनुसार किसी-किसीको नश्वर जन्म भी प्रदान करता हूँ। जो शून्यवादी हैं, मैं शून्यस्वरूप होकर उनकी सत्ताको शून्यगत कर देता हूँ। जो जड़, जड़कर्म अथवा जड़विधिवादी हैं, उनके आत्माको आच्छादित चेतनरूपमें जड़प्राय बनाकर जड़रूपमें ही उनको प्राप्य होता हूँ। जो योगी हैं, उनके निकट मैं ईश्वरके रूपमें विभूति प्रदान करता हूँ अथवा कैवल्य दान करता हूँ। इस प्रकार सर्वस्वरूप होकर मैं सभी मतवादियोंके लिये प्राप्य होता हूँ। परन्तु इन सबमें गोलोक-व्रजमें मेरी सेवा-प्राप्तिको ही प्रधान समझना चाहिये। मनुष्यमात्र ही मेरे विविध पथका अनुसरण करते हैं। श्रीगीताके इस श्लोकके द्वारा यह ठीक प्रकारसे समझना चाहिये कि जो जिस-जिस प्रकारसे भजन करते हैं, उन्हें अपनी-अपनी कामनाके अनुरूप ही फल प्राप्त होता है, सबका फल एक समान कदापि नहीं होता। 'मनुष्याः पार्थ सर्वशः'—इसका अर्थ कुछ लोग इस प्रकार करते हैं कि जो जैसा भी करें, वे सभी भगवान्के ही भजनपथमें हैं और एक ही फल प्राप्त करेंगे, यह सर्वथा भ्रान्त धारणा है। कुकर्मियोंकी, ज्ञानियोंकी, भक्तोंकी और प्रेमी भक्तोंकी अन्तमें एक ही गति होगी—इस विचारका गीता, भागवतादि शास्त्रोंमें खण्डन किया गया है, क्योंकि गीता (९/२५) में आगे कहा गया है— “यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥” “देवपूजकगण देवलोकको प्राप्त होते हैं, पितृपूजकगण पितृलोकको प्राप्त होते हैं, भूतपूजकगण भूतलोकको प्राप्त होते हैं और मेरी पूजा करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।” ॥२०॥ १५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२१-२३ ] मोर पुत्र, मोर सखा, मोर प्राणपति। एइभावे येइ मोरे करे शुद्धभक्ति॥ २१॥ आपनाके बड़ माने, आमारे सम-हीन। सेइ भावे हइ आमि ताहार अधीन॥ २२॥ अनुवाद-यदि कोई शुद्धभक्ति भावसे मुझे अपने पुत्र, मित्र अथवा प्राणप्रियतमके रूपमें भावना करते हुए अपनेको बड़ा मानता है और मुझे अपने समान या छोटा समझता है, तो मैं उसके प्रेमके वशीभूत हो जाता हूँ॥ २१-२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो 'कृष्ण मेरा पुत्र हैं', इस प्रकार वात्सल्य भाव; 'कृष्ण मेरे सखा हैं', इस प्रकार सख्य भाव; 'कृष्ण मेरे प्राणपति हैं', इस प्रकार मधुरभावसे शुद्धभक्ति करते हैं और रसभेदसे मुझे छोटा मानकर स्वयंको बड़ा मानते हैं, उनके उस भावसे मैं उनके अधीन हो जाता हूँ। 'शुद्धभक्ति'-ज्ञानकर्म-आवरणहीन, अन्याभिलाषाशून्य, अनुकूल सङ्कल्पयुक्त श्रीकृष्णानुशीलनरूप भक्ति ही 'शुद्धभक्ति' कहलाती है॥ २१-२२॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचरितामृतमें हम 'भक्ति' और 'शुद्धभक्ति'के साथ-साथ 'बिद्धभक्ति'का भी उल्लेख देखकर भक्तिके तीन विभागोंको लक्ष्य करते हैं। अन्याभिलाषितायुक्त, ज्ञानकर्मयोगादिके द्वारा आवृत, श्रीकृष्णसे पृथक् भोगके अनुशीलनके साथ हरिसेवाकी सजावटको 'बिद्धभक्ति' कहते हैं। कर्ममिश्रा, ज्ञानमिश्रा, योगमिश्रा और भोगमय-व्रतमिश्रा आदिके द्वारा आवृत सेवाचेष्टा बिद्धभक्तिके अन्तर्गत है। इसमें शुद्धभक्तिसे पृथक् अन्यरूप चेष्टा वर्तमान रहती है। अबिद्धा-सेवामयी विधिके अनुगमनसे 'भक्ति' होती है। यह भक्ति बिद्धभक्तिसे स्वतन्त्र और विष्णुकी अनुकूल-चेष्टामयी होती है। रागात्मिक भक्तोंकी अहैतुकी, नित्य-हरिसेवाके अनुगमनके लोभसे उदित प्रेमसेवाको 'शुद्धभक्ति' कहा जाता है; वह केवलमात्र शास्त्रके नियमोंके द्वारा परिचालित नहीं होती। 'वैधीभक्ति' या 'भक्ति' या 'अबिद्धा भक्ति' शुद्धभक्तिकी सहायिका होनेपर भी 'शुद्धभक्ति' शब्दसे रागानुगा-सेवाको ही लक्ष्य किया है। शुद्धभक्तिको भक्तिकी पराकाष्ठा कहा जाता है। यह गोलोकके भक्तोंकी रागमयी भक्ति है और वैधीभक्ति परव्योम या वैकुण्ठके भक्तोंकी गौरवमयी भक्ति है॥ २२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४४)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ २३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ २३॥ अनुभाष्य-स्यमन्तपञ्चकमें सूर्यग्रहणके उपलक्ष्यपर द्वारकासे यादवगण और व्रजसे सभी व्रजवासियोंके साथ नन्दमहाराज उपस्थित हुए थे। गोकुलवासिनी व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णका मिलन होनेपर श्रीकृष्ण गोपियोंसे कह रहे हैं- मयि भूतानां (प्राणिनां) भक्तिः (श्रवणकीर्त्तनाख्या) अमृतत्वाय (नित्यपार्षदत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति) हि। भवतीनां (गोपीनां) मदापनः (मत्साक्षात्कारकः) मत्स्नेहः यत् आसीत् तत् दिष्ट्या (तत् तु मद्भाग्येनैव)। चौथा अध्याय | १५५

[ ४/२३-२५ श्लोक-भावानुवाद—मेरे प्रति श्रवण-कीर्तनादि लक्षणोंवाली नवधाभक्तिके द्वारा प्राणी निःसन्देह अपने नित्यपार्षदस्वरूपको प्राप्त करनेके योग्य होते हैं। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, उससे तुम्हें मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है और वह मेरा सौभाग्य ही है॥२३॥ माता मोरे पुत्रभावे करेन बन्धन। अतिहीन-ज्ञाने करे लालन-पालन ॥ २४ ॥ अनुवाद—मेरी माता कभी-कभी अपने पुत्र-भावसे मुझे बाँध देती है। वह मुझे अत्यन्त असहाय समझकर मेरा लालन-पालन भी करती है॥ २४॥ अमृतानुकणिका—'माता'—वात्सल्य प्रेमकी परमाश्रय यशोदा माता। यशोदा माता श्रीकृष्णको अपना पुत्र मानकर उनका लालन-पालन और कभी शासन भी करती हैं। उनकी श्रीकृष्णमें ईश्वर बुद्धि नहीं है। उनका मानना है कि श्रीकृष्ण उनके गर्भजात पुत्र हैं, उनके दुग्धपोष्य शिशु, नितान्त निराश्रय और नितान्त दुर्बल हैं, अपने आप शरीरपर बैठी मक्खी भी नहीं उड़ा सकते, भूख लगनेपर उसे मुखसे कह भी नहीं पाते। उनको छोड़कर श्रीकृष्णका अन्य कोई सहारा नहीं है; वे खिलायेंगी, तो श्रीकृष्ण खायेंगे; वे रक्षा करेंगी, तो श्रीकृष्णकी रक्षा होगी। उनका मानना है कि श्रीकृष्णमें अपने अच्छे-बुरेका विचार करनेकी क्षमता नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णके मङ्गलके लिये ही उनपर शासन करती हैं, उन्हें डाँटती-फटकारती हैं और कभी रस्सीसे बाँध भी देती हैं—श्रीकृष्णके प्रति उनकी इतनी ममता बुद्धि है। श्रीकृष्ण उनके शुद्ध वात्सल्य-प्रेममें मुग्ध होकर उनके प्रेमकी वश्यताको स्वीकारकर यशोदा माताके लालन-पालन, ताड़न-भर्त्सन, सभीको अङ्गीकारकर अपरिमित आनन्दका अनुभव करते हैं। देवकीमें भी श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्य प्रेम है, किन्तु वह ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित होनेके कारण विशुद्ध नहीं है। मथुरामें जन्मके समय देवकीने उनका भगवत्-रूप देखा था, इसलिये श्रीकृष्णको निराश्रय मानकर उनके लालन-पालनका भाव उनमें उदित नहीं होता है और उनपर वे शासन भी नहीं कर सकतीं। इसलिये इस पयारमें 'माता' कहनेसे उन्हें लक्ष्य नहीं किया गया है॥२४॥ सखा शुद्धसख्ये करे स्कन्धे आरोहण। तुमि कोन् बड़ लोक,—तुमि आमि सम ॥ २५ ॥ अनुवाद—सखालोग शुद्ध-सख्यभावसे मेरे कन्धेके ऊपर चढ़ जाते हैं और कहते हैं कि तुम कौनसे बड़े आदमी (धनी व्यक्ति) हो, तुम और हम समान हैं॥ २५ ॥ अमृतानुकणिका—'सखा'—श्रीदाम, सुबल, मधुमङ्गलादि। व्रजके इन सखाओंमें श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्यभाव है। श्रीकृष्णमें उनकी ईश्वर-बुद्धि नहीं हैं, वे श्रीकृष्णको अपनेसे बड़ा नहीं मानते अपितु समान बुद्धि रखते हैं। इसी समान भावसे वे श्रीकृष्णके साथ निःसङ्कोच होकर खेलते हैं; कभी खेलमें हारकर श्रीकृष्णको कन्धेपर बैठाते हैं और कभी श्रीकृष्णके हार जानेपर उनके कन्धेपर चढ़ जाते हैं। कभी वनमें कोई फल प्राप्त होनेपर उसे चखकर देखते हैं और यदि वह स्वादिष्ट होता है, तो श्रीकृष्णको खिलाये बिना स्वयं खानेकी इच्छा नहीं करते। तब वे अपना जूठा फल श्रीकृष्णके मुखमें देकर कहते हैं—'कान्हा! यह फल खाकर तो देखो, कितना स्वादिष्ट है।' इस पयारमें दिखलाया है कि श्रीकृष्ण अपने व्रजके सखाओंके प्रेमके द्वारा कितने वशीभूत हैं। १५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२५-२६ ] द्वारका-मथुरादिके सखाओंका सख्य भाव इस पयारका लक्ष्य नहीं है। कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपका दर्शनकर अर्जुन भयभीत होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। सख्य-भावसे पहले उन्होंने श्रीकृष्णके साथ हास-परिहासमें जो उनका अनादर किया था, उसके लिये वे क्षमा प्रार्थना करने लगे। किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक बार गोवर्धन-धारण, वैकुण्ठ दर्शनादि अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करनेपर भी सुबलादि सखाओंकी ऐसी अवस्था कभी नहीं हुई॥२५॥ प्रिया यदि मान करि' करये भर्त्सन। वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन॥२६॥ अनुवाद—यदि मेरी प्रियतमा मान करके मेरी भर्त्सना (निन्दा) करती है, तो वह भर्त्सना वेदस्तुतियोंसे भी अधिक मेरे मनको हरण कर लेती है॥२६॥ अनुभाष्य—शुद्ध-अनुरागवश अपना परम-आत्मनीय माननेसे आश्रय (भक्त) के विषय (श्रीकृष्ण) के प्रति ताड़ना-भर्त्सनारूपी दुर्वचन भी उनकी आत्यन्तिक और ऐकान्तिक प्रीतिका ही परिचय हैं। जहाँपर विषयके प्रति पूज्य और गुरुबुद्धि होती है, वहाँ स्वाभाविक प्रीतिकी शिथिलता न्यूनाधिक रूपमें अवश्य वर्तमान होती है। प्रीतिरहित अज्ञानी जनोंके लिये वेदशास्त्रोंमें जो विधि और निषेध निर्धारित हुए हैं, उस प्रकार विधिके अनुरूप गौरव वाक्योंके द्वारा की गयी स्तुति (वैधस्तुति) की यदि उपरोक्त प्रीतिमूलक वाक्यों (भर्त्सना)से तुलना की जाय, तो इनमें गौरव-पूजाका अभाव होनेपर भी इनका उत्कर्ष वैधस्तुतिकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे मुक्त शुद्धभक्तोंका भगवान्‌के साथ अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसे सम्बन्धज्ञानसे जो नित्यवृत्तिका उदय देखा जाता है, वह ऐश्वर्यप्रधान वैध गौरवकी अपेक्षा सब प्रकारसे उपादेय अर्थात् कल्याणप्रद है॥२६॥ अमृतानुकणिका—मान—उःनीः शृङ्गारभेद-प्रकरण (१५/७४)— “दाम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः। स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥” अर्थात् “परस्पर अनुरक्त और एकत्र अवस्थित रहनेपर भी नायक-नायिकामें अपने-अपने अभिलषित आलिङ्गन, दर्शन, चुम्बन, प्रियभाषणके प्रतिबन्धक भावको 'मान' कहते हैं।” श्रीकृष्ण-प्रेयसी व्रजसुन्दरियाँ मानवती होकर अनेक बार श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं, किन्तु श्रीकृष्ण इससे रुष्ट नहीं होते अपितु उन्हें इतना आनन्द होता है, जितना उन्हें वेद-स्तुति सुनकर भी नहीं होता। गोपियोंके निर्मल प्रेमके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत होकर स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे उनके प्रेमके ऋणशोधनमें असमर्थ हैं (भाः १०/३२/२२—न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां ०)। श्रीराधिकाके मानभञ्जनके लिये श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् होकर भी उनके चरणोंमें अपने शीशको नत करते हैं (गीत-गोविन्दम्—'देहि पदपल्लवमुदारं')। साधारणतः नायकके किसी अपराधके कारण नायिका मान करती है। कभी-कभी नायिकाके प्रति भी नायकका कारणाभासजनित मानका उदय होता है। इस पयारमें 'यदि' शब्दका तात्पर्य यह है कि व्रजसुन्दरियोंका श्रीकृष्णके प्रति सदा मान नहीं होता, किसी-किसी समय होता है और तभी वे श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं। जहाँ प्रणय विराजमान होता है, वहींपर मान चौथा अध्याय | १५७

