भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/१७-२० ]

भगवतावतार अवश्य ही आश्रय करके रहते हैं तथा उनके द्वारा नियुक्त पालनकर्त्ता विष्णु श्रीकृष्णके स्वरूपमें ही थे। विष्णुके द्वारा ही श्रीकृष्ण सभी असुरोंका संहार करते हैं। असुरोंका वध श्रीकृष्णावतारका केवल आनुषङ्गिक कार्यमात्र है। किन्तु प्रेमरस-सारके आस्वादन और राग तथा भक्तिको जगत्में प्रचार करनेके लिये परम-रसिक और परम-करुणामय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की थी। श्रीकृष्णके मनका भाव यह है— “ऐश्वर्यज्ञानसे जगत् परिपूरित है; उस ऐश्वर्यज्ञानसे जो शिथिल प्रेम उदित होता है, उसमें मेरी प्रीति नहीं रहती। जो भक्त स्वयंको छोटा मानकर मुझे ईश्वर मानता है, उसका प्रेम ऐश्वर्यगत है, मैं कभी भी उस प्रेमके अधीन नहीं होता हूँ; मेरा जो जिस भावसे भजन करता है, मैं भी उसका उसी भावसे भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है।” ॥ १७-१९॥ अमृतानुक्रमणिका—ऐश्वर्यज्ञानी भक्त श्रीकृष्णको अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके और समस्त भगवत्स्वरूपोंके भी ईश्वर मानकर स्वयंको एक धूलिकणसे भी तुच्छ मानते हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णके अनुग्रहके प्रार्थी हैं अर्थात् श्रीकृष्णके अधीन हैं, किन्तु श्रीकृष्ण उनके अधीन नहीं हैं। प्रेमकी जिस अवस्थामें पहुँचकर भक्त श्रीकृष्णको वशीभूत कर सकते हैं, ऐश्वर्यज्ञानी भक्त प्रेमकी उस अवस्थाको प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि ऐश्वर्यज्ञानसे उनका प्रेम शिथिल हो जाता है और श्रीकृष्ण ऐसे प्रेमके वशीभूत नहीं होते तथा उस प्रेममें उनकी प्रीति नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है—श्रीकृष्ण शुद्धप्रेमवाले भक्तोंके अधीन होते हैं, किन्तु ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तोंके अधीन नहीं होते, तो क्या इसके द्वारा श्रीकृष्णका पक्षपातित्वरूप वैषम्य परिलक्षित नहीं होता? इसके उत्तरमें कह रहे हैं—जो भक्त जिस भावसे श्रीकृष्णका भजन करता है, वे उसपर उसीके अनुरूप अनुग्रह करते हैं। जो स्वयंको श्रीकृष्णके अधीन मानकर उनसे अनुग्रहकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें अपने अधीन भक्त मानकर अधीनसूचक अनुग्रह प्रकाश करते हैं। और जो भक्त श्रीकृष्ण-वशीकरण प्रेमकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें वह प्रेम प्रदानकर उसके अधीन हो जाते हैं। श्रीकृष्ण सदा ही भक्तोंकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करते हैं। यह श्रीकृष्णका स्वभाव है, इसलिये इसमें उनका पक्षपातित्व प्रकाश नहीं होता। यदि वे किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा करें और किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा नहीं करें, तब उनका पक्षपातित्व प्रकाशित होगा। यदि कहें कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण क्या इस भक्तका ऐश्वर्यज्ञान दूरकर उसे निजवशीकरण प्रेम नहीं प्रदान कर सकते? इस पयार (१९) में इसके उत्तरमें कह रहे हैं—भक्तकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करना ही श्रीकृष्णका स्वभाव अथवा स्वरूपानुबन्धि गुण है और इसमें कभी भी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये श्रीकृष्ण ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तके भावका परिवर्तन नहीं करते॥ १७-१९॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २० ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०॥

चौथा अध्याय | १५३