श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/१५-१६ ] रसिक-शेखर कृष्ण परमकरुण। एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम॥ १६ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, इसलिये अपने ही प्रेमरसके सारका आस्वादन और वे परम करुण हैं, इसलिये जगत्में बद्धजीवोंके उद्धारके लिये रागमार्ग भक्तिका प्रचार—इन दो कारणोंसे श्रीकृष्णकी अवतीर्ण होनेकी इच्छा उत्पन्न हुई॥ १५-१६॥ अमृतानुकणिका—'प्रेमरस निर्यास'—विभाव-अनुभावादिके मिलनसे परमास्वादन-चमत्कारिता-प्राप्त प्रेमका सार। 'रागमार्ग भक्ति'—रागानुगा भक्ति। (भःरःसिः पूर्व २/२७२,२७०)— “इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्। तन्मयी या भवेद्भक्तिः साऽत्र रागात्मिकोदिता॥ विराजन्तीमभिव्यक्तं व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते॥” अर्थात् “इष्ट (श्रीकृष्ण) में स्वाभाविकी जो एक प्रेममयी तृष्णा है, उसके कारण इष्टमें परमाविष्टता अथवा आवेश हुआ करता है। उस प्रेममयी-तृष्णाका नाम है—'राग'। रागमयी भक्तिको 'रागात्मिका-भक्ति' कहते हैं और यह व्रजवासी-जनोंमें सुस्पष्ट भावसे विराजमान है। उस रागात्मिका-भक्तिका जो अनुगमन अथवा अनुसरण करती है, उसे 'रागानुगा-भक्ति' कहते हैं।” अन्य युगावतार जगत्में वैधीभक्तिकी स्थापनाके लिये अवतीर्ण होते हैं। परन्तु स्वसुख-वासनाशून्य और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमयी सेवामें श्रीकृष्णके प्रति भक्तोंका जो ऐश्वर्यज्ञानहीन विशुद्ध प्रेम प्रकाश पाता है, उस प्रेम-रस-सारका आस्वादन करनेके लिये और जीवोंमें रागानुगा भक्तिके प्रचारके लिये श्रीकृष्ण व्रजमें अवतीर्ण हुए—यही स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका अन्तरङ्ग कारण है। इन दो उद्देश्योंकी सिद्धिकी इच्छा उनके दो स्वरूपानुबन्धि गुणोंके कारण ही हुई, किसी अन्यके द्वारा नहीं। श्रीकृष्णका रसिक-शेखरत्व और परम-करुणत्व—ये दो गुण उनके स्वरूपानुबन्धि गुण हैं। वे रसिक शेखर हैं, इसलिये उत्कृष्ट रसास्वादनकी उनकी स्वाभाविकी इच्छा है, रसोंमें भक्तोंका प्रेमरस-निर्यास (सार) सर्वोत्कृष्ट है। तभी उनकी भक्तोंके प्रेमरस-निर्यासके आस्वादनकी इच्छा हुई। मायाबद्ध जीव संसारमें अनादिकालसे दुःख भोग रहे हैं। उनके इस संसार दुःखको दूरकर अपने श्रीचरणसेवाका अन्तरङ्गतम अधिकार देकर परमसुखके अधिकारी बनानेके अभिप्रायसे परम-करुण श्रीकृष्णकी रागानुगाभक्तिके प्रचारकी इच्छा हुई। जगत्में तब केवल वैधीभक्ति प्रचलित थी, परन्तु वैधीभक्तिके द्वारा व्रजके भावको प्राप्त नहीं किया जा सकता। 'रसिक-शेखर'—रसिकोंमें सर्वश्रेष्ठ; रसिकेन्द्र चूड़ामणि। परतत्त्व श्रीकृष्णको श्रुतियोंमें कहा गया हैं—'रसो वै सः' अर्थात् वे रसस्वरूप हैं। रस-शब्दके दो अर्थ हैं। 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः'—जिसका आस्वादन किया जाय, वह रस है; जैसे मधु। और 'रसयति आस्वादयति इति रसः'—जो आस्वादन करे, उसे भी रस कहा गया है; जैसे भ्रमर। इसलिये रस-शब्दके अर्थ हैं—आस्वाद्य रस और आस्वादक रसिक। इस पयारमें आस्वादक रसिक—केवल एक ही अर्थका उल्लेख हुआ है। श्रीकृष्ण अद्वय-तत्त्व हैं, उनके समान रसिक अन्य कोई नहीं हैं, इसलिये वे रसिक-शेखर हैं। चौथा अध्याय | १५१