[ ४/२६-२९ सम्भव होता है। यह हेतुक और अहैतुक भेदसे दो प्रकारका होता है। श्रीराधिकाकमें कभी किसी कारणसे मान होता हैं और कभी अकारण मान भी होता है। श्रीराधिकाके मान प्रसादनमें श्रीकृष्णको सुख मिलता है, इसलिये उनके सुख विधानके लिये श्रीराधिकाको मान होता है। द्वारकाकी महिषियोंका कान्ताभाव ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित है और वह श्रीकृष्णके लिये उतना तृप्तिदायक नहीं है। इसलिये द्वारकामें महिषियोंके साथ रहते हुए भी श्रीकृष्णका मन गोपियोंकी तीव्र विरह-वेदनासे हाहाकार कर उठता है। ऐश्वर्यज्ञानवशतः श्रीकृष्णके प्रति महिषियोंकी ममता बुद्धि गोपियोंके समान प्रगाढ़ नहीं है। कभी-कभी वे मानवती होती हैं, परन्तु वे श्रीकृष्णका तिरस्कार नहीं कर पातीं, अपितु श्रीकृष्ण ही कभी-कभी उनका तिरस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण कहीं उनका त्याग नहीं कर दें, इस आशङ्कासे श्रीकृष्णके तिरस्कार करनेपर शीघ्र ही अपना मान त्याग देती हैं। किन्तु तिरस्कारकी कल्पना भी दूरकी बात है, काकुति-मिनती और यहाँतक कि चरण-धारणके द्वारा श्रीकृष्ण अनेक बार व्रजसुन्दिरियोंके मान-भञ्जनमें समर्थ नहीं होते। इसलिये व्रजसुन्दिरियोंका प्रेम ही इस पयारका लक्ष्य है, महिषियोंका प्रेम नहीं ॥ २६ ॥ एइ शुद्धभक्ति लञा करिमु अवतार। करिब विविधविध अद्भुत विहार ॥ २७ ॥ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ये लीलार प्रचार। से से लीला करिब याते मोर चमत्कार ॥ २८ ॥ अनुवाद-इस शुद्धभक्तिको लेकर मैं अवतार लूँगा और ऐसी नाना प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करूँगा, जो वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें भी अज्ञात हैं। मैं ऐसी-ऐसी लीलाओंका प्रकाश करूँगा जिनसे मैं स्वयं भी चमत्कृत हो जाता हूँ ॥ २७-२८ ॥ मो-विषये गोपीगणेर उपपति-भावे। योगमाया करिबेक आपनप्रभावे ॥ २९ ॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावसे प्रेरित होकर गोपियाँ मेरे प्रति उपपति-भावको प्रकाश करेंगी ॥ २९ ॥ अनुभाष्य-मायासे अतीत वैकुण्ठादि लोकोंमें भगवान्का जो सब लीलावैचित्र्य दिखलायी देता है, उसमें स्वयंरूप श्रीकृष्णकी चमत्कारिता नवनवायमान रूपमें नहीं होती। उसके ऊपर स्थित गोलोकमें स्वयंरूप श्रीकृष्ण निजसुख-उद्देश्यसे जिस प्रकारकी लीलाएँ करते हैं, वैसी लीलाओंके उत्कर्षको ऐश्वर्यप्रधान भक्तोंके सामने प्रदर्शन करनेके लिये उन लीलाओंको प्रपञ्चमें प्रकट करनेकी श्रीकृष्णकी इच्छा हुई। आश्रयकी अपने विचारसे विषयके प्रति वैध गौरवकी अपेक्षा होती है, आश्रय अर्थात् गोपियोंका जिनके प्रति गौरव वर्तमान है, उन पतियोंकी वञ्चना और त्यागकर श्रीकृष्ण-अनुरागवशतः ऐश्वर्यरहित माधुर्यके आकर्षणसे आकृष्ट होकर जो चेष्टा देखी जाती है, वह परकीया सेवाप्रवृत्ति योगमायाके द्वारा ही सम्पन्न होती है। ऐसी चिन्मयी मायाका प्रभाव श्रीकृष्णके लिये भी अज्ञेय विषय है, वह उनकी कृपास्वरूपा योगमायाके द्वारा ही सम्भवपर है ॥ २९ ॥ अमृतानुकणा-गोलोकमें शुद्ध चित्-प्रतीति है, वहाँपर जड़-प्रतीति नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। चित्शक्तिने रसकी पुष्टिके लिये जिन सभी विचित्र भावोंको वहाँ उदय किया है, उसमें १५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/२९-३१ ] अनेक स्थानोंपर 'अभिमान' नामक एक सत्ता है। गोलोकमें श्रीकृष्ण अनादि और अजन्मा हैं। तो भी वहाँपर लीलाके सहायक नन्द-यशोदाने पिता-माताके अभिमानके द्वारा वात्सल्यरसको मूर्तिमान किया हुआ है। शृङ्गाररसमें विप्रलम्भ और सम्भोगादि अभिमानके रूपमें वर्तमान हैं। और परकीयभावमें शुद्ध स्वकीयत्व रहनेपर भी परकीय अभिमान और औपपत्य अर्थात् उपपति होनेका अभिमान नित्य वर्तमान हैं। प्रकट-व्रजमें वे सब अभिमान मायाके प्रभावसे स्थूल होकर लक्षित होते हैं। यशोदाका प्रसव, श्रीकृष्णका सूतिकागृह, अभिमन्यु-गोवर्धन आदिके साथ नित्यसिद्धा गोपियोंका विवाहमूलक परकीय अभिमान-यह सब कुछ अत्यन्त स्थूलरूपमें दिखलायी पड़ता है। यह सब कुछ ही योगमायाके द्वारा ही सम्पादित होता है और अत्यन्त सूक्ष्म-मूलतत्त्वसे संयोजित है। इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है और गोलोकके सर्वथा अनुरूप है। शुद्धस्वकीय भाव वैकुण्ठमें विराजमान है। स्वकीयत्व परकीयत्व अचिन्त्यभेदाभेदरूपमें गोलोकमें दिखायी पड़ते हैं। और देखो, आश्चर्यका विषय यह है कि व्रजमें परकीयभाव स्थूल रूपसे होनेपर, पर-दार अर्थात् परायी स्त्रीका सङ्ग दिखायी देनेपर भी उसमें परदारत्व नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णकी शक्तियाँ उनकी निजशक्ति हैं। अनादिकालसे गोपियोंके साथ श्रीकृष्णका संयोग रहनेके कारण उनका स्वकीयत्व और दाम्पत्य ही सिद्ध होता है। अभिमन्यु आदि केवल उस-उस अभिमानके अवतार विशेष हैं, उन्होंने श्रीकृष्णकी लीलापुष्टिके लिये गोपियोंके पति होकर श्रीकृष्णको उपपतिभावमें व्रजरङ्गका नेता किया है। प्रपञ्चसे अतीत गोलोकमें केवल अभिमानसे ही रसकी सम्पूर्ण पुष्टि हो जाती है। परन्तु प्रपञ्चके अन्तर्गत गोकुलमें विवाहधर्म और उस धर्मके उल्लङ्घनकी प्रतीतिके लिये उस-उस अभिमानकी प्रकटता पृथक् सत्ता (अभिमन्यु आदि) रूपमें योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है।" (जैवधर्म) ॥ २९॥ आमिह ना जानि ताहा, ना जाने गोपीगण। दुँहार रूपगुणे दुँहार नित्य हरे मन ॥३०॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावके कारण इसे ना तो मैं जान सकूँगा और ना ही गोपियाँ जान सकेंगी, क्योंकि हमारा मन एक-दूसरेके रूप और गुणोंके द्वारा नित्य आकृष्ट रहेगा ॥ ३० ॥ अनुभाष्य-ईश्वरका उनके वश्य अर्थात् जीवके प्रति जो भाव है, उस भावकी अनुभूतिसे आश्रयके (जीवके) अपने प्रयाससे विषयकी अर्थात् ईश्वरकी चमत्कारिता उत्पादनकी चेष्टासे (ईश्वरकी) उपलब्धि नहीं होती। इसलिये ही योगमायाकी विशेषताओंके वर्णनमें उनको आश्रय-जातिका सहायक बतलाया गया है। विषय और आश्रय, दोनों अपने-अपने भावोंकी अनुभूतिसे एक-दूसरेके भावोंकी प्रतीतिमें अवस्थित होकर आकृष्ट होते हैं। इस लीलावैचित्र्यके सम्बन्धमें भौतिक जगत्में भ्रमणशील (मायाबद्ध) जीव प्रवेश नहीं कर सकते। वैसी अवस्था ना आनेपर अथवा उसमें रुचि उदय होनेसे पहलेतक जीवोंका इसे अनुभव करनेका सौभाग्य उदित नहीं होता है ॥ ३० ॥ धर्म छाड़ि' रागे दुँहे करये मिलन। कभु मिले, कभु ना मिले, दैवेर घटन ॥ ३१ ॥ चौथा अध्याय | १५९

[ ४/३१-३३ अनुवाद-संसारके मर्यादारूपी धर्मको त्यागकर हमारा अनुराग ही हम दोनोंका मिलन करायेगा। योगमायाके प्रभावसे कभी मिलन होगा, तो कभी मिलन नहीं होगा॥३१॥ अनुभाष्य-परस्पर आकर्षणके कारण श्रीकृष्ण और गोपियोंका मर्यादामय वैधधर्मको त्यागकर सभी बाधाओंको पार करते हुए मिलन होता है। एक-दूसरेकी उद्दीपना होनेपर वे अपने सभी वैध कर्त्तव्योंको तत्क्षणात् भूलकर मिलनेके लिये अति उत्कण्ठित हो जाते हैं। मिलनके उत्कर्षकी समृद्धिके लिये कभी-कभी विप्रलम्भ-रसके द्वारा उसकी पुष्टि होती है। प्राकृत जड़जगत् निरानन्द होनेके कारण इसमें विप्रलम्भका अभाव दिखायी देता है, किन्तु अप्राकृत राज्यमें विरहमें पूर्ण तन्मयताके कारण चमत्कारिता समृद्ध होती है। मिलनमें अभिलषित वस्तुको पानेकी उत्कण्ठामें किञ्चित् शिथिलता होती है, परन्तु विरहमें मिलनकी उत्कण्ठा प्रबल होनेके कारण वही अधिक चमत्कारिता उदय कराती है॥३१॥ एइ सब रसनिर्यास करिब आस्वाद। एइ द्वारे करिब सब भक्तरे प्रसाद॥३२॥ अनुवाद-इस प्रकार मैं इन सब रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इन्हीं लीलाओंके द्वारा सभी भक्तोंके ऊपर कृपा करूँगा॥३२॥ व्रजेर निर्मल राग शुनि' भक्तगण। रागमार्गे भजे येन छोड़ि' धर्म-कर्म॥३३॥ अनुवाद-व्रजके इस निर्मल अनुरागके विषयमें श्रवणकर भक्त लोग सभी अनित्य धर्मों-कर्मोंको छोड़कर मेरा रागमार्गमें भजन करेंगे॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ-गोलोकादिमें जिन सब लीलाओंका प्रचार नहीं है, उन-उन लीलाओंका मैं इस कृष्णावतारमें प्रचार करूँगा। उन लीलाओंसे स्वयं मैं भी चमत्कृत हो जाऊँगा। मेरी योगमाया स्वरूप-शक्ति अचिन्त्य प्रभावसे मेरी इच्छासे मेरी नित्यप्रिया गोपियोंके हृदयमें उपपति भावका सञ्चार करेगी। मैं भी उस समय रसकी पुष्टिके लिये उसे जान नहीं पाऊँगा, अर्थात् मेरी अचिन्त्यशक्ति मेरी सर्वज्ञताको गोपन करके उसमें एक प्रकार अद्भुत रस उत्पन्न करेगी और गोपियाँ मेरी स्वरूपशक्ति होनेपर भी उसे नहीं जान पायेंगी। मेरे और मेरी गोपियोंके अद्भुतरूप-गुणोंसे परस्परके मनको हरण करनेपर सामान्य धर्मपथको त्याग करते हुए शुद्ध-रागमार्गमें हम लोगोंमें परस्पर मिलन-सुख उदित होगा; दैव-घटनाकी भाँति कभी मिलन और कभी विच्छेद होगा। मैं इन सभी रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इसे भक्तोंको प्रसन्न होकर दान करूँगा। सभी भक्तोंको उस रसके दान करनेकी प्रक्रिया यह कि मैं व्रजमें जो निर्मल राग प्रकट करूँगा, उसे श्रवण करके भक्तगण अन्य सभी धर्मों-कर्मोंका त्यागकर रागमार्गमें मेरा भजन करेंगे॥२८-३३॥ अनुभाष्य-श्रीलरघुनाथदास गोस्वामीकृत 'मनःशिक्षा' दूसरे श्लोकमें- “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगण-निरुक्तं किल कुरु" अर्थात् “हे मेरे प्यारे मन ! श्रुतियोंमें कथित (पुण्यजनक) धर्म और (पापमूलक) अधर्म कुछ भी मत करो"; और राजा श्रीकुलशेखरकृत 'मुकुन्दमाला-स्तोत्र' पाँचवें श्लोकमें- १६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

४/३२-३४ ] “नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे, यद्यद् भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि, त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥” अर्थात् “हे भगवन्! धार्मिक कार्योंमें मेरी रुचि नहीं है, ना ही मुझे पृथ्वीका राज्य चाहिये और ना ही मैं इन्द्रिय-भोगोंकी कामना करता हूँ। वे मेरे पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप आते-जाते रहें। भले ही मुझे बार-बार जन्म लेने पड़ें, मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि आपके चरणकमलोंमें मेरी निश्चला भक्ति हो।” आदि श्लोकोंमें उन्होंने स्वधर्मसे अतीत रागभक्तिकी बात लिखी है। (भाः ११/११/३२)— “आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स च सत्तमः॥” अर्थात् “जो मेरे द्वारा वेद-शास्त्रोंमें उपदिष्ट स्वधर्मके पालनसे चित्तशुद्धि आदि गुणों और उल्लङ्घनके दोषोंसे अवगत होकर तथा उस प्रकारके सभी धर्मोंको मेरे ध्यानमें बाधा समझकर उन्हें त्यागकर केवल मेरी भक्ति करता है, वह परम सन्त है।”॥३३॥ अमृताणुकणिका—जिन समस्त जातप्रेम-भक्तोंने यथावस्थित देहमें साधनकी पूर्णता लाभकी है, उन्हें नित्यलीलामें प्रवेश करानेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें उनका गोप गृहमें जन्म कराते हैं। तब वे नित्यसिद्ध परिकरोंका आनुगत्य करके नित्यलीलामें प्रवेशकी योग्यता लाभ करते हैं। प्रकटलीलाके योगसे ही साधनसिद्ध भक्त नित्यलीलामें प्रवेश करते हैं। प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर श्रीकृष्ण जो सब लीलाएँ प्रकट करते हैं, साधक भक्त उन सभी लीलाओंका श्रवण, कीर्तन करके सिद्धिके मार्गमें अग्रसर होते हैं। श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण होकर भाग्यवान् साधक भक्तोंको दर्शनादि देकर कृतार्थ करते हैं। इसलिये प्रकटलीला साधक भक्तोंको भी कृतार्थ करनेके लिये है। और जो भजन करनेके इच्छुक हैं, किन्तु साध्य-साधनतत्त्वका निर्णय करनेमें असमर्थ होनेसे किसी एक निर्दिष्ट भजनपथका अनुसरण नहीं कर पाते, श्रीकृष्णकी प्रकटलीलाके असमोर्ध्व माधुर्यकी कथा शास्त्रादिसे अथवा किसी महाजनके मुखसे श्रवणकर अन्य सभी पन्थोंका त्यागकर श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी व्रजलीलाकी उपासनाके प्रति लुब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकटलीला भजनोन्मुख भक्तोंको कृतार्थ करने हेतु भी है। और जो विषयोंमें आसक्त साधारण लोग हैं, श्रीकृष्णकी लीलाकी अपूर्व रस-वैचित्रीकी कथा सुनकर वे भी विषयसुखोंकी तुच्छताकी उपलब्धि कर पाते हैं तथा रागानुगा भक्तिके प्रति उनका लोभ जाग्रत हो जाता है। इसलिये प्रकटलीलामें विषयासक्त लोगोंके प्रति भी श्रीकृष्णकी असीम करुणा अभिव्यक्त होती है॥३२-३३॥ रागानुग साधनसिद्ध मुक्त पुरुष ही अप्राकृत रासलीला-श्रवणके अधिकारी :— श्रीमद्भागवत (१०/३३/३६)— अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥३४॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्ण भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी नित्य नरदेहको चौथा अध्याय | १६१

[ ४/३४-३५

प्रकटकर चित्तको आकृष्ट करनेवाली विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं, जिसे सुनकर साधारण जीव भी भगवत्-परायण हो जाया करते हैं॥३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्ने नरदेह प्रकटकर जिस रासलीलाको प्रकाश किया है, उसे श्रवण करके उसके अधिकारी भक्त उस लीलापरायण होकर उस क्रीड़ाका भजन करेंगे अर्थात् उनकी सेवा करेंगे॥३४॥ अनुभाष्य—राजा परीक्षित्के द्वारा श्रीशुकदेवके निकट श्रीकृष्णकी पारकीया विहारकी यथार्थता और प्रयोजनीयताके सम्बन्धमें प्रश्न करनेपर उसके उत्तरमें शुकदेवजी कह रहे हैं— भक्तानां (रसभेदावस्थितानां हरिजनानां) अनुग्रहाय (कृपावितरणाय) मानुषं देहं (नरोचितं परम् अप्राकृतशरीरम्) आश्रितः (दधत्) तादृशीः क्रीड़ाः भजते (करोति), याः (क्रीड़ाः लीलाः) श्रुत्वा (अन्योऽपि जनः भगवति श्रद्धान्वितो भूत्वा) तत्परः (कृष्णसेवापरायणः) भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—विभिन्न रसोंमें स्थित भक्तोंपर कृपा वितरण करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण परम अप्राकृत नरदेह धारण करके विविध अप्राकृत क्रीड़ाएँ करते हैं। उन लीलाओंको सुनकर अन्य व्यक्ति भी भगवान्में श्रद्धावान् होकर श्रीकृष्ण सेवापरायण हो जाते हैं॥३४॥ 'भवेत्' क्रिया विधिलिङ्, सेइ इहा कय। कर्त्तव्य अवश्य एइ, अन्यथा प्रत्यवाय॥३५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उक्त श्लोकमें “भवेत्” पदरूप क्रियामें विधिलिङ् व्यवहार किया है, इसलिये यह निश्चित रूपसे आवश्यक कर्त्तव्य है; अन्यथा अर्थात् नहीं करनेसे प्रत्यवाय अर्थात् दोष होता है॥३५॥ अनुभाष्य—अनन्तलीलामय भगवान्की विविध प्रकाशमूर्तियाँ वैकुण्ठमें नित्य विराजमान हैं। यह देवीधाम उस गोलोक-वैकुण्ठका विकृत छायारूप है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठके अनुरूप इस प्रपञ्चमें भी विचित्रताएँ दिखलायी पड़ती हैं, परन्तु वे नित्य ना होकर खण्डित, तुच्छ, अकल्याणकारी और कालके द्वारा परिवर्तनशील हैं। विषय-विग्रह (भगवान्) के विविध प्रकाश आश्रित जीवोंकी यथोपयोगी सेव्य-सेवाधर्ममें नित्य अवस्थित हैं। वैकुण्ठमें विशुद्धसत्त्व और प्रपञ्चमें मिश्र तथा गुणमय सत्त्व दिखायी देता है। विषय और आश्रयमें नित्यानुभूतिसे विविध लीलावैचित्र्य नित्य वर्तमान होनेसे आश्रयकी उपयोगिताके विचारसे “नरतनु ही भजनका मूल है”, इस वाक्यकी सार्थकता है। इसलिये जगत्में मनुष्य योनिको सभी योनियोंमें सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। आश्रयजातीय जीव प्रपञ्चमें रहते हुए उनके उपयोगी विषय-विग्रहकी सेवामें अधिकार प्राप्त करते हैं। भगवान्के मनुष्यरूपके अतिरिक्त अमानुषिक (मत्स्य, कूर्म, वराहादि) विविध रूप भी हैं। जीवकी जैसी स्वरूपवृत्ति उदय होती है, उसीके अनुसार भजनीय वस्तुके प्रकाशभेदसे लीला-वैचित्र्य होता है। उस लीलावैचित्र्यकी उपयोगिताके विचारसे तारतम्य देखनेपर मनुष्य देहमें ही नित्य लीला-आश्रित भक्तोंपर अधिक कृपा वितरित होती है। ऐसी लीलाएँ जब प्रपञ्चमें प्रकट होती हैं, तब सर्वोत्तम मनुष्य सेव्य-वस्तुकी उन-उन सेवाओंमें उत्साहित होते हैं। भजनकी उन्नत अवस्थामें भजनीय वस्तुकी अनुभूतिके वर्णन-श्रवणसे जीवके

