श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/२० अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ ! जो मेरी जिस भावसे उपासना करता है, मैं उसे उसी भावसे प्राप्य होता हूँ। सभी मनुष्य मेरे ही पथ अर्थात् मेरे द्वारा प्रदर्शित पथके अनुगामी हैं ॥२०॥ अनुभाष्य—भगवान्ने पहले सूर्यको जिस योगविषयमें उपदेश दिया था, उसके परम्पराक्रमसे आते हुए नष्ट हो जानेपर वे पुनः अर्जुनको वही उपदेश कर रहे हैं। भगवान् अपनी प्रकटलीलाका कारण बतलाते हुए यह श्लोक कह रहे हैं— हे पार्थ (अर्जुन), ये (भक्ताः) यथा (येन भावेन) मां (कृष्णं) प्रपद्यन्ते, अहं तथैव तान् भजामि (अनुगृह्णामि)। मनुष्याः सर्वशः (सर्वप्रकारेण एव) मम वर्त्म (सिद्धमार्गं) अनुवर्त्तन्ते (अनुसरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन ! भक्त जिस भावसे मेरी शरण ग्रहण करता है, मैं भी उसी भावसे उसपर अनुग्रह करता हूँ। मनुष्य सभी प्रकारसे ही मेरे द्वारा सिद्ध किये गये मार्गका अनुसरण करते हैं ॥२०॥ अमृतानुकणिका—जो व्यक्ति जिस भावसे मेरे प्रति प्रपत्ति स्वीकार करते हैं, मैं उनका उसी भावसे भजन करता हूँ। सभी मतोंका चरम उद्देश्यस्वरूप मैं, सबको ही प्राप्य हूँ। शुद्ध भक्तगण मेरे सच्चिदानन्द विग्रहकी नित्य-सेवा प्राप्तिके लिये मेरी आराधना करते हैं, मैं ऐसे प्रेमी भक्तोंको अपना नित्य परिकर बनाकर उनको अभिलषित प्रेममयी सेवा प्रदान करता हूँ। सकाम कर्मियोंके निकट मैं कर्मफल प्रदाता ईश्वरके रूपमें प्राप्त होता हूँ। जो निर्विशेषवादी हैं, मैं उनको (उनके) आत्मविनाशके द्वारा निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप निर्वाण-मुक्ति प्रदान करता हूँ। मेरे सच्चिदानन्द विग्रहके नित्यत्वको स्वीकार नहीं करनेके कारण उनके चिदानन्द स्वरूपका लोप हो जाता है। उनमेंसे निष्ठाभेदके अनुसार किसी-किसीको नश्वर जन्म भी प्रदान करता हूँ। जो शून्यवादी हैं, मैं शून्यस्वरूप होकर उनकी सत्ताको शून्यगत कर देता हूँ। जो जड़, जड़कर्म अथवा जड़विधिवादी हैं, उनके आत्माको आच्छादित चेतनरूपमें जड़प्राय बनाकर जड़रूपमें ही उनको प्राप्य होता हूँ। जो योगी हैं, उनके निकट मैं ईश्वरके रूपमें विभूति प्रदान करता हूँ अथवा कैवल्य दान करता हूँ। इस प्रकार सर्वस्वरूप होकर मैं सभी मतवादियोंके लिये प्राप्य होता हूँ। परन्तु इन सबमें गोलोक-व्रजमें मेरी सेवा-प्राप्तिको ही प्रधान समझना चाहिये। मनुष्यमात्र ही मेरे विविध पथका अनुसरण करते हैं। श्रीगीताके इस श्लोकके द्वारा यह ठीक प्रकारसे समझना चाहिये कि जो जिस-जिस प्रकारसे भजन करते हैं, उन्हें अपनी-अपनी कामनाके अनुरूप ही फल प्राप्त होता है, सबका फल एक समान कदापि नहीं होता। 'मनुष्याः पार्थ सर्वशः'—इसका अर्थ कुछ लोग इस प्रकार करते हैं कि जो जैसा भी करें, वे सभी भगवान्के ही भजनपथमें हैं और एक ही फल प्राप्त करेंगे, यह सर्वथा भ्रान्त धारणा है। कुकर्मियोंकी, ज्ञानियोंकी, भक्तोंकी और प्रेमी भक्तोंकी अन्तमें एक ही गति होगी—इस विचारका गीता, भागवतादि शास्त्रोंमें खण्डन किया गया है, क्योंकि गीता (९/२५) में आगे कहा गया है— “यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥” “देवपूजकगण देवलोकको प्राप्त होते हैं, पितृपूजकगण पितृलोकको प्राप्त होते हैं, भूतपूजकगण भूतलोकको प्राप्त होते हैं और मेरी पूजा करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।” ॥२०॥ १५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत