भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/१५-१९ 'एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम'-ये दो इच्छाएँ श्रीकृष्ण अवतारके मूल कारण होनेपर भी दोनों इच्छाओंको एक समान प्रधान नहीं कहा जा सकता। रसास्वादन उनका निजी कार्य है, केवल अपने लिये है- “अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥” (आदि ४/१०३) और करुणा उनका एक स्वरूपगत गुण है, इसीके वशीभूत होकर वे जीवके निस्तारकी चेष्टा करते हैं- “'लोक निस्तारिब', - एइ ईश्वर-स्वभाव॥” (अन्त्य २/६) इस करुणाके वशीभूत होकर उन्होंने जीवोंके निस्तारके उद्देश्यसे रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छा की। रसास्वादन-स्पृहाके परिपूर्ण होनेसे जीवोंके लिये रागमार्गकी भक्तिका प्रचार आनुषङ्गिक रूपसे स्वतः ही सम्पन्न हो जायेगा। इसलिये प्रेमरस-निर्यासर-आस्वादन ही श्रीकृष्ण अवतारका मुख्य अन्तरङ्ग कारण है; और रागमार्ग भक्ति-प्रचारको गौण अन्तरङ्ग कारण मानना होगा। तथापि दोनों कारणोंको अन्तरङ्ग कहनेका हेतु यह है- दोनों कार्य श्रीकृष्णके निज कार्य हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्स्वरूप रागमार्गकी भक्तिका प्रचार नहीं कर सकते॥ १५-१६॥ ऐश्वर्यज्ञानेते सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥ १७॥ अनुवाद-सभी लोगोंकी भक्ति मेरे ऐश्वर्य ज्ञानसे मिश्रित है। किन्तु ऐसे ऐश्वर्य-ज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥ १७॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/१६ में यह पद्य द्रष्टव्य है॥ १७॥ आमारे ईश्वर माने, आपनाके हीन। तार प्रेमे वश आमि ना हइ अधीन॥ १८॥ अनुवाद-जो मुझे ईश्वर मानता है और स्वयंको हीन (छोटा) समझता है, ऐसे व्यक्तियोंके प्रेमसे मैं वशीभूत नहीं होता हूँ॥ १८॥ आमाके त' ये ये भक्त भजे येइ भावे। तारे से से भावे भजि, - ए मोर स्वभावे॥ १९॥ अनुवाद-जो-जो भक्त जिस-जिस भावसे मेरा भजन करता है, मैं उसी-उसी भावसे उसका भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है॥ १९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे, उसी समय जगत्के भार-हरणका काल भी उपस्थित हुआ। जगत्के भार-हरणका दायित्व स्थितिकर्त्ता विष्णुके ऊपर है, भार-हरण स्वयं-भगवान्का कार्य नहीं है। श्रीकृष्णके अवतीर्ण होनेके समय भारहरणका काल उपस्थित होनेसे, पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णमें इसलिये नारायण, चतुर्व्यूह अर्थात् वासुदेव- सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, मत्स्यादि सभी अंशावतार, युगावतार और मन्वन्तरावतार-सभी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें अवतीर्ण हुए थे। पूर्ण भगवान्में उनके अङ्ग और अंशादि-खण्डरूप सभी १५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत