श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२१-२३ ] मोर पुत्र, मोर सखा, मोर प्राणपति। एइभावे येइ मोरे करे शुद्धभक्ति॥ २१॥ आपनाके बड़ माने, आमारे सम-हीन। सेइ भावे हइ आमि ताहार अधीन॥ २२॥ अनुवाद-यदि कोई शुद्धभक्ति भावसे मुझे अपने पुत्र, मित्र अथवा प्राणप्रियतमके रूपमें भावना करते हुए अपनेको बड़ा मानता है और मुझे अपने समान या छोटा समझता है, तो मैं उसके प्रेमके वशीभूत हो जाता हूँ॥ २१-२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो 'कृष्ण मेरा पुत्र हैं', इस प्रकार वात्सल्य भाव; 'कृष्ण मेरे सखा हैं', इस प्रकार सख्य भाव; 'कृष्ण मेरे प्राणपति हैं', इस प्रकार मधुरभावसे शुद्धभक्ति करते हैं और रसभेदसे मुझे छोटा मानकर स्वयंको बड़ा मानते हैं, उनके उस भावसे मैं उनके अधीन हो जाता हूँ। 'शुद्धभक्ति'-ज्ञानकर्म-आवरणहीन, अन्याभिलाषाशून्य, अनुकूल सङ्कल्पयुक्त श्रीकृष्णानुशीलनरूप भक्ति ही 'शुद्धभक्ति' कहलाती है॥ २१-२२॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचरितामृतमें हम 'भक्ति' और 'शुद्धभक्ति'के साथ-साथ 'बिद्धभक्ति'का भी उल्लेख देखकर भक्तिके तीन विभागोंको लक्ष्य करते हैं। अन्याभिलाषितायुक्त, ज्ञानकर्मयोगादिके द्वारा आवृत, श्रीकृष्णसे पृथक् भोगके अनुशीलनके साथ हरिसेवाकी सजावटको 'बिद्धभक्ति' कहते हैं। कर्ममिश्रा, ज्ञानमिश्रा, योगमिश्रा और भोगमय-व्रतमिश्रा आदिके द्वारा आवृत सेवाचेष्टा बिद्धभक्तिके अन्तर्गत है। इसमें शुद्धभक्तिसे पृथक् अन्यरूप चेष्टा वर्तमान रहती है। अबिद्धा-सेवामयी विधिके अनुगमनसे 'भक्ति' होती है। यह भक्ति बिद्धभक्तिसे स्वतन्त्र और विष्णुकी अनुकूल-चेष्टामयी होती है। रागात्मिक भक्तोंकी अहैतुकी, नित्य-हरिसेवाके अनुगमनके लोभसे उदित प्रेमसेवाको 'शुद्धभक्ति' कहा जाता है; वह केवलमात्र शास्त्रके नियमोंके द्वारा परिचालित नहीं होती। 'वैधीभक्ति' या 'भक्ति' या 'अबिद्धा भक्ति' शुद्धभक्तिकी सहायिका होनेपर भी 'शुद्धभक्ति' शब्दसे रागानुगा-सेवाको ही लक्ष्य किया है। शुद्धभक्तिको भक्तिकी पराकाष्ठा कहा जाता है। यह गोलोकके भक्तोंकी रागमयी भक्ति है और वैधीभक्ति परव्योम या वैकुण्ठके भक्तोंकी गौरवमयी भक्ति है॥ २२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४४)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ २३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ २३॥ अनुभाष्य-स्यमन्तपञ्चकमें सूर्यग्रहणके उपलक्ष्यपर द्वारकासे यादवगण और व्रजसे सभी व्रजवासियोंके साथ नन्दमहाराज उपस्थित हुए थे। गोकुलवासिनी व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णका मिलन होनेपर श्रीकृष्ण गोपियोंसे कह रहे हैं- मयि भूतानां (प्राणिनां) भक्तिः (श्रवणकीर्त्तनाख्या) अमृतत्वाय (नित्यपार्षदत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति) हि। भवतीनां (गोपीनां) मदापनः (मत्साक्षात्कारकः) मत्स्नेहः यत् आसीत् तत् दिष्ट्या (तत् तु मद्भाग्येनैव)। चौथा अध्याय | १५५