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४/३५ ] स्वरूपको प्रकट करनेमें विपुल सहायता होती है। पाँच प्रकारकी स्थायीभाव रतियोंमें सर्वश्रेष्ठ मधुर-रतिका सामग्रीसे योग जिस सर्वश्रेष्ठ रसको प्रकाश करता है, उसके प्रति जिसकी रुचि जाग्रत हुई है, वही उसका अधिकारी है। उस रुचिको जाग्रत करनेकी सुविधाके लिये भगवान् मत्स्य-कूर्म-वराहादि लीलाओंके विनिमयमें रामादि लीलाओंको इस प्रपञ्चमें प्रकट करते हैं। और भी, रामादि नरलीलाओंमें जिस रसकी चमत्कारिता प्रबल नहीं है, वह जीवकी जड़ बुद्धिसे परे होनेपर भी तथा अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी ऐश्वर्य एवं माधुर्य विचारके तारतम्यसे पारकीया मधुर रति अतुलनीय नवनवायमान चमत्कारिताको प्रकाशित करती है। प्राकृत बुद्धिवाले सहजिया लोग श्रीराधा-कृष्णकी अप्राकृत लीलाओंको ना समझनेके कारण उनका अनुकरण करके व्यभिचारमें प्रवृत्त होते हैं। ऐसे व्यभिचारके द्वारा विशुद्धसत्त्वमय गोलोकका वैचित्र्य उद्दिष्ट नहीं होता, अपितु वह उनके चित्तको मलिन करके इन्द्रिय-परायणतामें अधोपतित कराता है। अप्राकृत-लीलामें अधोक्षजकी सेवा वर्तमान है। प्राकृत सहजिया लोग यह बात नहीं समझकर श्रीकृष्णसेवाको भी भोगमय इन्द्रियतर्पण मानकर भ्रमित हो जाते हैं। प्रपञ्चागत भगवत्-लीला कुछ प्राकृत सहजियोंकी विचरण भूमि नहीं है अर्थात् उनका इसमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णकी रासलीलादि योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है और वह भौतिक विचारमें यथारूप परिलक्षित नहीं होती। सहजिया लोग श्रीकृष्णलीलाको नश्वर भोगोंके अन्तर्गत मानते हैं। वे “तत्परत्वेन निर्मलम्” और “तत्परो भवेत्” पदका विकृत अर्थ करके अप्राकृत-तत्त्वको प्राकृत-तत्त्व समझनेकी भूल करते हैं। वे “तादृशी क्रीड़ा” शब्दके अर्थभ्रमसे इन्द्रिय-तर्पणमें निमग्न होते हैं, किन्तु वास्तवमें अप्राकृत रति ही “तादृशी” शब्दका मुख्य अर्थ है। अविद्याग्रस्त हरिविमुख जीव अप्राकृत क्रीड़ाको नहीं समझकर अपनी प्राकृत बुद्धिके द्वारा जड़भोगमें उन्मत्त होकर इस श्लोकके अर्थका अनर्थ करते हैं। साधन और सिद्धिकी भूमिकामें विवर्त्त उपस्थित होनेपर ही अर्थात् साधनकी अवस्थामें स्वयंको सिद्ध समझनेपर ही जीव प्राकृत-सहजिया हो पड़ता है। विधिलिङ्का “भवेत्” शब्द देखकर किसीको केवल रुचिके द्वारा प्राप्य इस रागानुग पथको अधिकारका विचार किये बिना अनर्थयुक्त भोगियोंका ही वैधपथ नहीं समझना चाहिये। प्रपञ्चमें कर्त्तव्य (नैतिकता) और अकर्त्तव्य (अनैतिकता) का विचार होता है। गोलोक-वृन्दावनमें इस प्रकारका कोई नियम नहीं होता। वहाँ केवल लोभके वशीभूत होकर अनुरागके पथपर सभी आश्रित-तत्त्व श्रीकृष्ण-प्रीतिरूप रसका अनुसन्धान करते हैं। यदि कोई जीवात्माके नित्य और अवश्य सेव्य प्रपञ्चागत परमश्रेष्ठ मधुरभावके प्रति उदासीन होता है, तो वह निश्चितरूपसे ही भगवत्सेवाको छोड़कर नश्वर व्यभिचारमें अधःपतित होगा। मधुररतिमें तत्पर ना होनेपर जीवका मधुर-रतिके विपरीत जड़भोगवाद प्रबल हो जायेगा। इसी प्रकार वात्सल्यरतिसे श्रीकृष्णसेवासे विमुख होनेपर भोगप्रवृत्ति उसको नश्वर पुत्र-मोहमें अधोपतित करेगी। उसी प्रकार श्रीकृष्णको एकमात्र बन्धु ना माननेसे इन्द्रियपरायण नश्वर बन्धुगण आकर जीवको अधोपतित करेंगे। उस प्रकार भगवत्-विमुखता उपस्थित होनेपर जीव श्रीकृष्णसेवासे उदासीन होकर भोगपर इन्द्रियसेवी नश्वर देहकी सेवा करते-करते स्वरूप-विभ्रान्त चौथा अध्याय | १६३

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हो जायेगा। इसी प्रकार श्रीकृष्णमें निरपेक्ष बुद्धि ना होनेसे जीव श्रीकृष्णविमुख होकर जड़वस्तुसे निरपेक्ष अर्थात् ब्रह्ममें लीन एक पत्थरकी भाँति मोक्ष या निर्वाणका दास होकर निर्विशेषवादी हो जायेगा। श्रीकृष्णलीलामें प्रवेश करनेमें जिनकी उदासीनता होगी, उनकी ही इन्द्रिय-परायण भोगबुद्धि और उसके परिणामस्वरूप सत्कर्म और कुकर्ममें औपाधिक अस्मिता (देहमें 'मैं' और देह-सम्बन्धी वस्तुओंमें 'मेरा' का भाव) समृद्ध होकर परम कल्याणसे वञ्चित करेगी॥ ३५॥ अमृताणुकणिका - 'तत्परः' - भगवत्परायण अथवा लीलापरायण। परायण-पर (श्रेष्ठ) + अयन (गति या आश्रय); अर्थात् श्रेष्ठ गति अथवा आश्रय जिसका। इसलिये 'तत्परः' का अर्थ 'लीलाअनुष्ठानमें रत' नहीं है। जीव भगवत्-लीला-अनुष्ठानमें रत नहीं हो सकता, क्योंकि जीव भगवान् नहीं है। भगवान् स्वरूपशक्तिके सङ्गमें लीला करते हैं, किन्तु स्वरूपशक्तिके सङ्ग बद्धजीवकी क्रीड़ा सम्भव नहीं है। और 'तत्परः' शब्दका अर्थ 'भगवत्-लीलाके अनुकरणमें रत' भी नहीं है, क्योंकि भगवत्-लीलाका अनुकरण जीवके लिये निषिद्ध है। रासलीलाके प्रसङ्गमें श्रीशुकदेवने कहा (भाः १०/३३/३१)- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद्यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा करता है, तो उसका विनाश अनिवार्य है। जैसे शिवके अतिरिक्त अन्य कोई हलाहल विषपान करे, तो उसका विनाश अवश्यम्भावी है।” यदि कहें उक्त रीतिसे परकीया प्रेम और औपपत्य रसका उत्कर्ष सिद्ध करनेसे तो सभी लोगोंका कल्याणके स्थानपर महान अकल्याण ही होगा। उनका इहलोक और परलोक, दोनों नष्ट हो जायेंगे। इस शङ्काके समाधान हेतु उत्तर देते हैं (उः नीः ३/२४)- “वर्तितव्यं शमिच्छद्भिर्भक्तवन्न तु कृष्णवत्। इत्येवं भक्तिशास्त्राणां तात्पर्यस्य विनिर्णयः॥” अर्थात् “अपना कल्याण चाहने वाले व्यक्तियोंको भक्तके समान आचरण करना चाहिये, श्रीकृष्णकी भाँति नहीं। यही समस्त भक्ति शास्त्रोंका निर्णयात्मक तात्पर्य है।” इस श्लोककी टीकामें श्रीजीव गोस्वामी लिखते हैं- “शृङ्गाररसकी बात तो दूर रहे, अन्य रसोंमें भी श्रीकृष्णके भाव अनुकरणीय नहीं हैं।” श्रीकृष्णवत् आचरण निषेध करके भक्तवत् आचरणकी विधि कही गयी है। अर्थात् वैष्णवजन जैसा आचरण करते हैं, उनके समान ही वैसा आचरण करना चाहिये। इसपर शङ्का हो सकती है कि भक्त दो प्रकारके होते हैं - सिद्ध और साधक, तो किन भक्तोंके आचरणका अनुसरण करें? इसके उत्तरमें कहते हैं-सिद्धोंका नहीं, साधकोंका अनुसरण करना चाहिये। लीलाविष्ट अवस्थामें प्रेमवैवश्य-वशतः अनेक बार सिद्ध कोटिके भक्तोंका आचरण प्रायः श्रीकृष्णके आचरण-तुल्य हो जाता है, जैसे रासस्थलीसे श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर गोपियाँ श्रीकृष्णके आचरणका अनुकरण करने लगीं। साधक कोटिके भक्तोंका आचरण भी सर्वथा अनुकरणीय नहीं है। साधकोंमें भी दुराचारी मिल जाते हैं, जैसे (गीता ९/३०) में भगवत्-वाक्य है 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।'

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४/३५ ]

अर्थात् अनन्य भावसे भजन करनेवाले साधक भक्तोंमें कभी-कभी परधन-अपहरण, परस्त्रीगमनादि सुदुराचार दिखलायी देता है; उनका यह निन्दनीय आचरण अनुकरणीय नहीं है। तो क्या सिद्ध और साधक भक्त, दोनों ही हमारे लिये अनुसरणीय नहीं हैं? नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिये। विचारपूर्वक आचार्योंने सिद्धान्त किया है कि जो सभी भक्त भक्ति-शास्त्रोंकी विधियोंका पालन करते हैं, उनका भक्ति-शास्त्रानुमोदित आचरण ही अनुसरणीय है। यहाँ एक और प्रश्न हो सकता है—गीतामें श्रीकृष्णने कहा—'श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो करते हैं, साधारण लोग उसका अनुसरण करते हैं; त्रिलोकमें मेरे लिये कोई भी कर्म नहीं है, किन्तु मैं यदि कोई कर्म नहीं करूँ, तो मेरा अनुसरण करके लोग भी कर्म नहीं करेंगे और समाजमें व्यभिचार फैलेगा। इसलिये लोगोंके मङ्गलके लिये अनासक्त भावसे कर्म करना उचित है।' इन सभी उक्तियोंसे यह समझा जाता हैं कि श्रीकृष्णका आचरण अनुकरणीय हैं। जब आदर्शकी स्थापनाके लिये वे कर्म करते हैं, तब उनका आचरण अनुकरणीय क्यों नहीं है? इसका उत्तर यह है कि श्रीकृष्ण किस प्रकारके कर्मकी बात कर रहे हैं, इसका विवेचन आवश्यक है। स्वजनोंके वधके भयसे अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे। गीताके द्वितीय अध्यायमें श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा कि तुम क्षत्रिय हो और युद्ध करना तुम्हारा स्वधर्म है तथा धर्मयुद्धमें स्वजनोंका वध पाप नहीं है। तृतीय अध्यायमें यही बात अन्य प्रकारसे कही है। यहाँपर भी स्वधर्म अथवा वर्णाश्रम-धर्मकी बात कही है। भागवतमें कहा गया है कि जब तक कर्मोंसे निर्वेद अवस्था नहीं आती, किम्वा भगवत्-कथादिमें श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक कर्म करना चाहिये। कर्मोंसे निर्वेद अवस्था उत्पन्न होनेपर लोग ज्ञानमार्गका साधन और तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि उत्पन्न होनेपर भक्तिमार्गके साधनका अवलम्बन करेंगे। इससे पूर्व कर्म करनेका विधान इसलिये किया गया है कि यथायथ भावसे कर्मानुष्ठानसे चित्त शुद्धिकी सम्भावना है, चित्तशुद्धि होनेपर किसी भाग्यसे भक्तिमार्गके अनुष्ठानमें रति उत्पन्न हो सकती है। गीता ३/१७में आगे कहा है— “यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥” अर्थात् “जो व्यक्ति आत्माराम हैं और आत्मामें ही तृप्त रहनेवाले हैं एवं आत्मामें ही सन्तुष्ट हैं, उनके लिये कोई कर्त्तव्य कर्म नहीं हैं।” किन्तु लोग उनकी आन्तरिक दशाको नहीं समझकर उनके बाह्य आचरणका अनुसरण करेंगे, इसलिये ऐसे आत्माराम पुरुष भी लोक कल्याणके लिये कर्मका आचरण करते हैं। श्रीकृष्णका जन्म और कर्म दिव्य हैं, वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, उनका जन्म किसी कर्मके फलसे नहीं है, वे स्वेच्छासे जन्म ग्रहण करते हैं। स्वरूपतः उनका कोई वर्णाश्रम भी नहीं है, इसलिये वर्णाश्रमोचित धर्म उनका नहीं है। वर्णाश्रमोचित कर्म बद्धजीवोंकी चित्तशुद्धि और समाजके मङ्गलके लिये हैं। ये श्रीकृष्णके लिये नहीं हैं, तो भी जब वे नरलीला करनेके लिये जगत्में अवतीर्ण होते हैं, वे क्षत्रियकुलमें आविर्भूत होकर गृहस्थाश्रमका अभिनय करते हैं। इसलिये वे वर्णाश्रमोचित जो-जो कर्म, जैसे द्वारकामें वे कहीं होम करते, कहीं पञ्चसूना-यज्ञ करते, सन्ध्या-वन्दनादि करते हुए दिखलायी देते हैं, वह केवल आदर्श-स्थापना

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और लोक-संग्रहके लिये है। इन्हीं कर्मोंका उन्होंने गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायमें वर्णन किया है, भक्तोंके साथ उनकी आनन्दमयी क्रीड़ारूपी लीलाका नहीं। किन्तु 'अनुग्रहाय भक्तानामादि' श्लोकोंमें उनकी लीलाओंका वर्णन है। वे रसिकशेखर हैं, वे लीलाओंके द्वारा अपने प्रेमीभक्तोंके साथ रसास्वादन करके आनन्द अनुभव करते हैं और भक्तोंको भी आनन्द प्रदान करते हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये दासोचित सेवाका भाव चित्तमें स्फुरित करानेके लिये श्रीकृष्णकी लीलाओंके श्रवण-कीर्तनादि साधनभक्तिका अनुष्ठान ही जीवका कर्तव्य है। इसके विपरीत कुछ भी करनेपर श्रीकृष्ण-दासत्व स्फुरित होनेकी कोई भी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णकी लीलाके अनुकरणसे केवलमात्र अपराध ही सञ्चित होंगे। विशेषतः लीलानुकरण साधनभक्तिका अङ्ग है, ऐसा किसी भी शास्त्रमें नहीं कहा गया है; इसलिये लीलानुकरणसे भक्तिदेवीकी कृपा प्राप्त करनेकी सम्भावना भी नहीं है, अपितु शास्त्रादेश-उल्लङ्घनजनित अपराध ही होंगे। श्रीमद्भागवत और अन्यान्य शास्त्रोंमें सर्वत्र ही श्रीकृष्ण कथा श्रवण करनेका महात्म्य ही वर्णित हुआ है, लीलानुकरणका कहीं भी उल्लेख नहीं है॥ ३५॥ रागमयी भक्तिके प्रचारकी इच्छा ही श्रीगौरावतारका मुख्य कारण :- एइ वाञ्छा यैछे कृष्णप्राकट्य-कारण। असुरसंहार-आनुषङ्ग प्रयोजन॥ ३६॥ धर्मकी स्थापनादि स्वयंरूप श्रीकृष्ण या श्रीगौरका मुख्य कार्य नहीं :- एइ मत चैतन्य-कृष्ण पूर्ण भगवान्। युगधर्मप्रवर्त्तन नहे ताँर काम॥ ३७॥ अनुवाद-जिस प्रकार प्रेमरस-निर्यायसका आस्वादन और रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छाएँ ही श्रीकृष्णके प्रकट होनेका मुख्य कारण है तथा असुरोंका संहार तो केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन है, उसी प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु स्वयं-भगवान् हैं, नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना इनका कार्य नहीं है॥ ३६-३७॥ स्वांश युगावतारके साथ अवतारीका मिलन :- कोन कारणे यबे हैल अवतारे मन। युगधर्मकाल हैल से काले मिलन॥ ३८॥ अनुवाद-जिस-किसी कारणसे जब स्वयं-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अवतार लेनेकी इच्छा हुई, तब युगधर्म-काल उस कालमें मिल गया॥ ३८॥ गुह्य और बाह्य कारणसे अवतीर्ण होकर स्वयं आचार और प्रचार :- दुइ हेतु अवतरि' लञा भक्तगण। आपने आस्वादे प्रेम-नाम-सङ्कीर्त्तन॥ ३९॥ सेइ द्वारे आचण्डाले कीर्त्तन सञ्चारे। नाम-प्रेममाला गाँथि पराइल संसारे॥ ४०॥ अनुवाद-अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, इन दो कारणोंसे स्वयं-भगवान् अपने भक्तोंको लेकर

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४/३६-४१ ] अवतरित हुए और भक्तोंके साथ स्वयं प्रेम एवं नामसङ्कीर्त्तनका आस्वादन किया तथा इसके द्वारा उन्होंने कीर्त्तनका प्रचारकर चण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी प्रेमदान किया। उन्होंने नाम-प्रेमरूपी मालाको गूँथकर सम्पूर्ण संसारको पहनायी ॥ ३९-४० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें जिस प्रकार उक्त अभिलाषाके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए थे और असुर-संहार उनका मूलप्रयोजन ना होकर केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन था, उसी प्रकार गौरावतारमें श्रीकृष्णचैतन्य पूर्णतम भगवान् हैं। नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना उनका अपना कार्य नहीं था, परन्तु किसी गूढ़ कारणके लिये जब पूर्ण भगवान्ने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की, तो घटनाक्रमसे उसी समय युगधर्मकाल भी आकर उपस्थित हो गया। इसलिये श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके गूढ़ अन्तरङ्ग प्रयोजन और युगधर्म प्रचाररूप बाह्य प्रयोजन-इन दो कारणोंसे अवतीर्ण होकर उन्होंने प्रेम और नामसङ्कीर्त्तनका भक्तोंके साथ आस्वादन किया ॥ ३६-३९ ॥ एइमत भक्तभाव करि' अङ्गीकार। आपनि आचरि' भक्ति करिल प्रचार ॥ ४१ ॥ अनुवाद-इस प्रकार उन्होंने भक्तभावको अङ्गीकार करके स्वयं आचरण किया और भक्तिका प्रचार भी किया ॥ ४१ ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णने अपनी औदार्यलीलाको प्रकट करनेकी इच्छासे अपनी नित्य गौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकाशित किया। नित्य गौरलीलामें श्रीकृष्णका भक्तभाव ही उनकी नित्यलीलाकी चमत्कारिता है। स्वयंरूप श्रीकृष्णने नित्यगौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकट करके सेव्य श्रीकृष्णकी सेवाको जीवके लिये सुलभ किया है। प्राकृत-साहजिक लम्पट-सम्प्रदायके लोग अप्राकृत विप्रलम्भके स्वरूपज्ञानको नहीं जानते हैं। श्रीगौरसुन्दरने जिस कारणसे भक्तभावको अङ्गीकार किया, उसका खण्डन करके वे उन्हें अवैधरूपसे सम्भोगविग्रह 'नागर' कहकर स्वयंको “नदीय-नागरी” या “गौरनागरी” आदि काल्पनिक शब्दोंसे भूषित करते हैं। इस प्रकार नित्य विप्रलम्भ रसके भक्त अथवा आश्रय-जातीय भावोंको विलुप्तकर वे लोग जो कुकर्म करते हैं, उससे स्वयंरूप श्रीकृष्ण कभी सन्तुष्ट नहीं होते हैं। स्वयंरूप श्रीगौरविग्रह उन सभी प्राकृत भोगपरायण साहजिकगणोंपर कृपा करनेके बदले बहुत दूरसे उनका त्याग कर देते हैं। उनका श्रीकृष्णलीलाके सम्भोग विचारसे विप्रलम्भ-रस-लीलामय कृष्णभक्तिके विनाशका प्रयास श्रीगौरसुन्दरसे विद्वेषके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ४१ ॥ अमृतानुकणिका-श्रीकृष्णके औदार्यमय गौरावतारका वैशिष्ट्य यह है कि इस बार साधारण जीवोंको, यहाँ तक पापियोंको भी अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण हुए हैं। इस बार भगवान् द्वापर युगकी भाँति केवल “मामेकं शरणं व्रज” नहीं कह रहे हैं। अपितु क्या करनेसे उनके शरणागत हुआ जायेगा, हाथ पकड़कर वह शिक्षा देनेके लिये अपनी अचिन्त्य-शक्तिबलसे भक्तभाव अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। कोई लोग तर्क करके कह सकते हैं कि श्रीचैतन्यदेवके भक्तोन्मत्त भाव साधारण लोगोंके लिये अनुसरणीय नहीं हैं। इस प्रसङ्गमें वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीनृसिंह अथवा श्रीवराह अवतारके भाव-प्रदर्शनका दृष्टान्त उल्लेख करते हैं, परन्तु यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि श्रीमन्महाप्रभुका श्रीनृसिंह चौथा अध्याय | १६७

[ ४/४१-४४

अथवा श्रीवराह अवतारका भाव-प्रदर्शन भक्तोन्मत्त भाव नहीं है। वह तो श्रीगौरनारायणका आत्मस्वरूप-ऐश्वर्य-प्रकाश-लीला है। भक्तभावसे कोई कभी भी अपनेमें श्रीकृष्ण, श्रीनृसिंह, श्रीवराह, श्रीराम आदि विष्णुतत्त्व होनेका अभिमान नहीं करता। भक्तोंमें विष्णुके दास या दासानुदासके अतिरिक्त अन्य कोई अभिमान नहीं है। “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः” (भागवत १०/३३/३०) अर्थात् जीव कभी भी अपनेको मनके द्वारा भी ब्रह्म होनेकी कल्पना ना करे। क्योंकि जीव अनीश्वर अथवा वश्य-तत्त्व है। अनीश्वर होकर जो मूढ़तावशतः अपनेको ईश्वर मानते हैं, वे निश्चय ही विनष्ट हो जाते हैं। एकछत्र भोक्ता-तत्त्व भगवान् श्रीकृष्णकी रासादि-लीला, भगवान् बलदेवकी मद्यपान-लीला, द्वारकाधीशकी सोलह हजार महिषियोंसे विवाहकी लीला आदि भोग्य और वश्य जीवके लिये अनुकरणीय नहीं है। किन्तु श्रीकृष्ण और श्रीबलदेवने लोकशिक्षाके लिये सान्दीपनी मुनिके आश्रममें रहकर जो वेदाध्ययन और गुरुसेवाका आदर्श उन्होंने दिखलाया है, वहाँ यदि कोई उपरोक्त श्लोकका प्रयोग करके श्रीराम-कृष्णके आदर्शके अनुसरणसे विमुख हो जाय, तब उसे मन्दभाग्य ही कहा जायेगा। भगवान्की लोकशिक्षाके उद्देश्यसे की गयी लीलाओंका अवश्य अनुसरण करना चाहिये। अनर्थयुक्त जीव भगवान् श्रीगौरसुन्दर अथवा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जैसे स्त्रीके स्वामी होनेकी इच्छा करके माल्य, चन्दन, ताम्बूल आदि भोग करनेकी स्पृहा करके परम अनर्थ-सागरमें पतित होंगे। किन्तु लोक-शिक्षक श्रीगौर-नित्यानन्दके द्वारा आचरित और प्रचारित विष्णु-वैष्णव-सेवा, सर्वात्माके द्वारा सब समय श्रीकृष्ण-अनुसन्धानके आदर्शको ग्रहण ना करनेके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अहैतुकी-महावदान्यतारूपी गङ्गाके तटपर अवस्थित रहकर भी माया मरीचिकाके द्वारा ही भ्रान्त होंगे-ऐसा समझना चाहिये॥४१॥ शान्तके अतिरिक्त चारों रसोंके आश्रयवर्गकी श्रीकृष्णप्रीति ही काम्य :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार। चारि प्रेम, चतुर्विध भक्तइ आधार ॥४२॥ भक्तगण अपने-अपने रसकी श्रेष्ठता मानते हैं :- निज निज भाव सबे श्रेष्ठ करि' माने। निजभावे करे कृष्णसुख-आस्वादने ॥ ४३ ॥ निरपेक्ष विचारसे अप्राकृत मधुररसमें अन्यान्य रस अन्तर्भुक्त होनेपर श्रीकृष्णप्रीतिचेष्टा सर्वापेक्षा अधिक :- तटस्थ हइया हृदि विचार यदि करि। सब रस हैते शृङ्गारे अधिक माधुरी ॥ ४४ ॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, ये चार प्रकारके रस हैं। चार प्रकारके भक्त इन रसोंमें प्रेमके आधार हैं। अपने-अपने भावको सभी भक्त श्रेष्ठ मानते हैं और अपने भावोंसे श्रीकृष्णकी सेवाकर उनके सुखमें स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। परन्तु निरपेक्ष होकर हृदयमें यदि विचार किया जाय, तो सभी रसोंसे शृङ्गार (मधुर) रसमें माधुर्य अधिक है॥४२-४४॥

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४/४२-४६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंमें प्रत्येकको अपने-अपने द्वारा कृष्णसुखास्वादन सर्वश्रेष्ठ लगता है, किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे मधुर अर्थात् शृङ्गाररसकी माधुरी अन्य तीन रसोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननी होगी ॥ ४२-४४॥ दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें उत्तरोत्तर श्रीकृष्ण-सुखास्वादनका आधिक्य :- भक्तिरसामृतसिन्धु (२/५/३८)- यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ ४५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उल्लासमयी रति उत्तरोत्तर आस्वादन-विशेष प्रतीत होती है। वही रति स्थान-विशेषपर वासनाक्रमसे परमास्वादनीय होकर मधुर-रसरूपमें प्रकाश पाती है ॥ ४५ ॥ अनुभाष्य-असौ रतिः यथोत्तरम् (उत्तरोत्तरक्रमेण) स्वादविशेषोल्लासमयी (मधुरविशेषस्य आधिक्यवती) अपि वासनया (वासनाभेदेन) का अपि (रतिः) कस्यचित् (भक्तस्य) स्वाद्धी भासते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ मधुर रसमें दो प्रकार स्थिति, स्वकीया और परकीया :- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ ४६ ॥ अनुवाद-इसलिये इसका नाम मधुर रस है। यह दो प्रकारका होता है, एक स्वकीया और दूसरा परकीया ॥ ४६ ॥ अनुभाष्य-उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीरूप गोस्वामीने स्वकीया और परकीयाकी इस प्रकार परिभाषा दी है। स्वकीया कृष्णवल्लभा- “करग्राह विधिं प्राप्ताः पत्युरादेशतत्पराः। पातिब्रत्यादविचलाः स्वकीयाः कथिता इह ॥ ” अर्थात् “शास्त्रकी विधिके अनुसार जिनका पाणिग्रहण हुआ है, पतिके आदेश पालनमें जो सदा तत्पर रहती हैं और पातिव्रत्य-धर्मसे कभी विचलित नहीं होतीं, रसशास्त्रमें उनको 'स्वकीया' नारी कहा गया है।” परकीया कृष्णवल्लभा,- “रागेणैवार्पितात्मानो लोकयुग्मानपेक्षिणा। धर्मेणास्वीकृता यास्तु परकीया भवन्ति ताः ॥” अर्थात् “पर-पुरुषके अनुरागसे आकृष्ट होकर जो आत्मसमर्पण करती हैं और इस प्रकारका यौनसम्बन्ध धर्मशास्त्रविधिके द्वारा अस्वीकृत जानकर भी इस लोक और परलोकमें किसी भी असुविधाकी चिन्ता नहीं करती हैं, उनको 'परकीया रमणी' कहा जाता है।”॥४६॥ अमृतानुकणिका-सभी अप्राकृत रसोंके मध्य श्रीकृष्णका मधुररस अपार, अतुल, असमोध्र्व है। किन्तु श्रीकृष्णके दो असीम गुण जीवके पक्षमें बड़े ही उपादेय हैं। एक-उनकी सर्वशक्तिमत्ता और दूसरा-उनकी निरङ्कुश इच्छा। अपनी सर्वशक्तिमत्ताके प्रभावसे वे अपार, असमोध्र्व तत्त्वको चौथा अध्याय | १६९

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अनायास ही प्रपञ्चमें ला सकते हैं। अपनी निरङ्कुश इच्छा-प्रभावसे वे तुच्छ प्रपञ्चमें उनके सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रकाश करनेकी इच्छा करते हैं और प्रपञ्चकी हेयता और न्यूनतासे सम्पूर्ण रूपसे अस्पृष्ट रहकर भी ये सभी सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रेमाञ्जनयुक्त भक्तिनेत्रोंवाले भक्तोंके अप्राकृत दर्शनके विषयीभूत होते हैं। विशेषतः कलियुगके जीवोंके सौभाग्यकी पराकाष्ठाकी बात तो सम्पूर्ण रूपसे कही नहीं जा सकती। क्योंकि इस युगमें स्वयं माधुर्य-विग्रह श्रीकृष्ण अपनी अपूर्व लीलारसका वितरण करनेके लिये औदार्यमय विग्रह रूपमें प्रकटित हुए हैं। और जीवोंके सौभाग्यका पथ इस युगमें ऐसे सहज भावसे आविष्कृत हुआ है कि स्वयं विषय (श्रीकृष्ण) सर्वश्रेष्ठ आश्रय (श्रीराधा) के भावोंको लेकर लोक-शिक्षक हुए हैं। 'आत्म' और 'पर'–ये दो तत्त्व हैं। आत्मनिष्ठ धर्म ही–आत्मारामता है, उसमें रसकी पृथक् सहायता नहीं है। किन्तु पररामता धर्ममें रसविचित्रता और रसोत्कर्षके लिये अनेक प्रकारकी पृथक् सहायताका अवस्थान है। आत्मारामता और पररामता, दोनों नित्य व्यापार हैं। श्रीकृष्ण एक ओर 'आत्माराम' और दूसरी ओर वैसे ही 'परराम' हैं। इस प्रकारके विरुद्धधर्मका समन्वय अचिन्त्यशक्तियुक्त लीलापुरुषोत्तमके पक्षमें स्वाभाविक ही है। श्रीकृष्णलीलाके एक केन्द्रमें आत्मारामता, और उसके विपरीत केन्द्रमें पररामताकी पराकाष्ठारूप परकीयता है। आत्मारामताकी दिशामें अग्रसर होनेसे क्रमशः रसकी निरपेक्षता और शुष्कता प्रकट होती है। और परकीयकी दिशामें अग्रसर होनेपर साथ-साथमें रसकी अधिकतर प्रफुल्लता प्रकट होती है। (भाः १०/३३/१६)–“रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्व-प्रतिबिम्ब-विभ्रमः॥” (भाः १०/३३/१९)–“रेमे स भगवान्स्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥” (भाः १०/३३/२५)–“सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः”, इन भागवतीय वचनोंके द्वारा यह स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि 'आत्मारामता' ही श्रीकृष्णका निजधर्म है। श्रीकृष्ण अद्वयतत्त्व हैं और उनकी शक्तियाँ अनन्त हैं (परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते—श्वेताश्वतर ६/८)। वे सभी शक्तियाँ रूपवती होकर आत्माराम श्रीकृष्णको क्रीड़ा कराती हैं। श्रीकृष्णकी एक पराशक्ति ही रसविलासके लिये अनन्तशक्ति रूपमें प्रकाशित होती है। ये अनन्तशक्तियाँ पराशक्तिका कायव्यूह या विस्तार हैं। रासक्रीड़ामें श्रीकृष्ण जितनी संख्यामें हैं, गोपीशक्ति भी उसी संख्यामें प्रकाशित होती है। सभी श्रीकृष्ण ही हैं, किन्तु चित्शक्ति योगमाया श्रीकृष्णकी इच्छासे श्रीकृष्णको और गोपियोंको पृथक् प्रकट करती है, लीला-पोषणके लिये सभीको पृथक् भावसे सजाती है और रसपोषणके लिये परस्पर पारकीय सम्बन्धका ज्ञान प्रदान करती है। अचिन्त्य चित्शक्तिका यह अचिन्त्य कार्य क्षुद्रजीव अथवा ब्रह्मादि अधिकारिक देवताओंकी बुद्धिके भी अगम्य है। श्रीकृष्ण ऐश्वर्यमय चित्-जगत्में आत्मशक्तिको लक्ष्मीरूपमें प्रकट करके स्वकीय बुद्धिसे रमण करते हैं। यह स्वकीय बुद्धि प्रबल होनेसे दास्यरस पर्यन्त ही वहाँपर रसकी सुन्दर गति है अर्थात् उस स्थानका मधुररस-सादृश्य भी दास्यके स्तरपर स्थित है। और स्वकीय अभिमानसे रसकी अत्यन्त दुर्लभता और चमत्कारिता नहीं है, ऐसा देखकर श्रीकृष्ण आत्मशक्तिको लाखों गोपीरूपोंमें पृथक् करके विलास करते हैं।

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